मधुवंती के यहाँ वे अनेक दिनों से नहीं गए थे, और जाने का विचार भी आये, तो गणेश नामक युवक को उन्होंने अपने प्रासाद में स्थान दिया था. अब कम से कम एक मास तक तो जाना नहीं हो पायेगा. वैसा सन्देश उन्होंने भेज दिया था. वर्त्तमान में वह भी महाभारत काल की स्त्रियों की पराधीनता, वाक्पटुता, असहायता, संयम, धैर्य पर संशोधन कर रही थी. उसे अध्ययन के लिए एक उत्तम पर्याय मिल गया था, इसकी कालिदास को प्रसन्नता थी.
ब्रह्म मुहूर्त पर उन्होंने लिखना
आरम्भ किया – पाँच सर्ग तो हो गए है, और पाँच हुए तो हुए, मन पर बंधन
नहीं लादना है, ऐसा
उन्होंने निश्चय किया, और प्रसन्न मन से राजा अज की कथा आरंभ की. उसका विवाह हो ही
गया था. मृदुवचनी,
गुणवती, फूल
से भी कोमल कांता इन्दुमति के रूप में राजा अज को प्राप्त हुई थी. परन्तु अयोध्या
से विदर्भ में प्रवेश करने से लेकर विवाह वेदी पहुँचने तक और विवाह संपन्न होने तक
कालिदास ने इतना अधिक विस्तृत वर्णन किया कि वे स्वयँ ही चकित हो गए. प्रभावती का
विवाह,
युवराज कुमार का विवाह, उसके
संस्कार मन पर अंकित हो गए होंगे. इंदुमति के स्वयंवर में आर्यावर्त के अनेक राजा
उपस्थित थे, उनका
वर्णन कालिदास ने अनेक उपमाएं देकर किया था. वे खुद भी चकित हो गए थे.
मेघों से मुक्त
धवल चंद्रिका – इन्दुमति शशिधर को – अज को प्राप्त हुई थी.
स्वर्ग से भी अधिक श्रृंगारित अयोध्या
नगरी में राजा अज और उनकी नूतन वधू.
कालिदास ने सातवाँ सर्ग आरम्भ कर
दिया था. इस सर्ग में इन्दुमति को प्राप्त करने के लिए आये हुए राजा-महाराजाओं के
विवाहों का, और
जिनके विवाह निश्चित नहीं हुए उनके द्वारा अज पर आक्रमण करने का वर्णन है.
आठवें सर्ग में प्रौढ़-प्रगल्भ
सम्पूर्ण आर्यावर्त का राजा और अपार संपत्ति प्राप्त करने वाला रघु और आर्यावर्त
से संपत्ति लाकर ‘विश्वजित’ यज्ञ
में सम्पूर्ण संपत्ति दान करने वाला – अज.
दो भिन्न प्रकृतियाँ, परन्तु ध्येय –
एक. जनहित. रघु ने वानप्रस्थाश्रम स्वीकार किया और योग सिद्धि से मृत्यु को भी
स्वीकार किया.
अज की अनेक रानियाँ थीं, परन्तु पुत्र
प्राप्ति हुई इन्दुमति से. राजा अज की उस पर नि:सीम प्रीति थी. पुत्र का नाम दशरथ
रखा गया. चारों ओर आनंद ही आनंद था. अज और इन्दुमति स्वस्थ थे. अज का विचार था कि
यदि हम किसी का द्वेष नहीं करते तो हमारा द्वेष करने वाला भी कोई न होगा. हम सौंवे
यज्ञ का अश्व लेकर गए और पूरे आर्यावर्त को पादाक्रांत किया. और वस्तुस्थिति वैसी
ही थी. इसलिए अज और इंदुमती वन विहार के लिए गए. राजा की गोद में सिर रखकर हरी घास
पर इन्दुमति लेटी थी. उसी समय नारद मुनि गोकर्ण से शिव शंकर के पास जा रहे थे. वे
शिवशंकर का गुणगान कर रहे थे और उनकी वीणा पर लगी हुई पुष्प माला इन्दुमति के
वक्षस्थल पर गिरी. फूल से कोमल इन्दुमति तत्क्षण गतप्राण हो गई. ईश्वर की भी योजना
थी कि कोमल कांता को कोमल पुष्पमाला से मृत्यु प्राप्त हो.
पल भर को तो राजा अज कुछ समझ ही नहीं
पाया, मगर
फिर अनावर दुःख से विलाप करने लगा. हमारे ही प्राण लिए होते... उस विलाप में
आक्रोश नहीं, अपितु
संवेदनशील उत्कट प्रेम था. ‘अज विलाप’ लिखते-लिखते कालिदास को भी अपने अश्रु रोकना
असंभव हो गया, वे भी
स्तम्भ का सहारा लेकर रोने लगे.
तभी वहाँ गणेश आया, दो-तीन दिन पूर्व
ही आया हुआ गणेश कालिदास की ऐसी अवस्था देखकर बौखला गया. अगले ही पल उसने कालिदास
के मस्तक पर हाथ रख दिया.
“तात...” उसके स्पर्श से, उसकी पुकार से
कालिदास चौंक गए.
“ऐसे आंसू न बहायें, तात,” कालिदास ने
अपने ऊपर झुके हुए गणेश को दृढ आलिंगन दिया, मगर अब यह आलिंगन दुःख से नहीं, अपितु अत्यंत
आनंद से था.
गणेश को प्रथम देखते ही उन्हें अपने
रूप का स्मरण हो आया. हम सशक्त, अलौकिक रूप से सुन्दर थे, इसलिए हमारा
घात हुआ, गणेश दुर्बल और अज्ञानी है इसलिए उसका घात हुआ. दोनों ही तो यौवन की
देहलीज़ पर थे.
राजसभा से आने के बाद वे गणेश को
अपने साथ क्षिप्रा तट पर श्रीमहाकालेश्वर के मंदिर में ले गए और उसके मस्तक पर हाथ
रखकर बोले,
“वत्स गणेश, तुम हमारे
पुत्र के समान हो. तुम तेजस्वी हो, रूपवान भी हो, किंचित न्यूनता है तो विद्यार्जन
में. हम तुम्हें नित्यक्रम देंगे, नित्य पाठ देंगे. तुम अश्वशाला, गोशाला, शस्त्रागार सब
संभालोगे. सबसे बातें करोगे. तुम्हारी वाणी निरागस है, परन्तु शीघ्र ही तुम्हारे
मुख से रसात्मक वाणी प्रकट होगी. अब बताओ, तुम माता के पास जाओगे या हमारे दिए हुए नित्य
पाठ का अध्ययन करोगे? तुम पर ज़बरदस्ती नहीं होगी, वत्स.”
गणेश बालक के समान उनसे लिपट गया. और
तीन ही दिनों में उसे अपना आत्मविश्वास प्राप्त हो गया, वाणी प्राप्त हुई और
संवेदना का अनुभव हुआ.
“वत्स, मंदिर जाकर आये? शिव स्तोत्र
का पठन किया?”
उसने ‘हाँ’ कहा.
“क्या अब अंकशास्त्र का पाठ दूं?”
“अवश्य, तात.”
“क्या हमें ‘तात’ कहने की इच्छा
हुई तुम्हारी?”
“जब से मैं कुछ समझने लायक हुआ, मेरे तात मुझे
षंढ कहते है, मेरे दोनों भाई उपहासपूर्वक मुझे पुकारते हैं, मेरी माता
मुझे शतमूर्ख कहती है. जो अपने पुत्र को समझते हैं, वे ‘तात’ होते हैं.”
उनके सामने उसका सम्पूर्ण जीवनपट खुल
गया. अब हम उसके पिता होकर उसे सबल बनायेंगे, सुन्दर आचार-विचार और संस्कृति से संस्कारित
करेंगे, ऐसा
उन्होंने निश्चय किया.
“अब आप लिखें, तात. हम अपनी
अभ्यासिका में है,” उसकी
वाणी में भी अनजाने ही परिवर्तन हो गया था.
कालिदास लिखने लगे.
वसिष्ठ ऋषि ने राजा अज को
सान्त्वनापूर्ण सन्देश भेजा, और इन्दुमति की मृत्यु का रहस्य भी बताया.
तृणबिंदु नामक ऋषि को मोह में डालने वाली अप्सरा हरिणी. उन्होंने उसे शाप दिया, “तुम मानव
जन्म लोगी, और जब
तक तुम्हारे हृदय पर पुष्पाघात नहीं होता, तभी तक जीवित रहोगी.” इन्दुमति के रूप में उसी
अप्सरा ने जन्म लिया था. अत: तुम शोक न करो. हे राजन जीवन-मरण तो नैसर्गिक क्रिया
है.”
वसिष्ठ मुनि का सान्त्वनापूर्ण
सन्देश पाकर धैर्यशील राजा अज ने अपने आप को सम्भाला. कुमार दशरथ के हाथों में
राज्य शासन सौंपा और स्वयँ वसिष्ठ मुनि की शरण में गया.
प्रजापिता दशरथ ने सार्वभौम राज्य का
स्वीकार करते हुए इक्ष्वाकु वंश के अपने पितरों का स्मरण करके आर्यावर्त की
धर्मध्वजा अखंडित रखते हुए,
लोकराज्य निर्माण करने का व्रत लिया. मृगया, मद्य, मृगनयनी से दूर रहने वाले सत्शील राजा दशरथ की
तीन रानियाँ थी – मगध कन्या सुमित्रा, कोसल कन्या कौशल्या, और केकय कन्या
कैकेयी. कौशल्या महारानी थीं, तो कैकयी कनिष्ठ रानी. कैकयी अस्त्र-शस्त्र,
वेदविद्या,
रणनीति में पारंगत थी.
तीन रानियों वाले सामर्थ्यसंपन्न
दशरथ रघुकुल के आदर्श थे,
परन्तु कभी कभी अकस्मात् नियती अपना खेल खेलती है, और अनजाने में किसी की ह्त्या हो
जाती है. सभी कुछ अनाकलनीय...
कालिदास रानियों का वर्णन कर रहे थे, और उन्हें
श्रवण कुमार द्वारा दी गई शाप वाणी का स्मरण हुआ. श्रवण कुमार की ह्त्या अनजाने
में हुई थी,
परन्तु पुत्र जन्म का आनंद उससे सहस्त्र गुना अधिक था. सुमित्रा का लक्ष्मण, कौशल्या के
श्रीराम और कैकेयी के दो पुत्र – भरत और
शत्रुघ्न,
क्योंकि कैकेयी को पुत्र कामेष्टी यज्ञ में पायस के दो भाग मिले थे.
स्वयँ राजा दशरथ अत्यंत पराक्रमी थे.
देव-दानवों के युद्ध में अनेक बार पराक्रम की पराकाष्ठा करके उन्होंने देवताओं को
विजय प्राप्त करवाई थी. उनका विवाह हुआ था परन्तु वे नि:संतान थे. श्रवण कुमार के
पिता के शाप के कारण ही सही, उन्हें चार पुत्रों की प्राप्ति होती है. अनेक यज्ञ
और दान करने वाले राजा दशरथ को यज्ञों और अन्य कार्यों का फल प्राप्त होता है
पुत्र जन्म के फलस्वरूप. उसके पराक्रम से देवतागण प्रभावित होते, इस कारण यम, कुबेर, वरुण,
इंद्र की उन पर कृपा थी. अयोध्या नगरी में मानो चिर बसंत ही होता था.सब कुछ कुशल
क्षेम से था,
परन्तु पुत्र नहीं था,
परन्तु शाप वाणी के कारण ही सही, चार पुत्र हुए थे.
कालिदास ने अयोध्या नगरी का और
चक्रवर्ती सम्राट दशरथ का इतना सुन्दर वर्णन किया है कि उन्हें स्वयँ पर ही
आश्चर्य हुआ. परन्तु उन्हें प्रतीत हुआ कि कवि अथवा साहित्यकार अपनी कल्पना से
रचना करते हैं, यह
नितांत भ्रम है. औरों की अपेक्षा उनके पास संवेदना अधिक होती है, और प्रकृति, मानव, पशुपक्षी
के प्रति उत्कट भावना की अनुभूति के फलस्वरूप ही उनकी रचना साकार होती है. यथार्थ
को अधिक रम्य तथा कलात्मक बनाने के लिए कवि शब्दों के अभिनव प्रयोग करते हैं, उन पर
कल्पनाओं के रंग चढाते हैं. वैसे सब कुछ यथार्थ में होता है, प्रकृति का
प्रणय, मानव
का प्रणय, स्थिति,
लय, उद्गम के बीच
की सूक्ष्म रेखा. प्रत्येक घटना के सूक्ष्म निरीक्षण से साहित्य निर्मिती होती है.
हमने दशरथ को देखा नहीं है, परन्तु हमने
सम्राट चन्द्रगुप्त को देखा है. हमने स्वर्ग नहीं देखा, परन्तु
लावण्यवती स्त्रियों को देखा है. हमने विलासी राजाओं को देखा है. प्रत्येक घटना को
मन में जातन करके रखा है. शास्त्रकार भी इसी प्रकार घटनाओं का अवलोकन करते हैं, अपने
निरीक्षणों से निष्कर्ष निकालकर भविष्य का अनुमान लगाते हुए लिखते हैं. दोनों के
ही पास आत्मसंवाद,
आत्मानंद होता है. शास्त्रकार मनोरंजन नहीं करते, अपितु ज्ञान वृद्धि करते हैं. कवि
प्रत्येक मनुष्य के मन में संवेदनाओं की आनंद नगरी बनाता है. कवि का प्रयोजन
आनंदप्राप्ति तो है ही,
संस्कार, संस्कृति और मानवी गुणों का भण्डार बनाना भी है.
कालिदास हंस पड़े. हम अपने मन में ही
प्रश्नोत्तर का पाठ ले रहे है. हम अयोध्या नगरी के दशरथ हो गए हैं. उसके अंतर्मन
में प्रवेश कर गए हैं. उसकी भावनाएँ, संवेदनाएं अब हमारी हैं. सब कुछ कितना विचित्र
है! निराकार भावनाएं साकार होती हैं. हमारे मन में प्रकट हुई संवेदनाएं अनेक मनों
में उतनी ही उत्कटता से संप्रेषित होती हैं. कैसे होता है यह? ये विषय अगम्य
है – जब ऋषि मुनियों के लिए ही अगम्य है, तो हम तो शून्य ही हैं.
वे फिर अयोध्या नगरी पहुँच गए थे.
पुत्र जन्म का महोत्सव चल रहा था. अयोध्या नगरी आनंद नगरी हो गई थी, परन्तु दशरथ
के मन में श्रवण के माता पिता का शाप गूँज रहा था. श्रवण के माता-पिता ने दशरथ को
खुद की तरह पुत्र वियोग में मृत्यु को प्राप्त होने का शाप दिया था.
कालिदास ने नौंवा सर्ग पूर्ण किया, भोजपत्र
एकत्रित किये, उन्हें रेशमी वस्त्र में रखा और स्नान के लिए क्षिप्रा नदी की ओर चल
पड़े.
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