जब कालिदास
की आंख खुली तो उत्तररात्रि का अंतिम प्रहर समाप्त हो चुका था. चराचर अभी सुख
स्वप्नो में था. चन्द्रमा पश्चिम की ओर सरक रहा था.
‘दुःख, व्यथा, मन के घाव सिर्फ हमें ही नहीं, अपितु प्रकृति की हर वस्तु को होते होंगे. शाम को श्यामलवर्णा संध्या के
प्रासाद में चन्द्रमा आया. उसने सोचा होगा, अब यही है मेरा श्रेयस-प्रयास मार्ग. इस मार्ग पर सहचरी
के हाथ में हाथ देकर आनंद से जीवन व्यतीत करना है. यही जीवन है और यही विश्वास का
प्रतीक. अन्य अप्सराएं भी नहीं चाहिए. परन्तु संध्या उसे अपने प्रासाद से दूर कर
देती है और जीवन बीतता है रजनी के साथ. रजनी अनुपम है. स्नेहल, शीतल, शुभ्रवर्णा, नितांत सुन्दर है. मन की आर्त पुकार है. रजनी के सान्निध्य
में विश्व का विस्मरण हो जाए, ऐसी उसमें सामर्थ्य है. विद्युल्लता की चंचलता और आकाश की गूढ़ रम्यता भी
है. सब कुछ शुभंकर और सुखद होते हुए भी संध्या को भूलना असंभव है. वह घाव, वह व्यथा चिरंतन है. घाव को हाथ का स्पर्श होते ही मन
भूतकाल में चला जाता है और...’
गहरी नींद
में सोई मधुवंती का हाथ उनके वक्ष पर पडा और उनके ह्रदय की गति बढ़ गई. उन्होंने मन
ही मन कहा, ‘यही है
वर्त्तमान का सत्य. अब नहीं यादें मान- अपमान की.’
वे उठ गए.
सुबह अभी हुई नहीं थी. उत्तर रात्रि और प्रभात का वह संधिकाल था. दीपदान की ज्योत
शांत करके वे दीर्घा में आये.
‘यह संधिकाल
कितना शांत, रम्य और
ऋषिमुनियों की उपासना से अभिमंत्रित सा है, खिलते हुए फूलों की सुगंध, लहर-लहर से चराचर को हौले से स्पर्श करता हुआ समीर, हौले से जागृत होने वाली, परन्तु फिर भी रात्रि की गंध-धुंद प्रीति के स्वप्न में
खोई क्षिप्रा का हलके से जागना. नितांत सुन्दर!’
कालिदास
विचार कर रहे थे. संपूर्ण विश्व ही कितना रमणीय है. उस निराकार सामर्थ्य का अंश
मेरी आत्मा, उस आत्मा को प्राप्त होने वाली ऊर्जा, सोचो तो, सब कुछ कितना अगम्य है! अणु परमाणु से लेकर ब्रह्मांड तक विस्तृत इस विशाल
विश्व का एक अंश मैं. मैं विश्वात्मक और मेरे भीतर की आत्मा उस परमतत्व से संलग्न.
जैसे संपूर्ण विश्व ही मुझमें समाविष्ट हो गया हो. यदि प्रत्येक वस्तु को अपना
मानें, तो मैं ही
एक स्नेहसागर हो जाता हूँ. अश्वत्थ वृक्ष की प्रत्येक शाखा पर बहार आये, वह
विस्तारित होता जाए, उसी तरह
मैं भी क्रमशः विस्तारित होता जाता हूँ.
मैं ही तब
हो जाता हूँ श्रीकृष्ण. और फिर, एक बार श्रीकृष्ण रूप हुआ कि समूचे विश्व का
विस्तार, विकास और
विलय दिखाई देने लगता है. क्षण भर ही के लिए. अगले ही क्षण फिर समझ में आता है कि
आनंद, केवल आनंद
ही है – सम्पूर्ण विश्व में. अगर मैं मन में ठान लूँ तो अवकाश का भ्रमण भी कर सकता
हूँ. मेरी चैतन्य आत्मा सागर के नीचे गहराई में स्थित भूगर्भ में सहजता से प्रवेश
कर सकती है. कठोरतम वस्तु को भी यदि स्नेहपूर्वक स्पर्श किया जाए, तो वह मृदु प्रतीत होने लगती है. मेरे इस अनुभव को एक
बार मधुवंती को बताना चाहिए, ऐसा उन्हें लगा और वे दीर्घा से शयनकक्ष में आये. मधुवंती शैय्या पर नहीं
थी. उन्होंने गवाक्ष से देखा. प्रातःकाल की चरण मुद्राएँ आकाश में प्रकट हो रही
थीं.
वे शयनकक्ष
से बाहर आये. नित्य नियम था क्षिप्रा के तट पर जाने का. परन्तु आज वे हरसिंगार के
वृक्ष के नीचे खड़े हो गए. सूर्य का स्वागत करने के लिए, उसके आगमन से पूर्व, खिले
हुए हरसिंगार के फूल अब धरती के कंधे पर गिर रहे थे.
उनके सम्मुख
देहधारी हरसिंगार साकार हो उठा. इस हरसिंगार को आतुरता थी वसुंधरा का सर्वांग
सिंगार करने की. वसुंधरा भी लज्जित होकर उस पुष्पवर्षा के नीचे खडी थी. ओस की
बूंदों से गीली वसुंधरा और उस पर केसरी डंडी वाले मोतिया रंग के हरसिंगार के फूलों
का छिड़काव. वह सुहास्यवदना, पूरे मन से पुष्प श्रृंगार को स्वीकार कर रही थी. हरसिंगार कह रहा था, “और पुष्प वर्षाव चाहिये? हर शाखा पर सहस्त्र-सहस्त्र पुष्प खिले हैं. यह पुष्पभार, यह गंधभार
तुम्हें असह्य तो न होगा, हे वसुन्धरे, हे लावण्यलतिके?’
‘नहीं
स्वामी, नहीं. प्रतिदिन प्रातःकाल को आपके हाथों से होने वाली इस पुष्पवर्षा की
मैं प्रतीक्षा करती रहती हूँ. सृष्टि में अनंत पुष्प एवँ वृक्ष हैं. परन्तु
श्रीकृष्ण सत्यभामा के लिए स्वर्ग से जो लाये थे, उसी हरसिंगार के वृक्ष जितने आप
मुझे प्रिय हैं. ऐसे समय प्रतीत होता है कि आप श्रीकृष्ण हैं और मैं राधा!’
“हे
चारुगात्री, कितना मधुर बोलती हो!”
“आर्य...आर्य
....” वैसी ही मधुर आवाज़! परन्तु यह स्वर तो मधुवंती का है और यह स्पर्श भी
मधुवंती का! उन्होंने आंखें खोलीं, और स्वयँ ही लज्जित हो गए. हरसिंगार के पेड़ से टेककर, आंखें
मूंदे वे खड़े थे और मधुवंती ने उन्हें जगाया था. वह शुचिर्भूत होकर मंदिर की ओर
निकली थी.
“स्वामी, आप यहाँ, ध्यानस्थ
मुद्रा में?”
कालिदास
हँसे. उनका हास्य पूरे तन पर फ़ैल गया. ‘हास्य इतना सुन्दर और व्यापक हो सकता है?’ मधुवंती
को प्रथम बार ही यह अनुभव हुआ था.
वह
हँसते हुए बोली,
“कदम्ब
के वृक्ष से टिककर खड़े श्रीकृष्ण तो ज्ञात थे, परन्तु हरसिंगार के वृक्ष से
टिके कविराज को प्रथम बार ही देख रही हूँ.”
“तुम
समीप आओ, राधा के समान.”
“कविराज, स्त्री को
काल और समय का भान होता है. इस समय मंदिर की ओर जा रही हूँ.”
बोलते-बोलते
मधुवंती निकल भी गई, वे अद्याप वैसे ही खड़े थे.
‘प्रकृति
बोलती है, प्रकृति हंसती है, प्रकृति संकेत करती है, एक बार प्रकृति के रंग में
रंगने पर किसी अन्य रंग की अभिलाषा नहीं रहती.
हर ऋतू
की एक अभिलाषा होती है, हर ऋतू का एक विलक्षण सौन्दर्य होता है. ऋतुओं में लयबद्ध
गति होती है. ऋतुओं के अपने-अपने स्वर तथा राग होते हैं. प्रत्येक ऋतू का एक
स्वतन्त्र पृष्ठ होता है.
और
उस पृष्ठ पर प्रत्येक ऋतू अपनी-अपनी कथा लिखता रहता है. वह पृष्ठ उसका अपना होते
हुए भी छहों ऋतुओं के परस्पर दृढ़ संबंधों का होता है. ऋतुओं का चक्र निरंतर घूमता
रहता है.
मगर
इस ऋतुचक्र को गतिमान करने वाला है कौन? इस ऋतुचक्र के साथ संपूर्ण प्रकृति ही सृष्टि को विविध
निमंत्रण देती रहती है. दिशादिशाओं से आने वाले इन निमंत्रणों को सृष्टि भी सहज ही
स्वीकार करती है.
फिर
भी प्रश्न अनुत्तरित ही रहता है. यह वसुंधरा, ये सप्तसागर, ये दशदिशाएं, यह अवकाश, चन्द्र, सूर्य, तारे, नक्षत्र
इनका निर्माता कौन है? हमारे भीतर उसके अंश को हम जान भी लें तो भी इस विश्वात्मक अंश को हम जान
सकेंगे क्या?
मंदिर
की घंटियों का स्वर उन्हें सुनाई दिया और वे जागृत होकर क्षिप्रा तट की ओर चलने
लगे. आज उन्हें विलम्ब हो गया था, जैसा कभी नहीं होता था. फिर भी वे प्रसन्न थे. ऋतुओं के
इस चक्र का वे पुनः अवलोकन करने वाले थे, एक बार फिर से ऋतुओं के शब्द समारोह
संपन्न करने वाले थे. ऋतूचक्र से उन्हें शब्दों के माध्यम से ऋतुओं का दर्शन प्रस्तुत
करना था.
***
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