Friday, 3 October 2025

एकला चलो रे - 31

 

31

 

मोहनदास गांधी से मिलकर भी मन को पर्याप्त समाधान प्राप्त नहीं हुआ. मन को सिर्फ यही बात समझ में आई थी कि ‘युद्ध से कुछ भी प्राप्त नहीं होगा, और अहिंसा से दीर्घ काल तक संघर्ष करना पडेगा. परन्तु सतरा घाटों का पानी पीने वाले ये अंग्रेज़ लोग अपनी पूरी ताकत से दबा नहीं देंगे, ऐसा कैसे कह सकते हैं?

मन अस्वस्थ हो गया था और चारों ओर अन्धेरा छा जाए ऐसी उनकी अवस्था हो गई थी. एक आम सभा में उन्होंने अंग्रेजों के इस कदम की निंदा करते हुए ‘सर की सम्माननीय उपाधि वापस लौटा दी थी.

इस बीच उनका स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता था. शायद अस्वस्थ मन को ही बुखार आ रहा था. शरीर तो मन के ही आधीन होता है. शरीर रोज़ की तरह कार्यरत था.

उस दिन वे शाल्मली कुटी से बाहर निकले ही थे, कि रथी और बेला आ गए. वे हाल ही में अमेरिका से लौटे थे और उनसे मिलकर भी गए थे.

“आज कोई विशेष बात?

“अभी हाल ही में शरतबाबू की चिठ्ठी आई थी...”

“शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय की?

“नहीं, शरदबाबू चक्रवर्ती की. बड़ी दीदी के पति की चिट्ठी है.”

रवी ने चिट्ठी रवीन्द्रनाथ के हाथों में दी. उसमें सूचित किया गया था कि रवी बाबू की बड़ी बेटी बीमार है. रवीन्द्रनाथ अपनी अस्वस्थता के बारे में भूल गए. शायद अस्वस्थ मन को यह संकेत मिला होगा. उन्होंने कलकत्ता जाने की तैयारी की. परन्तु अब मन और अधिक भयभीत हो गया था.

 

 

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