Friday, 3 October 2025

एकला चलो रे - 30

 

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जलियाँवाला बाग़ – एक क्रूर हत्याकाण्ड’ इस शीर्षक से अखबार में प्रकाशित हुई खबर रवीन्द्रनाथ पढ रहे थे और उसे पढ़ते हुए वे सिहर गए. 

गुरू गोविन्द सिंह ने ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की इसलिए यह दिन पंजाब में, विशेषत: अमृतसर में अत्यंत उत्साहपूर्वक मनाने के लिए अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के निकट जलियाँवाला बाग़ में अनेक तीर्थयात्रियों तथा अन्य लोगों की भीड़ जमा हुई थी. स्वर्ण मंदिर के निकट ही चारों तरफ़ से ऊँची दीवार से घिरे हुए संकरे मार्ग से प्रवेश करने पर भव्य आँगन में कल 13 अप्रैल 1919 को दोपहर लगभग तीन बजे जनरल डायर की आज्ञानुसार इस निहत्थे विशाल जनसमूह पर गोलियां दागी गईं.

स्वर्ण मंदिर के निकट एकत्रित लोगों ने गोलियों की आवाज़ सुनी और वे भागने लगे. साथ ही जलियाँवाला बाग़ के विशाल आँगन में ‘रौलेट एक्ट के विरुद्ध हो रही आम सभा में भी लोगों ने अचानक हुई गोलियों की आवाज़ सुनी और वे भागने लगे. कुछ लोगों ने वहां स्थित कुएं में छलांग लगा दी. कुछ लोग भाग कर वापस जाने के लिए जैसे ही उस संकरे मार्ग पर आये, जहां हाथों में बंदूकें लिए ब्रिटिश सैनिक खड़े थे. उन्हें वापस लौटना पड रहा था, क्योंकि बाहर जाने के लिए वही एक संकरा मार्ग था. इसलिए लोगों को चुन चुन कर बन्दूक की गोलियों से मारा गया. कुछ लोग भगदड़ में मर गए.

यह क्रूर और दिल दहलाने वाला यह काण्ड, जो मानवता के मुख पर कालिमा पोत रहा था, दो घंटे चलता रहा. अंदाज़ था कि वहां लगभग तीन से साढ़े तीन हज़ार लोग थे. चार सौ लोग वहीं मृत्यु के मुख में समा गए, दो हज़ार लोग अत्यवस्थ थे, कितने लोगों ने कुएँ में छलांग लगा दी इसका तो कोई अंदाज़ ही नहीं.

रवीन्द्रनाथ ने हाथ का अखबार नीचे रखा और उसी क्षण उन्हें महसूस हुआ, कि जनरल डायर जैसे नीच कर्म करने वाले व्यक्ति को उसीकी बन्दूक से दनादन गोलियों से भून देना चाहिए. परन्तु यह ‘रौलेट एक्ट इतना अधिक अमानुष था कि उसके लिए ये अकेले का काम नहीं था. रौलेट के अनुसार न्याय देने वाले ब्रिटिश, बेवजह ज़मानतपत्र दाखिल करने वाले ब्रिटिश, अपराधी वही निश्चित करेंगे और उस पर जेल की सज़ा भी वे ही तय करेंगे. एक तरह से भारतीय अपना सिर ज़रा सा भी ऊपर न उठाएं, इसलिए यह नियम बनाया गया था.

ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने और उनके साम्राज्य को सुरंग लगाने के प्रयत्न जारी ही रहने वाले थे. मनुष्य  के भीतर का राक्षस जब बेकाबू हो जाता है, तो उसका विनाश निश्चित ही होता है. मगर उसके लिए किसी विनाशक की ज़रुरत होती है. वह अवश्य आयेगा. कल इस जलियाँवाला बाग़ की मिट्टी की शपथ लेकर स्वताब्त्रता के लिए प्राणों की बाज़ी लगाने वाले वीर तैयार होंगे.

परन्तु हमें अक्षरशः क्या करना चाहिए, यह प्रश्न उन्हें बेचैन कर रहा था. इन दस वर्षों में ऐसी कुछ घटनाएं हुई थीं, कि उनके बारे में क्या कहा जाए, यह वे समझ नहीं पा रहे थे. छोटे शमीन्द्र को मुंगेर भेजने में हमसे गलती हुई, यह विचार उन्हें रह-रहकर सता रहा था. मन को शांत करने के लिए मृणालिनी नहीँ थी, रेणुका नहीं थी. रथींद्र अब विवाहयोग्य हो गया था. साथ ही शान्ति निकेतन की जिम्मेदारियों का दायरा भी बढ़ गया था.

और इस सबके बीच भी अनेकों प्रकार के शब्दों का फेर उन्हें घेरे हुए था. कभी कभी उन्हें ऐसा लगता कि न जाने ब्रह्मदेव ने हमें बनाते समय किस रसायन का उपयोग किया होगा, कि उनका अपना दुःख भी शीतल होकर मन शब्दब्रह्म में खिलता रहे.

प्रत्येक कर्तव्य को पूर्ण करते हुए एक अनामिक समाधान प्राप्त हो और अगले कर्तव्य के स्वागत के लिए मन तत्पर हो, ऐसी स्थिति थी. इस बीच हमने दो नाटक लिखे और ‘प्रजापातेर निर्बंध उपन्यास आरंभ किया. अनेक सुन्दर कविताओं का संकलन करके ‘गीतांजलि’ शीर्षक से उनका प्रकाशन किया जाए. प्रकृति में विविध प्रकार के फूलों का अपना अस्तित्व होता है, उसी तरह शब्दरूपी हर फूल का गंध, आकार और प्रकार भिन्न था.

‘जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड’ का मन से तीव्र निषेध दर्ज करते हुए भी वाल्मीकि के समान कहीं मुख से एकाध काव्यात्मक शापवाणी तो नहीं निकल जायेगी, ऐसा उन्हें लग रहा था.

रथींद्र का विवाह विधवा कन्या प्रतिमा देवी से हो गया था, और उन्होंने उन दोनों की गृहस्थी सियालदह में बसा दी थी. वे दोनों प्रसन्न थे. एक तरफ़ थोड़ा सा समाधान मिला, कि दुःख मानो दरवाज़े के पास ही राह देख रहा होता, पल भर में सुख बाहर, और मन सदैव अपना...

फिर भी मन में स्थाई दुःख का मुक्त संचार हने के बाद भी मेघाच्छादित आकाश में सूरज की सुनहरी किरणें आ जाएँ, वैसे ही सुख भी मन के भीतर आ ही जाता है. मन को सजाता है, उस पर बहार लाता है, और वैसे ही लौट भी जाता है. मगर यादों के सुगंध छोड़कर.

अखबार में छपे शीर्षक ‘जलियाँवाला बाग़’ शीर्षक से ही उनका मन भर आया. मन में अंग्रेजों के खिलाफ़ क्रोध उमड़ आया. किसी को भी, कभी भी, किसी भी कारण से गिरफ़्तार करने वाला, और उन्हींके हाथों में क़ानून और न्याय रहने वाला ‘रोलेट एक्ट’ अर्थात् सिर्फ हुकुमशाही और उत्पीडन था. उसे उखाड़ फेंकने की सामर्थ्य हमारे भीतर नहीं है. हाथों में शस्त्र होते हुए भी हम उसका प्रयोग नहीं कर सकते, यह बात वे जानते थे. परन्तु जलियांवाला बाग़ की मिट्टी माथे पर लगाकर कल लोग देश के लिए युद्ध का आह्वान करेंगे यह उन्हें मालूम था.

हमारा भी खून न खौलता हो, ऐसी बात नहीं है. परन्तु हम तीन तरफ़ से घिरे हुए हैं. ब्रिटिश सरकार के साथ हमारे दादा जी के समय से चले आ रहे संबंध, उसे नकारते हुए विद्रोह करना, यह हमारा स्वभाव नहीं है. हम केवल शब्दों के माध्यम से स्वयं को व्यक्त कर सकते हैं.

अंग्रेजों का भारतीयों के प्रति रोष, साम्राज्य लालसा से उत्पन्न उनका उन्माद और अहंकार हमसे भी बर्दाश्त नहीं होता. शान्ति निकेतन के विरुद्ध उन्होंने काफ़ी तीव्र कार्रवाई की. हम नहले पे दहला निकले, यही हमारा अंग्रेजों के विरुद्ध शीत युद्ध, और इस सबके बीच शान्ति निकेतन को आगे ले जाने में जहां मन को तकलीफ़ हो रही थी, फिर भी हमने भारतीय संस्कृति को बचाए रखा, इसकी खुशी है. आज यहाँ सौ से अधिक विद्यार्थी अपनी मनपसंद कलाओं में प्रावीण्य प्राप्त कर रहे हैं. अपने बल पर अर्थार्जन कर रहे हैं. हर कोई हाथ में शस्त्र ही उठाए, ऐसा तो नहीं है ना?

उन्होंने मन को समझाया, परन्तु मन शांत नहीं था. उन्होंने उस हत्याकान्ड का निषेध करते हुए एक लेख लिखा. फिर भी उनका समाधान नहीं हो पा रहा था.

और वे कलकत्ता आये. एक आम सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा,
“अंग्रेज़ सरकार इतना स्वार्थी और नीच कार्य करेगी
, ऐसा भूल कर भी नहीं सोचा था.

यदि बोलने का, निषेध करने का अधिकार ही अंग्रेज़ छीन रहे हैं, तो उन्हें ‘अहिंसा’ शब्द का अर्थ भी समझ में नहीं आयेगा. जिस भारत में वैदिक काल में विश्वकल्याण हेतु शान्तिमंत्र गूंजते थे, वहां का वातावरण आज चीखों और कराहों से भरा है. यह क्रूरकर्मा अब भारत को नहीं चाहिए. इसके लिए जिसे जिस मार्ग का अनुसरण करना है, करे.

परन्तु ब्रिटिश सरकार के इस ‘जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड का हम निषेध करते हैं, और उन्होंने हमें सम्मान पूर्वक जो उपाधि – ‘सर दी है, उसे उन्हें वापस लौटाते हैं.

भाषण समाप्त हुआ. तालियों की गडगडाहट हुई. उस दिन रवीन्द्रनाथ के मन में समाधान था.

 

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