Wednesday, 17 September 2025

एकला चलो रे - 28

 

 

 

28

 

                        जनगणमन-अधिनायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा द्राविड़ उत्कल बंग

विन्ध्य हिमाचल यमुना गंगा उच्छल जलधि तरंग

तव शुभ नामे जागे, तव शुभ आशीष मागे,

गाहे तव जयगाथा।

जनगण मंगलदायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

 

रवीन्द्रनाथ अपनी मधुर और सुस्पष्ट आवाज़ में मुक्त रूप से गा रहे थे. कलकत्ता में राष्ट्रीय अधिवेशन का आज शानदार उद्घाटन था और इस सभा में हाल ही में भारत आये आयरिश सम्राट और युनाइटेड किंगडम के शासक भी थे. उनका आगमन भारत में हुआ था.

उसी दिन कलकत्ता अधिवेशन के अंतिम सत्र में कलकत्ता के युवकों ने रवीन्द्रनाथ के उस गीत के विरुद्ध ज़बर्दस्त निषेध घोषणाएँ कीं. अगले दिन सभी अखबारों में रवीन्द्रनाथ का निषेध किया गया. अधिवेशन समाप्त होने के बाद भी उस गीत के निषेधार्थ अनेक सभाएं हुईं. परन्तु रवीन्द्रनाथ समझ ही नहीं पा रहे थे, कि इस गीत में उनसे क्या गलती हुई है, और अखबारों की खबर पढ़कर वे लोगों की भावना को समझ गए. परन्तु उसका स्पष्टीकरण देते हुए उन्होंने अखबार में लिखा, ‘हमारे उपन्यास ‘गोरा में उपन्यास का नायक गोरा परेश बाबू कहता है, ‘मुक्ति का एक मन्त्र हमारे पास है, और इसीलिये हम किसी भी समाज में अपना स्थान न पा सके. हमें अज्ञानी समझें और हमें ईश्वर का ऐसा मन्त्र दें, जो हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, ब्राह्मो समाज, सभी को एक सुविचार दे. जिसके फलस्वरूप मंदिर के द्वार सबके लिए खुले रहेंगे, और वे लिखते हैं,

 

देश देश नंदित करि, मन्द्रित तव भेरी

आशिलो जो तो वीरवृन्द आसन तव घेरी ।।

 

 हमारी ये भावनाएँ विश्वात्मक हैं. हमने जन-गण-मन...यह कविता किसी एक को संबोधित करके नहीं लिखी है. कम से कम जॉर्ज पंचम के स्वागत के लिए तो बिल्कुल ही नहीं.

उनके इस स्पष्टीकरण से सतही तौर पर तो लोगों का गुस्सा कम हो गया, फिर भी वह दीर्घकाल तक भीतर ही भीतर उफन रहा था. रवीन्द्रनाथ विचार कर रहे थे.

‘इतने वर्षों से लोकमानस पर हमारा प्रभुत्व है. लोग हमें समझते हैं. थोड़ा क्रोधित भी हो जाएं, तो भी हमसे प्रेम ही करते हैं, हमारे साहित्य पर प्रेम करते हैं. इकट्ठा किया हुआ सूखे पत्तों का ढेर बिना किसी कारण अचानक जलने लगे, वैसा आचरण किया लोगों ने. वस्तुतः ऐसा नहीं है.

हमने जॉर्ज पंचम के स्वागत में यह कविता नहीं लिखी है। असल में कोई संभ्रम निर्माण हो ऐसे कोई शब्द ही उसमें नहीं हैं. उन्होंने फिर से अपनी कविता पढ़ी,

                       अहरह तव आह्वान प्रचारित, शुनि तव उदार बाणी

हिन्दु बौद्ध शिख जैन पारसिक मुसलमान खृष्टानी

पूरब पश्चिम आसे तव सिंहासन-पाशे

प्रेमहार हय गांथा।

जनगण-ऐक्य-विधायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

 

इस दूसरे पद में भी उन्हें कुछ भी आक्षेपार्ह नज़र नहीं आया. उन्होंने मोहितचन्द्र को बुलाया और कहा,

“तीसरा पद सुनें,

                    “पतन-अभ्युदय-वन्धुर पन्था, युग युग धावित यात्री।

हे चिरसारथि, तव रथचक्रे मुखरित पथ दिनरात्रि।

दारुण विप्लव-माझे तव शंखध्वनि बाजे

संकटदुःखत्राता।

 जन गण पथ परिचायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

मोहितचन्द्र ये तो हमने श्रीकृष्ण की शंखध्वनि से भारतीय जनता को जगाने का प्रयत्न किया है. निद्रित भारतीय जनता घोर तिमिर से बाहर आये, सभी धर्मों के लोग एकत्रित होकर सुखशांति से रहें, केवल यही हमारा उद्देश्य था. आगे चलकर चौथे पद में यही विचार स्पष्ट किया है.

घोरतिमिरघन निविड़ निशीथे पीड़ित मूर्छित देशे

जाग्रत छिल तव अविचल मंगल नतनयने अनिमेषे।

दुःस्वप्ने आतंके रक्षा करिले अंके

स्नेहमयी तुमि माता।

जनगणदुःखत्रायक जय हे भारत भाग्य विधाता!

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

 

चौथा पद पढ़कर उन्होंने मोहितचन्द्र की ओर साभिप्राय देखा और वे मनःपूर्वक हँसे.

“अब पांचवा पद पढ़ें तब अभिप्राय देता हूँ.

 

रात्रि प्रभातिल, उदिल रविच्छवि पूर्व-उदयगिरिभाले –

गाहे विहंगम, पुण्य समीरण नवजीवनरस ढाले।

तव करुणारुणरागे निद्रित भारत जागे

तव चरणे नत माथा।

जय जय जय हे जय राजेश्वर भारत भाग्य विधाता!

जय हे, जय हे, जय हे, जय जय जय जय हे।।

“अब बताइये, की इसमें जॉर्ज पंचम को उद्देश्य करके क्या कहा गया है?”

“गुरुदेव, क्षमा चाहता हूँ, परन्तु आप मन में कल्पना ही करें, यह सारी शब्द संपदा, और उसका अर्थ केवल जॉर्ज पंचम के इस देश में आने के बाद क्या क्या हो सकता है, ऐसी कल्पना करके लिखी गई होगी, इसमें कोई संदेह ही शेष नहीं बचता.”

“अर्थात्, आपको भी ऐसा ही प्रतीत होता है?

“मुझे कैसे होगा, गुरुदेव. आप मन में जॉर्ज पंचम की कल्पना करें और पूरी कविता पढ़ें. भारत  के भाग्य विधाता जॉर्ज पंचम के भारत आने के बाद क्या क्या हो सकता है, इसका वर्णन यह कविता है. एक बार पढ़ कर देखें. ‘चिर सारथी अर्थात् सम्पूर्ण विश्व के चक्र को धारण करने वाले श्रीकृष्ण के स्थान पर जॉर्ज पंचम को मन में लाएं. सम्पूर्ण चित्र स्पष्ट हो जाएगा.”

और रवीन्द्रनाथ समझ गए. जॉर्ज पंचम का भारत आना और अधिवेशन में कविता पढ़ना एक संयोग था. उन्हें समझ में आ गया और अपना स्पष्टीकरण देने वाला, समझाकर बतलाने वाला लेख उन्होंने ‘भारती पत्रिका तथा अन्यत्र लिखा. उनके मन में विचार आया,

‘हमसे भी लोगों को अपेक्षाएं हैं. हमें प्रयत्नपूर्वक उन्हें पूरा करना होगा. और वह हम करेंगे ही. परन्तु यह राजकारण हमारे लिए नहीं है. इसकी अपेक्षा ‘एकला चलो रे का मार्ग सर्वोत्तम है.

उन्हें अपने घनिष्ठ मित्र जगदीशचन्द्र बोस को भी लिखा, और मन शांत हो गया...और वे अपना काम करने लगे.

 

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