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मैत्रेयी का कलिम्पोंग
से फोन आया तो रथीन्द्रनाथ और प्रतिमादेवी कलिम्पोंग गए थे. रवीन्द्रनाथ के माथे
पर ज़ख्म था, और वे बात करने की स्थिति में नहीं थे.
“क्या हुआ बाबूजी को?” प्रतिमादेवी ने पूछा.
“ठीक तरह से तो मुझे मालूम
नहीं है. परन्तु शायद हमेशा की तरह सुबह-सुबह खिड़की खोलने गए होंगे. और चक्कर आने से खिड़की के नीचे गिर गए होंगे.
दीवार का कोना उन्हें लग गया होगा. उनकी काम वाली सेविका देर से आने वाली थी, इसलिए मैं चाय लेकर ऊपर आई, तो उन्हें इस हालत में
देखा.”
“मैत्रेयीदेवी, आपने हमारे पिता की जितनी
संभव थी,
सेवा की. मगर अब हम उन्हें कलकत्ता में जोडोसान्को की ठाकुरबाड़ी में ले जायेंगे.
वहां सारे रिश्तेदार हैं, खूब बड़ा मित्र परिवार है, और बढ़िया डॉक्टर हैं.”
“आप ठीक कह रहे हैं. उन्हें
बढ़िया इलाज की आवश्यकता है. हमें विश्ववंद्य कवि की अल्प सेवा करने का अवसर
प्राप्त हुआ,
यह हमारा सौभाग्य है.”
इसके बाद रवीन्द्रनाथ
जोडोसान्को की ठाकुरबाड़ी में पश्चिम की ओर वाले अपने मनपसंद कमरे में आये और
उन्हें प्रसन्नता का अनुभव हुआ. “रथी, यहाँ आये और मन प्रसन्न हो गया. घूम फिर कर यहीं आये, अब पूरी तरह ठीक होने तक
यहीं रहेंगे.”
“इसीलिये तो आपको यहाँ लाये
हैं.”
उस दिन प्रसन्नचित्त
रवीन्द्रनाथ थोड़ी ही देर बाद अखबारों के समाचार पढ़ते हुए हताश होकर पलंग पर लेट
गए. ब्रिटिश शासन एक और भारतीय सेना लेकर युद्ध में उतरने वाला था. काले मेघ आकाश को
ढांक लें और वातावरण उदास हो जाए ऐसा लग रहा था.
“यह सब देखने के लिए हम क्यों
ज़िंदा हैं?”
यह प्रश्न भी उनके सामने था.
‘जीवन का प्रयोजन लेखन था, कि अत्यधिक प्रवास था, प्रेम था या प्रेम की विफलता
थी,
शान्तिनिकेतन के विश्वविद्यालय बनने की प्रक्रिया में उत्पन्न आर्थिक स्थिति को
संभालना था? कलाओं को प्रोत्साहन देकर स्वतन्त्र कला का विकास देखना था, या जी भर के प्रकृति के
सौन्दर्य को निहारते हुए एकाकी रहना था?
मनुष्य के जीवन का प्रयोजन वह
स्वयं निश्चित करता है या नियति? नियति
ही गढ़ती है. वही हमारे जीवन का मनचाहा डिजाईन बनाती है. हमारे हाथों से कर्म
करवाती है. रंग भी वही भरती है, बिखेर भी देती है. कर्म की अदृश्य पंक्तियाँ वही
हमारे माथे पर लिखती है. हमारे जीवन में कौन कौन आने वाला है, ये वही निश्चित करती है.
श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘अरे भोले अर्जुन, यदि तुम्हें कुछ आकलन न हो रहा हो तो अनन्य भाव से ‘मामेकं शरणम् व्रज.’
‘क्या हम नियति की शरण में थे?’ उनके ही मन ने प्रश्न किया.
‘नहीं, रोबी, तुम नियति की शरण में नहीं
थे. तुम स्वकर्तृत्व का इतिहास लिख रहे थे. शांतिनिकेतन का पौधा तुमने बोया, उसे विकसित किया, अपार परिश्रम से यह संभव
हुआ. जैसे विश्वामित्र ने वैभव संपन्न इंद्र को आह्वान किया था, उसी तरह तुमने विद्यार्थियों
को शिक्षा देने के लिए, कला को विकसित करने के लिए ब्रिटिशों के विरोध को ललकारा
था.’
‘मगर अब?’
‘तुमने नींव ही इतनी मज़बूत
बनाई है कि विरोधी भी कभी तुम्हारे परिश्रम की इमारत गिरा नहीं पायेंगे. तुमने
जैसी निष्ठा से जो जो कार्य किया, वह हर काम अमर हो गया. इतिहास में वह स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा. भविष्य
में भी ‘बाईशे श्रावण’ मनाया जाएगा, सप्तपर्णी
का पत्ता देकर स्नातकों का सम्मान किया जाएगा. सब कुछ तुम्हारी इच्छानुसार होगा, रोबी.’
रवीन्द्रनाथ मनःपूर्वक हँसे.
नियति को छोड़कर उन्हें ‘रोबी’ नाम से संबोधित करने वाला कोई नहीं था. और ‘बाबूजी’ कहकर पुकारने वाले केवल
रथीन्द्र और प्रतिमा थे.
माधुरीलता इस दुनिया में नहीं
थी. रेणुका नहीं थी. मीरा वृद्धावस्था में अपनी ससुराल में थी. सौमिन्द्र नहीं था, या आगे रवीन्द्रनाथ का वंश
चले, उनका नाम आगे बढ़े, ऐसा कोई उत्तराधिकारी नहीं था.
पल भर को उदास हुआ मन प्रसन्न
हो गया.
बचपन से प्रौढावस्था तक और अब
इस जराजर्जर अवस्था तक हमारी सखी, प्रिय कविता कामिनी ही रही. उसने सुख में, दुःख में, धूप में, बरसात में हमारा साथ नहीं छोड़ा. अब
उठना मुश्किल है. जीवन परावलंबी हो गया है. खिड़की से दिखाई देने वाले क्षितिज के
रंगों को भी गर्दन घुमा कर नहीं देख सकते. अब कुछ ही दिनों में ‘बाईशे श्रावण’ आयेगा. विद्यार्थी पंचतत्वों
की वेशभूषा में खड़े होंगे. पालकी में कोमल पौधे लेकर लडके-लड़कियां रंगबिरंगी
वेशभूषा में आयेंगे. वे पौधे पृथ्वी में लगाए जायेंगे. तब और शायद आगे भी हम नहीं
रहेंगे.’ यह विचार आते ही वे पल भर को उदास हो गए.
मन को संवरने का शौक था. गहन
दुःख के कितने ही प्रसंग आयें, उनमें से उबारने वाली उनकी सखी कविता ही थी. थोड़ी देर पहले जब विचार आया था, तो उन्होंने मन ही मन कहा,
‘हमारा कोई वारिस नहीं, रवीन्द्रनाथ का वंश आगे
चलेगा नहीं,
परन्तु ऐसा कदापि नहीं होगा. हमारा संगीत, हमारा नाट्य, हमारा नृत्य ‘रवीन्द्र’ नाम से आगे जाएगा. हमारी
कविता – रवीन्द्रनाथ की कविता, कथा,
उपन्यास काल के पटल पर उत्कीर्ण हो गई है. साहित्य का, भारतीय और बंगाली साहित्य का इतिहास लिखते हुए
उसमें ‘रवीन्द्रनाथ ठाकुर’ यह नाम प्रमुख होगा. हमारा वंश-वारिस न होते हुए भी हमारा नाम चिरस्थायी
रहेगा.’
वे प्रसन्नता पूर्वक हँसे.
जुलाई में आये तूफ़ान और बारिश
से वृक्ष दहल गए थे. कहीं प्रलय ही तो नहीं आने वाला है, ऐसा भय व्याप्त हो गया था.
परन्तु वसुंधरा ने मखमल जैसी तरुण शय्या ओढ़ ली थी, सुनहरी सूर्य किरणों ने उस पर नक्काशी बनाई थी.
यह देखकर वे उठे. खिड़की से गहरा हरा, तोते जैसा रंग चमक रहा था.
मनुष्य के मन में भी ऐसी ही
टूट फूट होती रहती है. ऐसा प्रतीत होता है, मानो सब कुछ नष्ट हो गया है, समाप्त हो गया है. परन्तु
शेष रहता है चैतन्य. कितनी ही बिजलियों से आती है वसुंधरा की पुकार. बारिश यद्यपि
थमी नहीं थी,
परन्तु उसका ज़ोर कम हो गया था. प्रकृति के सम्मुख वह भी नतमस्तक हो गई है.
छोटी सी खिड़की से बाहर देखने
से वे प्रसन्न हो गए. इन दिनों उन्होंने एक भी अखबार हाथ में नहीं लिया था. वे
अपने आप में मगन थे, परन्तु अब विश्व युद्ध की हवा के चलने के साथ ही भारत में स्वतंत्रता के
आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ लिया था. यह स्वतंत्रता का सूर्योदय नहीं था, परन्तु पूर्वी क्षितिज पर
प्रकट हुए रंगों से उन्हें विश्वास हो गया कि सारथी अरुण रविराज को निश्चित ही
लेकर आयेगा.
और आंखों के सम्मुख भारत का
लहराता हुआ ध्वज दिखाई देने लगा. साथ ही उन्हें अपनी लिखी पंक्तियाँ याद आईं:
जन गण मन अधिनायक जय हे,
भारत भाग्य
विधाता!
पंजाब, सिंधु, गुजरात, मराठा,
द्राविड, उत्कल, वंग!
विंध्य, हिमाचल, यमुना, गंग,
उच्चल
जलधितरंग!
तव शुभनामे जागे!
तव शुभ आशिष
मागे!
गाहे तव जय
गाथा!
जनगण मंगलदायक
जय हे भारत भाग्यविधाता!
जय हे! जय हे!
जय हे! जय जय जय जय हे!
वे प्रसन्नता पूर्वक हंसे.
हज़ारों भारतीयों के कंठ से उन्हें यह गीत सुनाई देने लगा. पांच ही मिनट बैठने से
उनकी पीठ में दर्द होने लगा.
तभी रथींद्र और प्रतिमा भी
आये.
“बाबूजी, पलंग को खिड़की के और निकट
सरकाऊँ क्या?
जिससे आपको अच्छी तरह दिखाई देगा.”
“नहीं, रथी, अब कुछ नहीं चाहिए. वे उदास
स्वर में बोले,
मानो अंतिम बिदा ले रहे हों. रथींद्र के ध्यान में यह बात आ गई, वह हंसते हुए बोला,
“ऐसे कैसे कुछ नहीं, बाबूजी! पिछले वर्ष आपकी
‘नवजातक’,
‘सानाई’
रोगशय्याय’ – ये पुस्तकें प्रकाशित हुई
थीं. अब देखिये,
आपने जो ‘यादों के पल’ लिखे थे,
उन पर आधारित किताब दिसंबर में ही प्रकाशित हो चुकी है. परन्तु आप उधर शांति
निकेतन और फिर कलिम्पोंग में थे, इसलिए हर बार वह किताब आपको देना भूल जाता था. ये देखिये, यह है वो किताब.”
“छेले बेला”, रथींद्र उनके
हाथ में किताब देते हुए बोला.
“अभी और किताबें लिखनी हैं
इसलिए जल्दी ठीक होना है.”
“हाँ, बाबूजी...जल्दी ही ठीक होना
है आपको.” प्रतिमादेवी ने कहा.
“हम प्रसन्न हैं. ठीक ही हैं.
हम जियेंगे भारत के स्वतन्त्र होने तक . हर भारतीय के मन की बेचैनी और तीव्र
इच्छा हमारे मन में
भी है. हम अच्छे हो ही जायेंगे.”
अनजाने ही उनके शब्द लडखडाये, उन्हें एहसास नहीं हुआ
परन्तु रथींद्र और प्रतिमादेवी को फ़ौरन समझ में आ गया.
अगले आठ दिन डॉक्टरों के दवा
देने के बाद भी शरीर के अंग शिथिल हो गए थे. थक गए थे. उन्हें चिर विश्रांम की
आवश्यकता थी,
परन्तु मन इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं था, वह जीवन की ओर खीच रहा था. रवीन्द्रनाथ विचार
ही नहीं कर रहे थे.
मगर उस दिन, शाम होते ही वे उठ कर बैठ
गए. सूर्य अब पश्चिम की ओर जा रहा था, और क्षितिज पर विविध रंग बिखरे हुए थे. उनकी
आंखों से अनजाने ही आंसू बह निकले. संध्या अपने महल के द्वार पर रविराज का स्वागत
करने के लिए खड़ी थी.
यह देखते ही उनकी इच्छा हुई
कि अपना आनंद से,
वेदना से भर आया ह्रदय किसी को बताएं, मन का आकाश रिक्त करें. मगर ऐसा कौन था? जिसके सम्मुख अपने मन की
भावनाएं व्यक्त कर सकें. उन्हें अपनी ही बहुत पुरानी कविता याद आई. मासूम चपला और
मुरला का संवाद. चपला पूछती है:
सखी भावना कोहेरे बोले? सखी जातोना कोहेरे बोले?
तोमारा जो बोलो, दिवश रजनी, भालोबाशा, भालोबाशा.
सखी, भालोबाशा कारे कोय? शे की केबलई जातनामय
सखी, चिंता, यातना का अर्थ क्या है? तुम लोग दिन-रात कहते रहते
हो, क्या प्रेम भी यातना ही है?
शे की केबलई चोखेर जाय?
शे की केबलई दुखेर शाश?
लोके तॉबे
करे की शुखरी तोरे
ऐमान दुखेर आश?
प्रेम के बारे में कितने
भोलेपन से पूछती है,
‘क्या प्रेम होने पर आंखों
में पानी आता है?
क्या प्रेम दुःख का नि:श्वास है? आगे की पंक्तियाँ प्रयत्न करने पर भी याद नहीं आईं.
‘प्रेम’ शब्द का विविध सुखद
अनुभव उन्होंने लिया था. नृत्य, नाट्य,
कथा,
उपन्यास में उसे प्रस्तुत किया था. जी भर के प्रेम का अनुभव करते हुए वे प्रसन्न
थे.
बस! इस अतीव आनंद के क्षण में
जीवन का पूर्णविराम हो, ऐसी बात मन में आई.
कविता कामिनी निरंतर उनके पास
थी. अनेक प्रिय कामिनियों का स्मरण भी पिछले दो-तीन दिनों में हुआ था. वे समाधानी
थे.
देखते-देखते खिड़की से दिखाई
दे रहा आकाश कृष्ण मेघों से आच्छादित हो गया. समूची प्रकृति कृष्ण हो गयी थी, और उसकी राधा थी वसुंधरा.
उसने वसुंधरा को अपने अंक में छुपा लिया था.
‘हमारी वसुंधरा! हमारी भारत
माता!’
उनका मन भर आया. मन ही मन
बोले,
‘हे ईश्वर, तू कण कण में है, हरेक मन में है. कोई तुझे
मानता है,
कोई नहीं मानता. फिर भी तुम समान भाव से सर्वत्र हो. हम भी अनेक बार अकेले रहे
हैं. अनेक अपमानास्पद प्रसंगों से गुज़रे हैं. तुम्हारा स्मरण किया, प्रभु... तुम्हारा ही स्मरण
हुआ. ‘एकला चलो रे’ कहते रहे,
परन्तु तुम और केवल तुम ही हमारे मन में थे.
आज हमारे वंश को आगे बढ़ाने
वाला कोई नहीं है. यह दुःख पल भर के लिए मन में आया भी. ऐसे विचार भी मन में आये :
हमने कौन सा पाप किया, कौनसा पुण्य किया, इसका लेखा जोखा रखा नहीं. हमने जो भी चाहा उसे प्राप्त
करने के प्रयत्न में तुम भी हमारे साथ निरंतर प्रयत्न करते रहे.
हम दुखी न हों, इसलिए हमेशा हमारे साथ कविता
सखी दी. तुम्हारे आभारी हैं. शायद जितना अतुल सुख जिस समय प्राप्त हुआ, तभी दुःख के पहाड़ भी गिरे, परन्तु उनका संयमपूर्वक
सामना करने की शक्ति तुमने दी. अब सिर्फ एक ही मांगता हूँ...
‘हमें नहीं चाहिए
मोक्ष...हमें नहीं होना है मुक्त! हमें स्वतन्त्र, शृंखलारहित, लावण्यवती हमारी भारत माता को देखना है.
गहरा हरा महावस्त्र धारण किये, माथे पर हिमालय का दमकता
मुकुट धारण करने वाली, पांवों में सर-सरिताओं के घुँघरू बांधे, घने वन के सुगन्धित समीर को पुकारने वाली, सुहास्य वदना, चारुगात्री, सुनेत्रा, सुकेशी हमारी हमारी भारत माता
को स्वतन्त्र विहार करते हुए देखना है.
हे ईश्वर, आज तक इस इक्यासी वर्षों की
आयु में हमने तुमसे कुछ भी नहीं माँगा, आज बस यही मांगते हैं. उसको स्वतन्त्र
देखने के लिए हमें मृत्यु नहीं चाहिए, ऐसा हम कभी नहीं कहेंगे, परन्तु उसे स्वतन्त्र देखने के लिए हमें फिर से
जन्म दे. नहीं चाहिए हमें वह पुण्य पावन मोक्ष. हमें चाहिए पुनः जन्म! पुनः जन्म!’
मन ही मन बातें करके वे
अत्यंत थक गए थे. पलंग पर लेटते हुए उनका ध्यान सामने वाले कैलेंडर की ओर गया.
तारीख थी 7 अगस्त
1941. वैसे
तो उस तारीख का कोई विशेष महत्त्व नहीं था. जन्म लेने वाले शिशु जैसा. वह सिर्फ
समय के आगे बढ़ने की सूचक थी.
कल रात को ही अपूर्व सेन ने
वह तारीख बदली थी. वे मन ही मन बोले,
‘तारीखों को महत्त्व तभी
प्राप्त होता है,
जब कोई विशेष घटना घटित होती है. वरना तो वे दिन मौन रहते हैं’.
पास ही की दीवार पर लगा हुआ
वह कैलेण्डर हवा से नीचे गिर गया. गिरने लायक नहीं था फिर भी.
यदि हम इसी तरह हौले से जीवन
से मृत्यु की गोद में गिर जाएँ तो? जैसे जर्जर पत्ता भिरभिराते हुए वृक्ष से दूर चला जाए तो? कितना कठिन होता है, दृष्टिगोचर हो रही सीमा रेखा को पार करना...
वे विचार कर रहे थे. उन्होंने
आंखें मूंद लीं. कुछ ही देर में आये रथींद्र ने उन्हें पुकारा, मगर अदृश्य सीमा रेखा पार
करके वे जा चुके थे.
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