Sunday, 24 August 2025

एकला चलो रे - 22

  

 

22


आधी रात समाप्त हो रही थी और अब मृणालिनी शान्ति से सो रही थी. रवीन्द्रनाथ सोच रहे थे, मृणालिनी को  आखिर हुआ क्या है? दिन भर तो हंसते-हंसते सारे काम कर रही थी. रात का भोजन भी हो गया और भयानक थकावट लिए सोने के लिए गई. पैरों के नीचे रखी हुई चादर भी ठीक से नहीं ओढ़ पा रही थी. लिखते-लिखते रवीन्द्रनाथ बीच बीच में उसकी ओर देख लेते थे. आख़िर उन्होंने उठाकर उसके बदन पर चादर डाल दी.

“क्या हो रहा है, छुटी?” उसने कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने उसके मस्तक पर हाथ रख कर देखा – बुखार नहीं था. मगर आंखें नहीं खुल रही थीं. वे बार बार पूछ रहे थे. “छुटी, तुम्हें क्या हो रहा है! कुछ बोलोगी तभी तो हमें पता चलेगा ना?”

बड़े प्रयत्न से उसने कहा, “बहुत थक गई हूँ मैं. आंखें खोलने की भी शक्ति नहीं है.” यह सुनकर रवीन्द्रनाथ मन ही मन कांप गए और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बोले, “तुम्हें कुछ नहीं होगा. घबराओ नहीं. मन को पक्का रखो. दवा लेती रहो, अच्छा लगेगा.” रवीन्द्रनाथ ने उसे दवा दी, फिर भी एक बात मन में खटक रही थी, आंखें खोलने की भी शक्ति नहीं है – इतनी थकान अचानक होना सहज नहीं है. वह भीतर से अस्वस्थ है, ये वह समझ गए और बेचैन हो गए. 

वह अब गहरी नींद में थी, मगर वे जाग रहे थे. उनका मन भर आया. ठाकुर परिवार पर बहुत प्रेम करने वाली, सेवा करने वाली, अपने मन में उन्हें सर्वोच्च स्थान ही नहीं अपितु देवता का दर्जा देने वाली, कहीं उनके ऊपर किये जा रहे दोषारोपण से हताश तो नहीं हो गई? उन्होंने अपने आप से पूछा, तभी उनके दूसरे मन ने कहा,

‘रोबी, तुम्हारी ये छुटी केवल बीस वर्ष की, और पांच संतानों की माता होने से थक तो नहीं गई ना?

‘तुम अनेक बार उसके आस पास भी नहीं होते थे, तब एकाकी जीवन जीते हुए, बच्चों की देखभाल करते हुए थक तो नहीं गयी है, ना?

प्रश्नों के चक्कर में उलझे हुए रवीन्द्रनाथ पलंग से उठे आधी रात समाप्त होकर ब्रह्म मुहूर्त का समय हो चला था. उन्होंने एक बार फिर मृणालिनी के मस्तक पर हाथ लगाकर देखा, बुखार नहीं था. वे बदन पर शाल लपेट कर बाहर आये, और मन में प्रार्थना के स्वर गूजे:

ॐ असतो मा सद्गमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय

मृत्योर्माsमृतम गमय

आविरावीर्म एधि   

रुद्र यत्ते दक्षिणं मुखम्

तेन माम पाहि नित्यम्

यह उदात्त प्रार्थना, उपनिषदों में स्थित वैश्विक प्रार्थना, आत्म शक्ति की प्रार्थना भारतीय संस्कृति की आत्मा है, और यही भारतीय संस्कृति का विश्व को सन्देश है.

प्रातःकाल के चार बजे थे. आश्रम परिसर शांत था. गुरुदेव परिसर में घूम रहे थे. चुभती हुई हवा थी. बड़े विद्यार्थी छोटे विद्यार्थियों को उठा रहे थे और चुभती हुई ठण्ड में लिहाफ़ में लिपटे हुए विद्यार्थी उठना नहीं चाहते थे. वातावरण में सिर्फ इतनी ही आवाज़ थी. 

सुबह सुबह स्मरण हुए उपनिषद के इस श्लोक का वे ऊंची आवाज़ में उद्घोष करने लगे, तब उनकी आवाज सुनकर सारे विद्यार्थी एक साथ उठ गए.

उन्हें जागते देखकर वे अपने ऑफिस में आये और कागज़ लेकर लिखने लगे.

‘हे परमेश्वर, मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधेरे से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमृत तत्व की ओर ले चलो. हे स्वयंप्रकाश तत्व, तू मुझमें प्रकट हो. हे रूद्र, हे प्रलयंकारी देव, तुम्हारा दक्षिणमुख सदैव मेरी दृष्टि के सम्मुख रहने दे. यदि रूद्र के तेज का ही अनुभव नहीं किया, तो प्रसन्नता का अनुभव कैसे होगा? मेरी राय में इस प्रार्थना का सार ही ‘आविरावीर्म एधि’ अर्थात् स्वयं प्रकाश का तत्व है, इससे व्यक्तित्व ही प्रकट होता है. इस प्रकाश को स्वयं के भीतर अनुभव करना चाहिए, नहीं तो अपने भीतर के सत्य का अनुभव कैसे होगा? अँधेरे से प्रकाश में जाने का आक्रोश कैसे समाप्त होगा? मृत्यु में जो पूर्णविराम का अमृत तत्व है, वहां तक पहुँचना कैसे है? कौनसी शक्ति हमारी समस्याएँ सुलझाएगी? वो शक्ति है ‘अविः जो हमारे मन को आलोकित करता है वह प्रकाश. ये प्रश्न स्वयं प्रकाश द्वारा ही सुलझते जाते हैं. ये तभी समझ में आता है, जब आत्मशक्ति का अनुभव होता है. रौद्र तांडव ही एकमेव सत्य नहीं है. तांडव के पीछे एक प्रसन्नता भी है. हमारे अज्ञान के कारण हमें उसका अनुभव नहीं होता. जब अनुभव होता है, तब मन प्रकाशित होता है, परन्तु तब तक भय चारों तरफ से घेरे रहता है. आत्मदारिद्र्य जब आता है, तो हम दया की भीख मांगते हैं.’

लिखते लिखते वे रुक गए. ‘सचमुच, हमें क्या चाहिये?’ उन्होंने यह प्रश्न अपने मन से पूछा, तो मन ने उत्तर दिया,

‘तुम्हें चाहिए आत्मशक्ति का प्रत्यय, तुम्हें चाहिए वैदिक मन्त्र से अखिल मानव जाति के लिए उपयोगी हो, ऐसा जीवन का सफलता देने वाला सारांश, तत्त्वज्ञान की वैश्विक सभा तुम्हें चाहिए. उपनिषद् के मन्त्र का अर्थ समझते हुए आत्मशक्ति की अनुभूति तुम्हें चाहिए. आत्म शक्ति की उपासना भारतीय संस्कृति का प्राण है. तुम्हें विश्व को यही बताना है.’

‘सत्य है,’ दूसरे मन ने जवाब दिया. ‘तो भगवद्गीता भी कर्मफल निरपेक्ष आत्मशक्ति प्रज्वलित करके सारासार विचार करने वाली वेदवाणी है. परन्तु उसका अर्थ समझते हुए अनेक प्रश्न उत्पन्न होते हैं, उपनिषद, वेद वैसे  नहीं हैं, वे स्पष्ट हैं.

भगवद्गीता में ‘स्वधर्मे निधनं श्रेय:परधर्मो भयावह:’ है तो प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि ‘स्वधर्म कौनसा है, और ‘परधर्म’ कौनसा?   उस समय तो एक ही – वैदिक धर्म अस्तित्व में था, तो उन्होंने अर्जुन को ‘परधर्म – यह शब्द क्यों बताया?

‘उपनिषदों का इतना अध्ययन किया, यह सीधा अर्थ तुम्हें समझ में नहीं आया? तुम्हारा धर्म कौनसा है? ‘तुम्हारा धर्म कौनसा है?’ श्रीकृष्ण ने प्रश्न न पूछते हुए उसका उत्तर ही दे दिया. ‘तुम्हारा धर्म है क्षात्र धर्म. तुम क्षत्रिय हो. बलवंत हो. युद्ध करना क्षत्रिय का कर्म है, और तुम्हें वही करना चाहिए. यह कर्म धर्म ही नहीं अपितु तुम्हारा स्वभाव धर्म हो गया है. ऐसे समय में यदि तुम युद्ध से इनकार करके क्षत्रिय धर्म के विरुद्ध आचरण करते हो, तो, हे अर्जुन तुम्हारी मृत्यु अन्य वर्णों के समान होना अशोभनीय है. तुम्हें क्षत्रियोचित कर्म करते हुए स्वधर्म का पालन करना पडेगा, और यदि अपनी प्रवृत्ति के विरुद्ध जाकर तुम शरण माँगने वाले हो, तो यह भयावह है. अनुचित है.’ दूसरे मन ने उत्तर दिया.

रवीन्द्रनाथ मनःपूर्वक हंसे. सचमुच, एक ही मन में दो मनों का अस्तित्व होता है. यदि प्रश्न सीधा हो, तो एक मन के उत्तर से दूसरा मन सहमत होता है, और यदि सहमत न हो, या आशंकित हो, तो दूसरा जागृत मन तुरंत उत्तर देता है.

प्रार्थना के लिए शंख ध्वनि हो गई थी. उन्होंने अपने कागज़ समेटे और प्रार्थना के लिए बाहर आये. बेहद ठण्डी हवा पत्ते-पत्ते को हिला रही थी. सूर्य भी अभी क्षितिज पर ही था. आज प्रार्थना आश्रम में ही आयोजित की जा रही थी. प्रार्थना के समय वे मन ही मन कह रहे थे,

                                   ॐ असतो मा सद्गमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय

मृत्योर्माsमृतम गमय

आविरावीर्म एधि   

प्रार्थना समाप्त होते ही रथी उनके पास आया. रथी और शमी – उनके दो पुत्र आश्रम में ही अध्ययन कर रहे थे.

“बाबा, हम सबको बहुत सर्दी लग रही है. हाथ से लिखना नहीं हो रहा है, अब सुबह पाठ शुरू हो जाएगा, हम क्या करें?

“रथी, शमीन्द्र तो तुमसे छोटा है. वह तो ऐसा कुछ कहने के लिए हमारे पास नहीं आया.”

“सबकी तरफ़ से मैं ही आया हूँ ना बाबा, आपके अनुशासन से सभी डरते हैं. मैं भी डरता हूँ.”

‘अब तुम और बाकी सब क्या करना चाहते हो?

शमीन्द्र सोचने लगा, और फिर बोला,

“मैं सबसे पूछकर आता हूँ.”

“मगर सबकी जो एक राय हो, वही मुझे बताना.” 

“हम सब खूब खेलना चाहते हैं.”

“इतनी ठण्ड में? बाहर? सर्दी लग जायेगी ना!”

“नहीं लगेगी! क्या हम खेल सकते हैं?”

रवीन्द्रनाथ को आत्मशक्ति का, स्वयंविश्वास का साक्षात्कार हुआ.

“ठीक है. फिर पाठ कब? भोजन से पहले या बाद में?

“पाठ भोजन से पूर्व. इसके बाद तो हमें अपनी इच्छानुसार पढ़ना या कुछ और करना होता है ना!” और आगे उनकी कोई बात न सुनते हुए वह बहुत प्रसन्नता से भागते हुए आश्रम के अपने कमरे में गया, और दो ही पलों में उस चुभती हुई हवा में सारे बच्चे खुशी से खेलने के लिए आ गए. हरेक के मुख पर प्रसन्नता थी.

रवीन्द्रनाथ को अपने स्कूल की याद आई. एक के बाद एक क्लास होती थी, बच्चे ऐसे लगते थे, जैसे किसी गोदाम में बंद हों. उस विषय की कक्षा में भी बैठना पड़ता था, जो अच्छी नहीं लगती थी. ऊपर से छड़ी का प्रयोग भी होता था. उस समय तो शिक्षक जेलर प्रतीत होते. सख्ती से पढ़ाई करवाते थे और बच्चों को अनुत्तीर्ण करना तो जैसे उनका जन्मसिद्ध अधिकार था. हाथ बांधकर मुंह पर उंगली रखे सुनना पड़ता था, चाहे पसंद हो अथवा न हो. प्रत्येक विद्यार्थी का यह कर्तव्य ही था.

उसका ध्यान खिड़की से दिखाई दे रहे नीले-सफ़ेद बादलों की ओर जाता, हवा से हिलती नारियल के पेड़ों की शाखों पर जाता, बगल में बैठा दोस्त हाथ पर चिकोटी काट कर क्लास में ध्यान देने को कहता और तभी से ऐसा लगता कि ऐसा स्कूल नहीं चाहिए. मुक्त पढ़ाई चाहिए. शायद आज के शान्ति निकेतन की कल्पना हमें वहीं से आई होगी.

बच्चे खेल रहे थे, वे मुक्त थे, स्वच्छन्द थे. प्रसन्न थे. इस पल उन्हें ऐसा लगा, कि छोटा होकर उनमें मिल जाऊं. इसी तरह प्रसन्नता से चिल्लाऊं. सुबह की प्रसन्न धूप को बदन से लपेट कर नाचूं... मगर अब यह संभव नही है. बचपन दूर के गाँव चला गया, कभी भी न लौटने के लिए. हाथ में लिया पारा फिसल जाए, सागर किनारे खड़े-खड़े पैरों के नीचे की बालू लहरें खसोट कर ले जाएं, उसी तरह फिसल गया बचपन. मगर अब उसे आसपास विचरते हुए देखता हूँ.

वे भीतर जाने के लिए मुड़े ही थे कि सतीशचन्द्र राय सामने से आता हुआ दिखा. वह हंसते हुए बोला,

“गुरुदेव, शान्ति निकेतन में न केवल फूल ही खिले है, बच्चे भी खिल रहे हैं. सिर्फ हवा ही नहीं पगलाई है, हवा में बच्चे भी उन्मत्त हो गए हैं. आज का दृश्य देव दुर्लभ है!”

“सही है. मगर अब श्यामली को उन्हें ‘लेमन ग्रास और तुलसी का काढ़ा ही देना होगा. बच्चे इस ठण्ड को महसूस करते हुए खेल रहे हैं.”

“सत्य है, गुरुदेव. शिक्षा के विषय में आपके सारे विचार लिख लूंगा.”

“सतीश बाबू, सिर्फ शिक्षा नहीं, बल्कि मनपसंद और जीवनोपयोगी शिक्षा होनी चाहिए.

सतीशचन्द्र राय ने कानों पर मफलर लपेटा और शाल भी कसकर ओढ़कर वे कुर्सी पर बैठने के लिए आगे आये, तभी रवीन्द्रनाथ बरामदे में दो कुर्सियां खींचकर लाये. अब हवा थम गई थी. बच्चे भी खेल में मगन थे.

और रवीन्द्रनाथ ने जीवन और शिक्षण संबंधी अपनी भूमिका बताना आरंभ किया. मोहितचन्द्र सेन, अजित कुमार चक्रवर्ती सतीशचन्द्र राय को ढूँढते हुए वहां तक आये ही थे. रवीन्द्रनाथ ने कहा,

“शिक्षा में आमूलाग्र परिवर्तन हो, इस उद्देश्य से एक बैठक बुलाने का विचार है. आज अंग्रेज़ी शिक्षा, विदेशी शिक्षा को आत्मसात करने का पूरा प्रयत्न हो रहा है. मातृभाषा के प्रति लगाव समाप्त हो चुका है. यह स्थिति चिंताजनक है. ऐसी स्थिति आ सकती है, कि न तो मातृभाषा अच्छी तरह आयेगी, ना ही अंग्रेज़ी भाषा. उनके ईश्वर को ही हम वन्दनीय मानें, इसका अर्थ ये हुआ कि हम अपनी संस्कृति, अपना भक्तिभाव उसके चरणों में अर्पित करें. यदि हम अपनी बौद्धिक दासता, वैचारिक दासता, आध्यात्मिक दासता से मुक्त न हुए तो हमारा जीवन अर्थ शून्य हो जाएगा. इसका विचार करके प्रत्येक व्यक्ति अपना-अपना आलेख प्रस्तुत करे.

उसी प्रकार कार्यकर्ताओं को तैयार करना होगा. जड़ें जितनी मज़बूत होंगी, वृक्ष भी उतना ही बड़ा होता जाएगा, और शान्तिनिकेतन का हर पत्ता फलता-फूलता रहेगा. उसकी सुगंध विदेशों में पहुंचेगी. संस्कृति का ध्यान रहेगा. शाश्वत मूल्यों का आधार प्राप्त होगा, कलाओं को प्रोत्साहन मिलेगा, प्रकृति का अपना महत्त्व होगा. नए भारत की यह शान रहेगी और सम्मान रहेगा.”

“बिलकुल सही. आप ज़रा भी चिंता न करें. देखते-देखते संस्था का डेढ़ वर्ष पूरा हो गया, और अनेक कार्यकर्ता स्वेच्छा से तैयार हो गए. हो रहे हैं. विद्यार्थियों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है.” सतीशचन्द्र राय ने कहा.

“और वैसे भी, समाज के अनेक लोगों का विरोध और अंग्रेजों का तीव्र विरोध हमारे यश की कुंजी है. जितना अधिक विरोध हो रहा है, समाज का ध्यान उतना ही ज़्यादा शान्ति निकेतन की ओर आकृष्ट हो रहा है. कुछ मीन-मेख निकालने वाले आते हैं. कुछ विरोधक की हैसियत से जानकारी प्राप्त करने के लिए, तो कुछ उत्सुकतावश, और कुछ अध्ययन के लिए यहां आते हैं. शान्ति निकेतन की मूल कल्पना ही इतनी आकर्षक है, कि कुछ ही समय में भारत में इस संकल्पना की न केवल प्रशंसा होगी, अपितु उसके प्रति आकर्षण में वृद्धि ही होगी. आप देखिएगा, गुरुदेव.”

रवीन्द्रनाथ हंस पड़े, हमेशा की तरह स्वच्छंद, मुक्त.

“सतीश, यह सारी व्यवस्था तुम छह व्यक्तियों के मज़बूत कन्धों पर टिकी है. इसीलिये अनेकों दुष्प्रचारों के बावजूद संस्था खड़ी है. धरती में अपने पैर मज़बूती से गड़ाए, सभी हमारी संकल्पनाओं के शाश्वत आधार हैं.”

“ये क्या कह रहे हैं, गुरुदेव! सभी कुछ आप ही का है. यदि आपकी संकल्पना न होती, तो क्या हम सब इकट्ठा होते?

“और एक बात. मृणालिनी की तबियत कुछ ठीक नहीं लगती. उसे एक बार कलकत्ता ले जाने का विचार है.”

“कल तो अच्छी थीं.”

“हां. मगर उसे भयानक थकावट का अनुभव हो रहा है.”

“जाकर आईये. हम पूरी ज़िम्मेदारी से, अनुशासन से, और आप ही की संकल्पना के अनुसार संभाल लेंगे. आप उन्हें लेकर कलकत्ता हो आइये.”

वे समाधानपूर्वक अपने कमरे में आये. मृणालिनी रथींद्र और शमीन्द्र, रेणुका से बातें कर रही थी. इतना ही नहीं, वह स्नान करके आई थी. पूरी तरह स्वस्थ थी.

रवीन्द्रनाथ चकरा गए. ऐसा हाल में दो-तीन बार हुआ था. अगर किसी से कहें, कि ‘अब यह उठ ही नहीं सकती, तो कोई भी विश्वास न करे, या स्वयं अपना ही विश्वास न हो. वे स्तब्ध होकर उसकी ओर देखते रहे. यह चमत्कार कैसे हो सकता है, इस पर वे विचार कर रहे थे.

“रेणुका, क्या तुम्हारी मां की तबियत लुकाछिपी खेलती है?” वह कुछ समझ नहीं पाई, मगर मृणालिनी ने कहा,

“ये मेरी आत्मशक्ति है, गुरुदेव. आपको कुछ कहना है?

“नहीं.  हमें कुछ नहीं कहना है. यही आत्मशक्ति  निरंतर बनी रहे.”

वह हंसी, जैसे कुछ हुआ ही न हो. वे भी हंसे, यह सोचकर  कि मन यूं ही भयभीत हो गया था.

“देखो, एकदम काम करना शुरू न करो. इतना सुन लो.”

“वह कहाँ काम कर रही है? सब कुछ मुझसे करवा रही है. कहती है, ‘जल्दी शादी हो गई, इसलिए तू यहाँ है. तब तक सब कुछ सीख लो. आगे तकलीफ़ नहीं होगी.”

“ये सही है, रेणुका. ससुराल जाने पर कोई ये न कहे, कि माँ ने कुछ सिखाया नहीं.”

काफ़ी दिनों के बाद सबका सुख-संवाद चल रहा था. वे मृणालिनी की ओर देखते हुए बोले, “तुम मायाविनी हो. अभी एक रूप, दोपहर में अलग रूप, शाम को एक अन्य. रात में तो तुम भयभीत करने वाली होती हो. मेरा विचार है, कि हमें एक बार सत्येनदा से मिलने जाना चाहिए. क्योंकि एक बार यदि काम में उलझ गया, तो फिर जाना संभव न होगा, और हिसाब का रजिस्टर एक बार उन्हें दिखाना है. नौकाघर में जाकर देवेन्द्रनाथ से भी मिलना है.”

उसने कुछ नहीं कहा था. इस डेढ़ वर्ष में शांतिनिकेतन में एक अच्छा परिवार बन गया था. गुरुमाता की प्रतिष्ठा थी. बच्चे और पति एक साथ थे. मन पर कोई बोझ नहीं था. फिर भी बीच बीच में उसकी तबियत बिगड़ जाती थी. वह कभी कुछ बताती नहीं थी, अगर तबियत ज़्यादा ही बिगड़ जाती, तो वह दिखाई दे जाता था.

घर में, बाहर रवीन्द्रनाथ पर हो रहे विरोध को वह अपने भीतर समेट रही थी. ‘नए मार्ग पर, लोकप्रवाह के विरुद्ध जाना हो तो आक्रोश, जनता का रोष तो उत्पन्न होगा ही. अपने मन को वह समझा रही थी. माधुरीलता अपनी ससुराल में थी. उसके पति अमेरिका गए थे. उसके वापस लौटने तक मृणालिनी के मन में चिंता थी ही. उसी तरह एक बार वह निर्धारपूर्वक ठाकुरबाड़ी छोड़कर शांतिनिकेतन आई थी.

“छोटी बहू, तुम जा तो रही हो, परन्तु वहाँ का वातावरण, वहाँ का  काम सहन कर पाओगी ना? बेकार ही जाने की ज़िद न करो. वहाँ जाने की तुम्हारी इच्छा स्वाभाविक है. परन्तु दोनों के विवाह के बाद तुम थक गई हो. कम से कम बच्चों को तो यहाँ छोड़ती जाओ. मैं उन्हें संभाल लूंगी.”

आज मृणालिनी सोच रही थी, इतने प्यार से माता समान ज्ञाननन्दिनी ने कहा था, मगर मेरे ही मन का उत्साह अपार था. आज डेढ़ वर्ष बाद वहीं जाना पड़ रहा था. परन्तु ज्ञाननंदिनी माँ है, वह प्यार से संभाल लेगी, ऐसा विश्वास रवीन्द्रनाथ के मन में था, मृणालिनी के मन में भी था.

उन्हें हमेशा ऐसा लगता था कि जीवन में संयम, अनुशासन और संगती होना चाहिए. परन्तु समस्याएँ समाप्त नहीं हो रही थीं. ब्रह्मचर्याश्रम के बाद विद्यार्थी आ रहे थे. जगह की कमी हो रही थी, इसलिए जगन्नाथपुरी का अपना बंगला बेच दिया. कहीं न कहीं से पैसों का इंतज़ाम करना और उन्हें आश्रम के लिए प्रदान करना – यह काम बढ़ गया था. इसीके साथ शांतिनिकेतन आने से पूर्व हुए दोनों कन्याओं के विवाह में भी काफ़ी खर्चा हो गया था. ऐसे में अब मृणालिनी का बिगड़ता हुआ स्वास्थ अधिक गंभीर विषय प्रतीत हो रहा था. उन पर पुत्रवत्  स्नेह करने वाले सत्येन्द्रनाथ और पिता देवेन्द्रनाथ से मिलने का विचार करके उन्होंने मृणालिनी से ठाकुरबाड़ी जाने के बारे में कहा था. परन्तु मृणालिनी की बिल्कुल इच्छा नहीं थी. ‘यदि आपकी इच्छा अहो, तो सियालदह से किसी डॉक्टर को बुलाकर मेरा इलाज करवा लें, मुझे सचमुच कुछ नहीं हुआ है.’

मगर अब रवीन्द्रनाथ ने कहा,

“छुटी, यदि तुम्हारी इच्छा न हो तो, हम ही ठाकुरबाड़ी जायेंगे और बच्चों को भी ले जायेंगे. तुम यहीं रहो.”

रवीन्द्रनाथ ने ऐसा कहा तो उसके पास कोई चारा न बचा. मन ही मन उसे अच्छा भी लगा. अनेक बार उनके मन में विचार एक होता, मगर करना कुछ और पड़ता था. इस समय भी शांतिनिकेतन में आ रहे विद्यार्थियों के रहने का पर्याप्त इंतज़ाम नहीं था, पैसों का इंतज़ाम करना कठिन हो रहा था. यदि किसी से मांगने भी जाओ, तो चार बातें सुननी ही पड़ती थीं. ‘इतने बड़े ज़मींदार हो. जोड़ासान्को की विशाल हवेली में रहते हो, आपको पैसों की क्या कमी है. अंग्रेजों के बीच आपका प्रभाव है. उन्होंने ही आपको ‘सर की उपाधि दी है. आपको ये बेकार की हरकतें क्यों सूझती हैं. मज़े से रहने के बदले क्यों विजनवास में रहते हो? कवि हो, नाटककार हो, क्या ये कम  है?’ इसी तरह के वाक्य उन्हें सुनने पड़ेंगे, यह उन्हें भलीभांति ज्ञात था. बाहर के ही क्यों, ठाकुरबाड़ी के लोगों को भी यह निरा पागलपन ही लगता था. मगर एक बार जिस काम को हाथ में लेते उसे पूरा करने का उनका संकल्प ही था.

एक अच्छी बात यह थी कि सहकारी दिल लगाकर काम करने वाले थे. परन्तु केवल डेढ़ वर्ष में ही संस्था को पूरी तरह उनके ऊपर छोड़कर ठाकुरबाड़ी जाने का उनका मन नहीं था. परन्तु दिन-प्रतिदिन बिगड़ती हुई मृणालिनी की तबियत को देखते हुए उसे अब कलकत्ते के किसी डॉक्टर को दिखाना आवश्यक था.

रवीन्द्रनाथ मन ही मन हंसे. ‘हमारा मन किसी संग्रहालय जैसा है. एक वस्तु निकालने जाओ, तो दूसरी सामने दिखाई देती है, उसे वापस रखते हुए तीसरी वस्तु पर नज़र जाती है, और मन भिरभिराता है सभी वस्तुओं की ओर. हर चीज़ आवश्यक प्रतीत होती है. किसी भी वस्तु को दुर्लक्षित करने का मन ही नहीं होता.’ उन्होंने सभी वस्तुओं को मन में ठूंस दिया और मृणालिनी से बोले,

“छुटी, तुम्हारी तबियत का कारण अवश्य है, परन्तु बाबा को देखे हुए बहुत दिन हो गए. माँ समान भाभी ज्ञाननन्दिनी और पिता समान द्विजेनदा से भी मिलना है. निमित्त तुम्हारी तबियत का हो, तो भी मन में प्रतिदिन उनकी याद आती है.”

मन में एक बात और भी थी. लॉर्ड कर्ज़न के वाइसरॉय बनकर भारत आने पर भारतीयों पर अनेक अत्याचार आरंभ हो गए थे. भारतीयों की एकता को समाप्त करने का निरंतर विचार करने वाले इस लॉर्ड कर्ज़न को एक सनसनीखेज़ पत्र कलकत्ता के अखबार में प्रकाशित करते हुए कलकत्ता के नेताओं की भूमिका को भी जानना चाहते थे. उनका मन सभी दिशाओं में घूम रहा था. उन्होंने मृणालिनी और बच्चों के साथ कलकत्ता जाने का निश्चय किया.

एक तरफ़ तो रवीन्द्रनाथ मन ही मन कलकत्ता जाने की तैयारी कर रहे थे, मगर दूसरी ओर मन पूरे ज़ोर से यह भी कह रहा था कि शान्ति निकेतन में ही रहें. क्योंकि ब्रह्मोसमाज के समर्थक और स्वयँ को कट्टर हिन्दू समझने वाले पालक अपने बच्चों को शान्ति निकेतन में भेजने के लिए तैयार नहीं थे. अंग्रेज़ केवल मौखिक विरोध ही नहीं कर रहे थे, उन्होंने लिखित नोटिस भी निकाला था:

‘सरकार में सेवारत कर्मचारी यदि अपने पाल्य को शान्ति निकेतन भेजते हैं, तो उनकी सेवा समाप्त कर दी जायेगी.’ परिणाम स्वरूप विद्यार्थी आते नहीं थे. तब गाँव-गाँव घूम कर विद्यार्थियों को इकट्ठा करने के लिए अथक प्रयत्न करने पड़ते थे.

और आज भी वही स्थिति थी. गाँवों में व्याप्त निर्धनता के कारण विद्यार्थी आ रहे थे. जगह की कमी का अनुभव हो रहा था. नए कमरे बनाए जा रहे थे, मगर पालक कब अपने बच्चों को लेकर चले जायेंगे, यह भय निरंतर रहता था. ऐसे में हाल ही में आये हुए विद्यार्थियों की संख्या देखकर अंग्रेज़ों का खून खौल उठा था. ‘शान्ति निकेतन नामक संस्था को ही जड़ से मिटाने का षडयंत्र अंग्रेजों ने रचा था. उसे उत्तेजित करते हुए दृढ़तापूर्वक खड़े रवीन्द्रनाथ मृणालिनी की बीमारी से मन ही मन अपना धीरज खो रहे थे. परंतु चेहरे पर वही प्रसन्न स्मित और मुख में गीत था.

अब चाहे जो हो, कलकत्ते जाना ही है,’ यह निर्णय उन्होने लिया और मृणालिनी से बोले,

“अगले सोमवार को कलकत्ते जाना है. बच्चों के साथ तैयारी करो.”

उसका विचार था, कि कहने के बाद भी रवीन्द्रनाथ अपना विचार बदल देंगे, मगर वैसा हुआ नहीं था. वह शान्त खड़ी रही.

रवीन्द्रनाथ अब ब्रह्मचर्याश्रम की ओर निकले थे. उन्हें याद आया, अंग्रेजों द्वारा भेजा गया आदेश बर्दाश्त किया. रिश्तेदारों द्वारा की गई निंदा, उपहास बर्दाश्त किये. एना के आग्रह पर उन्होंने शान्ति निकेतन ‘ब्रह्मचर्य आश्रम की स्थापना की.

बचपन में स्कूल का बंदियों जैसा जीवन, शिक्षकों का कठोर व्यवहार, गृहपाठ, और अंग्रेज़ी में ही बोलने और लिखने को बाध्य करने वाला अभ्यासक्रम. गृहपाठ न करने पर मिलने वाली कठोर शिक्षा...इस सब के कारण स्कूल जाने का उनका मन ही नहीं होता था. उन्हें अपेक्षा थी मुक्त वातावरण, मुक्त बचपन, मुक्त शिक्षा की, और यहाँ बच्चों को यह सब देते हुए उन्हें प्रसन्नता होती थी.

परन्तु मन में एक चुभन थी. जगन्नाथपुरी के अपने बंगले में वे कभी कभी वास्तव्य के लिए जाया करते थे. जब इस ‘ब्रह्मचर्याश्रम’ के लिए स्थान अपर्याप्त प्रतीत होने लगा, तो अतिरिक्त कमरे बनाने के लिए उन्होंने उस बंगले को बेचने का निश्चय किया.

वहीं के एक युवक ने कहा,

“बाबू मोशाय, जब आप यहाँ आते हैं तो बहुत प्रसन्नता का अनुभव होता है. आप बहुत सुन्दर हैं. आपकी कवितायेँ आपसे भी अधिक सुन्दर हैं. हम उन्हें सुनते हैं, यह आनंद हमें भविष्य में कैसे प्राप्त होगा?

वे शांत खड़े थे. उन नौजवानों के बीच एक नन्ही परी थी. उन्होंने ही उसे ‘परी नाम दिया था.

“आप यहाँ से न जाईये, बाबूजी, तब मुझे सागर की बालू में कौन घर बनाकर देगा.”

“आयेगा एक सुन्दर राजकुमार, सफ़ेद घोड़े पर और घर बनाने में तुम्हारी सहायता करेगा.”

“आप भी राजकुमार हैं, क्या आपके पास नहीं है सफ़ेद घोड़ा?

कितनी ही देर वे उसे समझाते रहे, अनेक तरह की दलीलों से, मगर वह सुन ही नहीं रही थी. अंत में उन्होंने उससे कहा,

“परी, हमारे पास तुम्हारे जैसी दो परियाँ हैं. तीन राजकुमार हैं, तुम आओगी हमारे साथ?

वह दुखी होकर लौट गयी, उनके जाने तक वापस ही नहीं आई. उन्हें कई बार ऐसा लगा कि उसके घर जाकर उससे मिलें. मगर अब वह बंगला ही बेच दिया. जगन्नाथपुरी से रिश्ता ही टूट गया. एक मन ने दूसरे मन को समझाया, ‘वह एक परी मुरझा गई, दुखी हो गई, परन्तु तुम्हें अनेक गुलाब की कलियों को विकसित करना है.’

मन ही मन उन्होंने परी की कल्पना की. गोरे गुलाबी रंग की, नीला फ्रॉक पहनी, घुँघराले बालों वाली, आकर्षक. उन्होंने मन ही मन कहा,

‘तुम जानती हो परी, अनेक बार, अनेक चीज़ें छूट गईं. हम पर नितांत प्रेम करने वाले लोग छूट गए. ये ऐसा ही होता है. नियति हर चीज़ हमारी झोली में नहीं डालती. तुम छोटी हो, भूल जाओगी. परन्तु हमारे मन में तुम्हारा स्थान हमेशा रहेगा. क्या कभी मिलोगी?

वे अजित कुमार चक्रवर्ती के कक्ष में गए. उन्हें सम्पूर्ण कल्पना से अवगत कराया, और कहा,

“हम औरों को भी इस बात की कल्पना दे रहे हैं. डेढ़ वर्ष बाद, अब जाकर, शान्ति निकेतन में चहल-पहल होने लगी थी. एक ही बात समझ में आई, कि जब झोली भर-भर के सुख मिलने लगता है, तो दुःख भी दबे पांव चला आता है. हमने आदत डाल ली. मन के द्वार कभी भी बंद नहीं करते, क्योंकि अब दुःख भी साथ रहने लगा है.”

असल में तो यह सब उन्हें कहना नहीं था. अनजाने में ही मुख से निकल गया. वे स्वयं ही हंसते हुए बोले,

“हम एक बार अपने पिताश्री से मिलकर आते हैं. उन्हें यह सब हृदयपूर्वक बहुत अच्छा लगेगा, और मृणालिनी की तबियत भी किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाता हूँ. वैसे तो हम जल्दी ही वापस लौटेंगे, और यदि देर भी हो रही होगी, तो कलकत्ता-सियालदह अब बहुत दूर नहीं है. बीच बीच में आते रहेंगे.

रवीन्द्रनाथ ने मन को इस तरह समझाया, परन्तु नज़र के सामने अनेक काम दिखाई दे रहे थे, और इतने साल गाँव के लोगों को दवाई देते हुए आत्मसात किया हुआ चिकित्सा शास्त्र मृणालिनी की तबियत के बारे में साशंक था.

सावन का महीना आरंभ हो गया था, फिर भी आषाढ़ मास के समान वर्षा हो रही थी. वे मृणालिनी और बच्चों के साथ सियालदह स्टेशन पहुँच चुके थे.

 

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