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अभी
कल परसों ही तो श्रावण धाराएं बरस गईं थीं. आज पूर्व क्षितिज पर आ रहा बाल रविराज
कुछ देर रुका और फिर उसने अपनी किरणों के अश्व चारों दिशाओं में बिखेर दिए.
शांति
निकेतन में आज सभी अत्यंत उत्साह से ब्रह्म मुहूर्त में प्रार्थना के लिए एकत्रित
हुए थे. आज सामवेद की कुछ ऋचाओं का पठन भी किया गया, और सारे विद्यार्थी शांति
निकेतन के भव्य प्रांगण में इकट्ठा हुए. बंगाल में उत्साहपूर्वक मनाया जाने वाला महोत्सव
‘बाईशे श्रावण’ आज शांति निकेतन में अलग प्रकार से आयोजित किया गया था. आसपास के गाँवों के
लोगों को भी निमंत्रण भेजे गए थे.
पिछले
आठ दिनों से इस उत्सव की तैयारियां शुरू हो गईं थीं. बहुत कुछ अलग-सा होने वाला है, इसकी
कल्पना रवीन्द्रनाथ ने सबको पहले ही दे दी थी. श्रावण मास में तैयार नन्हें वृक्षों
के पौधे सजाकर रखे हुए थे. पालकियां तैयार थीं. भव्य आँगन में बीचोंबीच एक वृत्त बनाया
गया था. उसके तीन तरफ़ मंडप बनाकर चटाईयां बिछाई गयी थीं, एक तरफ आमंत्रित मेहमानों के
लिए कुर्सियां भी रखी गईं थीं.
आज
सबकी पोशाक पीले रंग की थी. धोती, अंगरखा और कमर पर कस कर बंधे हुए वस्त्र पहने ये बालक
मानो सूरजमुखी की चलती फिरती क्यारियाँ ही थीं. लड़कियों ने फूलों से सिंगार किया
था.कलाई पर फूलों की माला, गले में, बालों में फूलों के हार और हरे वस्त्रों में वे वनदेवता
प्रतीत हो रही थीं.
गाँव
के लोग जल्दी जल्दी शांति निकेतन में आ रहे थे. एक दूसरे से कह रहे थे,
‘च्योलून
च्योलून, ताडीताडी च्योलून, परे बेशी भीड़ हॉबे. ‘
अर्थात्
अपेक्षा से अधिक भीड़ होने से सब लोग चिपक चिपक कर बैठ गए. आगे क्या होने वाला इसके
बारे में उत्सुकता बढ़ रही थी.
सजी
धजी कुछ लड़कियों ने मंगलगीत आरंभ किया. तभी शांति निकेतन के फाटक से चार पांच
छोटी-छोटी पालकियां लेकर आने वाले बच्चे और उनके पीछे जुलूस के बच्चे थे. पालकियों
के आते ही लड़कियां अत्यंत खुशी से गाने लगीं.
आय आय आय आमादेर अंगणे
तोदेर नवीन पल्लवे।
नाचक आलोक सवितार
दे पवने वल्लभे।
मर्मर गीत उपहार ।
शंखध्वनि
हुई. मंगल वाद्य बजने लगे. सारी सृष्टि सचेतन होकर आगे सुनने लगी. वे सुशोभित
पालकियां वृत्त के भीतर स्थिर हो गईं. उसी वृत्त में पृथ्वी, आप, तेज, वायु और
आकाश ये पंच महाभूत भी स्थित थे और उस पालकी के छोटे छोटे पौधों को आकाश के हाथों
में देते हुए दो बच्चे गाकर बता रहे थे,
‘आकाशे तोमार सहास उदार दृष्टि
माटार गभीरे जागाय रूपेर सृष्टि
तव आह्वान एई तो श्यामल मूर्ती
आलोक अमृते खुंजिले प्राणार पूर्ती
गीत
चल ही रहा था कि आकाश ने कहा,
‘हे, नन्हे
पौधों, आओ हमारे पास, हम तुम्हारी रक्षा करेंगे. तुम प्रसन्न रहो.’ वे पौधे आकाश
को दिए गए. तब उन दोनों बच्चों ने वायुदेव से कहा,
हे पवन, करो नई गौण ।
आषाढ़े बेजेछे तव वंशी
तापित निकुंजेर मौन। निश्वासे दिले तुमि
ए तरु खेलिबे तव संगे।
संगीत दियो एरे भिक्षा
दियो तव छंदेर रंगे ।
पल्लव हिल्लोल शिक्षा
वायुदेव ने
वे पौधे आकाश के हाथों से लिए और उन्हें सहलाते हुए बोले,
‘हम
इन नन्हे पौधों को झुलाएंगे, खिलाएंगे, नृत्य करना सिखाएंगे.
दो बच्चों ने सूर्यदेव से
कहा,
‘सृष्टिर प्रथम वाणि तुमि हे आलोक। ए नव तरुते तव शुभ दृष्टी होक।
एकदा प्रचुर पुष्पे हवे सार्थकता। उहार प्रच्छन्न प्राणे राखो सेई
कथा।।
स्निग्ध पल्लवेर तले तव तेज भरी।
होक तव जयध्वनि शतवर्ष धरी।
फिर से वे दो बालक गाते हुए
बोले,
‘हे मेघ, इंद्रेर भेरी बाजाओ गंभीर मन्द्रस्वरे
मेदुर अंबरतले।
आनंदित प्राणेर स्पंदने ।
जागुक हे शिशुवृक्ष
महोत्सवे लहो एरे डेके
वानेर सौभाग्य दिने धरणीर वर्षा अभिषेके ।
चिंता न करें. हम जलसिंचन करके नन्हे पौधों को
संजीवनी प्रदान करेंगे.
और
फिर सबने उन पौधों को धरती के चरणों में रखा और दो बच्चे फिर से गाने लगे,
वृक्षेर धन हे धरणी धरो। फिरे निये तव वक्षे ।
शुभदिने
एरे दीक्षित करो।
अंतरे पाक
कठिन शक्ति।
कोमलता
फुले पत्रे ।
पक्षी समाज
पाठाक पत्री।
टोमा
अन्नसत्रे।
धरती
ने उन पौधों को अपने निकट लिया और बोली, “तुम बिल्कुल चिंता न करो. मैं इन पौधों
को बोऊँगी, फुलाऊंगी, सिखाऊंगी, बड़ा करूंगी, और जब बड़ा तरुवर हो जाएगा,
तो अनेकों का आश्रय स्थान होगा. इसकी ज़िम्मेदारी मैं उठाऊंगी.”
कार्यक्रम
समाप्त नहीं हुआ. नृत्य नाट्य आरंभ हुआ, जिसके
माध्यम से सबसे विनती की गई थी. पंचमहाभूत – आप-तेज-अग्नि-वायु और आकाश इन
नन्हें पौधों को बढ़ाएंगे, परन्तु आप लोग भी उन्हें बढ़ाएं. नृत्य नाट्य के समय
अनेक वाद्यों का संमिश्र स्वर वातावरण में गूँज रहा था. लोग प्रसन्नता से उठने
लगे. वन महोत्सव का ‘बाईशे श्रावण’ ऐसा भी हो सकता है, इसकी कल्पना भी किसी ने नहीं की थी.
रवीन्द्रनाथ का मन भर आया.
यह कल्पना उनके मन में कहाँ से आई, याद ही नहीं आ रहा
था. सचमुच, निराकार मन में प्रत्यक्ष ईश्वर द्वारा निर्मित
सृष्टि की बदौलत कितनी सुन्दर कल्पनाएँ प्रकट होती हैं. जब हम अपने बाग़ में गए थे, तो श्रावण की वर्षा में भीगते हुए इन नन्हें पौधों को देखा था. एक नन्हा घास का पौधा अपने सारे पत्ते मोगरे की बेल के
तने पर बिखेरकर निश्चिन्त था. मानो माँ की गोद में कोई बालक सोया हो. तब हमारे मन
में थी मृणालिनी. छोटे शमीन्द्र को गोद में लिए गीत गाने वाली. तब उनके मन में
विचार आया था, बच्चे का जन्म लेना, उसका बड़ा होना, अस्त होना, इन घटनाओं को नित्य देखते हुए यदि आकाश, पृथ्वी,
आप,
तेज और वायु यदि सहकार ही न करें तो?
और
यहीं से उनके मन में एक सुसंगत कल्पना उत्पन्न हुई. वैदिक ऋषियों ने ऋग्वेद में इन
पंचमहाभूतों की स्तुति की है. ऋग्वेद में सर्वप्रथम
ॐ
अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् होतारं रत्नधातमम्।
अर्थात् अग्निदेवता की
स्तुति की है. इसके बाद वायु की . क्योंकि यज्ञ कुंड को प्रज्वलित करने के लिए
वायु की आवश्यकता है.
वायवा याहि दर्शतेमे सोमा अरंकृताः ।तेषां पाहि श्रुधी हवम् ॥
उस
काल के ऋषियों को ज्ञात थी सृष्टि निर्माण के लिए कारणीभूत पाँच महाभूतों का महती
और इसीलिए उन्होंने सम्पूर्ण मनोभाव से उन्हें वंदन किया था. आज हम अनजाने
ही उन ऋषियों की भूमिका में पहुँच गए, इसका उन्हें मनःपूर्वक आनंद हुआ.
सचमुच,
मनुष्य कभी कभी कितना प्रसन्न हो जाता है, और कभी कभी उतना ही दुखी भी हो जाता है. उन्हें याद
आया – अपनी भतीजी इंदिरा को वे कब से पत्र लिखा करते थे. अभी हाल ही में ये लेखन
बंद हो गया है. मगर पत्र लिखते हुए अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव होता. एक दिन
उन्होंने लिखा था,
“प्रिय
इंदिरा,
हम
तुमसे बारह वर्ष बड़े हैं. समंजस लेखक, कवि और बहुत कुछ हैं. आयु के श्रेष्ठत्व और
सामाजिक श्रेष्ठत्व के होते हुए भी मेरे मन की भावनाएं तुम्हे लिखे गए पत्रों में
जिस प्रकार प्रकट हुई हैं, वैसी अन्य किसी भी लेख में नहीं हुईं. जो तुम्हें समझ
में भी नहीं आयेगी, या तुम जिसका गलत अर्थ निकालोगी,
या विश्वास नहीं करोगी, या मुझे जो बात मन में छुपे हुए रहस्य जैसी प्रतीत
होती है, वह तुम्हें कवि की नितांत कपोलकल्पना प्रतीत होगी. ऐसा विचार हमारे मन में
कभी नहीं आता, और इसीलिये मन की बात हम सहजता से लिख देते हैं.
तुम्हारे स्वभाव में एक सहजता है, निर्मलता है, बिना किसी संकोच के तुम्हारे अंतःकरण में सत्य का
चकाचौध करने वाला प्रतिबिंब दिखाई देता है.’
इंदिरा
को लिखा हुआ पत्र रवीन्द्रनाथ को पूरा पूरा याद आ गया. वह चौदह वर्ष की थी,
जब उन्होंने उसे पहला पत्र लिखा था. वह बाईस वर्ष की होने तक यह क्रम जारी रहा.
पत्र लिखना हमारा शौक है. उसे हमने कम से कम ढाई सौ पत्र लिखे थे. अंतिम पत्र में
उन्होंने लिखा था,
“इंदिरा,
तुमने बताया कि मेरे सारे पत्र सुरक्षित रखे हैं. वे सारे पत्र मुझे दे दो. उन्हें
फिर से पढ़ते हुए मुझे बहुत खुशी होगी, और यदि दीर्घकाल तक जीवित रहा तो,
वे मेरे लिए यादों के मोरपंख होंगे.”
और
सचमुच, उसने वे सारे पत्र उन्हें दे दिए. उन्होंने ‘छिन्न पत्रावली’
प्रकाशित की और वे मन ही मन हंसे. चाहे कविता हो, उपन्यास हो, नाटक हो, नृत्य हो, राजकीय, सामाजिक लेखन हो, साथ ही शांति निकेतन का अभ्यासक्रम अथवा कार्यक्रम
तैयार करना हो, इस सबके बीच भी हम निरंतर पत्र लिखते ही रहे.
हमारा
स्वभाव गंभीर है, लोग यूं ही ऐसा कहते हैं. हम अधिक गहराई से हर बात पर
विचार करते हैं, इतिहास, धर्म का गहराई से अध्ययन करते हैं,
इसलिए कहते हैं. फिर भी हम पत्र लिखते हैं? क्यों? मन से मन का संवाद जुड़ जाता है,
इसलिए? उसमें एक अपना मन होता है, तो दूसरा किसी अन्य का मन, और लिखते जाते हैं. पद्मा
नदी में जैसे लहरों पर लहरें उठती हैं, उसी तरह मन में भी शब्दों के आवर्तन होते ही रहते
हैं. जब जब हम नौकाघर में बैठकर लिखते रहे, तो प्रकृति परिवर्तन का प्रत्येक क्षण शब्दों से
प्रकट होता रहा. इसके बाद शांति निकेतन के रम्य परिसर को बढ़ाने के लिए हाथ में
खुरपी, फावड़ा लेकर बाग में काम करते समय भी वही शब्दगंध महकता रहा. उस ‘शाल्मली’
वृक्ष के नीचे एक कुटी बनाने का विचार अभी ताज़ा है.
पूर्व
क्षितिज पर आते ही सहस्त्र किरणें बिखर जाती हैं, उसी तरह ये अपार, असंख्य शब्द बिखेरने को मन आतुर हो
उठता है. सम्राट के मुख पर नित्य सुवर्ण दान देते समय जो प्रसन्नता होती है,
वैसी ही प्रसन्नता का अनुभव मन से शब्दों को प्रकट करने में होती है.
आज
रवीन्द्रनाथ कुछ अधिक ही प्रसन्न थे, इसीलिये एक के बाद सुहानी यादों में खोये हुए थे. वह
पद्मा नदी, दोनों तरफ़ फ़ैली गहरी हरियाली, उसके बाद गाँव में जाने पर अत्यंत दरिद्रता,
अज्ञान, रूढी परंपरा और जीवन के लिए भीषण संघर्ष, सिर्फ लज्जा रक्षण के लिए वस्त्र
पहनने वाले लोग, आधा पेट, गीले घरों में सोने वाले लोग और दूसरी तरफ़ ब्रिटिश
शासन में अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त करके अंग्रेजों की ही शरण में आये बेहद अमीर
सरदार, राजघराने, धनवान और निर्धन के बीच गहरी खाई.
यहीं
से शब्दों ने जन्म लिया – आनंद के, दुःख के, करुणा के, इन शब्दों में यह सामर्थ्य थी कि इन्होने शमीन्द्र की
मृत्यु से हृदय में हुई गहरी चोट पर मरहम लगाने का काम किया. फिर से कुछ कविताओं
का एक संग्रह प्रकाशित करने का निश्चय किया. फलस्वरूप 156
कविताओं का संग्रह ‘गीतांजली’
प्रकाशित हुआ और शरदचंद्र ने कहा,
“रवीबाबू,
यह कविता संग्रह अत्यंत सुन्दर बन पड़ा है. परन्तु आप इन सभी कविताओं को अंग्रेज़ी
में लिखें.”
“हमने
उन्हें मातृभाषा में लिखा है, मन को उतना ही समाधान.”
शरद
बाबू हंसे.
“ये
इतना बड़ा शांति निकेतन क्यों बनाया है? अपने आनंद के लिए ही ना? परन्तु ये कवितायेँ आप सिर्फ
अपनी भाषा तक ही क्यों रखते हैं?”
“आपका
तात्पर्य हम समझे नहीं.”
“इन
कविताओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद करके उन्हें नोबेल पुरस्कार के लिए भेजिए. आपके
लिए यह नोबेल पुरस्कार दो बातों के लिए महत्वपूर्ण है. आपकी कविताओं को
अंतरराष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर स्थान प्राप्त होगा और दूसरी बात अल्फ्रेड नोबेल
ने पारितोषक के रूप में इतनी बड़ी धनराशि रखी है. यदि वह मिल गई तो शांति निकेतन के
लिए अधिक सहायता होगी.”
रवीन्द्रनाथ ने कहा,
“मातृभाषा में कविता लिखते हुए मन की सारी सवेदनाएँ उनमें प्रकट होती हैं. हमने
लेख तो अंग्रेज़ी में लिखे हैं, परन्तु कविता लिखना कठिन प्रतीत होता है.”
कलकत्ता की यह बातचीत रवीन्द्रनाथ के मन में रह गई. ‘गीतांजली’
के बंगाली में प्रकाशित होते ही, उसमें से कुछ गिनी चुनी कविताएँ लेकर उनका अंग्रेज़ी
में अनुवाद किया. अपनी भावनाएँ भली प्रकार प्रकट हों, इसलिए कई बार किया और कविता संग्रह को नोबेल पुरस्कार
के लिए स्वीडन भेजा.
अल्फ्रेड
नबर ने अपनी बेशुमार संपत्ति का नब्बे प्रतिशत भाग पुरस्कार के लिए सुरक्षित रखा
था. यह ज्ञात होने पर रवीन्द्र बहुत प्रभावित हुए. श्री रामकृष्ण परमहंस ने अपनी
शिक्षा विवेकानंद को दी, और विवेकानंद ने विश्व के सामने भारतीय सनातन
संस्कृति का विराट स्वरूप प्रस्तुत किया. बंकिमचंद्र ने बंगाली साहित्य में
मौल्यवान योगदान दिया. बंकिमचंद्र के ‘आनंद मठ’ की कीर्ति चारो और फ़ैल गई. सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी ने
राजकीय आन्दोलन आरंभ किये. हर कोई अपने ही तरीके से कोई न कोई आन्दोलन चला रहा था.
रवीन्द्रनाथ का ‘शांति निकेतन’ एक आन्दोलन था. इस आन्दोलन से पूरे विश्व को शान्ति
का सन्देश मिले, यह भी उनके मन में था. साथ ही यहाँ सभी कलाओं को
प्रोत्साहित किया जाता है, यह सर्वधर्मियों के लिए मुक्त विद्यापीठ है,
यह सन्देश भी इस पुरस्कार के माध्यम से विश्व में पहुंचे,
ऐसी इच्छा भी थी. बंगाल में शांति निकेतन की कीर्ति फ़ैल रही थी.
बंगाल
की एक सभा में एक मारवाड़ी सज्जन ने पूछा,
“आप
क्या केवल बंगाली बच्चों को ही शांति निकेतन में प्रवेश देते हैं?”
“नहीं,
ऐसी बात तो नहीं है.”
“तो फिर,
यदि मारवाड़ी बच्चों को आपके पास भेजें तो?”
“समस्या है – आर्थिक.
विद्यार्थियों की संख्या में वृद्धि होने से शिक्षकों की तथा विद्यार्थियों के
रहने की जगह में भी वृद्धि होगी, और...”
“आपका पक्ष समझ में आया.
उन सज्जन ने बिना मांगे ही एक बहुत बड़ी रकम अनुदान के रूप में रवीन्द्रनाथ के
हाथों में थमा दी. आज तक रवीन्द्रनाथ
ने अपना धन लगाते हुए इस संस्था का आरंभ किया था. उसका कार्य अब प्रगति पथ पर था.
शांति निकेतन में तैयार की गयी वस्तुओं की अब सियालदह के बाज़ार में बिक्री होने
लगी थी. फिर भी अत्यंत किफ़ायत से शांति निकेतन का काम काज चल रहा था. अब तक
रवीन्द्रनाथ ने किसी से भी दान नहीं मांगा था.
उस मारवाड़ी सज्जन द्वारा
उनके हाथ पर रखी काफ़ी बड़ी रकम देखकर अपने कार्य को अब समाज की मान्यता मिल रही है, इसका
उन्हें आनंद हुआ. उनकी आंखें भर आईं.
“रवी बाबू,
आप काम करते रहें, हम और भी सहायता करेंगे,” हाथ में रकम रखकर बोलते बोलते वह व्यक्ति वहां से
चला गया.
राजस्थान
का यह व्यक्ति बंगाली व्यक्ति से जुड़ गया था, इसका उन्हें आश्चर्य हुआ. असल में तो रवीन्द्रनाथ
महाराष्ट्र के संपर्क में थे. अनेक घटनाओं का, अनेक व्यक्तियों का उन पर प्रभाव था. लोकमान्य तिलक,
सावरकर, शिवाजी महाराज, साथ ही संत ज्ञानेश्वर, तुकाराम के प्रति उनके मन में अत्यंत आदर का भाव था. शिवाजी
महाराज पर उन्होंने कविता लिखी थी. लोकमान्य तिलक के लिए ‘फंड’
इकट्ठा किया था. परन्तु राजस्थान से वे दूर ही थे. इस निमित्त से राजस्थान और
शूरवीर मारवाड़ी समाज उनसे मिलने वाला था.
एक तरफ़ उनका ध्यान शांति
निकेतन के विकास पर केन्द्रित था, तो दूसरी ओर उन्हें आग्रहपूर्वक आमंत्रित करने वाला
समाज परिवर्तन था. किस पर ध्यान केन्द्रित करें, यह प्रश्न था.
सन् 1757 में अंग्रेज़ों ने प्लासी के
युद्ध में विजय प्राप्त करके भारत में अपनी सत्ता स्थापित की और तभी से अमन चैन
समाप्त हो गया. स्वतन्त्र राज्यों से इसका विरोध हुआ, फिर भी अंग्रेजों की शक्ति के आगे उनकी एक न
चली. सन् 1848 में लॉर्ड डलहौजी के कार्यकाल में अंग्रेजी राज की पताका पूरे भारत
में फहराने लगी, परंतु उसका मूल केन्द्रबिन्दु उत्तर पश्चिम भारत था. सन् 1856 तक
उन्होंने सर्वोच्च सत्ता स्थापन की और सन् 1857 से भारत की स्वतंत्रता के लिए
सामूहिक आंदोलन आरंभ हुआ.
वे विचार कर रहे थे. ‘आज शांति निकेतन में ‘बाईशे श्रावण’ मनाया गया तो
सबको कितना आनंद हुआ. यदि भारत स्वतन्त्र हुआ तो सबको कितना आनंद होगा. स्वतंत्रता
का सूर्य देखने से पूर्व ही स्वामी विवेकानंद सनातन हिन्दू संस्कृति का
प्रचार-प्रसार करके बीमार हो गए और उनका निधन हो गया. शायद हम भी...’
और
उसी समय मोहितचन्द्र उनके कक्ष में आये.
“गुरुदेव, इन आठ वर्षों में शांति निकेतन की प्रगति देखकर मन भर आया. आपने जिस विषय
पर ध्यान केन्द्रित किया, वह अत्यंत सफल ही हुई. इसके पीछे आपका अध्ययन, चिंतन और योजनाओं का गहरा चिंतन था. आज के
‘बाईशे श्रावण’
के आयोजन ने तो कमाल ही कर दिया. अब कलकत्ता के सारे अखबारों में यह खबर प्रकाशित
होगी.”
“मोहितचन्द्र, हम यह सब प्रसिद्धी के लिए नहीं कर रहे हैं.
हमारे दो उद्देश्य थे. एक तो यह कि गाँव-गाँव के गरीब बच्चों को शिक्षा प्राप्त हो
और हमारे बचपन में शिक्षा का जो दबाव सब विद्यार्थियों पर होता था, वह न हो. इसलिए मुक्त
विचारों का मुक्त कलाओं का यह शांति निकेतन हो.
दूसरा उद्देश्य था, हमें बारह वर्ष की आयु में ही, जब कोई भी जन संपर्क न था, यह रम्य परिसर मन को बहुत भा गया था. हमारे पिता कई-कई घंटे यहाँ ध्यान
किया करते थे,
तो यह प्रदेश मन में था ही. आगे चलकर
ऋषियों के आश्रम, मुक्त वातावरण का जीवन, विद्यार्जन – यह सब मन में आया और...”
“आपका सपना पूरा हुआ, यही मैंने भी कहा.”
“मोहितचन्द्र, मनुष्य की इच्छाएं समाप्त नहीं होतीं. शांति
निकेतन में देश-परदेश से विद्यार्थी आयें, ऐसी भी इच्छा है. कहना नहीं चाहता था, क्योंकि कुछ सपने ऐसे होते हैं, जो मन में भी पूरा होने से
डरते हैं.”
“ऐसा क्यों?” मोहितचन्द्र ने उत्सुकता से पूछा और
रवीन्द्रनाथ की तरफ़ देखा. उनकी स्वच्छ आंखों में भोलापन था, सम्पूर्ण विश्व की
उत्सुकता थी. उज्जवल गोरा रंग, सीधी धारदार नाक, सुदृढ़ देहयष्टी और उन्नत भालप्रदेश दाढी और गर्दन पर झूल रहे बाल. उन्हें
ऐसा प्रतीत हुआ कि रवीन्द्रनाथ को ईश्वर ने सभी कुछ प्रदान किया है.
“ऐसे क्या देख रहे हो हमारी तरफ़?”
मोहितचन्द्र हंसे.
“हर कोई आपसे प्रेम करने लगे ऐसा रूप, ऐसी कला, ऐसे छंद आपको ईश्वर ने आपको
दिए हैं,
कि हर कोई आपकी ओर देखता ही रहेगा, और फिर आप क्यों डरते हैं?”
“क्योंकि मन ही तो चारों ओर भागता है.”
बल मिथ्या आपनार सुख, मिथ्या आपनार दुःख ।
स्वार्थमग्ने जनविमुख, बृहद जगत हतेसे
करवनो शेखेनी बांचिते ।।
परन्तु मन में उद्देश्य एक ही है...थके हुए, टूटे हुए मन को, म्लान हो
चुके बालकों को,
एक संजीवन देना है शांति निकेतन से. लोक कहते हैं, ‘रवीबाबू की कविता में केवल
प्रकृति वर्णन ही होता है.’ परन्तु वैसा नहीं है. खिलती हुई कलियाँ यदि अचानक
मुरझा जाएँ तो,
निरभ्र आकाश में मेघ गर्जना होने लगे तो, तो ये पशु पक्षी, ये व्यक्ति कहाँ जायेंगे?”
मोहितचन्द्र सुन रहे थे. एक लैय में, एक सुर में संगीत झंकृत हो
उठे,
ऐसा मंद,
मंद स्वर...इतने दिन उनके सहवास में रहते हुए कभी इस ओर ध्यान नहीं गया था.
“गुरुदेव, शांति
निकेतन के उत्कर्ष के लिए हम सभी वचनबद्ध हैं. आज नन्हे पौधे ज़मीन में लगाए हैं, कल उनकी शाखाएं, उपशाखाएँ पल्लवित होकर वृक्ष बनेंगे. उसी तरह
आज के विद्यार्थी बड़े होकर देश विदेश में भ्रमण करेंगे और शांति निकेतन विश्वात्मक
हो जाएगा, और वह भी आप ही के सामने.”
दोनों दिल खोलकर हंसे. फिर अन्य विषयों पर बातचीत करते
हुए रवीन्द्रनाथ ने कहा,
“निश्चय कर लिया. गीतांजली का अंग्रेज़ी में अनुवाद
करना है.”
“छः महीने बाद कलकत्ता में राष्ट्रीय सभा का अधिवेशन
है ना?”
“हां. निमंत्रण आया है. वैसे भी अपना ही राष्ट्रीय
कार्य है,
अत: निमंत्रण न आता तो भी जाने ही वाला था और अपने विचार भी सबके सम्मुख रखने वाला
था. अब तो आग्रहपूर्वक बुलाया है.”
“पंचम जॉर्ज आ रहे हैं ना?”
“हाँ भारत के भाग्य विधाता पंचम जॉर्ज! जो भी आता है,
उसे भारत का भाग्य विधाता ही समझ लिया जाता है, क्योंकि भारतीय लोग अभी भी उसके
वर्चस्व को मानते हैं. इस देश को मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता है. प्रत्येक प्रांत
में चार-पांच लोग नेतृत्व कर रहे हैं. परन्तु संगठित नेतृत्व की आवश्यकता है. जब
तक ऐसा नहीं होता,
तब तक इंग्लैण्ड से आने वाला प्रत्येक व्यक्ति भारत का भाग्य विधाता!”
“आप जो कह रहे हैं, वह सही है, गुरुदेव. अनेक युवा नेताओं ने बंगाल में एक संगठन
बनाया है. उसी तरह अन्य प्रान्तों में भी हैं.”
“बिल्कुल हैं, परन्तु उनका नेतृत्व करने के लिए किसी
को आगे आना चाहिए. सावरकर जैसा युवक अंदमान में है. लोकमान्य तिलक वृद्धावस्था में
हैं. ऐसी ही स्थिति औरों की भी है. चारों तरफ चिंगारियां फ़ैल रही हैं, परन्तु वांछित विस्फोट नहीं
हो रहा है.”
“सही है. मुझे ऐसा लगता है, गुरुदेव कि कलकत्ता
में जब कॉंग्रेस का अधिवेशन हुआ था तो आपने बंकिम चंद्र के उपन्यास ‘आनंद मठ’ का
गीत ‘वंदे मातरम्’ सुस्वर गाया था. आज हरेक की ज़ुबान पर वह
गीत तो है ही, परंतु हर घोषणा का आरंभ ‘वंदे मातरम्’ इन
शब्दों से होता है. ‘वंदे मातरम्’ अजरामर हो गया है.”
“बिल्कुल सही है. ‘वंदे मातरम्’
चिरंजीवी शब्द हैं. भारत माता का कितना अप्रतिम वर्णन उन्होंने किया है. अब तो वे
शब्द प्रत्येक भारतीय आत्मा का हुंकार बन गए हैं.”
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