रात बढ़ रही थी, परन्तु भोजन के बाद मधुवंती
अस्वस्थ थी. देखते-देखते उसे ज्वर हो गया. वैद्य को बुलाया गया. ज्वर कम नहीं हो
रहा था. उनके मन में चन्दन का उबटन लगाने का विचार आया. दो दिनों के लिए आये हुए
कालिदास पंद्रह दिन उसके महल में वास्तव्य करते रहे. उस महल की रंगत म्लान हो गई
थी, परन्तु म्लान सौन्दर्य भी मन में मोह उत्पन्न कर रहा था.
“आर्य, हमारे कारण आप राजकार्य छोड़कर यहाँ बैठे हैं.
‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ कथन करके आप पधारें. वास्तव में जाएँ, उसके
बिना न जाएँ. चतुर्थ अंक भी उस दिन पूर्ण नहीं हुआ था. कथन करें.”
“तुम्हें कष्ट तो न होगा, प्रिये?”
“ऐसा विचार मन में भी न लाएं. प्रीती कथाएँ किसे
प्रिय नहीं होतीं? परन्तु वह कथा सुनते हुए मन में विचार आया कि यदि आप भी महाराज
दुष्यंत के समान एक दिन निकल गए तो! इस विचार से हमें ज्वर आ गया. अब हम स्वस्थ
हैं.”
कालिदास के नेत्र भर आये. मधुवंती को विद्वत्वती के
बारे में अभी बताया नहीं, परन्तु कभी न कभी बताना चाहिए.
हमारा ही भविष्य अन्धकार में है, फिर भी एक बार विद्वत्वती के पास
जाना ही चाहिए...मन में अनेक वचार थे, परन्तु वे स्वयँ को संयमित करते
हुए बोले,
“सखी, हम तुम्हें कभी स्वयँ से दूर न
करेंगे.” उन्होंने उसके मस्तक पर हाथ रखा, फिर हँसते हुए बोले,
“सर्वप्रिय शकुन्तला गर्भवती थी. आश्रम में उसके लाड़
हो रहे थे, और अचानक वार्ता आई कि कण्व मुनि आ रहे हैं. सभी चिंतित हो गए. परन्तु
कण्व मुनि शांत, विचारवान, संयमशाली
थे. उन्हें भी ज्ञात हो गया था कि सम्राट दुष्यंत आये थे, उन्होंने
शकुन्तला से गन्धर्व-विवाह किया था और साम्प्रत शकुन्तला गर्भवती है.
आश्रम में आते ही वे शकुन्तला से मिलने उसके आश्रम
पहुंचे. प्रियंवदा वहाँ उपस्थित थी. अपनी धर्मकन्या का विवाह हो गया है, साम्प्रत
वह गर्भवती है, यह देखकर उनके नेत्रों में
आनंदाश्रु आ गए. उन्होंने उसे मन:पूर्वक आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘स्वस्थ
रहो. हमें सब कुछ ज्ञात है. आकाशवाणी हुई थी. हम प्रसन्न हैं. तुम्हें हस्तिनापुर, अपने घर
पहुंचाने की व्यवस्था करता हूँ.’
कन्या का विवाह हो गया, वह गर्भवती है- इस बात का अतीव
आनंद, और अब उसके विरह के दु:ख की भावना को कण्व मुनि ने अपने मन में ही रखा.
यही भावना प्रियंवदा और अनुसूया की भी थी.
उसे भेजने की व्यवस्था की गई. गौतमी माता और दो-तीन
शिष्य उसके साथ हस्तिनापुर जाने वाले थे. सखियाँ उसका श्रृंगार कर रही थीं. आम्र
वृक्ष ने उसे वस्त्र दिए. आज तक प्रत्येक वृक्ष से संवाद करने वाली, मृगशावकों
पर प्रीति करने वाली, आश्रमवासियों की प्रिय कन्या शकुन्तला अब ससुराल जायेगी, इस
कल्पना से सभी विह्वल हो गए थे. उसका श्रृंगार करते हुए आश्रम की तपस्विनियाँ उसे
आशीर्वाद देती हैं.
‘पति के लिए आदरणीय हो, वीर पुत्र की माता हो.’ उसी समय
कण्व मुनि के प्रभाव से वृक्ष लताओं ने उसे अलंकार और वस्त्र प्रदान किये. इन सब
प्रसाधनों से वह आश्रम कन्या अब नागरी कन्या प्रतीत होने लगती है. उसके रूप को मन
में संजोते हुए कण्व मुनि उनके पैरों पर अवनत शकुन्तला को उठाते हुए आशीर्वाद देते
हैं, ‘जिस प्रकार शर्मिष्ठा राजा ययाति को अत्यंत प्रिय थी, उसने
पुरू जैसे वीर पुत्र को जन्म दिया, वैसी ही तुम भी होना.’
आश्रम की अग्नि वेदी उसे पवित्रता प्रदान करती है, आश्रम
परिसर के सारे पक्षी, लता, वृक्ष उसे आशीर्वाद देते हैं, और
आकाशवाणी होती है, ‘जिस मार्ग से वह जायेगी, उस पर
नीलवर्ण कमलिनी के सरोवर हों, घने वृक्षों की छाया हो, मार्ग के
धूलिकण भी अत्यंत मृदु हों, और सभी दिशाओं से सुगन्धित पवन उसके
मन को प्रसन्न रखे.’
शकुन्तला सभी वृक्षों को प्रणाम करती है. समूचा तपोवन
ही उसके विरह की कल्पना से शोकाकुल हो गया है. मृगशावकों ने तृण ग्रहण करना बंद कर
दिया. वन लताओं के नेत्रों में अश्रु भर आये, वे चलने लगते हैं. मौन मृगशावक उसके
वस्त्र खींचने लगे.
कण्व मुनि ने कहा, ‘शकुन्तला, अश्रुओं
के कारण तुम्हारे नेत्र प्रसन्न नहीं प्रतीत होंगे, मार्ग में, असमतल धरती पर चलते हुए
पाँव लड़खड़ाएंगे.’ तब शारंग राव कहता है, ‘अब आप सब जलाशय के समीप आये है, यहीं पर
उससे बिदा लें.’
कण्व मुनि शारंग राव से कहते हैं, ‘राजा
दुष्यंत से कहना, कि अन्य स्त्रियों के समान
शकुन्तला को प्रेम पूर्वक स्वीकार करें. आश्रम में उसका भरण पोषण हुआ है, नागरी
रीतियों से वह अनभिज्ञ है, अत: उसे समझाना, उसका
तिरस्कार न करना.’
अब शकुन्तला वियोग वेदना से व्यथित है. सखियाँ उससे
कहती हैं,
‘यदि किसी कारण से सम्राट दुष्यंत को विस्मरण हो जाए, अथवा वे
तुम्हें स्वीकार करने में संमति न दिखाएं, तो अपनी अनामिका की राजमुद्रिका
उन्हें दिखा देना.’
सभी शोकाकुल हैं, आश्रम से एक अनजान नगरी की ओर उसकी
यात्रा आरंभ हो गई है. चिंता है. सब कुछ सकुशल होगा यह विश्वास है. वियोग का दुःख
है, और उसके आनंद में आनंद भी है. अंत में अत्यंत दुखी मन से उससे बिदा लेते
हुए कण्व मुनि ने कहा, ‘कन्या पराया धन होती है. आज जिसका
धन उसे सौंपते हुए मैं निश्चिन्त हो गया हूँ. यह वियोग का प्रसंग दुखद अवश्य है, परन्तु
आगे सब कुछ सुखद है.’
प्रिये यहाँ चतुर्थ अंक समाप्त हुआ.
“अप्रतिम, आर्य! एक कुमारिका के जीवन में आये
हुए पुरुष से प्रेम करके उससे गन्धर्व-विवाह करने सा साहस और धैर्य शकुन्तला में
है. यह न केवल आश्रम के मुक्त जीवन के कारण है, अपितु सबकी उस पर अनन्य श्रद्धा है
इस कारण भी है. अति सुन्दर! शकुन्तला का वियोग, सखियों की प्रीति, वृक्ष लताओं
द्वारा दिए गए वस्त्र और कन्या को श्वसुर गृह भेजने वाले पिता को हो रहा दु:ख और
कर्तव्य पूर्ती का आनंद. आर्य, अति सुन्दर!”
‘आर्य, प्रीति के भी अनेक रंग होते हैं,
भावनाएँ होती हैं. पति के प्रति प्रेम में आसक्ति है. पिता का प्रेम निष्काम है.
सखियों का प्रेम नि:स्वार्थ है. वृक्ष लताओं पर प्रेम मानवता की अनावर भावनाओं का
प्रतीक है, पुत्र के प्रति प्रेम कर्तव्यनिष्ठ है. कन्या से कोई
अपेक्षा ही नहीं, नितांत सुन्दर, आर्य, नितांत
सुन्दर!’ वह प्रसन्न थी, उसने कहा भी,
‘आर्य, गणिकाओं को भी पुत्र होते हैं, कन्याएं
भी होती है. अपत्य सुख का एकांगी अनुभव उन्हें प्राप्त होता है. उन्हें अपने नाम
के साथ पति का सर्वश्रेष्ठ नाम लगाने की अभी तो प्रथा नहीं है. इसलिए पुत्र-कन्या
मधुवंती के. उनकी पाठशाला ‘गन्धर्व विद्यालय’, ऐसा होता है उनका सम्मान.
आर्य...एक बात पूछूं?’
“अवश्य,” उन्होंने कहा, मगर वह
क्या पूछेगी, इस बारे में वे आशंकित थे.
“आप हमसे विवाह क्यों नहीं करते? समाज में
वह मान्य है ना?”
“मधुवंती, इस प्रश्न पर विचार बाद में. आगे
पढ़ें?”
मधुवंती समझ गई कि सत्यप्रिय कालिदास को सत्य बोलना
मान्य नहीं, और असत्य कहना आता नहीं. वह हंसी. मन में आये विचारों के झंझावात को
दूर करके मन के आकाश को निरभ्र किया और बोली,
“अवश्य पढ़ें, आर्य. हमें यह जानने की उत्कंठा है
कि सम्राट दुष्यंत उसका स्वागत कैसे करते हैं.”
पांचवें अंक में सम्राट दुष्यंत आसनस्थ हैं, विदूषक
अर्थात् उनका सखा माधव प्रवेश करता है और कहता है, ‘वातावरण के मधुर स्वर बता रहे हैं, कि
महारानी हंसपदिका वीणा पर गा रही हैं – ‘नित्य नूतन पराग की खोज में रत भ्रमर को यदि आम्र
मंजिरी का विस्मरण हो जाए, तो आश्चर्य की कोई बात नहीं. क्योंकि साम्प्रत
वह कमलिनी के पराग कणों का आस्वाद ले रहा है.’
“सत्य ही है महाराज...”
“प्रिये, सम्राट दुष्यंत इस गीत से अस्वस्थ
हो गए, उनका मन व्याकुल हो गया, ऐसा क्यों? इस
प्रश्न से वे विचलित है. इसी समय दासी आकर सूचित करती है कि कण्वाश्रम से कुछ
शिष्य उनके दर्शनों के लिए आये है. सम्राट उन्हें आमंत्रित करते हैं.
सम्राट दुष्यंत उठकर नागरी वेष में, मुख पर अवगुंठन
ली हुई युवती का, गौतमी माता का और शारंगराव तथा दो
शिष्यों का अभिवादन करते हैं. सम्राट दुष्यंत ने सोचा कि ये आश्रमवासी शुभ सन्देश
लेकर आये हैं. अवगुंठन में भी जिसके अंग प्रत्यंग के विलक्षण सौन्दर्य का अनुभव हो
रहा है, ऐसी युवती को देखकर सम्राट चकित हो जाते हैं.
वे आश्रमवासियों से पूछते हैं,
‘सब लोग सकुशल हैं ना? यज्ञ विधि निर्विघ्नता से संपन्न
हो रहे हैं ना? आश्रम के लिए मिलने वाला अनुदान
समुचित है ना? और आप कण्वाश्रम से हमारे लिए क्या
आज्ञा लेकर आये हैं?’
कण्व शिष्य शारंगराव कहता है, ‘जिससे
आपने गन्धर्व विवाह किया, उसका आपको विस्मरण हो जाए, यह
आश्चर्य की बात है. वह गर्भवती है. आप उसके बाद आश्रम में पधारे ही नहीं. आपका कोई
सन्देश नहीं आया, और आपने उसके बारे में जानने का
प्रयत्न भी नहीं किया.’
“आर्य, सम्राट दुष्यंत को सचमुच विस्मरण
हो गया था, अथवा...”
“सुनो ना, मधुवंती, सम्राट दुष्यंत पूछते हैं, ‘आप
सीधा-सीधा आरोप लगा रहे हैं, परन्तु यह युवती है कौन? आप यह सब
हमसे क्यों कह रहे हैं?’
‘महाराज, स्त्री कितनी भी पवित्र हो, परन्तु
यदि वह अपने मातृगृह में वास्तव्य कर रही हो, तो जन निंदा का कारण होती है. इसके
अतिरिक्त वह गंधर्व विवाह से आपके द्वारा स्वीकार की गई पत्नी है. उसे अपने पति
गृह पहुंचाना हमारा धर्म है,’ शारंग राव कहता है.
मधुवंती सुन रही थी. उसे ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वह
स्वयँ कालिदास के सम्मुख खडी होकर अपना परिचय दे रही है, ऐसा हम
कदापि नहीं करेंगे. वह अपने आप में मगन थी, फिर भी कालिदास कहते ही जा रहे थे.
फिर भी उनके मन में प्रश्न उत्पन्न हो ही गया, ‘ऐसे समय में हम क्या करते? यदि
विस्मरण हो भी गया होता, तो क्या एक लावण्यवती युवती को हम
स्वीकार करते? ‘असंभव,’ दूसरे मन ने तत्काल उत्तर दिया.
मगर क्या एक वर्ष में विस्मरण हो सकता है?’ ‘परन्तु कथा के प्रत्यक्ष प्रमाण
होते हुए भी ऐसे प्रश्न क्यों उपस्थित होते हैं? कल यदि मधुवंती सीधे राजसभा में आ
जाए और सम्राट चन्द्रगुप्त से कहे, ‘जैसे देवताओं की देवांगना, वैसे ही
मैं कालिदास की गणिका, तो?’ वे स्वयँ ही अस्वस्थ हो गए.
“स्त्रियों के वेदवती, वीरांगना, पतिव्रता
और शास्त्रप्रवीण होने पर भी उनमें स्वाभिमान और आत्मसम्मान होना चाहिए. चाहे तो
वह पुरुष का अपमान अथवा उससे स्पर्धा न करे, परन्तु आकाश में सूर्य का प्रखर
अस्तित्व होने पर भी चंद्रप्रभा अपना स्वतन्त्र अस्तित्व लिए उपस्थित रहती है, इसे कैसे
नकारा जा सकता है? इसीलिये हमारी शकुन्तला कहती है,
‘आपको अधिकारपूर्वक ‘आर्य’ के रूप में संबोधित करने आई थी.
ऋषि कन्या होने के कारण मैं निर्भय हूँ, परन्तु संस्कृति ने, संस्कारों ने
मुझे शालीन मर्यादाएं भी प्रदान की हैं, इसीलिये मैंने अभी तक कुछ नहीं कहा
था. इतने अल्प काल में आपको मेरा विस्मरण हो जाएगा, ऐसा सोचा नहीं था.
अब मैं आपको पुरुवंशी राजन कहकर संबोधित करती हूँ,
परन्तु आपका यह विस्मरण एक नाटक तो नहीं है ना? अब मैं आपकी राजमुद्रा वाली
मुद्रिका ही दिखाती हूँ, जो आपने गन्धर्व विवाह के समय मुझे दी थी.’
और शकुन्तला उस मुद्रिका को अवगुंठन में, या जहाँ
कहीं बंधी हो वहाँ देखती है, परन्तु मुद्रिका नहीं मिलती. गौतमी माता को याद आता
है कि आश्रम से निकलने के बाद उन्होंने शची तीर्थ में स्नान किया था. वह इस बात की
याद दिलाती है, सम्राट हंसने लगते हैं. कहते हैं, कि स्त्रियों
की चतुराई देखने लायक होती है.
अर्थात्, वह राजमुद्रा शची तीर्थ में गिर गई, यह सिद्ध
होने पर शकुन्तला के सम्मुख केवल एक ही पर्याय है, और वह है स्मरण करवाने का. वह
यादों का एक एक पन्ना पलटती जाती है.
कभी मृगशावक की कथा सुनाती है, कभी कुछ
और. मगर सम्राट दुष्यंत कहते हैं, ‘कुछ स्त्रियाँ पुरुषों को वश में
करने में ही प्रयत्नरत रहती हैं. गौतमी माता, शारद्वत, शारंगराव
अनेक प्रकार से सम्राट दुष्यंत को समझाते हैं, कभी क्रोधित होकर, कभी
उपदेश देकर. शारंग राव कहता है,
‘जिस शकुन्तला को चतुराई कभी छूकर नहीं गई, जिसे छल,
कपट ज्ञात ही नहीं है, उस पर ऐसा दोषारोपण? और जिसने
अन्य जनों को वंचित करने की ही ठान ली हो, उससे क्या कहा जाए?’
आगे वह कहता है,
‘अब पत्नी आपकी है. चाहें तो इसे अपने साथ रखें या जो
चाहें करें.कण्व मुनि के कथनानुसार इसे यहाँ लाने का कार्य हमने कर दिया. और
शकुन्तला को वहीं छोड़कर वे सब वहाँ से चले जाते हैं.’
“आगे क्या हुआ?” मधुवंती ने उत्सुकता से पूछा.
“एक अनुपम लावण्यवती, मानो उसी की प्रतिकृति हो, आई और
शकुन्तला को अप्सरा तीर्थ की ओर ले गई.”
“कौन थी वह? वहाँ आई कैसे?”
“वह छठे अंक में कथन करता हूँ,” कालिदास मधुवंती की
ओर देखते हुए बोले.अपनी रचना का उत्कंठावर्धक प्रभाव देखकर वे प्रसन्न हो गए थे.
“इस अंक में राजमुद्रिका मिल गई है. सम्राट दुष्यंत
की राजसभा में एक सैनिक कैवर्तक को पकड़ कर लाता है. उसे मत्स्य के उदर में वह
राजमुद्रिका मिलती है. इसलिए उसे चोर समझ कर लाया गया है. परन्तु सम्राट दुष्यंत
को बीती हुई घटनाओं का स्मरण होने लगता है. कैवर्तक को धन देकर भेज दिया जाता है.”
“परन्तु समस्या तो हल नहीं हुई, आर्य!”
मधुवंती ने कहा.
“जीवन के प्रश्न प्रवेश तो सहजता से करते हैं, परन्तु
त्वरित जाते नहीं हैं. सम्राट दुष्यंत ने वसंतोत्सव का आयोजन करने से मना कर दिया
है. हमारे हाथ से एक स्त्री का अक्षम्य अपमान हुआ है, वह भी हमारी पत्नी का, वह
बार-बार कहती रही, और हम सुनकर भी व्यंग्य करते रहे.
अक्षम्य अपराध हुआ है हमारे हाथ से. सम्राट उदास हैं. उन्होंने अपने सारे आभूषण
उतार दिए हैं. विरह का, शकुन्तला का अपमान करने का शल्य मन
में चुभ रहा था, और शकुन्तला के उदर में उनका ही
गर्भ है, यह वे समझ गए थे.
और उसे ढूंढें तो कैसे, यह प्रश्न उनके सामने है. उसी समय
सानुमती नामक अप्सरा आती है, और राजमुद्रिका शची तीर्थ में कैसे
गिर गई, यह कथन करती है.
सम्राट दुष्यंत हिमालय से निकलती हुई मालिनी नदी, वहाँ का
अरण्य, तपोवन, प्रियंवदा, गौतमी, शकुन्तला
के चित्र बनाते हैं. अब उन्हें सब कुछ स्मरण हो आया है.
उसी समय राजसभा से आई हुई समस्याओं का निराकरण करते
हुए सम्राट दुष्यंत कहते हैं, जिनका कोई नहीं, उनके हम
हैं. परिवार के कर्ता पुरुष का धन उसकी गर्भवती माता को भी प्राप्त हो. परन्तु
उनके मन में घोर निराशा है. ‘हमारे पुरुवंश का राज्य, धनसंपदा भविष्य में किसके लिए? कहाँ
होगी शकुन्तला? हमारी मृत्यु के बाद पितरों को
तर्पण भी कौन करेगा? इस विचार से सम्राट मूर्छित हो
जाते हैं. सानुमति, जो मेनका की सखी है, तत्काल
सम्राट की स्थिति का वर्णन करने के लिए स्वर्ग लोक जाती है.’
“परन्तु मेनका, अर्थात् शकुन्तला की माता सम्राट
से कैसे मिलेगी? वही तो शकुन्तला को स्वर्ग लोक ले
गई है ना? और सम्राट को यह ज्ञात नहीं हैं ना?”
“प्रिये, तुम सम्राट दुष्यंत से भी अधिक
आतुर-उत्सुक हो.”
“आर्य, जब तक प्रेमी जनों का मिलन नहीं हो
जाता, तब तक उत्सुकता तो रहती है. एक बार मिलन हो जाए, फिर
कथावाचक को अपनी कर्त्तव्य पूर्ती का आनंद होता है.”
कालिदास हँसे. आज प्रतिहारी को भेजकर सम्राट ने उनसे
मधुवंती के स्वास्थ के बारे में पूछा था. इसका अर्थ था – राजसभा में उनकी
अनुपस्थिति और व्यक्तिगत मित्रता. उन्होंने प्रतिहारी से कहा था,
“आज शाम को घाट के मंदिर में अवश्य आऊँगा.”
अत: मध्याह्न के बाद उन्होंने संक्षेप में कथन किया.
उन्होंने आरम्भ किया,
“इस बीच सुर-असुर युद्ध हुआ. इन्द्रदेव पुरुवंशीय
महायोद्धा, सम्राट दुष्यंत को असुरों के आक्रमण को रोकने के लिए आमंत्रित करते
हैं. सुर- अर्थात् प्रत्यक्ष देवताओं की विजय होती है. इन्द्रदेव सम्राट दुष्यंत
का सम्मान करते हैं. तब इन्द्रदेव ने सम्राट को अपने समीप बिठाकर अपने गले की
मंदार माला उन्हें पहनाई. सम्राट को आनंद होता है. आकाश, नक्षत्र,
मेघमालाओं से होते हुए पृथ्वी की ओर आते हुए वे अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव करते
हैं. उनका रथ सजल मेघमाला के ऊपर से जा रहा है, अत: रथचक्र गीले हो गए हैं. पृथ्वी
अत्यंत मनोहारी दिखाई दे रही है. पूर्व-पश्चिम समुद्र तट, उस पर उतरती हुई सुनहरी
संध्या, सिद्धिदाता हेमकूट पर्वत, कश्यप मुनि ने यहाँ तपस्या की थी.
कुछ ही समय में सम्राट दुष्यंत का रथ द्रुतगति से
आकाश से पृथ्वी की ओर आने लगा. तब उन्हें मरीचि ऋषि का स्मरण हो आया. सारथी मातलि
उनसे कहता है, कि कश्यप ऋषि की तपश्चर्या परम
आश्चर्यकारक थी. उनके मुख से लताएं फूटीं, शरीर काष्ठवत् हो गया. उस पर
चींटियों ने वल्मीक बना लिए. पक्षियों ने उनकी
जटाओं में घोंसले बना लिए.
कश्यप मुनि के आश्रम, अर्थात् हेमकूट पर्वत पर मातलि ने
रथ को रोका. सम्राट के आगमन की सूचना देने के लिए मातलि आश्रम के भीतर गया. उसी
समय अनेक तपस्विनियाँ एक बालक का विरोध करती दिखाई दीं. बालक सुंदर, सुदृढ़, दृढ़
संकल्पी था, उसके मुख पर राजसी तेज था. सम्राट दुष्यंत के मन में
प्रश्न उठा कि यह बालक आश्रम में तपस्विनियों के सान्निध्य में कैसे आया?”
“किसका था वह बालक?” मधुवंती ने अतीव उत्सुकता से
पूछा. कालिदास कहते-कहते रुक गए. मधुवंती
की ओर देखते हुए एकदम मन में विचार आया, ‘हमारा कोई पुत्र नहीं है, यदि ऐसा
ही सुन्दर पुत्र हमारा होता तो? ब्याहता पत्नी विद्वत्वती और हमें रति सुख देने
वाली मधुवंती...’ उनका अचानक विचारमग्न होना मधुवंती के ध्यान में नहीं आया.
“कथन करें, आर्य!”
“वह वीर बालक सिंहनी के दूध पीते हुए शावक को ले जा
रहा था- उसके दांत गिनने के लिए.”
“मधुवंती, ऐसा शौर्य, ऐसी
वीरता, ऐसी शक्ति और ऐसी निर्भयता वैश्य, शूद्र अथवा ब्राह्मण पुत्र में हो
ही नहीं सकती. यह निश्चित ही क्षत्रिय पुत्र है, राजसी तेज से युक्त है. अत: इसकी
माता कोई तेजस्वी स्त्री होगी, और पिता कोई वीर पुरुष होगा. अन्यथा ऐसा बालक
दुर्लभ ही है.”
“आखिर, वह पुत्र था किसका?” मधुवंती
ने आतुरता से पूछा.
“कथन करता हूँ, मधुवंती. तुम्हारी यह अनावर
तीव्रता हमारे लेखन की सफलता है. उनमें से एक तपस्विनी सम्राट दुष्यंत को देखकर
कहती है, ‘महाराज, यह बालक हमारी बात नहीं सुनता, आप तो कह
कर देखें.’
सम्राट दुष्यंत उसे स्पर्श करते हैं, और उनके
मन में विचार आता है, ‘यह स्पर्श परिचित प्रतीत होता है.
तपस्विनियाँ कहती हैं कि यह बालक ऋषि कुमार नहीं है, बल्कि अप्सरा पुत्री, ऋषि
कन्या ने इस बालक को इन्द्रदेव के पिता, कश्यप मुनि के इस आश्रम में जन्म
दिया है.
धर्मं पत्नी का त्याग करने वाले राजश्री का यह पुत्र
है, उनका नाम मैं नहीं लूँगी.’
शायद यह शकुन्तला का पुत्र है. सम्राट दुष्यंत के मन
में आशा उत्पन्न हुई. उन्होंने उस बालक को अपने निकट लिया. तब वह बालक उनकी बांहों
से छिटकते हुए कहता है, ‘मेरे पिता राजश्री दुष्यंत हैं.’
मधुवंती ने गहरी सांस छोडी. जैसे उसे ही अपना पुत्र
प्राप्त हो गया हो. अतिशय प्रसन्न मन से वह बोली, “आर्य, विरही जनों का दीर्घ काल के पश्चात
मिलन कितना आनंददायी हो सकता है, इस कल्पना से ही मैं अत्यंत
प्रसन्न हूँ.”
“सत्य है मधुवंती. जीवन में किसी को भी विरहावस्था
प्राप्त न हो. सम्राट दुष्यंत के विरह की हमने केवल कल्पना ही की है. उसकी सत्यता
को हमने मन से पहचाना है. परन्तु क्या सभी का अपने प्रिय व्यक्ति से पुनरपि मिलन
संभव है क्या, यह प्रश्न हमें सताता है. संयोग
इतने सहज नहीं होते.”
“हम समझे नहीं आर्य, कि आप अकस्मात् चिंतित क्यों हो गए? सम्राट
दुष्यंत और शकुन्तला का पुत्र सहित मिलन आपने करवाया ना! आपके शब्द लावण्य से यह
कालातीत प्रेमकथा बन गई है.”
“शकुन्तला सम्राट दुष्यंत के सामने खडी है, उन्होंने
बार-बार उससे क्षमा मांगी है. शकुन्तला के नेत्र आनंदाश्रुओं से भरे हैं, अंत सुखद
हो गया है. कश्यप मुनि उन्हें जी भरके आशीर्वाद देते हैं और सबसे बिदा लेकर वे
अपने हस्तिनापुर की ओर निकले हैं.”
“आर्य, कल्पनातीत सुन्दर! लावण्यमयी, नादमयी
भाषा से हम प्रभावित हैं. क्या पुरस्कार दें आपको?”
“सखे, मधुवंती, तुम ही
हमारा पुरस्कार हो. हमें कुछ और नहीं चाहिए. अनेक दिन तुम्हारे और दुष्यंत-शकुन्तला
के सहवास में व्यतीत हुए. हम प्रसन्न हैं.”
“एक प्रश्न, आर्य.”
“अवश्य पूछो.”
“आर्य, आपने शकुन्तला की देह का इतना सूक्ष्म
और अप्रतिम वर्णन किया, वह कैसे किया है?”
“अर्थात्, सत्य अनुभूति से. इसमें कोई कल्पना नहीं
है. हे लावण्यवती, सुखदायिनी मधुवंती, तुम तो हमारे
साथ हो ना? कहीं अन्यत्र जाने की हमने कभी कल्पना भी अभी तक नहीं
की.”
वह हंसी. उन्होंने अत्यंत स्नेह से उसे अपने निकट
लिया, वे दुष्यंत हो गए थे और मधुवंती थी लावण्यवती, शास्त्रवती शकुन्तला. कालिदास
अत्यंत प्रसन्न थे.
No comments:
Post a Comment