Thursday, 25 September 2025

एकला चलो रे - 29

 29


28 जनवरी को कलकत्ता के ‘टाऊन हाल’ में रवीन्द्रनाथ के पचासवें जन्मदिन के अवसर पर उनके सत्कार का आयोजन किया गया था. महाराज मणींद्र चंद्र नंदी, प्रफुल्ल चंद्र रॉय और जगदीश चंद्र बोस ने इस सत्कार समारोह का आयोजन किया था. सत्कार का उत्तर देते हुए रवीन्द्रनाथ ने कहा,
“हमारी जन्म तारीख 7 मई है. इससे पूर्व ही हमारा जन्म दिन मनाया जा रहा है. हमारे जन्म के पहले ही हम नवविचारधाराओं में जन्म ले चुके थे. यह एक निमित्त है. आज हमें अपने ही जीवन के कुछ स्पष्टीकरण देना हैं. शायद आप सबको भी वे अपने ही प्रतीत हों.

‘पहली बात यह, कि  हमें विदेश जाना है, इसलिए जन्मदिन पहले ही मनाया जा रहा है. वह कब मनाया जाता है, यह महत्वपूर्ण नहीं है, आप सब इतने स्नेह से यह उत्सव मना रहे हैं, यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है. जन्म लेने से मृत्यु तक निरंतर चलते रहने के बीच एक पड़ाव होता है स्नेह का, जन्मदिन का. प्रत्येक दिन आगे बढ़ता हुआ ही रहता है.

‘उस प्रत्येक बढ़ते हुए दिन भी हम अपना कार्य करते ही रहते हैं. जन्मदिन पर हमने आपको परखते हैं. संचित हुआ काम, घटाया हुआ काम, कार्य की गुणवत्ता का गुणाकार और लोगों के दोषों का विभाजन. और आज तो हम जीवन के अर्धशतक के मोड़ पर खड़े हैं. ऐसे में स्वयं का मूल्यमापन करते हुए इस बात पर ध्यान गया कि जो हमारा नहीं था, ईश्वर का था, उसे हमने खो दिया है. हमारे पिता, पत्नी, पुत्र, कन्या, अपने मित्रों को खोया है. परन्तु जो प्राप्त किया, वह अधिक है.

शांति निकेतन में आज बच्चों की संख्या बढ़ रही है, अज्ञानी, पिछड़े हुए ये बच्चे कल के भारत का आधार होने वाले हैं. आश्रम पद्धति से उनके गुणों का विकास करने का हमारा प्रयत्न सफ़ल हो रहा है, और दूसरी बात यह कि नाट्यकला, संगीत, कथा, कविता, उपन्यास, हमारे गीत हमारी धुन में ही कलकत्ता में और गाँवों में भी गाये जा रहे हैं. यह हमारा सौभाग्य है, कि वे गीत सबको अपने प्रतीत होते हैं.  

तीसरी बात, ये कि हम जब जब विदेश जाते हैं, तब हम अपने आप को भारतीय कहते हुए वहां सबका स्वतन्त्र, निर्भय, और सुखमय जीवन देखते हैं, तो दरिद्रता की रेखा ने नीचे खड़ा और गुलामी के अँधेरे में ठोकर खाता हुआ भारत हमें दिखाई देता है, और यह अहसास होता है, कि भारत का ऋण चुकाना है.

आज हमारे जन्मदिन के अवसर पर हम ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं, कि “हे ईश्वर, भारत के लोगों के मन में जीवन के प्रति विश्वास निर्माण करने के लिए कुछ सर्वोत्तम शब्द हमें दे. हम अपने शब्दों से उन्हें बल दे सकें. सम्पूर्ण भारत के महासागर की केवल एक बूंद हैं. केवल एक बूंद, यह हम अच्छी तरह जानते हैं.

जन्मदिन के समारोह के अवसर पर उन्होंने अपने मन की बेचैनी को व्यक्त किया. फिर भी आजकल उनका मन अस्वस्थ था. उन्होंने अपने मन को कहीं और मोड़ने का चाहे कितना ही प्रयत्न क्यों न किया, मगर अपने आतंरिक एकाकीपन से मन व्याकुल ही था. ‘चाहे कहीं भी जाएं, हमारे साथ हमारा मन तो है. वह कहां जाएगा?’       

वे फिर से काम करने लगे. अगस्त तक सारे काम पूरे करने का उन्होंने निश्चय किया था. परन्तु अचानक उस समय उनकी तबियत बिगड़ गई. मार्च में वे जा नहीं सके. परन्तु मई में वे मुम्बई से लन्दन के लिए जहाज़ से निकले थे. उस समय उन्होंने ‘गीतांजली’ की प्रति नोबेल पुरस्कार के लिए भेजी.

लन्दन में कुछ दिन रहकर रथीन्द्रनाथ और उसकी पत्नी प्रतिमा के साथ वे अमेरिका आये. वहां एक कार्यक्रम के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया था. उसी समय शिकागो से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘पोएट्री में रवीन्द्रनाथ की एकदम छह कविताएँ प्रकाशित हुईं, और लोगों से उनका परिचय हुआ.

दिन हवा की गति से भाग रहे थे. वे भारत वापस आये. फिर से नए सिरे से शांति निकेतन पर ध्यान देने लगे.

और सन् 1993 में वे यू. एस. ए. में एक धर्म परिषद् में अपना लेख सादर करने गए. वे वापस आये, और उनके ‘गीतांजली को नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने का समाचार प्राप्त हुआ. भारत से साहित्य के लिए प्राप्त होने वाला यह सर्वोच्च सम्मान था. उन्हें यह ज्ञात था कि अल्फ्रेड नोबेल की छोडी हुई करोड़ों की संपत्ति के ब्याज से यह पुरस्कार दिया जाता है. परन्तु भारत को प्राप्त होने वाला प्रथम नोबेल पुरस्कार एक कवि के साहित्य को प्राप्त हो, इसका उन्हें आश्चर्य हुआ.

शांति निकेतन में उनका सम्मान समारोह आयोजित किया गया, तब उन्होंने कहा,
“हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी
, कि ऐसा कोई पुरस्कार हमें मिलेगा, और उसके लिए हमें प्रोत्साहित किया मोहितचन्द्र सेन और शरदबाबू ने. हम उनके आभारी हैं.”

और फिर आरंभ हुई उनके सत्कार की परंपरा. एक के बाद एक सार्वजनिक सत्कार होते रहे. इस भागदौड़ के जीवन में भी उनके कविता संग्रह, लेखन संग्रह प्रकाशित होते रहे. अब ब्रिटिश सरकार का ध्यान उनकी ओर गया, और एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्हें ‘सर की सम्माननीय उपाधि प्रदान की गई.

भारत का वातावरण सतही तौर पर शांत, मगर भीतर ही भीतर खदखदाते हुए ज्वालामुखी के समान तो था ही, साथ ही  विश्व युद्ध के संकेत भी प्राप्त हो रहे थे. रवीन्द्रनाथ को भारतीय स्तर पर पहचान मिली और अंदमान से विनायक दामोदर सावरकर की शुभेच्छाओं की कविता उन्हें प्राप्त  हुई. भारत में अनेक स्तरों पर उनका सम्मान हो रहा था. जिनमें जवाहरलाल  नेहरू और गोविन्द वल्लभ पन्त भी शामिल थे.

और उसी समय मोहनदास करमचंद गांधी अफ्रीका से लौटे थे. सत्याग्रह से संबधित उनकी अनेक कहानियां उनके भारत आने से पहले पहुँच चुकी थीं. ब्रिटिश सरकार का और साथ ही अनेक नेताओं का ध्यान भी उनकी तरफ़ था, और उनसे अपेक्षाएँ भी थीं.

मोहनदास गांधी ने भारत पहुंचने से पूर्व ही देश की स्थिति का जायज़ा लिया था और वकालत न करते हुए भारतीय जनता के लिए कार्य करने का निश्चय करके ही वे लौटे थे. रवीन्द्रनाथ के मन में मोहनदास गांधी के प्रति एक कुतूहल था. वकालत न करते हुए देशसेवा का व्रत लेने वाले इस व्यक्ति को देखना चाहिए, ऐसा उन्हें लग रहा था.

उनके भारत पहुंचते ही विश्व युद्ध की घोषणा होकर तीस देशों में न सिर्फ युद्ध का माहौल ही उत्पन्न हुआ, बल्कि तीस देशों ने इस युद्ध में भाग भी लिया. एक ह्त्या से आरंभ हुए दो देशों के बीच इस युद्ध में विश्व के तीस देशों ने भाग लिया. उसमें ब्रिटेन भी शामिल था, और ब्रिटेन के आधिपत्य वाले सभी देशों को, साथ ही भारत को भी इस युद्ध में भाग लेना पडा.

28 जुलाई 1914 को यह युद्ध शुरू हुआ. उसमें कुल लगभग एक करोड़ सैनिक, सत्तर लाख सर्वसामान्य लोग, डेढ़ लाख पशु भाग लेने वाले थे. यह विशाल युद्ध क्या विश्व का अंत करेगा, ऐसी आशंका निर्माण हो गई थी. इनमें तेरह लाख भारतीय लोग मजबूरन शामिल हुए थे. युद्ध के बारे में अखबारों में रोज़ ही लिखा जा रहा था, और रवीन्द्रनाथ को अत्यंत दुःख हो रहा था. जो जीवन नहीं दे सकता, उसे मारने का अधिकार ही नहीं है, ऐसा उनका विचार था. देश में भयग्रस्त वातावरण था. नौजवान भारत की स्वतंत्रता के लिए आगे आ रहे थे. ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो चारो ओर अन्धेरा छा गया हो.

उसी समय मोहनदास भारत वापस लौटे थे. इक्कीस वर्ष अफ्रीका में भारतीय व्यापारियों के कानूनी सलाहकार होने के कारण वे वर्णभेद और वंशभेद का सामना करके आये थे, सुप्रसिद्ध श्री गोपाल कृष्ण गोखले की सलाह पर. उसी समय वे एक राष्ट्रवादी नेता, संयोजक, व्यवस्थापक और शान्ति के मार्ग पर चलने वाले नेता के रूप में प्रसिद्ध थे. ऐसे समय रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें शांति निकेतन आने का निमत्रण दिया और वे तीन मार्च 1915 को शांति निकेतन आये.

शांति निकेतन का रम्य परिसर,  पद्मा नदी, नारियल और ताड़ के वृक्ष. उनकी ‘श्यामली कुटी, उस पर लिखी हुई पंक्तियाँ

I have made a shelter….”

“किसी तपोवन के आश्रम में जाएं और सहस्त्रों विद्यार्थियों को उसमें समा लें, ऐसा प्रतीत हो रहा है. आप कुलपति हैं इस विद्यापीठ के.” मोहनदास गांधी मन से रवीन्द्रनाथ की तारीफ़ कर रहे थे. उन्होंने आगे कहा,
“रवीन्द्रनाथ
, एक बात कहता हूँ, आप जैसी अद्वितीय पुरुष प्रतिमा हमने आज तक नहीं देखी. लक्ष्मी-सरस्वती का तेज और ईश्वर द्वारा प्रदत्त लावण्यमय रूप. मैं सोचता हूँ कि यदि प्रौढावस्था में आप इतने अधिक सुन्दर हैं, तो...”

“जो है, वह ईश्वर ने ही प्रदान किया है. हमारे हाथों से बना है यह शांति निकेतन, इसका व्यवस्थापन.”

“आपकी ‘गीतांजली को नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ और भारतीयों का सम्मान आपने बढाया, रवीबाबू!”

“आपने अफ्रीका में अहिंसात्मक मार्ग से सत्याग्रह किया, यह हमें बहुत अच्छा लगा.”

“अहिंसा मानव का कर्तव्य है. हिंदूधर्म ने प्राचीन काल से ही अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, असंग्रह, शरीरश्रम, अस्वाद, सर्वत्र भय वर्जनम् – का संदेश दिया है, उसी का पालन मैं कर रहा हूँ, बस इतनी ही बात है.”

“अफ्रीका में हिन्दू समाज की वकालत करना, और सम्पूर्ण भारत देश को उपदेश देना, और उनके द्वारा उसे मानना, यह कहां तक संभव है?

“सब कुछ संभव है, रवी बाबू! किसी भी सज्जन व्यक्ति को ह्त्या, हिंसा प्रिय नहीं है. ब्रिटिश सरकार से शान्ति मार्ग से ही युद्ध करना होगा. ‘युद्ध – यह शब्द ही हमें स्वीकार नहीं है. यदि हिन्दू-मुस्लिम एक हो जाएं, तो सत्याग्रह के मार्ग से निषेध करना सहज ही संभव है.”

“परन्तु, क्या भारतीयों का इतना बड़ा समाज एक होगा?

“रवीबाबू, एकसंघ क्यों नहीं होगा? स्वतंत्रता तो सभी चाहते हैं. जगह-जगह पर यदि अहिंसक मार्ग से सत्याग्रह किया जाए, तो देश स्वतन्त्र क्यों नहीं होगा?

रवीन्द्रनाथ विचार करने लगे. सम्पूर्ण देश को एकसंघ करना आसान नहीं था. उनके नेत्रों के सामने काश्मीर से कन्याकुमारी तक और ब्रह्मदेश से अफ़गानिस्तान तक सम्पूर्ण देश सजीव होकर खड़ा था. रवीन्द्रनाथ को महसूस हुआ कि मोहनदास गांधी इतने सहज शब्दों में बोल रहे हैं, इसका कि अर्थ यह है, कि ऐसा करने की सामर्थ्य उनके भीतर है.        

“एक प्रश्न उपस्थित होता है, कि प्रत्येक प्रांत में स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र क्रांतिकारी खड़े हो जाते हैं, और ऐसा कहते हैं, कि शस्त्रों से ही क्रान्ति होगी, उनका क्या?

“रवी बाबू, हरेक का मार्ग अलग होता है. यदि एकाध क्रांतिकारी एकाध ब्रिटिश अधिकारी को मार डाले, तो क्या प्रश्न समाप्त हो जाता है? वह मर जाता है, परन्तु देश स्वतन्त्र नहीं होता. देश में यदि अखण्डता और जागरूकता लानी है तो वह केवल अहिंसा के मार्ग से ही आयेगी, ऐसा मेरा विश्वास है.”

रवीन्द्रनाथ इस बात से पूरी तरह सहमत हो गए. शब्दों से जागृति होती है. भाषणों से और अहिंसात्मक आन्दोलनों से निषेध व्यक्त किया जाता है. क्रान्ति को दबाया जाता है. निषेध एक मन से दूसरे मन को जाता है.

“परन्तु इस सारे समाज को जागृत होकर सरकार के विरुद्ध निषेध दर्ज करने के लिए कितना समय लगेगा?

“समय तो लगेगा, रवीबाबू! परन्तु सन् 1857 के पहले से समाज स्वतंत्रता के लिए लड़ ही तो रहा है ना! कुछ और साल सही, परन्तु जीवन की हानि नहीं होगी.”

“ऐसा कैसे कह सकते हैं? यदि सत्याग्रह पर बंदी लगाई गई, बंदूकें चलाईं, गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया तो?”

“अब महायुद्ध आरंभ हो गया है. भारत के सैनिक वहां अंग्रेजों की विजय के लिए लढ़ रहे हैं. उन पर उपकार करने वालों का भी एहसास तो उन्हें होगा ही. इसके अतिरिक्त देश का ध्यान केन्द्रित करने का यही योग्य समय है. इस युद्ध का प्रतिसाद भारत में भी गूंजेगा ही.”

बड़ी देर तक मोहनदास गांधी और रवीन्द्रनाथ देश के बारे में बातें करते रहे. युद्ध के उपरांत शान्ति स्थापित होगी, इसकी प्रतीक्षा करनी चाहिए, अथवा लोगों में देशभक्ति की जागृति का प्रसार करना चाहिए, इस पर रवीन्द्रनाथ ने पूछा,

‘यह पहला ही महायद्ध है, जिसमें लगभग सभी देश शामिल हुए हैं, ऐसी परिस्थिति में यह युद्ध समाप्त कब होगा, यह भी एक बड़ा सवाल है.”

“रवी बाबू, महाभारत युद्ध से आखिर क्या प्राप्त हुआ? किसे किस प्रश्न का उत्तर मिला? जिन्हें उत्तर चाहिए था, वे तो रहे ही नहीं. ऐसा ही होता है. जिस भूमिका से युद्ध किया जाता है, उसमें द्वेष, क्रोध, साम्राज्य लालसा होती ही है. ब्रिटिश सरकार यदि यह सोचती है कि वे पूरे विश्व को जीत लेंगे, तो यह असंभव है. युद्ध से कभी प्रश्न हल नहीं होते, बल्कि अधिक बढ़ जाते हैं. हमारे भारत पर यह परिणाम अवश्य होगा.”

“फिर लोग आखिर युद्ध क्यों करते हैं?

“यही मूलभूत प्रश्न है, रवीबाबू! सत्ता. अहंकार, सामर्थ्य की खातिर ये युद्ध होते हैं, और मेरा ऐसा विचार है, कि हमारे देश पर ब्रिटिशों ने जो आक्रमण किया है, उसे हम युद्ध के बगैर लौटा देंगे! विश्वास रखें, अहिंसा से सब कुछ संभव है. गौतम बुद्ध ने अहिंसा का प्रसार किया, और सम्राट अशोक ने उसका स्वीकार तो किया ही, बल्कि देश विदेश में वह धर्म ले गया. क्योंकि अशोक मृत्यु के विराट स्वरूप को न देख सका.!”

“महात्मा! आप महात्मा हैं, मोहनदास जी! आप सचमुच ग्रेट हैं. हमें भी अहिंसा तत्व पूरी तरह से मान्य ही है, परन्तु अनेक क्रांतिवीर अपने देश के लिए लड़ रहे हैं, अंदमान में काले पानी की सज़ा भुगत रहे हैं, उन्हें भी मातृभूमि की स्वतंत्रता चाहिए.”

“मान्य है. रक्तपात से प्राप्त हुई स्वतंत्रता किस काम की? एक बार यदि देश संगठित होकर विदेशी माल का बहिष्कार करने लगे, प्रत्येक स्थान पर निषेध दर्शाने लगे, तो कुछ समय बाद क्यों न हो, स्वतंत्रता प्राप्त होगी ही.”

“सुभाषचंद्र, अरविंद घोष, सावरकर, तिलक, लाला लाजपत राय और ऐसे कितने ही लोग किसी न किसी मार्ग से स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर ही रहे हैं.”

“रवी बाबू, सत्य का अर्थ है स्वतंत्रता, सत्य से ही स्वतंत्रता प्राप्त होगी. जवाहरलाल नेहरू, गोविन्द वल्लभ पन्त इन सब से मैं यही कहता हूँ. अहिंसापूर्वक लढ़ें, सत्याग्रह से जीतें. शान्ति से रहें. परन्तु अब युद्ध की गूँज सुनकर लोग अवश्य ही अहिंसा की ओर मुड़ेंगे.”
“महात्माजी ..”        

“आपने मुझे इतना महत्वपूर्ण नाम ‘महात्माजी दिया है. अब मुझे उसके योग्य होना होगा.  इक्कीस सालों से भारत में हो रही घटनाओं के बारे में सिर्फ सुन रहा था. वैसे तो लन्दन में सावरकर तथा अन्य नेताओं से मुलाक़ात हुई थी. सावरकर ने अपने ज्वलंत विचार सभा में नहीं रखे थे, क्योंकि वे मेरी अहिंसावादी भूमिका से अवगत थे. मैंने ‘इन्डियन कॉंग्रेस में प्रवेश कर ही लिया है.  अब कार्यारंभ कर दिया है. स्वदेशी का उपयोग, स्वावलंबन, सत्य, अहिंसा, निषेध – ये सारे शस्त्र मैं अपनी ओर से लोगों को दूंगा.”

“सुभाषचन्द्र बोस के बारे में आपकी क्या राय है?

“क्रांतिकारी आन्दोलन का नेतृत्व करने की क्षमता उनमें है, युवा हैं. स्वतन्त्रता के लिए युद्ध करने की दृष्टी से उन्होंने एक संगठन तैयार किया है, जिसमें एक महिला पथक भी है, ऐसा सुना है.”

रवीन्द्रनाथ ने कुछ भी नहीं कहा. ‘अहिंसा से वे सहमत थे, परन्तु दीर्घ काल प्रतीक्षा मन से उन्हें स्वीकार नहीं थी. वैसे ही युद्ध से होने वाला संहार भी उन्हें मान्य नहीं था. जवाहरलाल नेहरू को मोहनदास गांधी मान्य थे. ऐसे समय में रवीन्द्रनाथ विचार कर रहे थे. सही-सही क्या करना चाहिए! इस प्रश्न का उत्तर उन्हें मिल गया था.

Wednesday, 17 September 2025

एकला चलो रे - 28

 

 

 

28

 

                        जनगणमन-अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंग

विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंग

तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशीष मागे,

गाहे तव जयगाथा।

जनगण मंगलदायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

 

रवीन्द्रनाथ अपनी मधुर और सुस्पष्ट आवाज़ में मुक्त रूप से गा रहे थे. कलकत्ता में राष्ट्रीय अधिवेशन का आज शानदार उद्घाटन था और इस सभा में हाल ही में भारत आये आयरिश सम्राट और युनाइटेड किंगडम के शासक भी थे. उनका आगमन भारत में हुआ था.

उसी दिन कलकत्ता अधिवेशन के अंतिम सत्र में कलकत्ता के युवकों ने रवीन्द्रनाथ के उस गीत के विरुद्ध ज़बर्दस्त निषेध घोषणाएँ कीं. अगले दिन सभी अखबारों में रवीन्द्रनाथ का निषेध किया गया. अधिवेशन समाप्त होने के बाद भी उस गीत के निषेधार्थ अनेक सभाएं हुईं. परन्तु रवीन्द्रनाथ समझ ही नहीं पा रहे थे, कि इस गीत में उनसे क्या गलती हुई है, और अखबारों की खबर पढ़कर वे लोगों की भावना को समझ गए. परन्तु उसका स्पष्टीकरण देते हुए उन्होंने अखबार में लिखा, ‘हमारे उपन्यास ‘गोरा में उपन्यास का नायक गोरा परेश बाबू कहता है, ‘मुक्ति का एक मन्त्र हमारे पास है, और इसीलिये हम किसी भी समाज में अपना स्थान न पा सके. हमें अज्ञानी समझें और हमें ईश्वर का ऐसा मन्त्र दें, जो हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, ब्राह्मो समाज, सभी को एक सुविचार दे. जिसके फलस्वरूप मंदिर के द्वार सबके लिए खुले रहेंगे, और वे लिखते हैं,

 

देश देश नंदित करि, मन्द्रित तव भेरी

आशिलो जो तो वीरवृन्द आसन तव घेरी ।।

 

 हमारी ये भावनाएँ विश्वात्मक हैं. हमने जन-गण-मन...यह कविता किसी एक को संबोधित करके नहीं लिखी है. कम से कम जॉर्ज पंचम के स्वागत के लिए तो बिल्कुल ही नहीं.

उनके इस स्पष्टीकरण से सतही तौर पर तो लोगों का गुस्सा कम हो गया, फिर भी वह दीर्घकाल तक भीतर ही भीतर उफन रहा था. रवीन्द्रनाथ विचार कर रहे थे.

‘इतने वर्षों से लोकमानस पर हमारा प्रभुत्व है. लोग हमें समझते हैं. थोड़ा क्रोधित भी हो जाएं, तो भी हमसे प्रेम ही करते हैं, हमारे साहित्य पर प्रेम करते हैं. इकट्ठा किया हुआ सूखे पत्तों का ढेर बिना किसी कारण अचानक जलने लगे, वैसा आचरण किया लोगों ने. वस्तुतः ऐसा नहीं है.

हमने जॉर्ज पंचम के स्वागत में यह कविता नहीं लिखी है। असल में कोई संभ्रम निर्माण हो ऐसे कोई शब्द ही उसमें नहीं हैं. उन्होंने फिर से अपनी कविता पढ़ी,

                       अहरह तव आह्वान प्रचारित, शुनि तव उदार बाणी

हिन्दु बौद्ध शिख जैन पारसिक मुसलमान खृष्टानी

पूरब पश्चिम आसे तव सिंहासन-पाशे

प्रेमहार हय गांथा।

जनगण-ऐक्य-विधायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

 

इस दूसरे पद में भी उन्हें कुछ भी आक्षेपार्ह नज़र नहीं आया. उन्होंने मोहितचन्द्र को बुलाया और कहा,

“तीसरा पद सुनें,

                    “पतन-अभ्युदय-वन्धुर पन्था, युग युग धावित यात्री।

हे चिरसारथि, तव रथचक्रे मुखरित पथ दिनरात्रि।

दारुण विप्लव-माझे तव शंखध्वनि बाजे

संकटदुःखत्राता।

 जन गण पथ परिचायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

मोहितचन्द्र ये तो हमने श्रीकृष्ण की शंखध्वनि से भारतीय जनता को जगाने का प्रयत्न किया है. निद्रित भारतीय जनता घोर तिमिर से बाहर आये, सभी धर्मों के लोग एकत्रित होकर सुखशांति से रहें, केवल यही हमारा उद्देश्य था. आगे चलकर चौथे पद में यही विचार स्पष्ट किया है.

घोरतिमिरघन निविड़ निशीथे पीड़ित मूर्छित देशे

जाग्रत छिल तव अविचल मंगल नतनयने अनिमेषे।

दुःस्वप्ने आतंके रक्षा करिले अंके

स्नेहमयी तुमि माता।

जनगणदुःखत्रायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

 

चौथा पद पढ़कर उन्होंने मोहितचन्द्र की ओर साभिप्राय देखा और वे मनःपूर्वक हँसे.

“अब पांचवा पद पढ़ें तब अभिप्राय देता हूँ.

 

रात्रि प्रभातिल, उदिल रविच्छवि पूर्व-उदयगिरिभाले –

गाहे विहंगम, पुण्य समीरण नवजीवनरस ढाले।

तव करुणारुणरागे निद्रित भारत जागे

तव चरणे नत माथा।

जय जय जय हे जय राजेश्वर भारत भाग्य विधाता!

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

“अब बताइये, की इसमें जॉर्ज पंचम को उद्देश्य करके क्या कहा गया है?”

“गुरुदेव, क्षमा चाहता हूँ, परन्तु आप मन में कल्पना ही करें, यह सारी शब्द संपदा, और उसका अर्थ केवल जॉर्ज पंचम के इस देश में आने के बाद क्या क्या हो सकता है, ऐसी कल्पना करके लिखी गई होगी, इसमें कोई संदेह ही शेष नहीं बचता.”

“अर्थात्, आपको भी ऐसा ही प्रतीत होता है?

“मुझे कैसे होगा, गुरुदेव. आप मन में जॉर्ज पंचम की कल्पना करें और पूरी कविता पढ़ें. भारत  के भाग्य विधाता जॉर्ज पंचम के भारत आने के बाद क्या क्या हो सकता है, इसका वर्णन यह कविता है. एक बार पढ़ कर देखें. ‘चिर सारथी अर्थात् सम्पूर्ण विश्व के चक्र को धारण करने वाले श्रीकृष्ण के स्थान पर जॉर्ज पंचम को मन में लाएं. सम्पूर्ण चित्र स्पष्ट हो जाएगा.”

और रवीन्द्रनाथ समझ गए. जॉर्ज पंचम का भारत आना और अधिवेशन में कविता पढ़ना एक संयोग था. उन्हें समझ में आ गया और अपना स्पष्टीकरण देने वाला, समझाकर बतलाने वाला लेख उन्होंने ‘भारती पत्रिका तथा अन्यत्र लिखा. उनके मन में विचार आया,

‘हमसे भी लोगों को अपेक्षाएं हैं. हमें प्रयत्नपूर्वक उन्हें पूरा करना होगा. और वह हम करेंगे ही. परन्तु यह राजकारण हमारे लिए नहीं है. इसकी अपेक्षा ‘एकला चलो रे का मार्ग सर्वोत्तम है.

उन्हें अपने घनिष्ठ मित्र जगदीशचन्द्र बोस को भी लिखा, और मन शांत हो गया...और वे अपना काम करने लगे.

 

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एकला चलो रे - 41

  41 मैत्रेयी का कलिम्पोंग से फोन आया तो रथीन्द्रनाथ और प्रतिमादेवी कलिम्पोंग गए थे. रवीन्द्रनाथ के माथे पर ज़ख्म था , और वे बात करने की...