Monday, 10 November 2025

एकला चलो रे - 41

 

41


मैत्रेयी का कलिम्पोंग से फोन आया तो रथीन्द्रनाथ और प्रतिमादेवी कलिम्पोंग गए थे. रवीन्द्रनाथ के माथे पर ज़ख्म था, और वे बात करने की स्थिति में नहीं थे.

“क्या हुआ बाबूजी को?” प्रतिमादेवी ने पूछा.

“ठीक तरह से तो मुझे मालूम नहीं है. परन्तु शायद हमेशा की तरह सुबह-सुबह खिड़की खोलने गए होंगे. और  चक्कर आने से खिड़की के नीचे गिर गए होंगे. दीवार का कोना उन्हें लग गया होगा. उनकी काम वाली सेविका देर से आने वाली थी, इसलिए मैं चाय लेकर ऊपर आई, तो उन्हें इस हालत में देखा.”

“मैत्रेयीदेवी, आपने हमारे पिता की जितनी संभव थी, सेवा की. मगर अब हम उन्हें कलकत्ता में जोडोसान्को की ठाकुरबाड़ी में ले जायेंगे. वहां सारे रिश्तेदार हैं, खूब बड़ा मित्र परिवार है, और बढ़िया डॉक्टर हैं.”

“आप ठीक कह रहे हैं. उन्हें बढ़िया इलाज की आवश्यकता है. हमें विश्ववंद्य कवि की अल्प सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ, यह हमारा सौभाग्य है.”

इसके बाद रवीन्द्रनाथ जोडोसान्को की ठाकुरबाड़ी में पश्चिम की ओर वाले अपने मनपसंद कमरे में आये और उन्हें प्रसन्नता का अनुभव हुआ. “रथी, यहाँ आये और मन प्रसन्न हो गया. घूम फिर कर यहीं आये, अब पूरी तरह ठीक होने तक यहीं रहेंगे.”

“इसीलिये तो आपको यहाँ लाये हैं.”

उस दिन प्रसन्नचित्त रवीन्द्रनाथ थोड़ी ही देर बाद अखबारों के समाचार पढ़ते हुए हताश होकर पलंग पर लेट गए. ब्रिटिश शासन एक और भारतीय सेना लेकर युद्ध में उतरने वाला था. काले मेघ आकाश को ढांक लें और वातावरण उदास हो जाए ऐसा लग रहा था.

“यह सब देखने के लिए हम क्यों ज़िंदा हैं?” यह प्रश्न भी उनके सामने था.

‘जीवन का प्रयोजन लेखन था, कि अत्यधिक प्रवास था, प्रेम था या प्रेम की विफलता थी, शान्तिनिकेतन के विश्वविद्यालय बनने की प्रक्रिया में उत्पन्न आर्थिक स्थिति को संभालना था? कलाओं को प्रोत्साहन देकर स्वतन्त्र कला का विकास देखना था, या जी भर के प्रकृति के सौन्दर्य को निहारते हुए एकाकी रहना था?

मनुष्य के जीवन का प्रयोजन वह स्वयं निश्चित करता है या नियति? नियति ही गढ़ती है. वही हमारे जीवन का मनचाहा डिजाईन बनाती है. हमारे हाथों से कर्म करवाती है. रंग भी वही भरती है, बिखेर भी देती है. कर्म की अदृश्य पंक्तियाँ वही हमारे माथे पर लिखती है. हमारे जीवन में कौन कौन आने वाला है, ये वही निश्चित करती है. श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘अरे भोले अर्जुन, यदि तुम्हें कुछ आकलन न हो रहा हो तो अनन्य भाव से ‘मामेकं शरणम् व्रज.’

‘क्या हम नियति की शरण में थे?’ उनके ही मन ने प्रश्न किया.

‘नहीं, रोबी, तुम नियति की शरण में नहीं थे. तुम स्वकर्तृत्व का इतिहास लिख रहे थे. शांतिनिकेतन का पौधा तुमने बोया, उसे विकसित किया, अपार परिश्रम से यह संभव हुआ. जैसे विश्वामित्र ने वैभव संपन्न इंद्र को आह्वान किया था, उसी तरह तुमने विद्यार्थियों को शिक्षा देने के लिए, कला को विकसित करने के लिए ब्रिटिशों के विरोध को ललकारा था.’

‘मगर अब?   

‘तुमने नींव ही इतनी मज़बूत बनाई है कि विरोधी भी कभी तुम्हारे परिश्रम की इमारत गिरा नहीं पायेंगे. तुमने जैसी निष्ठा से जो जो कार्य किया, वह हर काम अमर हो गया. इतिहास में वह स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा. भविष्य में भी ‘बाईशे श्रावण मनाया जाएगा, सप्तपर्णी का पत्ता देकर स्नातकों का सम्मान किया जाएगा. सब कुछ तुम्हारी इच्छानुसार होगा, रोबी.’

रवीन्द्रनाथ मनःपूर्वक हँसे. नियति को छोड़कर उन्हें ‘रोबी नाम से संबोधित करने वाला कोई नहीं था. और ‘बाबूजी कहकर पुकारने वाले केवल रथीन्द्र और प्रतिमा थे.

माधुरीलता इस दुनिया में नहीं थी. रेणुका नहीं थी. मीरा वृद्धावस्था में अपनी ससुराल में थी. सौमिन्द्र नहीं था, या आगे रवीन्द्रनाथ का वंश चले, उनका नाम आगे बढ़े, ऐसा कोई उत्तराधिकारी नहीं था.

पल भर को उदास हुआ मन प्रसन्न हो गया.

बचपन से प्रौढावस्था तक और अब इस जराजर्जर अवस्था तक हमारी सखी, प्रिय कविता कामिनी ही रही. उसने सुख में, दुःख में, धूप में, बरसात में हमारा साथ नहीं छोड़ा. अब उठना मुश्किल है. जीवन परावलंबी हो गया है. खिड़की से दिखाई देने वाले क्षितिज के रंगों को भी गर्दन घुमा कर नहीं देख सकते. अब कुछ ही दिनों में ‘बाईशे श्रावण आयेगा. विद्यार्थी पंचतत्वों की वेशभूषा में खड़े होंगे. पालकी में कोमल पौधे लेकर लडके-लड़कियां रंगबिरंगी वेशभूषा में आयेंगे. वे पौधे पृथ्वी में लगाए जायेंगे. तब और शायद आगे भी हम नहीं रहेंगे.’ यह विचार आते ही वे पल भर को उदास हो गए.

मन को संवरने का शौक था. गहन दुःख के कितने ही प्रसंग आयें, उनमें से उबारने वाली उनकी सखी कविता ही थी. थोड़ी देर पहले जब विचार आया था, तो उन्होंने मन ही मन कहा,

‘हमारा कोई वारिस नहीं, रवीन्द्रनाथ का वंश आगे चलेगा नहीं, परन्तु ऐसा कदापि नहीं होगा. हमारा संगीत, हमारा नाट्य, हमारा नृत्य ‘रवीन्द्र नाम से आगे जाएगा. हमारी कविता – रवीन्द्रनाथ की कविता, कथा, उपन्यास काल के पटल पर उत्कीर्ण हो गई है. साहित्य का, भारतीय और बंगाली साहित्य का इतिहास लिखते हुए उसमें ‘रवीन्द्रनाथ ठाकुर यह नाम प्रमुख होगा. हमारा वंश-वारिस न होते हुए भी हमारा नाम चिरस्थायी रहेगा.’

वे प्रसन्नता पूर्वक हँसे.  

जुलाई में आये तूफ़ान और बारिश से वृक्ष दहल गए थे. कहीं प्रलय ही तो नहीं आने वाला है, ऐसा भय व्याप्त हो गया था. परन्तु वसुंधरा ने मखमल जैसी तरुण शय्या ओढ़ ली थी, सुनहरी सूर्य किरणों ने उस पर नक्काशी बनाई थी. यह देखकर वे उठे. खिड़की से गहरा हरा, तोते जैसा रंग चमक रहा था. 

मनुष्य के मन में भी ऐसी ही टूट फूट होती रहती है. ऐसा प्रतीत होता है, मानो सब कुछ नष्ट हो गया है, समाप्त हो गया है. परन्तु शेष रहता है चैतन्य. कितनी ही बिजलियों से आती है वसुंधरा की पुकार. बारिश यद्यपि थमी नहीं थी, परन्तु उसका ज़ोर कम हो गया था. प्रकृति के सम्मुख वह भी नतमस्तक हो गई है.

छोटी सी खिड़की से बाहर देखने से वे प्रसन्न हो गए. इन दिनों उन्होंने एक भी अखबार हाथ में नहीं लिया था. वे अपने आप में मगन थे, परन्तु अब विश्व युद्ध की हवा के चलने के साथ ही भारत में स्वतंत्रता के आन्दोलन ने ज़ोर पकड़ लिया था. यह स्वतंत्रता का सूर्योदय नहीं था, परन्तु पूर्वी क्षितिज पर प्रकट हुए रंगों से उन्हें विश्वास हो गया कि सारथी अरुण रविराज को निश्चित ही लेकर आयेगा.

और आंखों के सम्मुख भारत का लहराता हुआ ध्वज दिखाई देने लगा. साथ ही उन्हें अपनी लिखी पंक्तियाँ याद आईं:

जन गण मन अधिनायक जय हे,
भारत भाग्य विधाता!
पंजाब, सिंधु, गुजरात, मराठा,
द्राविड, उत्कल, वंग!
विंध्य, हिमाचल, यमुना, गंग,
उच्चल जलधितरंग!

तव शुभनामे जागे!
तव शुभ आशिष मागे!
गाहे तव जय गाथा!
जनगण मंगलदायक जय हे भारत भाग्यविधाता!
जय हे! जय हे! जय हे! जय जय जय जय हे!

वे प्रसन्नता पूर्वक हंसे. हज़ारों भारतीयों के कंठ से उन्हें यह गीत सुनाई देने लगा. पांच ही मिनट बैठने से उनकी पीठ में दर्द होने लगा.

तभी रथींद्र और प्रतिमा भी आये.

“बाबूजी, पलंग को खिड़की के और निकट सरकाऊँ क्या? जिससे आपको अच्छी तरह दिखाई देगा.”

“नहीं, रथी, अब कुछ नहीं चाहिए. वे उदास स्वर में बोले, मानो अंतिम बिदा ले रहे हों. रथींद्र के ध्यान में यह बात आ गई, वह हंसते हुए बोला,

“ऐसे कैसे कुछ नहीं, बाबूजी! पिछले वर्ष आपकी ‘नवजातक, ‘सानाई रोगशय्याय – ये पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं. अब देखिये, आपने जो ‘यादों के पल लिखे थे, उन पर आधारित किताब दिसंबर में ही प्रकाशित हो चुकी है. परन्तु आप उधर शांति निकेतन और फिर कलिम्पोंग में थे, इसलिए हर बार वह किताब आपको देना भूल जाता था. ये देखिये, यह है वो किताब.”

“छेले बेला”, रथींद्र उनके हाथ में किताब देते हुए बोला.

“अभी और किताबें लिखनी हैं इसलिए जल्दी ठीक होना है.”

“हाँ, बाबूजी...जल्दी ही ठीक होना है आपको.” प्रतिमादेवी ने कहा.

“हम प्रसन्न हैं. ठीक ही हैं. हम जियेंगे भारत के स्वतन्त्र होने तक . हर भारतीय के मन की बेचैनी और तीव्र इच्छा हमारे मन में भी है. हम अच्छे हो ही जायेंगे.”

अनजाने ही उनके शब्द लडखडाये, उन्हें एहसास नहीं हुआ परन्तु रथींद्र और प्रतिमादेवी को फ़ौरन समझ में आ गया.

अगले आठ दिन डॉक्टरों के दवा देने के बाद भी शरीर के अंग शिथिल हो गए थे. थक गए थे. उन्हें चिर विश्रांम की आवश्यकता थी, परन्तु मन इस बात को मानने के लिए तैयार ही नहीं था, वह जीवन की ओर खीच रहा था. रवीन्द्रनाथ विचार ही नहीं कर रहे थे.

मगर उस दिन, शाम होते ही वे उठ कर बैठ गए. सूर्य अब पश्चिम की ओर जा रहा था, और क्षितिज पर विविध रंग बिखरे हुए थे. उनकी आंखों से अनजाने ही आंसू बह निकले. संध्या अपने महल के द्वार पर रविराज का स्वागत करने के लिए खड़ी थी.  

यह देखते ही उनकी इच्छा हुई कि अपना आनंद से, वेदना से भर आया ह्रदय किसी को बताएं, मन का आकाश रिक्त करें. मगर ऐसा कौन था? जिसके सम्मुख अपने मन की भावनाएं व्यक्त कर सकें. उन्हें अपनी ही बहुत पुरानी कविता याद आई. मासूम चपला और मुरला का संवाद. चपला पूछती है:

                        सखी भावना कोहेरे बोले? सखी जातोना कोहेरे बोले?

तोमारा जो बोलो, दिवश रजनी, भालोबाशा, भालोबाशा.

सखी, भालोबाशा कारे कोय? शे की केबलई जातनामय

सखी, चिंता, यातना का अर्थ क्या है? तुम लोग दिन-रात कहते रहते हो, क्या प्रेम भी यातना ही है?

 

शे की केबलई चोखेर जाय?

शे की केबलई दुखेर शाश?

लोके तॉबे करे की शुखरी तोरे

ऐमान दुखेर आश?

 

प्रेम के बारे में कितने भोलेपन से पूछती है,

‘क्या प्रेम होने पर आंखों में पानी आता है? क्या प्रेम दुःख का नि:श्वास है? आगे की पंक्तियाँ प्रयत्न करने पर भी याद नहीं आईं.

‘प्रेम’ शब्द का विविध सुखद अनुभव उन्होंने लिया था. नृत्य, नाट्य, कथा, उपन्यास में उसे प्रस्तुत किया था. जी भर के प्रेम का अनुभव करते हुए वे प्रसन्न थे.

बस! इस अतीव आनंद के क्षण में जीवन का पूर्णविराम हो, ऐसी बात मन में आई.

कविता कामिनी निरंतर उनके पास थी. अनेक प्रिय कामिनियों का स्मरण भी पिछले दो-तीन दिनों में हुआ था. वे समाधानी थे.

देखते-देखते खिड़की से दिखाई दे रहा आकाश कृष्ण मेघों से आच्छादित हो गया. समूची प्रकृति कृष्ण हो गयी थी, और उसकी राधा थी वसुंधरा. उसने वसुंधरा को अपने अंक में छुपा लिया था.

‘हमारी वसुंधरा! हमारी भारत माता!’

उनका मन भर आया. मन ही मन बोले,

‘हे ईश्वर, तू कण कण में है, हरेक मन में है. कोई तुझे मानता है, कोई नहीं मानता. फिर भी तुम समान भाव से सर्वत्र हो. हम भी अनेक बार अकेले रहे हैं. अनेक अपमानास्पद प्रसंगों से गुज़रे हैं. तुम्हारा स्मरण किया, प्रभु... तुम्हारा ही स्मरण हुआ. ‘एकला चलो रे कहते रहे, परन्तु तुम और केवल तुम ही हमारे मन में थे.

आज हमारे वंश को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं है. यह दुःख पल भर के लिए मन में आया भी. ऐसे विचार भी मन में आये : हमने कौन सा पाप किया, कौनसा पुण्य किया, इसका लेखा जोखा रखा नहीं. हमने जो भी चाहा उसे प्राप्त करने के प्रयत्न में तुम भी हमारे साथ निरंतर प्रयत्न करते रहे.

हम दुखी न हों, इसलिए हमेशा हमारे साथ कविता सखी दी. तुम्हारे आभारी हैं. शायद जितना अतुल सुख जिस समय प्राप्त हुआ, तभी दुःख के पहाड़ भी गिरे, परन्तु उनका संयमपूर्वक सामना करने की शक्ति तुमने दी. अब सिर्फ एक ही मांगता हूँ...

‘हमें नहीं चाहिए मोक्ष...हमें नहीं होना है मुक्त! हमें स्वतन्त्र, शृंखलारहित, लावण्यवती हमारी भारत माता को देखना है.

गहरा हरा महावस्त्र धारण किये, माथे पर हिमालय का दमकता मुकुट धारण करने वाली, पांवों में सर-सरिताओं के घुँघरू बांधे, घने वन के सुगन्धित समीर को पुकारने वाली, सुहास्य वदना, चारुगात्री, सुनेत्रा, सुकेशी हमारी हमारी भारत माता को स्वतन्त्र विहार करते हुए देखना है.

हे ईश्वर, आज तक इस इक्यासी वर्षों की आयु में हमने तुमसे कुछ भी नहीं माँगा, आज बस यही मांगते हैं. उसको स्वतन्त्र देखने के लिए हमें मृत्यु नहीं चाहिए, ऐसा हम कभी नहीं कहेंगे, परन्तु उसे स्वतन्त्र देखने के लिए हमें फिर से जन्म दे. नहीं चाहिए हमें वह पुण्य पावन मोक्ष. हमें चाहिए पुनः जन्म! पुनः जन्म!’

मन ही मन बातें करके वे अत्यंत थक गए थे. पलंग पर लेटते हुए उनका ध्यान सामने वाले कैलेंडर की ओर गया. तारीख थी 7 अगस्त 1941. वैसे तो उस तारीख का कोई विशेष महत्त्व नहीं था. जन्म लेने वाले शिशु जैसा. वह सिर्फ समय के आगे बढ़ने की सूचक थी.

कल रात को ही अपूर्व सेन ने वह तारीख बदली थी. वे मन ही मन बोले,

‘तारीखों को महत्त्व तभी प्राप्त होता है, जब कोई विशेष घटना घटित होती है. वरना तो वे दिन मौन रहते हैं’.

पास ही की दीवार पर लगा हुआ वह कैलेण्डर हवा से नीचे गिर गया. गिरने लायक नहीं था फिर भी.

यदि हम इसी तरह हौले से जीवन से मृत्यु की गोद में गिर जाएँ तो? जैसे जर्जर पत्ता भिरभिराते हुए वृक्ष से दूर चला जाए तो? कितना कठिन होता है, दृष्टिगोचर हो रही सीमा रेखा को पार करना...

वे विचार कर रहे थे. उन्होंने आंखें मूंद लीं. कुछ ही देर में आये रथींद्र ने उन्हें पुकारा, मगर अदृश्य सीमा रेखा पार करके वे जा चुके थे.

 

*************** 

एकला चलो रे - 40

 

40


पद्मा नदी में सुहानी शाम उतर आई थी. रंगबिरंगी क्षितिज अंधेरे की ओर झुक रहा था. आकाश में सिर्फ एक ही गहरा नारंगी रंग था. इतनी देर से धरती से वृक्ष पर फुदकने वाले नन्हे पंछी अब अपने घोंसलों में दुबक कर बैठ गए थे. लहरों के माध्यम से दिन भर अविरत बहने वाली पद्मा नदी भी शांत हो गई थी. 

उदयाचल पर पांव रखने से लेकर अस्ताचल पहुँचने तक अविश्रांत परिश्रम करने के उपरांत सूर्यदेव थक गए थे. अनुभूति से प्रगल्भ हो गए थे. कब एक बार रजनी के प्रासाद तक पहुंचते हैं और विश्राम करते हैं, इसकी प्रतीक्षा कर रहे थे.

रवीन्द्रनाथ आज दोपहर से ही शांति निकेतन के अपूर्व सेन और महेंद्र सेन के साथ पद्मा नदी के तीर पर आये थे. आजकल उन्हें बार बार पद्मा नदी के तीर पर जाने की इच्छा होती थी. परन्तु प्रतिमा देवी ‘न जाईये, चलते हुए संतुलन खो जाएगा, शरीर पहले ही कमजोर हो गया है,’ कहती, और रवीन्द्रनाथ कहते,

“अब क्या होने वाला है? और जो होने वाला है, वह क्या तुमसे, मुझसे कहकर होगा?

वे कहते, मगर जाते नहीं थे. कल प्रतिमा देवी किसी काम से कलकत्ता गयी थीं, उन्होंने सुबह ही अपूर्व सेन को बुला लिया.

“कुछ कुछ इच्छाएं अधूरी न रह जाएँ, अब उम्र की इस ढलान पर. सही है ना!”

“ऐसा क्यों कह रहे हैं?

“जो सत्य है वही कह रहा हूँ ना?

“वो बात नहीं, परन्तु ऐसी आरपार की भाषा किसलिए?

यह अंतिम समय की वाणी नहीं है. हमें पद्मा नदी पर जाना है, अभी हाल में उससे चैन से मिलना ही नहीं हुआ. जीवन का आरंभ ही ज़मींदारी के गाँव से, अर्थात् पद्मा नदी की नाव से हुआ. वहां जलनौका ही बनाकर हम कई बार रह चुके हैं.

‘पद्मा नदी हमारा जीवन थी. उसके रंग रूप, उसके सौन्दर्य से हम मोहित हो गए थे. अनेक कवितायेँ उसके सान्निध्य में लिखीं, सुख, दुःख, दारिद्र्य, अज्ञान का अनुभव पद्मा नदी के किनारे बसे गांवों में ही हुआ.

‘यदि हमारे पिता ने हमें यहाँ न भेजा होता, तो असली जीवन को हम जान ही न पाते. शायद सत्य का इतना प्रखर दर्शन न हुआ होता.”

“शायद महाकवि भी न हुए होते, ऐसा ही ना?

“हमें नन्ही उमर में ही जीवन का अर्थ बताया था पद्मा नदी ने. उसीकी साक्षी से कभी प्रसन्न होकर लिखते रहे, उसीकी साक्षी से समाज की स्थिति देखकर अनेक बार रो भी पड़े. उसी पद्मा नदी को देखने का आज मन है.”

“कोई बात नहीं. परन्तु आप नौका पर चढ़ने की जिद न करें, यदि संतुलन बिगड़ गया तो समस्या होगी.”

रवीन्द्रनाथ हंसे.

“हंसे क्यों गुरुदेव?

“कभी हम गुरू थे. हम जो कहते वह बात सुनी जाती. परन्तु अब सभी गुरू हो गए हैं, और हमें समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं.”

“वो बात नहीं है, गुरुदेव. यदि कुछ कम-ज़्यादा बोल गया होऊँ, तो क्षमा करें, 
परन्तु आजकल आपका संतुलन बारबार बिगड़ जाता है
, ऐसा प्रतिमा देवी कह रही थीं, और उनकी अनुपस्थिति में आपकी देखभाल का उत्तरदायित्व हमारा है. इसीलिए कहा. आप चलें, हम दोनों आते हैं.”

चारों ओर का वातावरण अत्यंत सौम्य और प्रसन्न था. कितनी सारी यादें ताज़ा हो गई थीं. परिवार कलकत्ता में था और वे अकेले यहां थे. साथ देने के लिए खिली हुई प्रकृति और मन में सिर्फ और सिर्फ शब्दसखी, कभी एना के रूप में, तो कभी प्रत्यक्ष कादंबरी के रूप में आती, कभी वह मृणालिनी होती. कितना मनःपूर्वक प्रेम किया कादम्बरी ने. मानो जवानी की सीमा पर प्रेम की दीक्षा ही दी. समझ में नहीं आता था, परन्तु राधा का प्यार सहज ही खिल गया, ऐसा कि अभी भी उसका स्मरण हो. मौलसिरी के फूलों की गंध लेकर वह आई थी. एना ने तो संदर्भ सहित ही प्रेम का अर्थ बताया और मृणालिनी ने जीवन को अर्थ दिया.

वे मन में ही हंसे! एना कलकल करते प्रेम के निर्झर के समान थी. उन्होंने ही उसके बारे में लिखा था,It was from her that I first heard praise of my personal appearance, praise that was often very delicately given.’

वह कहती, ‘आपका चेहरा कितना सुन्दर और आंखे, नाक कितने सुडौल हैं. यदि कभी दाढी, मूंछे बढ़ाकर चहरे को ढांकने का विचार आये, तो ऐसा मत करना. आपके चहरे की प्रत्येक रेखा उत्कट और अप्रतिम है. दाढ़ी में उसे न छुपाना.’

आज न तो कादम्बरी है, ना एना, ना मृणालिनी. परन्तु कुछ कुछ वर्षों के अंतराल के बाद महिलाएं जीवन में आयें और वे प्रेरणा और जीवन ऊर्जा दें, शायद यह नियति का ही निश्चय होगा.

जर्मनी में मिली थी हेलेन. तब वे साठ वर्ष के थे. परन्तु वह उनके रूप पर इतनी मुग्ध हो गई कि जब वे उसके घर में कुछ समय वास्तव्य करने के बाद निकले तो उसे ऐसा प्रतीत हुआ मानो घर का प्रकाश ही जा रहा है, आनंद बिदा ले रहा हो. वास्तव में तो वह उनकी पुस्तकों की अनुवादिका थी. और अभी हाल ही में मिली हुई विक्टोरिया ओकाम्पो. अमेरिका में जब वे बीमार हुए थे तब इस धनाढ्य, अनुपम सुन्दर महिला ने उनकी सुश्रूषा की थी. आगे चित्र प्रदर्शन के समय भी उसीने सहायता की थी.

परन्तु किस्मत ही ऐसी, कि सहवास में आई किसी भी महिला को दीर्घायुष्य प्राप्त नहीं हुआ. इस विक्टोरिया ने, जिसे वे ‘विजया कहते थे, उत्तर आयुष्य ही सुवासित कर दिया. उसकी दी हुई आराम कुर्सी का उपयोग वे आज भी कर रहे थे.

शाम गहरा गई थी. आकाश का रंग अब क्षितिज के रंग से मेल खा रहा था.

‘हमारे जीवन की संध्या भी अब गहरी हो गयी है. मन में जीवन की हर बात एकत्रित हो गई है. कुछ ही देर में क्षितिज के रंग भी एक काले रंग में विलीन हो जायेंगे. हमारे साथ भी वैसा ही होगा. वृक्ष का जीर्ण पत्ता गोल गोल घूमते हुए टहनी से गिर जाए वैसा ही होगा. हमारे जीवन के पन्ने जीवनवृक्ष से हौले से फिसल जायेंगे. एक ही रंग में जीवन सिमट जाएगा, और किसी अज्ञात प्रदेश में हम अकेले, निपट अकेले, चल रहे होंगे.’

वे सोच में डूबे थे कि अपर्ण सेन ने कहा,

“गुरुदेव, शाम हो गई है, अब वापस चलें?

“शाम सचमुच गहरा गई है, अब वापस लौटना असंभव है. अब कोई साथ नहीं चाहिए. अब नहीं चाहिए साथ...बस, एकला चलो रे!”

कभी कभी रवीन्द्रनाथ कुछ भी असंबद्ध सा बोल देते हैं यह दोनों को ज्ञात था. इसलिए वे बिना कुछ कहे उनके निकट आये. दोनों ने दोनों हाथ थामे और उन्हें किनारे तक लाये और किनारे से रास्ते तक लाये. अब शान्ति निकेतन में ‘फोर्ड’ कार आ गई थी. रवीन्द्रनाथ पैदल न चलें, कहीं जाना हो, तो सियालदह से स्टेशन तक जा सकें इसलिए.

वे देर शाम को शांति निकेतन लौटे तो रथीन्द्रनाथ और प्रतिमा देवी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे.

“बाबूजी, इतनी देर तक रुके. अपर्ण, महेंद्र आपके साथ थे फिर भी चिंता हो रही थी.” प्रतिमा देवी ने कहा. रवीन्द्रनाथ का हाथ पकड़ कर उन्हें कुटी में लाये.

“बाबूजी, वातावरण में थोडासा फेर बदल हो जाए तो अच्छा लगेगा. यहाँ वे ही विषय और वे ही चिंताएं होती हैं. इसलिए...”

“ इसलिए क्या, रथींद्र? वैसे हम ठीक हैं. उम्र के अनुसार थोड़ी बहुत समस्याएँ तो आती ही हैं ना...”

“मैं सोच समझ कर ही आया हूँ, अभी आप विश्राम करें.”

“ये ज़रा ज़्यादा ही हो गया, रथींद्र. विचार रखना और फिर उसे रोक देना, यह अच्छी बात नहीं है. आराम बाद में, पहले तुम कह डालो. अब हम विदेश तो नहीं जा सकते. वैसे तो कुछ भी नहीं कर सकते.”

“फिर भी आप दार्जिलिंग के पास कलिम्पोंग अवश्य जाएं. वातावरण में परिवर्तन होगा, मन भी प्रसन्न हो जाएगा. आपको याद है, बाबूजी, जब हम दार्जिलिंग से कलिम्पोंग जा रहे थे, हम रास्ता भटक गए थे, और राह में किसी के होने की संभावना भी नहीं थी. कार बेहद ठंडी हो गयी थी. कब कलिम्पोंग पहुंचते हैं यह बेचैनी थी.”

“याद आया, और हमें दिखाई दिया अनगिनत जुगनुओं से प्रकाशमान वह वृक्ष. उस वृक्ष को बस, देखते ही रहे और आगे याद आया की दोस्तों ने क्या कहा था. वहां तीस्ता नदी मिलेगी, तो समझना कि आप सही मार्ग पर हैं.”

बिलकुल ठीक. आगे हमें तीस्ता नदी मिली. मगर वह जुगनुओं का पेड़ अभी तक भूले नहीं हैं. घने अंधेरे में वही पेड़ मार्गदर्शक था. आपको वहां जाना अच्छा लगेगा ना? मैंने इंतज़ाम कर दिया है.”

वह विषय वहीं समाप्त हो गया था. भोजन के बाद वे अपने पलंग लेट गए और मन ही मन हंसे. उस वृक्ष पर असंख्य जुगनू थे. हमारे जीवन में अनगिनत लोग आये. उनमें से सुभाषचंद्र बोस जैसे साहसी नौजवान पर हमारी निष्ठा थी. ‘महाजातिसदन का निर्माण होने के बाद उद्घाटन के अवसर पर सुभाषचंद्र बोस ने कहा था,

“अपनी प्रतिभा से रवी बाबूने राष्ट्र को आशाएं और आकांक्षाएं दी हैं. उनका संदेश चिरतरुण और सदा के लिए प्रेरणादायी है. वे केवल कविताएँ ही नहीं लिखते, या चित्र ही नहीं बनाते, बल्कि चित्रों और कविताओं को जीते भी हैं. हर पल उनके सम्मुख एक वैभव संपन्न चित्र होता है, जो है भारतमाता का. वे भारत के, विश्व के, मानवता के कवि हैं.”

उस अवसर पर उस कार्यक्रम में रवीन्द्रनाथ की कविता ‘जन गण मन...’ ख़ास तौर से प्रस्तुत की गई.

आज रात को उनके मन में असंख्य व्यक्तियों का सम्मलेन हो रहा था. प्रत्येक व्यक्ति उनके सम्मुख हाथ जोड़कर खडा था. अभी कुछ ही दिन पहले स्वर्गवासी हुए दीनबंधू एंड्रयूज़ ने भी अपनी उपस्थिति दर्शाई थी.

‘क्या हमारी आयु दीर्घ है, इसीलिये जीवन प्रवाह में हमें इतने व्यक्ति मिले?’ उन्होंने अपने आप से पूछा था.

उनके दीर्घ जीवन काल में सैंकड़ों सामान्य तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति दो कारणों से आये थे. एक तो जवानी की देहलीज़ पर ज़मींदारी का कार्यभार संभालना और उनके साहित्य के वाचक तथा साहित्य को प्राप्त लोकमान्यता. सर्वसाधारण व्यक्ति नहीं करेगा, इतनी बार भारत और भारत के बाहर की हुई यात्राएं.

वे मन ही मन हंसे. ‘हमारे प्रश्नों के उत्तर देते हुए एक बात रह गई, कि ईश्वर ने हमें जो शारीरिक सौन्दर्य प्रदान किया है, उसके कारण भी अनेक व्यक्ति हमारी तरफ़ आकर्षित हुए. विशेषत: महिलाएं. ईश्वर ने मानसिक सौन्दर्य भी दिया, जिसके कारण चेहरे से मुस्कान कभी लुप्त नहीं हुई. मानो आकाश में असंख्य तारे हों, और हम हमेशा उनके केंद्र में रहे. मन ही मन स्वयँ को चन्द्रमा की उपमा देते हुए वे प्रसन्नता से हंसे. रात में नींद खुली तो चंद्रमा उनकी खिड़की के पास था. मन चाहा कि उठकर खिड़की से हाथ बढ़ाएं और उसे मुट्ठी में पकड़ लें. अपने बालमन पर भी उन्हें हंसी आई.

सुबह वे बहुत देर से उठे. तब रथीन्द्रनाथ ने फिर से कल ही का विषय छेड़ दिया.

“बाबूजी, आपकी पसंद का कलिम्पोंग, वहां का प्रचुर नैसर्गिक सौन्दर्य, वहां की नदी, सब कुछ आपको प्रिय है. हम दोनों आपको छोड़ने के लिए वहां आयेंगे. अपूर्व सेन को आपके साथ भेजेंगे. इसके अतिरिक्त एक घर में ही आपके निवास की व्यवस्था की है. आठ-दस दिन या एक महीना वहां रहकर आईये. स्वास्थ्य में सुधार होगा.”

“ठीक है, आप कहते हैं तो ऐसा ही करेंगे! परन्तु हमारी पुस्तकों को ज़रा ठीक से संभाल कर रखता हैं, उनकी सूची भी नहीं बनाई है. अनेक लोगों के आये हुए पत्र भी फाईल नहीं किये हैं. इस महीने में कुछ भी करने का मन ही नहीं था.”

“आठ दिन बाद जा सकते हैं.”

रथीन्द्रनाथ, प्रतिमादेवी मन ही मन समझ गए थे कि रवीन्द्रनाथ शांति निकेतन छोड़कर जाना नहीं चाहते, परन्तु क्योंकि यह डॉक्टरों की ही सलाह थी, इसलिए वे कुछ नहीं कर सकते थे.

“अच्छा, आठ दिन बाद जायेंगे. वहां सरकारी सिंफोना प्लान्टेशन चल रहा है, और उनका मुख्य केंद्र मॉंग्यू है. इसी प्लान्टेशन के केमिस्ट डा. मनमोहन सेन ने अपने क्वार्टर के पास एक क्वार्टर की आपके लिए व्यवस्था की है. उनकी पत्नी मैत्रेयी देवी ने बड़े आग्रह से आपको बुलाया है. वे दोनों ही वहां रहते हैं.”
विवरण सुनकर
, कलिम्पोंग जैसी जगह का नाम सुनकर भी रवीन्द्रनाथ के चेहरे पर उत्सुकता नहीं दिखाई दी. फिर भी प्रतिमा देवी ने कहा,

“हम भी आठ दिन आपके साथ रहेंगे. अब तैयारी करते हैं.”

उस रात अचानक उनकी नींद खुल गई. वे अपनी शाल्मली कुटीर से बाहर आये. चारों ओर निस्तब्धता थी.

वे शांति निकेतन के प्रांगण में आये. सामने शांति निकेतन की इमारत थी और एक तरफ आवास के लिए बनाई गयी अनेक कुटियाँ. चारों और सप्तपर्णी के पेड़. सामने शांति निकेतन का महाद्वार.

हमने इस सब का निर्माण किया. यहाँ निवास कर रहे, दूर दूर से आने वाले विद्यार्थियों को कभी हमने इकट्ठे किया. स्वयं इस वन-उपवन का निर्माण किया. चार विद्यार्थियों से आरंभ करके चार सौ-पांच सौ विद्यार्थियों का यह शांति निकेतन हमने स्थापित किया. पहले सियालदह से बोलपुर तक झाड-झंखाड़ थे. पत्थरों पर चलते हुए आना पड़ता था. अब सारे साधन उपलब्ध हैं. मोटरगाड़ी का रास्ता बन गया है.

ये सारा हमने किया है? ये सब हमारे हाथों से हुआ है, इस पर उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था. अनजाने ही आंखों से अश्रुधाराएँ बह निकलीं.

‘हम रहें, या ना रहें, शांति निकेतन सदा रहेगा. मन में दृढ़ विश्वास था. हमारी अर्ध प्रतिमा हमारे जीवन काल में ही जब यूरोप में लगाई गयी तो उसके नीचे उनकी पंक्तियाँ लिखी थीं:

 

When I was no longer

On this earth

My tree will let the ever renewed

Leaves of thy spring

Murmur to the warfare

The poet did love while he lived.

 

आज यहाँ ऐसा लिखने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि यही हमारा स्मारक है.’

मगर आज ही हमारे मन में ऐसे विचार क्यों आ रहे हैं? हम वापस आने वाले हैं. छोटी सी आश्रम शाला शांति निकेतन आज ‘विश्व भारती केंद्र बन गई है. विश्व विद्यालय हो गई है. और क्या चाहिए हमें?

वे समाधान पूर्वक अपनी कुटी में आये. उन्हें पुस्तकों से भरी अलमारियां दिखाई दीं. जीवन से प्रेम किया, शांति निकेतन से प्रेम किया. शब्दों से, प्रकृति से तो क्या सब से अटूट प्रेम किया. वास्तव में तो  हम प्रेम कवि-लेखक हैं.

इन अलमारियों में पूरी ज़िंदगी समाई हुई है. प्रत्येक शब्द में रवीन्द्रनाथ हैं. सौंदर्यवादी, आनंदयात्री, रवीन्द्रनाथ यहीं हैं. बंध-अनुबंध की रेशमी गांठे यहीँ पुस्तकों में हैं. हमारी विचारधारा, जीवनशैली, हमारे लिखे सैंकड़ों पत्र और उत्तर यहीं हैं.

उन्होंने जल्दी जल्दी अल्मारियाँ खोलीं. विश्व कवि रवीन्द्र उन्हें मिल गए. कितनी कहानियाँ तो गिनने की ही रह गईं. दो हज़ार से ऊपर कविताएँ यहीं हैं नई नई किताबों में. ये हमारे लिखे हुए अठारह उपन्यास. ये रहे समय-समय पर लिखे नृत्य नाटक, नाटक और छोटे बच्चों के लिए सहज पाठ भी यहीं हैं.

इधर वाली अलमारी में कविताओं को दी गयी धुनें और उनके रेकॉर्ड्स, उनकी कुछ तस्वीरें, ये अखबारों में छपी तस्वीरें और समय-समय पर लिखे लेख.

यहाँ सम्पूर्ण रवीन्द्रनाथ हैं. वापस आने पर ठीक करूंगा इस अलमारी को. अलमारियां बंद करके वे पलंग पर लेट गए.

और कब नींद आ गई पता ही नहीं चला.

नियत कार्यक्रम के अनुसार रथीन्द्रनाथ और प्रतिमादेवी उन्हें लेकर कलिम्पोंग गए. मैत्रेयी देवी ने कहा,

“आप बाबूजी की बिल्कुल चिंता न करें. उनके साथ एक सहकारी रहेगा और मैं पिता के समान उनका ध्यान रखूंगी. ज़रुरत पडी तो आपको तार भेजकर सूचित करूंगी.”

तीन चार दिनों में रवीन्द्रनाथ का वहां मन लग गया. अत्यंत रमणीय प्रकृति, प्रेम से सेवा करने वाला गोपाल, और दिन में दस बार हंसते हुए आने वाली मैत्रेयी. वैसे भी उन्हें एकांत अच्छा लगता था, अब तो वह और अधिक अच्छा लगने लगा था. आकाश की परिवर्तित होती हुई रंगछटाएं, परिवर्तित होता हुआ वातावरण, घर के सामने से कलकल बहती हुई तीस्ता नदी, इससे भी ज़्यादा प्रिय थी उन्हें लेखनी, स्याही और कागज़. यह सब उनकी मेज़ पर था.

अनुपम सुख हाथ जोड़े खडा था. परन्तु अब मन स्वस्थ नहीं था. दसों दिशाएं घूमकर आते, और खामोश बैठ जाते. अनचाही यादें घेरे रहतीं. मन देस-परदेस घूम कर आता, तो वे अपने मन से कहते,

‘क्यों रे भागता है इस तरह! अब कुछ और बचा है क्या प्राप्त करने को?

‘सब कुछ मिल गया है. समाधानी हैं हम. फिर भी क्या?

‘किसी भी मनुष्य के मन में ‘फिर भी यह शब्द बाकी रह जाता है. देख, तुझे डॉक्टरेट की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया गया, वह भी ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा. तुमने ‘सर की पदवी वापस लौटा दी, फिर भी तुम्हारा सम्मान हुआ ही ना...सभी कुछ तो मिल गया तुझे...’

‘मन, एक ही चीज़ रह गयी, जिसे हम अकेले कभी प्राप्त नहीं कर सकते थे, और जो संगठित कार्य करने के बाद भी प्राप्त नहीं हो रही है...वह है भारत की स्वतंत्रता.’

‘पहले का पारतंत्र्य का घना अन्धकार समाप्त हो गया है. यह सन् 1941 चल रहा है. अलग अलग पद्धतियों से देश की स्वतंत्रता का उष:काल शीघ्र ही पूर्व क्षितिज पर प्रकट होगा.’

‘मगर क्या तब तक हम होंगे?

‘ये तो नहीं कह सकते. विधाता की नियति रेखा अगम्य है. उसे जानने के बदले अब प्रसन्न रहो.’

महात्मा जी उन्हें प्रिय थे. तीन-चार बार उनसे मिल चुके थे. वे महाराष्ट्र, सातारा, रत्नागिरी में रह चुके थे. शिवाजी महाराज, लोकमान्य तिलक उन्हें प्रिय थे.

इतना ही नहीं, बल्कि जो जो प्रिय था, वह उन्होंने प्राप्त किया था. देश-विदेश की महान विभूतियों का उन्होंने सम्मान किया था, उसी तरह रवीन्द्रनाथ का भी किया था.

‘जीवन का प्रयोजन क्या है?’ उन्होंने अपने ही मन से प्रश्न किया.

‘जीवन का प्रयोजन क्या है, इस प्रश्न पर तुमने कभी सोचा ही नहीं. जो चाहिए उसे पाने के लिए अत्यंत जिद से प्रयत्न करते रहे, और जो किया उससे जीवन-प्रयोजन सिद्ध हुआ. अरे, आज तुम अस्वस्थ हो फिर भी ‘रोग शय्यार कविता संग्रह प्रकाशित करने के लिए तैयार हो. जीवन पर, प्रकृति पर, मनुष्यों पर नितांत प्रेम करना, भारतमाता पर प्रेम करना – शायद यही तुम्हारे जीवन का प्रयोजन है.

कुछ भी कहो, मन, हमने कभी मृत्यु को आमंत्रित नहीं किया. इसका अर्थ यह भी नहीं कि हम अमर हैं. परन्तु मृत्यु को आवाज़ दें, ऐसा समय नहीं आया. जीवन इतना अधिक व्यस्त था, परन्तु अब ‘थक गए हैं, यह भावना मन में दृढ़ होने लगी है. सचमुच, मन! यदि हमारी बात मानना हो तो एक ही कर, हमें बीमार न होने देना. सीधे क्षितिज के पार ले चलना.’

पहला मन हंसा.

‘तुम्हें चाहे कहीं भी ले जाऊं रोबी, वहां भी तुम नृत्य-नाट्य लिखोगे, कविताओं का प्रदेश ही निर्माण करोगे. आकाश के विशाल कॅनवास पर क्षितिज के रंग लेकर चित्र बनाओगे. सवाल यह है कि तुम इन चित्रों का प्रदर्शन कहाँ करोगे? पृथ्वी पर प्रांत, देश, विदेश हैं. भूल ही गया कि वहाँ भी देवलोक है, मृत्यु लोक है, विष्णु लोक है. अब तुम्हारे लिए कोइ समस्या नहीं है.

‘हमें प्रश्नों के उत्तर देकर कौन ले जाने वाला है, मन! मगर तुम ही विचार करो, अंतर में गहरे जाकर हमें बताओ, हमारी एक इच्छा अधूरी रह गई है.’

‘प्रत्येक व्यक्ति की कोई न कोई इच्छा अधूरी रहती है, क्योंकि किसी की भी इच्छाएँ समाप्त नहीं होतीं और जीवन आगे बढ़ता जाता है. अब तुम्हारी कौन सी इच्छा रह गयी है?

‘हे अंतर्मन, एक ही इच्छा रह गई है. हमारी भारतभूमि को परतंत्रता से मुक्त देखने की इच्छा है, पूरे विश्व को अब शान्ति के, अहिंसा के मार्ग पर जाते हुए देखना चाहते हैं.’

मन से मन का संवाद समाप्त हो गया था. अत्यंत थकान प्रतीत हो रही थी. मानो समूचे विश्व का भार उन पर आ पड़ा हो. एक भी पाँव चलने की उनमें शक्ति नहीं थी. अचानक इतने निस्तेज और क्षीण – और वह भी डॉक्टर के उपचार के चलते भी, कैसे हो गए, इसका उन्हें आश्चर्य हो रहा था.

8 मई 1941 को उनकी सालगिरह शांति निकेतन में एक भव्य समारोह में संपन्न हुई.  आम आम तौर से उनका उत्साह अविरत प्रवाहित होता रहता. इस दिन वे नए पौधे लगाते. बच्चों के साथ नृत्य भी करते. दिन भर अविरत काम करके आराम भी न करते, परन्तु आज सूर्योदय होने पर भी उनका उठने का मन नहीं हो रहा था. और अवसर पर तो वे भाषण देते, सुन्दर कविता गाते, परन्तु चार-पांच दिन पूर्व उनके ध्यान में यह बात आई, कि  हाथ अशक्त है, परन्तु मन सशक्त है. अब आंखें भी क्षीण हो गईं थीं. ‘डॉक्टरेट की उपाधि से उन्हें सम्मानित किया गया था, परन्तु उसका आनंद उन्हें क्षणिक ही हुआ था, क्योंकि एक बार फिर विश्व युद्ध का झंझावात सर्वत्र आगे पढ़ रहा था और पूरे विश्व की शान्ति ही डगमगा रही थी.

वर्तमान शतक का चौथा दशक इतिहास का काला पृष्ठ होने वाला था. वे मन से अहिंसावादी थे, फिर भी देश की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र क्रान्ति की घोषणा करने वाले सुभाषचंद्र को उन्होंने अपने उद्देश्य के लिए आशीर्वाद दिया था. परन्तु युद्ध विराम को कोई संकेत नहीं दिखाई दे रहा था, बल्कि विश्व युद्ध के संकेत प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे थे.

मानवता पर कालिमा पोतने वाले, गहराते हुए युद्ध-संकेत. प्रथम विश्व युद्ध में हुई प्रचंड हानि और उसकी लपटें अभी शांत भी नहीं हुई थीं, कि द्वितीय महायुद्ध के संकेत मिलने लगे थे.

साम्राज्यवाद, अहंकार, और उनके कारण होने वाले आक्रमण के कारण प्रत्येक देश आर्थिक दृष्टी से रसातल को जाता है. मनुष्य की हानि होकर निराशा फैलती है. इससे उबरने के लिए देश को कितना काल आवश्यक होता है!

ब्रिटिशों का राज है. प्रत्यक्ष भारत का कुछ लेना-देना न होते हुए भी ब्रिटिशों की ओर से उनके शत्रु से युद्ध करना पडेगा. कोरिया, मंचुरिया, जापान के साम्राज्यवादियों ने उखाड़-पछाड़ मचाई थी और अब चीन को जीतने के लिए युद्ध चल रहा था. यह लहर अब फैलती जायेगी, और मित्र देश एकत्रित होकर विश्व युद्ध होगा, यह स्पष्ट दिखाई दे रहा था. इटली का मुसोलिनी अबिसीनिया जीतकर सम्राट बनने के सपने देख रहा था.

वैसे तो अबिसीनिया एक स्वतन्त्र राष्ट्र था, जिसे जीतने के प्रयत्न चल रहे थे. अब हिटलर भी आगे आया, और उसने यूरोप के अनेक राष्ट्रों को जीतने का अभियान ही शुरू कर दिया.

रवीन्द्रनाथ मन में बहुत दुखी हो गए. मनुष्यों का संहार और राष्ट्र हानि किस सीमा तक पहुँच सकती है, इस विचार से रवीन्द्रनाथ बेचैन हो गए और अगतिक होकर उन्होंने तकिये पर सिर रखा और आंखें मूँद लीं.

*********

एकला चलो रे - 41

  41 मैत्रेयी का कलिम्पोंग से फोन आया तो रथीन्द्रनाथ और प्रतिमादेवी कलिम्पोंग गए थे. रवीन्द्रनाथ के माथे पर ज़ख्म था , और वे बात करने की...