Sunday, 31 August 2025

एकला चलो रे - 23

  




 

23   

 

रवीन्द्रनाथ ने एक विधवा स्त्री के जीवन पर आधारित ‘चोखेर बाली नामक उपन्यास लिखना आरंभ किया था. एक विधवा का जीवन, नैतिक मूल्यों का पतन हो रहे समाज का उसे हुआ दर्शन, विकृत मनोवृत्ति और स्त्री के रणरागिणी दुर्गा स्वरूप को उन्हें इस उपन्यास में प्रस्तुत करना था.

यह विषय कब से उनके मन में था. वैधव्य प्राप्त होना स्त्री के लिए अपराध नहीं है. पति के बिना एकाकी स्त्री को सम्मानपूर्वक जीवन देना समाज का कर्तव्य ही है. उसे वैधव्य प्राप्त हुआ, इसका अर्थ यह नहीं है, कि कोई भी उसे विकृत दृष्टि से देखे. उन्हें वह स्त्री एक गाँव में मिली थी, और उन्होंने देखा था कि कितनी निर्भयता से वह समाज का सामना कर रही थी. 

आज उसी कथानक पर वे लिख रहे थे. सामने हिमालय की पर्वत शृंखलाएं दिखाई दे रही थीं. सूर्य अभी अभी उदित हुआ था. उसके आगमन से पूर्व ही आकाश केसरी रंग में झिलमिला रहा था और उसका केसर का दान हिमकणों पर बिखरा था. उस विलोभनीय दृश्य से नज़र हट ही नहीं रही थी. कितने सारे दिनों के बाद वे ऐसा झिलमिलाता आकाश और हिमालय की शृंखलाएं देख रहे थे.

नैनीताल से वे अल्मोड़ा आये थे. रेणुका के साथ दो दिन नैनीताल के आश्रम में रुके थे. वातावरण में कोहरे की चादर फ़ैली थी. दो दिनों से वे देख रहे थे. कोहरा छा रहा था, और कुछ ही देर में लौट जाता. बार बार यही पुनरावृत्ति हो रही थी. नैनादेवी के मंदिर में भी वे रेणुका को लेकर गए थे.

“रानी, तुम्हें देखना है, यहाँ के नौ ताल? नवताल, भीमताल...”

“नहीं, बाबा, मुझे कुछ भी नहीं देखना है.”

“ऐसा क्यों, बेटी, सभी कुछ कितना सुन्दर है! तुम्हें अच्छा लगेगा.”

मुरझाई हुई वह कली, खिलने से पूर्व ही मिटने की तैयारी कर रही थी. वह खिले, उस पर बहार आये, इसलिए वे प्रयत्न कर रहे थे. इच्छा न होते हुए भी उन्होंने कलकत्ते में एक अंग्रेज़ डॉक्टर को बुलाया था.  

आयुर्वेदिक जडीबूटियों का उस पर कोई परिणाम नहीं हो रहा था. डेढ़ महीने से भी ज़्यादा खांसी-बुखार चल रहा था, जो कम नहीं हो रहा था. अंग्रेज़ डॉक्टर ने जलवायु परिवर्तन की सलाह दी थी. उन्होंने पूछा भी था, “यदि जलवायु परिवर्तन के लिए ले जाऊं, तो ठण्ड के कारण उसकी खांसी और ज़्यादा तो नहीं बढ़ जायेगी?

“नहीं, नहीं. ऐसा कुछ नहीं होगा. फिलहाल तो इस क्षय रोग पर कोई रोगप्रतिकारक दवाएं नहीं हैं. जलवायु परिवर्तन ही एक पर्याय है.”

चौदह वर्ष की रेणुका. वैसे तो वह उनकी विवाहित कन्या थी. वह सत्येन्द्रनाथ भट्टाचार्य की पत्नी थी. वे अभी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, इसलिए वह मायके में थी, और अब असाध्य क्षय रोग से ग्रस्त हो गई थी. उसके पति और ससुराल के लोग उसे देखने आये थे. अत्यंत म्लान हो चुकी रेणुका को देखकर वे लोग सहानुभूति से बोले, “हम उसे ले जायेंगे, परन्तु उसे ठीक होने दें, तब तक सत्येन्द्र की शिक्षा भी पूरी हो जायेगी.”

रवीन्द्रनाथ ने कुछ नहीं कहा. उनके सामने था दिन प्रतिदिन म्लान होता हुआ रेणुका का शरीर और न समाप्त होने वाली खांसी और बुखार.

रवीन्द्रनाथ ने ज्ञानरंजनी से कहा,
“भाभी
, जीवनभर आपने हमारी, अपनी स्वयं की ज़िम्मेदारी उठाई, मृणालिनी को भी संभाला, अब हमारे बच्चों को अपनी शरण में लीजिये.”

“ऐसा क्यों कह रहे हैं, देवरजी...हमारी कोई संतान नहीं है, आप हमारे लिए पुत्र जैसे ही हैं, और आपके बच्चे क्या मेरे ही बच्चे नहीं हैं क्या? ऐसी बात पूछकर हमें पराया न बनाइये. आप जाइए राणी को लेकर, मैं बच्चों को संभाल लूंगी. विश्वास है ना मुझ पर?

“ऐसा न कहिये, भाभी. आप पहले भी हमारा आधार थी, आज भी हैं, कल भी रहेंगी.”

उन्होंने मीरा और शमीन्द्र को ज्ञानरंजनी के पास छोड़ा और उन्होंने रथींद्र से कहा,

“तुम बड़े हो, रथी. तुम शान्ति निकेतन जाओ, अन्य बच्चों के साथ रहो. हमारे समय में जैसे होते थे, वैसा यह स्कूल नहीं है. यहाँ के शिक्षक भी अच्छे हैं.”

उन्होंने उसे अपने पास लिया और उनके नेत्रों से अनजाने ही आंसू बहने लगे. जैसे कल ही हुआ हो, वैसे एक प्रसंग उनकी आंखों के सामने तैर गया. एकदम स्पष्ट याद आ रहा था:

‘आधी रात का समय था. ठाकुरबाड़ी निद्रामग्न थी. मगर रवीन्द्रनाथ कांच की खिड़की से निरभ्र आकाश की चंद्रकोर देख रहे थे. उस पर एक स्पष्ट तारा था. इस चंद्रकोर और तारे को वे अनेक बार देख चुके थे, मगर आज चंद्रकोर हो, और साथ में तारा ही न हो तो, इस कल्पना से ही वे अत्यंत अस्वस्थ हो गए थे. निरभ्र आकाश में केवल उन्हीं का अस्तित्व है.

यदि इस तारे को निकाल दिया जाए, तो चंद्रकोर अधूरी ही रहेगी ना? सहजीवन ही तो जीवन का सुखद रूप है. वे सोच रहे थे.

‘मृणालिनी पलंग पर शांत सो रही थी. यहाँ आने पर उसकी तबियत ठीक हो गई थी. सत्येनदा की पत्नी ज्ञाननंदिनी ने कहा भी,

“रोबी, मृणालिनी को ठाकुरबाड़ी में रहने की आदत है. देखो, आठ ही दिनों में कितनी अच्छी हो गई है. बिल्कुल नज़र लग जाएगी. वे हंस दिए थे. किसी को बहला-फुसला कर भागने को कहा जाए, ऐसी था उसका स्वास्थ्य.  रोग का निदान नहीं हो रहा था. दवाएं चल रही थीं.

एक बार वे दोनों नौकाघर में देवेंद्रनाथ से मिलने गए. रवीन्द्रनाथ ने शांति निकेतन के बारे में पूरी जानकारी दी, तब उन्होंने कहा था,

‘रोबी, हमने कभी कल्पना भी नहीं की थी, आश्रम की इतनी सुन्दर कल्पना तुमने साकार कर दी. शिशुभवन, ब्रह्मचर्याश्रम साकार किया. हमारे शान्ति साधना आश्रम का तुमने सचमुच उद्धार किया. अब आप लोग बच्चों के साथ वहां हैं, हमें बहुत प्रसन्नता है.”

उन्होंने रवीन्द्रनाथ के मस्तक पर हाथ रखा, उसी तरह मृणालिनी के मस्तक पर भी रखा और बोले,

“छोटी बहू, तुम्हारा स्वास्थ्य उत्तम है. इसी तरह रोबी का साथ देती रहो, और समाज, परिवार जो तुम्हें बुरा-भला कह रहा है, बेवकूफ़ी की है, ऐसा कहता है, उसकी तरफ़ ध्यान न दो. तुम्हारा पति जो कार्य कर रहा है, वह युग युग तक आदर्श रहेगा. तुम उसका पूरा साथ दो.”

उसने हाँ कहते हुए कहा,

“बाबूजी, एक ही प्रार्थना है. अब आप नौकाघर में न रहें. ठाकुरबाड़ी वापस आयें. अब मैं हूँ ना. इतने दिनों तक आपकी बात सुनी, ना! अब आयेंगे ना वापस?

“आऊँगा, अवश्य आऊँगा. यह नौकाघर जैसे मेरा वृद्धाश्रम, वानप्रस्थाश्रम है. मोह से दूर रहना है. यह निवृत्ति है. मगर तुम कहती हो, तो आऊँगा वापस.”

“अपनी इच्छा के विरुद्ध कुछ न कीजिये, बाबूजी. अब आपको यहाँ आदत हो गई है. ठाकुरबाड़ी आकर आपको बंधन का अनुभव तो नहीं होगा, ना?”

“हम विचार करेंगे. अपने मन से संवाद करेंगे. फिर बताएंगे.”

देवेन्द्रनाथ थक गए थे, फिर भी दो सेवकों की सहायता से इस नौकाघर में सुखी थे. ठाकुरबाड़ी लौटते हुए मृणालिनी ने कहा भी, “हम एक बोझ लेकर जीते हैं, मन में इच्छा दबाकर जीते हैं, इसलिए हमें कष्ट होता है. सुखी जीवन में बाधा उत्पन्न होती है. अब मैंने भी निरिच्छ होने का फ़ैसला कर लिया है.”

“मतलब, क्या करने वाली हो?

“करूंगी सब कुछ, परन्तु उसमें मन नहीं रहेगा.”

“मगर, ऐसा क्यों करना है? तुम हो, हम सब हैं, बच्चे हैं, परिवार है. मगर उनसे मन हटाकर क्यों जीना है? जीवन में यदि कुछ भी प्राप्त न करना हो, और बहुत कुछ प्राप्त होने का समाधान हो, तब निवृत्त होना हमें भी स्वीकार है. परन्तु...”

उसने कुछ नहीं कहा.

पंद्रह दिन बाद ही उसे बुखार आया, और अत्यंत थकान का अनुभव हुआ. बुखार तो जैसे आया, वैसे ही चला गया, मगर थकान नहीं जा रही थी.

देखते देखते सावन बीत गया. भाद्रपद भी गया और आश्विन मास आ गया. अब दिवाली होने के बाद शांति निकेतन वापस जायेंगे और वहां विद्यार्थियों के साथ दिवाली मनाएंगे, यह विचार कर रहे थे, कि मृणालिनी को फिर से बुखार आया. वैसे तो बुखार तीन दिनों में उतर जाता था, मगर इस बार बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था. वह थक गई. उसे डॉक्टर के पास ले गए, दवाएं शुरू हो गईं. आठ दिन बाद वह अच्छी हो गई, और थकावट भी जाती रही. सत्येनदा ने कहा भी,

“छोटी बहू, तुमि बहु भालो लागवे,”  सभी प्रसन्न हो गए. सत्येनदा, द्विजेनदा ने कहा, “अब यहीं दीवाली मनाएंगे.” और रवीन्द्रनाथ ने कहा, “छुटी, तुमने मुझे कितनी बड़ी चिंता से मुक्त कर दिया, ऐसा लग रहा था कि इस बीमारी से तुम ठीक नहीं हो पाओगी. अपने मन को कठोर करने का, मन को समझाने का खूब प्रयत्न कर रहा था. और तुम ठीक हो गईं. भगवान ने हमारी इच्छा पूरी की. तुम्हें जीवनदान दिया.”

और अगले आठ दिनों में ठाकुरबाड़ी का वह बैठकखाना अनेक व्यक्तियों के आगमन से, हंसी मज़ाक से गूँज उठा. लार्ड कर्ज़न के अत्याचारों की गूँज अब रवीन्द्रनाथ के बैठक खाने में भी सुनाई दे रही थी. घर में दीपावली का उत्सव आरंभ हो गया था. दीवाली समाप्त हुई और रवीन्द्रनाथ ने राहत की सांस ली. इस महीने मृणालिनी अत्यंत प्रसन्न और सतेज दिखाई दे रही थी.

“अब जाना है ना शांति निकेतन?

“ये भी कोई पूछने की बात है? जहाँ आप, वहाँ मैं.”

रवीन्द्रनाथ हंस पड़े.

“छुटी, तुम खूब मीठा बोलती हो, और हो भी सुन्दर. जैसे किसी युवती को होना चाहिए. सचमुच, माँ बनने के बाद कोई भी स्त्री सुन्दर ही दिखाई देती है. मातृत्व का दान जो उसे मिल जाता है.”

कितनी ही देर वे दोनों बिल्कुल नए सिरे से बातें कर रहे थे. वह बीच ही में उठकर एक कागज़ ले आई.

“क्या आपने सोच लिया था, कि मैं न रहूँगी?

“ना, छुटी, ना!” उसने उनके सामने कागज़ रखा. उस पर उनकी कविता थी. वे हंसते हुए बोले, “बहुत पुरानी कविता है. शायद बीस-बाईस साल पुरानी, शायद चौबीस साल पुरानी.’

“तो क्या, अब उसे फिर से लिखा है?

“छुटी, तुम्हारी कसम, यह कविता अभी याद आई, इसलिए लिख दी.”  परन्तु “मुझे अच्छी लगी...” वह उन्हें रोकते हुए बोली, और उसने कविता पढ़ना शुरू किया,

तुमी रोबे, नीरवे,  हृदये मम

निबिड़ निभृत, पूर्णिमा निशीथिनी सम...

इसका अर्थ यह है, कि तुम हमारे ह्रदय में हमेशा वास करोगी. नीरव...निस्तब्ध, मौन रूप में, निराकार, जैसे पूर्णिमा का चन्द्रमा घनी काली रात में मन को साथ देता है, उसी तरह हमारे मन का अन्धकार दूर करके पूर्णिमा के समान प्रकाशित होगी. और आगे हम ही कहते हैं,   

मम जीवन, यौवन, मम अखिल भुवन,

तुमि भरीबे, गौरवे  निशीथिनी सम...

हमारे जीवन में यौवन तुम्हारे कारण है, तुम ही हमारा सम्पूर्ण विश्व हो, हमारा गौरव हो. तुम्हारे कारण हमारा जीवन आनंद से परिपूर्ण है. आधी रात को चन्द्रमा तारों के अस्तित्व से परिपूर्ण, मुग्ध होता है.”

“रहने दो...रहने दो...ओ, कवि मोशाय, अब रहने दो.”

उसने उनके हाथ से कागज़ ले लिया  और वह पलंग के पास गई. वे उठकर अपने काम पर गए और रात को ही वापस आये. मृणालिनी बक्से में कपड़े रख रही थी. शमीन्द्र, सौमेंद्र उसकी सहायता कर रहे थे. वे मन ही मन खुश हुए.

रात को भोजन के बाद हमेशा की तरह वे अपने लेखन कक्ष में गए. और मृणालिनी को बुखार हो गया. जब वे वापस आये, तो चकित रह गए. वे कमरे से भीतर-बाहर आ जा रहे थे. माधुरीलता उसके माथे पर ठन्डे पानी की पट्टियां रख रही थी.

“तुम जाओ, रेणुका. हम देखते हैं. अब तुम सोने जाओ. रात के ग्यारह बजे हैं. जाओ. बेटी. सब ठीक हो जाएगा.” उन्हें यह पता ही नहीं चल रहा था, की मृणालिनी को आखिर हो क्या रहा है. डॉक्टर भी हैरान थे. आधी रात बीत गई. उन्होंने उसके माथे पर, गले के नीचे हाथ रखकर देखा. बुखार एकदम सामान्य था.

और वे कुर्सी पर बैठे. उनकी आंख लग गई. नींद में गर्दन झुक गई, इसलिए वे जाग गए. उन्होंने सावधान होकर मृणालिनी की ओर देखा. ऐसा आभास हो रहा था मानो वह हंस रही हो. वे उठकर उसके पास गए, और जैसे ही उसका हाथ अपने हाथों में लिया, वह गिर गया. वे चौंक गए. मतलब, जब वे सो गए थे, उन दो-तीन घंटों में, प्रातःकाल के समय मृणालिनी उन्हें छोड़कर चली गई थी. ऐसा कुछ हो सकता है, इसकी उन्हें लेशमात्र भी कल्पना नहीं थी. वे फूट फूट कर रोने लगे. सुबह ही पढ़ी हुई उनकी कविता उनके मन में घूमने लगी:

मम जीवन, यौवन, मम अखिल भुवन

तुमि भरीबे गौरवे निशीथिनी सम

हे छुटी, सचमुच, तुम हमें छोड़कर चली गईं इस पर विश्वास ही नहीं हो रहा है.

 

जागीबे एकाकी, तव करुण आंखी

तव अंचल छाया मोहे राहिबे ढाकी ।

मम दुख वेदन, मम सफल स्वपन

तुमी भरीबे सौरभे निशीथिनी सम ।।

मगर फिर वे जोर से आक्रोश करने लगे. ठाकुरबाड़ी प्रातःकाल के स्वप्न से जाग गई. सभी इकट्ठे हो गए, मगर सबको छोड़कर, अंतरिक्ष को भेदकर दूर चली गई थी.

सभी रवीन्द्रनाथ को समझा रहे थे. परन्तु मन ही मन सभी डर गए थे. चालीस वर्ष के रवीन्द्रनाथ, और अकाल ही, संसार के बीस वर्ष भी पूरे किये बिना, मृत्यु को प्राप्त हुई मृणालिनी के बारे में सभी को गहन दुःख हो रहा था. देवेन्द्रनाथ थकावट और कमज़ोरी के बाद भी ठाकुरबाड़ी आये थे.

“छोटी बहू चली गई, इस पर विश्वास ही नहीं होता. रथींद्र चौदह वर्ष का, शमीन्द्र दस वर्ष का, मीरा आठ वर्ष की – इन्हें छोड़कर वह जा ही कैसे पाई? कम से कम हमारे बारे में तो सोचना चाहिए था. इस वृद्धावस्था में हमें कितनी यातना होगी, इसका विचार तो उसे करना चाहिए था.”

वृद्ध देवेन्द्रनाथ की आंखें भर आई थीं. उनकी वृद्ध काया थरथरा रही थी. रवीन्द्रनाथ कसकर पकडे, उनका सांत्वन कर रहे थे. पूरी ठाकुरबाड़ी शोक में डूबी थी.

दो महीने बाद रेणुका को बुखार आया. खांसी आई औए देखते-देखते वह बहुत क्षीण प्रतीत होने लगी.

“भाभी...” वे ज्ञानरंजनी के कमरे में गए. सत्येन्द्रनाथ अखबार पढ़ रहे थे. उन्होंने अखबार एक तरफ़ रखते हुए पूछा,

“की होबे, रोबी?

“सत्येनदा...” और वे बोल न सके. गला भर आया. अचानक आंखें भर आईं. ज्ञानरंजनी समझ गई. केवल एकतालीसवें वर्ष में उनके पांच बच्चों की माँ उन्हें और बच्चों को छोड़कर चली गई थी. यह दुःख उनके मन में है, यह बात ज्ञानरंजनी समझती थी. मृणालिनी के जाने के बाद उन्होंने माँ की ममता से उन्हें समझाया था,

“मृणालिनी चली गई, बिना कुछ कहे-सुने, यह दुःख हमने मन के सप्त पाताल में दबाकर रखा था, परन्तु अब...”

“अब क्या?

“राणी को पिछले आठ दिनों से बुखार है. खांसी भी है.”

“तो, इसमें घबराने जैसी क्या बात है, रोबी?

“मगर वह तो खेल रही है.”

“घर में मन नहीं लगता होगा. थक जाती है, और सो जाती है. खांसी भी है.”

“ऐसा करो, तुम्हारी भाभी उसे काढ़ा देगी, दो चार दिनों में ठीक हो जायेगी.”

ज्ञानरंजनी रोज़ दिन में तीन बार उसे काढ़ा देती, मगर वह और भी क्षीण होती गई.

उसकी ससुराल वाले आकर गए. ‘उसे अच्छा हो जाने दीजिये,’ ऐसा कहकर चले गए थे, और सारे उपाय करने के बाद वे हजारीबाग और फिर नैनीताल गए. नैनीताल में भी नैना देवी के मंदिर में उसे खांसी आई, तब मंदिर के पुजारी बोले,

“बेटी, तुम प्रसाद लेकर बाहर जाओ, मैं तुम्हारे पिताजी के साथ बात करता हूँ.”

वह बाहर गई, तो पुजारी ने कहा,

“आप धनवान लगते हैं, बिटिया की अधिक चिंता करने की आवश्यकता है. आप एक काम कीजिये. नैनीताल से अच्छा अल्मोड़ा है. वहां उसे ले जाओ. शायद आपको पता होगा, इसे क्षय रोग हो गया है. कमजोर और सफ़ेद दिखाई देती है.”

क्षय होने का निदान उस अंग्रेज़ डॉक्टर ने डरते-डरते ही किया था. स्थान परिवर्तन की सलाह भी दी थी. उसके अनुसार वे आये थे.

“क्षय का अर्थ है तबियत का गिरते जाना, यह वे जानते थे. इसीलिये वे अपनी जान से भी बढ़कर उसका ध्यान रख रहे थे. मृणालिनी को जाकर केवल छह महीने ही हुए थे, सन् 1902 समाप्त हो गया.

सन् 1903 आरंभ होकर चार महीने बीत चुके थे. अपनी माँ की मृत्यु के बाद रेणुका एकदम शांत हो गई थी. रथी, मीरा, शमी उसे खेलने के लिए बुलाती, तभी वह जाती थी.

हज़ारीबाग आने के बड़ा वह बिल्कुल अकेली पड़ गई. तब रवीन्द्रनाथ उसे कवितायेँ सुनाते. अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुनाते. इतना ही नहीं, एकाध नाटक अभिनय सहित दिखाते. परन्तु उसकी कमज़ोरी बढ़ती गयी, तब वे उसे नैनीताल ले आए. अब देवी के सामने पुजारी की बातों से उनका मन भर आया. असल में तो निराकार ईश्वर द्वारा निर्मित सृष्टि का आनंद, व्यक्तियों के बीच स्नेह का आनंद उन्हें दिखाई देता था, वैसे ही किसी को दुःख से बाहर निकालने में, दवा लेकर अच्छे होते हुए रोगी को देखकर भी मिलता था, आनंद.

परन्तु आज वे अपने मन से निर्धारपूर्वक बोले, ‘इस खिलती हुई कली को सुरक्षित रखना है.’

वे स्वयं उसे नृत्य करके दिखाते, कभी गाकर, तो कभी चित्र बनाकर दिखाते. पूरा दिन उसके साथ बिताते, उसे उदित होता हुआ सूर्य, हिमालय की विविध छटाएं, जल्दी होने वाला सूर्यास्त दिखाते. मानो वे उसकी सखी हो गए थे. एक दिन उसे सुबह उठाते हुए बोले,

“राणी, उठ, उठ. आश्रम की खिड़की से देख आज कांचन जंगा शिखर कैसे झिलमिला रहा है. वह तभी दिखाई देता है, जब आकाश निरभ्र हो.”

पूर्व दिशा में शुभ्र धवल पर्वत मालाओं के बीच वह झिलमिलाता केसरी रंग का कांचन जंगा शिखर दिखाई दे रहा था.

“देख, तू कितनी भाग्यवान है! जब हम तुम्हारी ही उम्र के थे, तो अपने बाबा के साथ बद्रीनाथ गए थे, तब हिमालय पर्वत की दो शुभ्र धवल पंक्तियों के बीच गहरा नीला-बैंगनी नीलकंठ पर्वत दिखाई दिया था. उस नीलकंठ पर्वत के माथे पर चंद्रकोर प्रकट हुई थी, और फिर कल्पना में ही हमने वहां डमरू और त्रिशूलधारी शिवशंकर को देखा था.’ प्रतिदिन उसे सुनाते समय रवीन्द्रनाथ उपन्यास लिख रहे थे. मन ‘चोखेर बाली में था, लेखन उनका श्वास था, और देखते-देखते चार महीनों में रेणुका स्वस्थ्य हो गई. उन्होंने वहां के एक वैद्य को दिखाया और वे समाधानपूर्वक ठाकुरबाड़ी वापस लौटे.

अब उन्हें शांतिनिकेतन लौटने की उतावली हो रही थी, परन्तु ज्ञानरंजनी ने कहा,

“और एक महीना रुक जाईये, उसका मन स्थिर हो जाने दो.” रवीन्द्रनाथ ने कुछ नहीं कहा.

परन्तु यहाँ, कलकत्ता लौटने पर देश में हो रही घटनाएं दिखाने वाले समाचार पत्र उन्हें अस्वस्थ कर रहे थे. लॉर्ड कर्ज़न के अत्याचारों की खबरें समाचार पत्रों में आ रही थीं, और जनता का आक्रोश उभर आया था. परन्तु उनके हाथ में राजसत्ता होने से प्रत्यक्ष रूप से विरोध करने के लिए कोई भी आगे नहीं आ रहा था. यदि यह जनआक्रोश बहुत अधिक बढ़ जाए, तभी स्फोट हो सकता है. जब जनता, समाज पूरी तरह जागृत हो जाएगा, तभी क्रान्ति हो सकती है.

देश को आज दिखाई दे रहा है परतंत्रता में दमन का वातावरण. समाज यदि अपने भूतकाल में झाँक कर देखेगा, तभी मन में असंतोष उत्पन्न होगा. नई चीज़ें सभी त्याज्य नहीं है, परन्तु यदि भूतकाल में झांके तो बहुत कुछ अमूल्य है, जब इसका ज्ञान होगा, तभी देश के प्रति समर्पण की भावना उत्पन्न होगी.

रवीन्द्रनाथ राष्ट्र के बारे में विचार कर रहे थे. ‘प्रत्येक राष्ट्र का अपना एक ध्येय, तत्व और संस्कृति होती है. उस राष्ट्र के प्राण में, ध्येय में, संस्कृति की जड़ें गहरी जमी हुई होती हैं. राष्ट्र और समाज उन्हें भूल नहीं सकता. एक दिन ऐसा भयानक बादल आता ही, कि बाहरी पत्ते तीव्र वायु से धराशायी हो जाते हैं, मगर जड़ सुरक्षित ही रहती है, उस पर फिर से नए पत्ते आते हैं, और आयेंगे.

परन्तु अब शांति निकेतन पर ध्यान देना चाहिए, अथवा राजनैतिक क्षेत्र पर? इस प्रश्न पर वे पल भर को रुक गए. फिलहाल शांति निकेतन हमारे बिना अभी व्यवस्थित रूप से चल रहा है, परन्तु राजनैतिक क्षेत्र में आज हमारी भी आवश्यकता है, ऐसा उन्हें बार-बार प्रतीत हो रहा था.

बंगाल का विभाजन करने का निर्णय सतही तौर पर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि बंगाल एक बड़ा प्रांत होने के कारण उसका विभाजन करके शासन व्यवस्था को सुलभ बनाना था. मगर सतही तौर पर प्रतीत होता हुआ यह कारण सीधा सादा नहीं था. पश्चिम बंगाल में मुसलमानों की बहुलता थी. देश में आज हिन्दुओं और मुसलमानों की जो एकता है, उसमें उन्हें फूट पैदा करना था. शासन तभी दृढ़ होगा, जब हिन्दुओं और मुसलमानों में द्वेष और कटुता निर्माण होगी. अंग्रेज़ यह बात अच्छी तरह जानते थे. इससे पहले बंगाल का आधा भाग गवर्नर द्वारा ही शासित था. मगर अब उसे विभाजित करने का इरादा था अंग्रेजों का.

और उसी समय सन् 1903 में मद्रास में कॉंग्रेस का 9वां अधिवेशन हुआ, तो लालमोहन घोष ने बंगाल का विभाजन करने की अंग्रेज़ों की नीति का विरोध किया था.

रवीन्द्रनाथ भी अस्वस्थ हो गए थे. बंगाल हमारा है, उसके दो टुकड़े किये जाएँ, यह कल्पना भी उन्हें मान्य नहीं थी. उन्होंने अनेक पत्रिकाओं में इस रणनीति और राजनीति बारे में अपने विचार प्रकट किये.

ठाकुरबाड़ी के बैठकखाने में अब सामाजिक, राजनीतिक चर्चा होने लगी थी. देर रात तक ये चर्चाएँ चलतीं, और रवीन्द्रनाथ ने इस बंग भंग आन्दोलन का विरोध करने के लिए रास्ते पर आने का विचार किया; परन्तु अचानक रेणुका की खांसी बढ़ गई. अल्मोड़ा से स्वस्थ होकर लौटी रेणुका, रात भर की खांसी से एकदम क्षीण हो गई. सुबह रवीन्द्रनाथ डॉक्टर के पास जाकर दवा लाये. दो ही दिन ठीक बीते, मगर इसके बड़ा खांसी बढ़ती ही गई.

और उस दिन सुबह दूध पीते पीते उसे भयानक खांसी आई, जो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी. सारे उपाय किये गए, और अंत में खांसी के साथ खून की उलटी हो गई.

सब कुछ समाप्त हो गया... मृणालिनी के जाने के बाद एक साल भी नहीं बीता था, कि कोई प्रसन्न बेल टूट जाए, ऐसा हुआ था.

रवीन्द्रनाथ ने स्वयं को संभाला. शमी और मीरा को निकट लेते हुए वे भीतर ही भीतर अपना दुःख पी गए.

शाम को वे अपने कमरे में अकेले बैठे थे. आकाश में चन्द्रमा भी नहीं था. तारे भी नहीं थे. आकाश मेघों से घिर गया था.



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