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पद्मा नदी में सुहानी शाम उतर
आई थी. रंगबिरंगी क्षितिज अंधेरे की ओर झुक रहा था. आकाश में सिर्फ एक ही गहरा
नारंगी रंग था. इतनी देर से धरती से वृक्ष पर फुदकने वाले नन्हे पंछी अब अपने
घोंसलों में दुबक कर बैठ गए थे. लहरों के माध्यम से दिन भर अविरत बहने वाली पद्मा
नदी भी शांत हो गई थी.
उदयाचल पर पांव रखने से लेकर
अस्ताचल पहुँचने तक अविश्रांत परिश्रम करने के उपरांत सूर्यदेव थक गए थे. अनुभूति
से प्रगल्भ हो गए थे. कब एक बार रजनी के प्रासाद तक पहुंचते हैं और विश्राम करते
हैं,
इसकी प्रतीक्षा कर रहे थे.
रवीन्द्रनाथ आज दोपहर से ही
शांति निकेतन के अपूर्व सेन और महेंद्र सेन के साथ पद्मा नदी के तीर पर आये थे.
आजकल उन्हें बार बार पद्मा नदी के तीर पर जाने की इच्छा होती थी. परन्तु प्रतिमा
देवी ‘न जाईये, चलते हुए संतुलन खो जाएगा, शरीर पहले ही कमजोर हो गया
है,’
कहती, और रवीन्द्रनाथ कहते,
“अब क्या होने वाला है? और जो होने वाला है, वह क्या तुमसे, मुझसे कहकर होगा?”
वे कहते, मगर जाते नहीं थे. कल
प्रतिमा देवी किसी काम से कलकत्ता गयी थीं, उन्होंने सुबह ही अपूर्व सेन को बुला लिया.
“कुछ कुछ इच्छाएं अधूरी न रह
जाएँ, अब उम्र की इस ढलान पर. सही है ना!”
“ऐसा क्यों कह रहे हैं?”
“जो सत्य है वही कह रहा हूँ
ना?”
“वो बात नहीं, परन्तु ऐसी आरपार की भाषा
किसलिए?”
“यह अंतिम समय की वाणी नहीं
है. हमें पद्मा नदी पर जाना है, अभी हाल में उससे चैन से मिलना ही नहीं हुआ. जीवन
का आरंभ ही ज़मींदारी के गाँव से, अर्थात् पद्मा नदी की नाव से हुआ. वहां जलनौका ही बनाकर हम कई बार रह चुके
हैं.
‘पद्मा नदी हमारा जीवन थी.
उसके रंग रूप,
उसके सौन्दर्य से हम मोहित हो गए थे. अनेक कवितायेँ उसके सान्निध्य में लिखीं, सुख, दुःख, दारिद्र्य, अज्ञान का अनुभव पद्मा नदी
के किनारे बसे गांवों में ही हुआ.
‘यदि हमारे पिता ने हमें यहाँ
न भेजा होता,
तो असली जीवन को हम जान ही न पाते. शायद सत्य का इतना प्रखर दर्शन न हुआ होता.”
“शायद महाकवि भी न हुए होते,
ऐसा ही ना?”
“हमें नन्ही उमर में ही जीवन
का अर्थ बताया था पद्मा नदी ने. उसीकी साक्षी से कभी प्रसन्न होकर लिखते रहे, उसीकी साक्षी से समाज की
स्थिति देखकर अनेक बार रो भी पड़े. उसी पद्मा नदी को देखने का आज मन है.”
“कोई बात नहीं. परन्तु आप
नौका पर चढ़ने की जिद न करें, यदि संतुलन बिगड़ गया तो समस्या होगी.”
रवीन्द्रनाथ हंसे.
“हंसे क्यों गुरुदेव?
“कभी हम गुरू थे. हम जो कहते
वह बात सुनी जाती. परन्तु अब सभी गुरू हो गए हैं, और हमें समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं.”
“वो बात नहीं है, गुरुदेव. यदि कुछ कम-ज़्यादा
बोल गया होऊँ, तो क्षमा करें,
परन्तु आजकल आपका संतुलन बारबार बिगड़ जाता है, ऐसा प्रतिमा देवी कह रही थीं, और उनकी
अनुपस्थिति में आपकी देखभाल का उत्तरदायित्व हमारा है. इसीलिए कहा. आप चलें, हम दोनों आते हैं.”
चारों ओर का वातावरण अत्यंत
सौम्य और प्रसन्न था. कितनी सारी यादें ताज़ा हो गई थीं. परिवार कलकत्ता में था और
वे अकेले यहां थे. साथ देने के लिए खिली हुई प्रकृति और मन में सिर्फ और सिर्फ
शब्दसखी,
कभी एना के रूप में, तो कभी प्रत्यक्ष कादंबरी के रूप में आती, कभी वह मृणालिनी होती. कितना मनःपूर्वक प्रेम
किया कादम्बरी ने. मानो जवानी की सीमा पर प्रेम की दीक्षा ही दी. समझ में नहीं आता
था,
परन्तु राधा का प्यार सहज ही खिल गया, ऐसा कि अभी भी उसका स्मरण हो. मौलसिरी के
फूलों की गंध लेकर वह आई थी. एना ने तो संदर्भ सहित ही प्रेम का अर्थ बताया और
मृणालिनी ने जीवन को अर्थ दिया.
वे मन में ही हंसे! एना कलकल
करते प्रेम के निर्झर के समान थी. उन्होंने ही उसके बारे में लिखा था, ‘It was
from her that I first heard praise of my personal appearance, praise that was
often very delicately given.’
‘वह कहती, ‘आपका चेहरा कितना सुन्दर और
आंखे,
नाक कितने सुडौल हैं. यदि कभी दाढी, मूंछे बढ़ाकर चहरे को ढांकने का विचार आये, तो ऐसा मत करना. आपके चहरे की प्रत्येक रेखा
उत्कट और अप्रतिम है. दाढ़ी में उसे न छुपाना.’
आज न तो कादम्बरी है, ना एना, ना मृणालिनी. परन्तु कुछ कुछ
वर्षों के अंतराल के बाद महिलाएं जीवन में आयें और वे प्रेरणा और जीवन ऊर्जा दें, शायद यह नियति का ही निश्चय
होगा.
जर्मनी में मिली थी हेलेन. तब
वे साठ वर्ष के थे. परन्तु वह उनके रूप पर इतनी मुग्ध हो गई कि जब वे उसके घर में
कुछ समय वास्तव्य करने के बाद निकले तो उसे ऐसा प्रतीत हुआ मानो घर का प्रकाश ही
जा रहा है,
आनंद बिदा ले रहा हो. वास्तव में तो वह उनकी पुस्तकों की अनुवादिका थी. और अभी हाल
ही में मिली हुई विक्टोरिया ओकाम्पो. अमेरिका में जब वे बीमार हुए थे तब इस धनाढ्य,
अनुपम सुन्दर महिला ने उनकी सुश्रूषा की थी. आगे चित्र प्रदर्शन के समय भी उसीने
सहायता की थी.
परन्तु किस्मत ही ऐसी, कि सहवास में आई किसी भी महिला
को दीर्घायुष्य प्राप्त नहीं हुआ. इस विक्टोरिया ने, जिसे वे ‘विजया’ कहते थे, उत्तर आयुष्य ही सुवासित कर दिया. उसकी दी हुई
आराम कुर्सी का उपयोग वे आज भी कर रहे थे.
शाम गहरा गई थी. आकाश का रंग
अब क्षितिज के रंग से मेल खा रहा था.
‘हमारे जीवन की संध्या भी अब
गहरी हो गयी है. मन में जीवन की हर बात एकत्रित हो गई है. कुछ ही देर में क्षितिज
के रंग भी एक काले रंग में विलीन हो जायेंगे. हमारे साथ भी वैसा ही होगा. वृक्ष का
जीर्ण पत्ता गोल गोल घूमते हुए टहनी से गिर जाए वैसा ही होगा. हमारे जीवन के पन्ने
जीवनवृक्ष से हौले से फिसल जायेंगे. एक ही रंग में जीवन सिमट जाएगा, और किसी अज्ञात प्रदेश में
हम अकेले, निपट अकेले, चल रहे होंगे.’
वे सोच में डूबे थे कि अपर्ण
सेन ने कहा,
“गुरुदेव, शाम हो गई है, अब वापस चलें?”
“शाम सचमुच गहरा गई है, अब वापस लौटना असंभव है. अब
कोई साथ नहीं चाहिए. अब नहीं चाहिए साथ...बस, एकला चलो रे!”
कभी कभी रवीन्द्रनाथ कुछ भी
असंबद्ध सा बोल देते हैं यह दोनों को ज्ञात था. इसलिए वे बिना कुछ कहे उनके निकट
आये. दोनों ने दोनों हाथ थामे और उन्हें किनारे तक लाये और किनारे से रास्ते तक
लाये. अब शान्ति निकेतन में ‘फोर्ड’ कार आ गई थी. रवीन्द्रनाथ पैदल न चलें, कहीं जाना हो, तो सियालदह से स्टेशन तक जा
सकें इसलिए.
वे देर शाम को शांति निकेतन
लौटे तो रथीन्द्रनाथ और प्रतिमा देवी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे.
“बाबूजी, इतनी देर तक रुके. अपर्ण,
महेंद्र आपके साथ थे फिर भी चिंता हो रही थी.” प्रतिमा देवी ने कहा. रवीन्द्रनाथ
का हाथ पकड़ कर उन्हें कुटी में लाये.
“बाबूजी, वातावरण में थोडासा फेर बदल
हो जाए तो अच्छा लगेगा. यहाँ वे ही विषय और वे ही चिंताएं होती हैं. इसलिए...”
“ इसलिए क्या, रथींद्र? वैसे हम ठीक हैं. उम्र के
अनुसार थोड़ी बहुत समस्याएँ तो आती ही हैं ना...”
“मैं सोच समझ कर ही आया हूँ,
अभी आप विश्राम करें.”
“ये ज़रा ज़्यादा ही हो गया, रथींद्र. विचार रखना और फिर
उसे रोक देना,
यह अच्छी बात नहीं है. आराम बाद में, पहले तुम कह डालो. अब हम विदेश तो नहीं जा सकते. वैसे तो कुछ भी नहीं कर
सकते.”
“फिर भी आप दार्जिलिंग के पास
कलिम्पोंग अवश्य जाएं. वातावरण में परिवर्तन होगा, मन भी प्रसन्न हो जाएगा. आपको याद है, बाबूजी, जब हम दार्जिलिंग से
कलिम्पोंग जा रहे थे, हम रास्ता भटक गए थे, और राह में किसी के होने की संभावना भी नहीं थी. कार बेहद ठंडी हो गयी थी.
कब कलिम्पोंग पहुंचते हैं यह बेचैनी थी.”
“याद आया, और हमें दिखाई दिया अनगिनत
जुगनुओं से प्रकाशमान वह वृक्ष. उस वृक्ष को बस, देखते ही रहे और आगे याद आया की दोस्तों ने
क्या कहा था. वहां तीस्ता नदी मिलेगी, तो समझना कि आप सही मार्ग पर हैं.”
“बिलकुल ठीक. आगे हमें तीस्ता
नदी मिली. मगर वह जुगनुओं का पेड़ अभी तक भूले नहीं हैं. घने अंधेरे में वही पेड़
मार्गदर्शक था. आपको वहां जाना अच्छा लगेगा ना? मैंने इंतज़ाम कर दिया है.”
वह विषय वहीं समाप्त हो गया
था. भोजन के बाद वे अपने पलंग लेट गए और मन ही मन हंसे. उस वृक्ष पर असंख्य जुगनू
थे. हमारे जीवन में अनगिनत लोग आये. उनमें से सुभाषचंद्र बोस जैसे साहसी नौजवान पर
हमारी निष्ठा थी. ‘महाजातिसदन’ का निर्माण होने के बाद उद्घाटन के अवसर पर सुभाषचंद्र बोस ने कहा था,
“अपनी प्रतिभा से रवी बाबूने
राष्ट्र को आशाएं और आकांक्षाएं दी हैं. उनका संदेश चिरतरुण और सदा के लिए
प्रेरणादायी है. वे केवल कविताएँ ही नहीं लिखते, या चित्र ही नहीं बनाते, बल्कि चित्रों और कविताओं को
जीते भी हैं. हर पल उनके सम्मुख एक वैभव संपन्न चित्र होता है, जो है भारतमाता का. वे भारत
के,
विश्व के,
मानवता के कवि हैं.”
उस अवसर पर उस कार्यक्रम में
रवीन्द्रनाथ की कविता ‘जन गण मन...’ ख़ास तौर से प्रस्तुत की गई.
आज रात को उनके मन में असंख्य
व्यक्तियों का सम्मलेन हो रहा था. प्रत्येक व्यक्ति उनके सम्मुख हाथ जोड़कर खडा था.
अभी कुछ ही दिन पहले स्वर्गवासी हुए दीनबंधू एंड्रयूज़ ने भी अपनी उपस्थिति दर्शाई
थी.
‘क्या हमारी आयु दीर्घ है, इसीलिये जीवन प्रवाह में
हमें इतने व्यक्ति मिले?’ उन्होंने अपने आप से पूछा था.
उनके दीर्घ जीवन काल में
सैंकड़ों सामान्य तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति दो कारणों से आये थे. एक तो जवानी की
देहलीज़ पर ज़मींदारी का कार्यभार संभालना और उनके साहित्य के वाचक तथा साहित्य को
प्राप्त लोकमान्यता. सर्वसाधारण व्यक्ति नहीं करेगा, इतनी बार भारत और भारत के बाहर की हुई
यात्राएं.
वे मन ही मन हंसे. ‘हमारे
प्रश्नों के उत्तर देते हुए एक बात रह गई, कि ईश्वर ने हमें जो शारीरिक सौन्दर्य
प्रदान किया है,
उसके कारण भी अनेक व्यक्ति हमारी तरफ़ आकर्षित हुए. विशेषत: महिलाएं. ईश्वर ने
मानसिक सौन्दर्य भी दिया, जिसके कारण चेहरे से मुस्कान कभी लुप्त नहीं हुई. मानो
आकाश में असंख्य तारे हों, और हम हमेशा उनके केंद्र में रहे. मन ही मन स्वयँ को चन्द्रमा की उपमा देते
हुए वे प्रसन्नता से हंसे. रात में नींद खुली तो चंद्रमा उनकी खिड़की के पास था. मन
चाहा कि उठकर खिड़की से हाथ बढ़ाएं और उसे मुट्ठी में पकड़ लें. अपने बालमन पर भी
उन्हें हंसी आई.
सुबह वे बहुत देर से उठे. तब
रथीन्द्रनाथ ने फिर से कल ही का विषय छेड़ दिया.
“बाबूजी, आपकी पसंद का कलिम्पोंग,
वहां का प्रचुर नैसर्गिक सौन्दर्य, वहां की नदी, सब कुछ आपको प्रिय है. हम दोनों आपको छोड़ने के लिए वहां आयेंगे. अपूर्व सेन
को आपके साथ भेजेंगे. इसके अतिरिक्त एक घर में ही आपके निवास की व्यवस्था की है.
आठ-दस दिन या एक महीना वहां रहकर आईये. स्वास्थ्य में सुधार होगा.”
“ठीक है, आप कहते हैं तो ऐसा ही
करेंगे! परन्तु हमारी पुस्तकों को ज़रा ठीक से संभाल कर रखता हैं, उनकी सूची भी नहीं बनाई है. अनेक
लोगों के आये हुए पत्र भी फाईल नहीं किये हैं. इस महीने में कुछ भी करने का मन ही
नहीं था.”
“आठ दिन बाद जा सकते हैं.”
रथीन्द्रनाथ, प्रतिमादेवी मन ही मन समझ गए
थे कि रवीन्द्रनाथ शांति निकेतन छोड़कर जाना नहीं चाहते, परन्तु क्योंकि यह डॉक्टरों की ही सलाह थी, इसलिए वे कुछ नहीं कर सकते
थे.
“अच्छा, आठ दिन बाद जायेंगे.
वहां सरकारी सिंफोना प्लान्टेशन चल रहा है, और उनका मुख्य केंद्र मॉंग्यू है. इसी
प्लान्टेशन के केमिस्ट डा. मनमोहन सेन ने अपने क्वार्टर के पास एक क्वार्टर की
आपके लिए व्यवस्था की है. उनकी पत्नी मैत्रेयी देवी ने बड़े आग्रह से आपको बुलाया
है. वे दोनों ही वहां रहते हैं.”
विवरण सुनकर,
कलिम्पोंग जैसी जगह का नाम सुनकर भी रवीन्द्रनाथ के चेहरे पर उत्सुकता नहीं दिखाई
दी. फिर भी प्रतिमा देवी ने कहा,
“हम भी आठ दिन आपके साथ
रहेंगे. अब तैयारी करते हैं.”
उस रात अचानक उनकी नींद खुल
गई. वे अपनी शाल्मली कुटीर से बाहर आये. चारों ओर निस्तब्धता थी.
वे शांति निकेतन के प्रांगण
में आये. सामने शांति निकेतन की इमारत थी और एक तरफ आवास के लिए बनाई गयी अनेक
कुटियाँ. चारों और सप्तपर्णी के पेड़. सामने शांति निकेतन का महाद्वार.
हमने इस सब का निर्माण किया.
यहाँ निवास कर रहे, दूर दूर से आने वाले विद्यार्थियों को कभी हमने इकट्ठे किया.
स्वयं इस वन-उपवन का निर्माण किया. चार विद्यार्थियों से आरंभ करके चार सौ-पांच सौ
विद्यार्थियों का यह शांति निकेतन हमने स्थापित किया. पहले सियालदह से बोलपुर तक
झाड-झंखाड़ थे. पत्थरों पर चलते हुए आना पड़ता था. अब सारे साधन उपलब्ध हैं.
मोटरगाड़ी का रास्ता बन गया है.
ये सारा हमने किया है? ये सब हमारे हाथों से हुआ है, इस पर उन्हें विश्वास ही
नहीं हो रहा था. अनजाने ही आंखों से अश्रुधाराएँ बह निकलीं.
‘हम रहें, या ना रहें, शांति निकेतन सदा रहेगा. मन
में दृढ़ विश्वास था. हमारी अर्ध प्रतिमा हमारे जीवन काल में ही जब यूरोप में लगाई
गयी तो उसके नीचे उनकी पंक्तियाँ लिखी थीं:
When I was
no longer
On this
earth
My tree
will let the ever renewed
Leaves of
thy spring
Murmur to
the warfare
The poet
did love while he lived.
आज यहाँ ऐसा लिखने की
आवश्यकता नहीं, क्योंकि यही हमारा स्मारक है.’
मगर आज ही हमारे मन में ऐसे
विचार क्यों आ रहे हैं? हम वापस आने वाले हैं. छोटी सी आश्रम शाला शांति निकेतन आज ‘विश्व भारती’ केंद्र बन गई है. विश्व
विद्यालय हो गई है. और क्या चाहिए हमें?’
वे समाधान पूर्वक अपनी कुटी
में आये. उन्हें पुस्तकों से भरी अलमारियां दिखाई दीं. जीवन से प्रेम किया, शांति निकेतन से प्रेम किया.
शब्दों से,
प्रकृति से तो क्या सब से अटूट प्रेम किया. वास्तव में तो हम प्रेम कवि-लेखक हैं.
इन अलमारियों में पूरी ज़िंदगी
समाई हुई है. प्रत्येक शब्द में रवीन्द्रनाथ हैं. सौंदर्यवादी, आनंदयात्री, रवीन्द्रनाथ यहीं हैं.
बंध-अनुबंध की रेशमी गांठे यहीँ पुस्तकों में हैं. हमारी विचारधारा, जीवनशैली, हमारे लिखे सैंकड़ों पत्र और
उत्तर यहीं हैं.
उन्होंने जल्दी जल्दी
अल्मारियाँ खोलीं. विश्व कवि रवीन्द्र उन्हें मिल गए. कितनी कहानियाँ तो गिनने की
ही रह गईं. दो हज़ार से ऊपर कविताएँ यहीं हैं नई नई किताबों में. ये हमारे लिखे हुए
अठारह उपन्यास. ये रहे समय-समय पर लिखे नृत्य नाटक, नाटक और छोटे बच्चों के लिए
सहज पाठ भी यहीं हैं.
इधर वाली अलमारी में कविताओं
को दी गयी धुनें और उनके रेकॉर्ड्स, उनकी कुछ तस्वीरें, ये अखबारों में छपी
तस्वीरें और समय-समय पर लिखे लेख.
यहाँ सम्पूर्ण रवीन्द्रनाथ
हैं. वापस आने पर ठीक करूंगा इस अलमारी को. अलमारियां बंद करके वे पलंग पर लेट गए.
और कब नींद आ गई पता ही नहीं
चला.
नियत कार्यक्रम के अनुसार
रथीन्द्रनाथ और प्रतिमादेवी उन्हें लेकर कलिम्पोंग गए. मैत्रेयी देवी ने कहा,
“आप बाबूजी की बिल्कुल चिंता
न करें. उनके साथ एक सहकारी रहेगा और मैं पिता के समान उनका ध्यान रखूंगी. ज़रुरत
पडी तो आपको तार भेजकर सूचित करूंगी.”
तीन चार दिनों में
रवीन्द्रनाथ का वहां मन लग गया. अत्यंत रमणीय प्रकृति, प्रेम से सेवा करने वाला
गोपाल,
और दिन में दस बार हंसते हुए आने वाली मैत्रेयी. वैसे भी उन्हें एकांत अच्छा लगता
था,
अब तो वह और अधिक अच्छा लगने लगा था. आकाश की परिवर्तित होती हुई रंगछटाएं,
परिवर्तित होता हुआ वातावरण, घर के सामने से कलकल बहती हुई तीस्ता नदी, इससे भी ज़्यादा प्रिय थी उन्हें
लेखनी,
स्याही और कागज़. यह सब उनकी मेज़ पर था.
अनुपम सुख हाथ जोड़े खडा था.
परन्तु अब मन स्वस्थ नहीं था. दसों दिशाएं घूमकर आते, और खामोश बैठ जाते. अनचाही यादें घेरे रहतीं.
मन देस-परदेस घूम कर आता, तो वे अपने मन से कहते,
‘क्यों रे भागता है इस तरह!
अब कुछ और बचा है क्या प्राप्त करने को?’
‘सब कुछ मिल गया है. समाधानी
हैं हम. फिर भी क्या?’
‘किसी भी मनुष्य के मन में
‘फिर भी’
यह शब्द बाकी रह जाता है. देख, तुझे डॉक्टरेट की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया गया, वह भी ऑक्सफोर्ड
विश्वविद्यालय द्वारा. तुमने ‘सर’ की पदवी वापस लौटा दी, फिर भी तुम्हारा सम्मान हुआ ही ना...सभी कुछ तो मिल गया तुझे...’
‘मन, एक ही चीज़ रह गयी, जिसे हम अकेले कभी प्राप्त
नहीं कर सकते थे,
और जो संगठित कार्य करने के बाद भी प्राप्त नहीं हो रही है...वह है भारत की
स्वतंत्रता.’
‘पहले का पारतंत्र्य का घना
अन्धकार समाप्त हो गया है. यह सन् 1941 चल रहा है. अलग अलग पद्धतियों से देश की स्वतंत्रता का उष:काल शीघ्र ही
पूर्व क्षितिज पर प्रकट होगा.’
‘मगर क्या तब तक हम होंगे?’
‘ये तो नहीं कह सकते. विधाता
की नियति रेखा अगम्य है. उसे जानने के बदले अब प्रसन्न रहो.’
महात्मा जी उन्हें प्रिय थे.
तीन-चार बार उनसे मिल चुके थे. वे महाराष्ट्र, सातारा, रत्नागिरी में रह चुके थे. शिवाजी महाराज, लोकमान्य तिलक उन्हें प्रिय
थे.
इतना ही नहीं, बल्कि जो जो प्रिय था, वह
उन्होंने प्राप्त किया था. देश-विदेश की महान विभूतियों का उन्होंने सम्मान किया
था,
उसी तरह रवीन्द्रनाथ का भी किया था.
‘जीवन का प्रयोजन क्या है?’ उन्होंने अपने ही मन से
प्रश्न किया.
‘जीवन का प्रयोजन क्या है, इस प्रश्न पर तुमने कभी सोचा
ही नहीं. जो चाहिए उसे पाने के लिए अत्यंत जिद से प्रयत्न करते रहे, और जो किया
उससे जीवन-प्रयोजन सिद्ध हुआ. अरे, आज तुम अस्वस्थ हो फिर भी ‘रोग शय्यार’ कविता संग्रह प्रकाशित करने के लिए तैयार हो.
जीवन पर,
प्रकृति पर,
मनुष्यों पर नितांत प्रेम करना, भारतमाता पर प्रेम करना – शायद यही तुम्हारे जीवन का प्रयोजन है.’
‘कुछ भी कहो, मन, हमने कभी मृत्यु को
आमंत्रित नहीं किया. इसका अर्थ यह भी नहीं कि हम अमर हैं. परन्तु मृत्यु को आवाज़
दें,
ऐसा समय नहीं आया. जीवन इतना अधिक व्यस्त था, परन्तु अब ‘थक गए हैं, यह भावना मन में दृढ़
होने लगी है. सचमुच, मन! यदि हमारी बात मानना हो तो एक ही कर, हमें बीमार न होने देना. सीधे क्षितिज के पार ले चलना.’
पहला मन हंसा.
‘तुम्हें चाहे कहीं भी ले
जाऊं रोबी,
वहां भी तुम नृत्य-नाट्य लिखोगे, कविताओं का प्रदेश ही निर्माण करोगे. आकाश के विशाल कॅनवास पर क्षितिज के
रंग लेकर चित्र बनाओगे. सवाल यह है कि तुम इन चित्रों का प्रदर्शन कहाँ करोगे? पृथ्वी पर प्रांत, देश, विदेश हैं. भूल ही गया कि
वहाँ भी देवलोक है, मृत्यु लोक है, विष्णु लोक है. अब तुम्हारे लिए कोइ समस्या नहीं है.
‘हमें प्रश्नों के उत्तर देकर
कौन ले जाने वाला है, मन! मगर तुम ही विचार करो, अंतर में गहरे जाकर हमें बताओ, हमारी एक इच्छा अधूरी रह गई है.’
‘प्रत्येक व्यक्ति की कोई न
कोई इच्छा अधूरी रहती है, क्योंकि किसी की भी इच्छाएँ समाप्त नहीं होतीं और जीवन आगे बढ़ता जाता है. अब
तुम्हारी कौन सी इच्छा रह गयी है?’
‘हे अंतर्मन, एक ही इच्छा रह गई है. हमारी
भारतभूमि को परतंत्रता से मुक्त देखने की इच्छा है, पूरे विश्व को अब शान्ति के, अहिंसा के मार्ग पर जाते हुए
देखना चाहते हैं.’
मन से मन का संवाद समाप्त हो
गया था. अत्यंत थकान प्रतीत हो रही थी. मानो समूचे विश्व का भार उन पर आ पड़ा हो.
एक भी पाँव चलने की उनमें शक्ति नहीं थी. अचानक इतने निस्तेज और क्षीण – और वह भी
डॉक्टर के उपचार के चलते भी, कैसे हो गए, इसका उन्हें आश्चर्य हो रहा था.
8 मई 1941 को उनकी सालगिरह शांति
निकेतन में एक भव्य समारोह में संपन्न हुई. आम आम तौर से उनका उत्साह अविरत प्रवाहित
होता रहता. इस दिन वे नए पौधे लगाते. बच्चों के साथ नृत्य भी करते. दिन भर अविरत
काम करके आराम भी न करते, परन्तु आज सूर्योदय होने पर भी उनका उठने का मन नहीं हो
रहा था. और अवसर पर तो वे भाषण देते, सुन्दर कविता गाते, परन्तु चार-पांच दिन पूर्व उनके ध्यान में यह बात आई, कि हाथ अशक्त है, परन्तु मन सशक्त है. अब आंखें भी क्षीण हो गईं
थीं. ‘डॉक्टरेट’
की उपाधि से उन्हें सम्मानित किया गया था, परन्तु उसका आनंद उन्हें क्षणिक ही हुआ था,
क्योंकि एक बार फिर विश्व युद्ध का झंझावात सर्वत्र आगे पढ़ रहा था और पूरे विश्व
की शान्ति ही डगमगा रही थी.
वर्तमान शतक का चौथा दशक
इतिहास का काला पृष्ठ होने वाला था. वे मन से अहिंसावादी थे, फिर भी देश की स्वतंत्रता के
लिए सशस्त्र क्रान्ति की घोषणा करने वाले सुभाषचंद्र को उन्होंने अपने उद्देश्य के
लिए आशीर्वाद दिया था. परन्तु युद्ध विराम को कोई संकेत नहीं दिखाई दे रहा था, बल्कि विश्व युद्ध के संकेत
प्रत्यक्ष दिखाई दे रहे थे.
मानवता पर कालिमा पोतने वाले,
गहराते हुए युद्ध-संकेत. प्रथम विश्व युद्ध में हुई प्रचंड हानि और उसकी लपटें अभी
शांत भी नहीं हुई थीं, कि द्वितीय महायुद्ध के संकेत मिलने लगे थे.
साम्राज्यवाद, अहंकार, और उनके कारण होने वाले
आक्रमण के कारण प्रत्येक देश आर्थिक दृष्टी से रसातल को जाता है. मनुष्य की हानि
होकर निराशा फैलती है. इससे उबरने के लिए देश को कितना काल आवश्यक होता है!
ब्रिटिशों का राज है.
प्रत्यक्ष भारत का कुछ लेना-देना न होते हुए भी ब्रिटिशों की ओर से उनके शत्रु से
युद्ध करना पडेगा. कोरिया, मंचुरिया,
जापान के साम्राज्यवादियों ने उखाड़-पछाड़ मचाई थी और अब चीन को जीतने के लिए युद्ध
चल रहा था. यह लहर अब फैलती जायेगी, और मित्र देश एकत्रित होकर विश्व युद्ध होगा, यह स्पष्ट दिखाई दे रहा था.
इटली का मुसोलिनी अबिसीनिया जीतकर सम्राट बनने के सपने देख रहा था.
वैसे तो अबिसीनिया एक
स्वतन्त्र राष्ट्र था, जिसे जीतने के प्रयत्न चल रहे थे. अब हिटलर भी आगे आया, और उसने यूरोप के अनेक
राष्ट्रों को जीतने का अभियान ही शुरू कर दिया.
रवीन्द्रनाथ मन में बहुत दुखी
हो गए. मनुष्यों का संहार और राष्ट्र हानि किस सीमा तक पहुँच सकती है, इस विचार से
रवीन्द्रनाथ बेचैन हो गए और अगतिक होकर उन्होंने तकिये पर सिर रखा और आंखें मूँद
लीं.
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