Friday, 5 September 2025

एकला चलो रे - 24

 

 

24


शांति निकेतन आश्रम जाग गया था. रवीन्द्रनाथ भी प्रार्थना में जाने के लिए तैयार हो रहे थे, और अचानक उनके मन से होठों पर एक पंक्ति आई. उसे गाते हुए वे आश्चर्यचकित हो गए. उनके मुख से एक के बाद एक पंक्तियाँ निकल रही थीं:

 

आमि चीनी गो, चीनी तोमारे,

ओ गो बिदेशिनी....

और उनकी आंखों के सामने प्रकट हुई मृणालिनी. खुलना जिले में डिही गाँव के वेणीमाधव रायचौधरी की कन्या मृणालिनी. उनकी पत्नी मृणालिनी. उनके साथ निरंतर डेढ़ वर्ष आश्रम व्यवस्था देखने वाली मृणालिनी. सचमुच, मन का कोई भरोसा नहीं होता. मन के भीतर का मन सदा जागृत रहता है, और जब वह बाहर आता है तो, दसों दिशाएं, अंतरिक्ष और भूगर्भ ढूंढ कर आता है.

रवीन्द्रनाथ सोच रहे थे. यह कविता उन्होंने प्रत्यक्ष मृणालिनी के लिए नहीं लिखी थी. बचपन में एक सुन्दर स्त्री चुपके से उनके मन में आकर बैठ गयी थी. अनजाने ही वह कादम्बरी के रूप में, एना के रूप में और मृणालिनी के रूप में आ गई. तीनों से उनके भावबंधन जुड़ गए. परन्तु यह स्त्री बचपन से ही मन में थी. मन की इस स्त्री ने सजीव रूप धारण कर लिया, फिर भी मन की स्त्री मन में ही रही. शायद वही उनकी सखी, प्रिया और कामिनी होगी...इसलिए यह कविता साकार हुई होगी.         

 

आमि चीनी गो चीनी, तोमारे ओ गो बिदेशिनी.

तुमि थाको सिन्धुपरे, ओ गो बिदेशिनी

देखेछी शरद प्राते तोमाय, देखेबी मधाय राते तोमाय...

 तुम रहती हो सागर पार, फिर भी आधी रात को तुम हमसे मिलने के लिए आती हो, तुम्हें हमने अपने मन में भी देखा है.

यह कविता कामिनी कौन हो सकती है? जीवन में तीन सुन्दर महिलाएं आईं, शायद यह मृणालिनी ही होगी. बचपन से मन में बसी हुई.

वह विचार करते हुए अपने कमरे में आये. सिर्फ दो ही महीने पहले वे शांति निकेतन लौटे थे. शमीन्द्र और मीरा को लेकर. मृणालिनी गई, और सिर्फ दस ही महीनों में रेणुका भी चली गई थी. विचार करना रोक देना है, मन को अनेक बातों में व्यस्त रखना है, इस उद्देश्य से मन को अनेक कामों में व्यस्त रखा था, परन्तु अंतर्मन जागृत ही था. दस वर्षों का संसार अचानक समाप्त हो जाए, और उम्र के पन्ने ठीक से पलटने से पूर्व ही हमें भी एकाकीपन का अनुभव हो. जो स्त्रियाँ  विधवा हो जाती हैं, उनका दुख  कितना गहन और जीवन कितना एकाकी होता है, इसका उन्हें अनुभव हुआ. पुरुष पुनर्विवाह कर सकता है, स्त्री नहीं, ऐसा क्यों? किसने बनाए ये नियम? इन रूढी-परंपराओं को बदलना होगा. क्योंकि सभीको सुख से जीने का अधिकार है. वे खड़े थे, तभी मीरा आई.

“बाबा, मुझे बहुत सर्दी लग रही है,” और देवेन्द्रनाथ भीतर से काँप गए. कहीं तीसरी बार भी तो...बाहर ठण्ड नहीं थी, मगर मीरा को सर्दी लग रही थी, क्या कारण हो सकता है?

उन्होंने अलमारी से शॉल निकालकर उसे उढ़ाई और पलंग पर उसे लिटाकर बोले,
“हम आश्रम की प्रार्थना समाप्त होने के बाद आते हैं. तब तक उठना नहीं.”

“नहीं उठूंगी. सचमुच नहीं उठूंगी.”

और वे ब्रह्मचर्यं आश्रम के बड़े कक्ष में प्रार्थना के लिए गए, पर उनका मन आज शांत नहीं था. मृणालिनी और रेणुका की मृत्यु को वे भूले नहीं थे. अभी कल-परसों ही तो यह सब हुआ था.  असल में तो बंग-भंग विरोध के आन्दोलन में वे सहभागी होना चाहते थे. उन्होंने लेख भी लिखे थे. परन्तु मन अशांत था. आज भी मन अशांत था.

एक तरफ वाईसरॉय लॉर्ड कर्ज़न के बार बार होने वाले बंगाल के दौरे, अनेक अंग्रेजों का बार-बार आना-जाना, उसका साम्राज्यवाद, और जिसे केवल इतिहास ही बदल सकता है, ऐसा बंगाल विभाजन का प्रस्ताव. ऊपर से पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित शिक्षित लोगों, और निम्न मध्यम वर्ग की दृष्टि से बंगाल में एक नई ही संस्कृति पनप रही थी. ऐसे में संस्कृति की जड़ों को मज़बूत करने वाली संस्था – शांति निकेतन टीका का विषय हो गई थी.

मीरा को कुछ न हो, ईश्वर के चरणों में ऐसी प्रार्थना करते हुए वे प्रार्थना स्थल पर पहुंचे. प्रार्थना आंगन में ही हो रही थी. मानो उदित हो रहे सूर्य को अर्घ्य दिया जा रहा हो. प्रार्थना के पश्चात् वे आश्रम कक्ष में आये और अजीत कुमार चक्रवर्ती से बोले,

“सभी शिक्षकों को शिक्षा की नई योजना बनाने को कहना है. फिर हम सब की राय से उस शिक्षा प्रणाली को प्रचलित करेंगे. विशेष बात यह होगी कि इस योजना में संस्कृति, संस्कार, नैतिक मूल्यों की शिक्षा, और परंपराओं का आदर हो.

और हमारा आज का बंगाली भाषा का क्लास आप लें.”

“कोई विशेष कारण, गुरुदेव?

“मीरा की तबियत कुछ ठीक नहीं है. कमरे में वह अकेली सोई है, वैसे चिंता का कोई कारण प्रतीत नहीं होता, परन्तु...”

“आप जाएँ, गुरुदेव.”

रवीन्द्रनाथ वापस जा रहे थे. अब मीरा का विषय उनके मन में नहीं था. शांति निकेतन का उदात्त भव्य रूप उनके नेत्रों के सामने साकार हो गया था. वट वृक्ष के ऊपर प्रसन्नता से चहचहाते अनगिनत पक्षियों के समान रौनक से भरा हुआ हो. अनेक बालक, बालिकाएं यहां आयें, उन्हें मुक्त शिक्षा देते हुए उनकी कलाकृतियों का भी विकास हो. खेती करने वालों को अनाज का मूल्य प्राप्त हो. जीवन को समृद्ध करने वाली शिक्षा हो.

नृत्य, नाट्य, संगीत की शिक्षा दी जाए और आगे चलकर यहां पदवी प्रदान की जाए.

वे मन ही मन हंसे. सचमुच, मन का कोई ठिकाना नहीं है, भविष्य की सुन्दर कल्पनाएँ भी वह साकार करता है. मृणालिनी गई, रेणुका गई, मन का एक कोना रिक्त हो गया. उस खाली कोने में अपने दुखों की गठरी रख दी. मेरे ही अधिकार वाला यह कोना, अनजाने में खुला भी रह गया. परन्तु मन में अनेक दालान हैं, उनमें चलते हुए ज़िंदगी आराम से बीत जायेगी. मगर, हे ईश्वर! अब ऐसे आघात न देना. मीरा को स्वस्थ रहने दो.

वे वापस आये, तो मीरा चित्र बनाने में व्यस्त थी. उन्होंने निकट आकर उसके माथे पर हाथ रखा. वह हमेशा ही  की तरह सामान्य थी. उसकी ठण्ड भी कम हो गई थी.

“कितना डरा दिया था तुमने, मीरा! इतनी ठण्ड क्यों लग रही थी?

“मुझे सर्दी लग ही नहीं रही थी. मेरा प्रार्थना में जाने का मन नहीं था.”

“अच्छा, अच्छा, कोई बात नहीं. आज का दिन तुम्हारी मर्ज़ी से जाने दो. शामली सबको दूध दे रही होगी, दूध पी लेना. शमीन्द्र के साथ खेलना हो, तो उसे भी भेज देता हूँ.

“नहीं. मुझे उस पर गुस्सा आता है. हमेशा अपने दोस्तों के साथ रहता है. मेरी तरफ़ देखता भी नहीं. मेरी लतिका से मैंने कुट्टी कर ली है.”

“तो, इसलिए तुम्हें आना नहीं था. मीरा, इस तरह कुट्टी नहीं करनी चाहिए. क्या तुम्हें भी उसके बिना अच्छा लगता है? उसका भी तो ख़याल करो. और उसे भी तुम्हारे बिना अच्छा नहीं लगता होगा. तुम दोनों घास के रंगबिरंगे फूल लाकर हमें देती हो ना? अब लतिका भी अकेली नहीं गई होगी! अच्छा, एक बात और, अगर मन न हो, तो सच-सच बताना चाहिए. समझ गईं?
“अब सच-सच बताऊंगी. अब मैं जा रही हूँ लतिका के पास.”

वह अपना लहंगा संभालते हुए भाग गयी, और वे निश्चिंत होकर बैठ गए. मन का बोझ उतर गया था. उन्हें खुद ही हंसी आई.

‘मन तो दिखाई ही नहीं देता. उसका कोई अवयव भी नहीं. फिर भी मन में इतना सब कुछ समाता कैसे है? मन ही दुखी होता है, मन ही भारी हो जाता है, मन ही हल्का हो जाता है. निराकार मन को ईश्वर ने संवेदनाओं की रेशमी गांठों में कस कर पिरोया है.’

सामने अखबार पड़े थे. बंगाल में आन्दोलन हो रहा था, और अंग्रेज़ इस जन आन्दोलन को कुचल देने का प्रयत्न कर रहे थे. उनका प्रभाव भारत में और अब बंगाल में न पड़े, इस बारे वे चिंतित थे. सब जगह भारतीयकरण हो, जो जो अपना है, उसे मूल्यवान समझ कर सुरक्षित रखा जाए, ऐसी उनकी अपेक्षा थी.

आज देश में अनाचार, अत्याचार, अज्ञान है, निर्धनता है. इस निर्धनता से मुक्ति मिलेगी, तभी आगे का मार्ग मिलेगा. परन्तु भारतीय इस बात को क्यों नहीं समझ रहे हैं? इतना भय, इतनी लाचारी, इतना अत्याचार क्यों सहन करते हैं ये लोग? यदि प्रत्येक व्यक्ति एक मुट्ठी चावल भी दे, तो दारिद्र्य सहन कर रहे लोगों के पेट में एक ग्रास जाएगा. तभी जाकर भारतीय जनता परतंत्रता और स्वतंत्रता के बीच के अंतर को समझ सकेगी.

ईश्वरचंद्र विद्यासागर, राजा राममोहन राय और अन्य कार्यकर्ता आज बंगाल विभाजन का विरोध कर रहे हैं. असल में तो मेरी भी आवाज़ उनमें शामिल है. रेणुका की मृत्यु के आठ ही दिन बाद कलकत्ता के मिनर्वा थियेटर में हुई सभा में उन्होंने कहा था, ‘प्रत्येक राष्ट्र की एक पृष्ठभूमि है. हरेक को उसकी रक्षा करना चाहिए. चाहे अनेक आक्रमणों से देश हतबल, निराश हो गया हो, फिर भी केवल ईश्वर भक्ति से देश का भला होने वाला नहीं है. अंधश्रद्दा से अब काम नहीं होने वाला, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को राष्ट्र हित के लिए कार्य करना चाहिए. प्रतिदिन प्रत्येक भारतीय अपनी प्रातःकालीन प्रार्थना में देश का स्मरण करे, रोज़ एक पैसा, एक मुट्ठी अनाज अपने निर्धन बंधुओं के लिए निकालकर रखे.

‘देश हमारा है, यह अपनेपन की भावना दृढ़ होनी चाहिए. हम देश बेचने के लिए नहीं, बल्कि देश को अपने साथ मज़बूती से बांधने के लिए निकले हैं. इसलिए देश को संगठित करने का प्रयत्न करें.’

‘आज अखबार बंगाल के विभाजन की खबरों से, और उसके विरोध में हो रहे आन्दोलन, गिरफ्तारियों की खबरों से भरा था. एकता में सम्पूर्णता होती है, हर व्यक्ति को यह बात समझना चाहिए, और यदि अभी समझ में आ भी गया, तो भी सर्वशक्तिमान अंग्रेज़ भारतीय मूल्यों और भारतीय व्यक्ति को पैरों तले कुचल देंगे, इसमें कोई संदेह नहीं.

शांति निकेतन में हमें अपने देश पर प्रेम करने’ वाले व्यक्ति का निर्माण करना है, और ऐसे व्यक्ति का निर्माण तभी होगा, जब उसे बचपन से ही संस्कृति, शाश्वत मूल्यों का ज्ञान होगा.  ‘ये लो शाश्वत मूल्य’, ऐसा कहकर उन्हें जेब से निकालकर नहीं दे सकते. वैसे ही उन्हें किसी बाज़ार में भी खरीदा नहीं जा सकता. इस दुनिया में व्यवहार तो खूब होंगे, परन्तु  सुख बेचने वाला, और दुख  खरीदने वाला कभी नहीं मिलता. ऐसा कोई न कहे. इसके लिए सर्वप्रथम ‘त्याग क्या है, यह समझना होगा.

‘हमारा त्याग देश के बांधवों के लिए होना चाहिए. हमारे जीवन का त्याग देश की स्वतंत्रता के लिए होना चाहिए, और जैसे गीली मिट्टी का घड़ा बनाया जाता है, उसी प्रकार इस ‘त्याग की शिक्षा देना होगी. बचपन में ही, इस शांति निकेतन में.’

 

संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।

समानी व आकूति: समाना हृदयानि व:

समानवस्तु वो मनो यथा व: सुसहासति।

एक दूसरे को साथ लेकर कार्य करो, विचार करो, इच्छा और मन यदि जुड़ जाएं तो ध्येय तक  पहुँचना सरल होगा.

असल में एकात्मता की भावना जब प्रबलतर होगी, तभी यह स्वातंत्र्य यज्ञ सच्चे अर्थों में प्रज्वलित होगा. यह एकात्मता की साधन ही भारत की आत्मा की साधना है. प्रेम एक ऐसी शक्ति है, कि जिसकी कक्षा में आते ही सारे भेद समाप्त हो जाते हैं.’

रवीन्द्रनाथ एक तरफ अखबार से समाचार पढ़ रहे थे, और दूसरी ओर शांति निकेतन के विकास की योजनाएं बना रहे थे. उनकी आंखों के सामने शांति निकेतन का आज का स्वरूप प्रकट हो गया. उन्होंने ‘नवयुगेर उत्सव लेख लिखते हुए कहा था,

शांति निकेतन की स्थापना करते समय उन्हें ऋषियों की अमृत वाणी सुनाई दी थी:

 

शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा

आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः॥

वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्

आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्।

 

ऋषि कहते हैं, ‘हे दिव्यधामवासी अमृत पुत्रों, सुनो. मैंने उस ज्योतिर्मय महापुरुष को, परमात्मा को जान लिया है.

जिस तरह प्रकाश स्वयं को केवल अपने आप में सीमित नहीं रख सकता, उसी तरह महानतम पुरुष भी अपना अनुभूति संपन्न धाम और द्वार किसी के भी लिए बंद नहीं कर सकता. विश्व के प्रांगण में वे प्रकट होते हैं, और उनके कंठ से नित्य मधुर वाणी प्रकट होती है. ऐसे दिव्य व्यक्ति के संपर्क में जो कोई आयेगा और ज्ञानामृत लेकर सर्वत्र जाएगा, तब सारा भारतवर्ष ‘दिव्यधाम के रूप में प्रतिष्ठित होगा.’

इसी सन्दर्भ में उन्होंने आगे लिखा:

It is recognized in the outburst of the Rishi, who addresses the whole world in a sudden ecstasy of joy – Listen to me, ye sons of the immortal spirit, ye who live in the heavenly abode, I have known the supreme person whose light shines from beyond the darkness.”

अब शांति निकेतन को वर्त्तमान काल के काल-प्रवाह में कैसे नष्ट किया जाए, यह विचार बंगाल में आकर अंग्रेज़ कर रहे हैं. आज सप्तपर्णी वृक्षों की सुगंध से महकते शांति निकेतन आश्रम को और अधिक दृढ़ करना होगा.

वे कागज़ लेकर लिखने लगे.

‘शांति निकेतन भारतीय संस्कृति का मूलमंत्र लेकर ही आगे बढ़ेगा, पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण नहीं चाहिए, परन्तु उन्होंने जो भी अच्छा किया है, उसे स्वीकार भी करना चाहिए. ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने भारतीय महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए और उनकी शिक्षा के लिए प्रयत्न किये. इसी प्रकार के प्रयत्न शांति निकेतन में होने चाहिए.

राजा राममोहन राय ने लॉर्ड बेन्टिंग से निरंतर संपर्क बनाते हुए सती प्रथा बंद करवाई, कानून बनाकर. उसी प्रकार विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए कानून की अनुमति ली. देखते देखते रथींद्र बड़ा हो रहा था. उसके लिए भी एक विधवा कुमारिका को पत्नी के रूप में लाने के लिए वे मन ही मन तैयार हो गए. जो कुमारी कन्याएं कुछ ही काल के लिए वैवाहिक बंधन में बंधी, परन्तु जिन्हें मायके में रहते हुए ही वैधव्य प्राप्त हुआ, इसमें उनका कोई दोष न था. कभी रथींद्र को भी यह सब समझाना होगा, ऐसा विचार उनके मन में आया.

उन्होंने अनेक योजनाओं को कागज़ पर लिखा और निश्चिन्त मन से वे कक्ष से बाहर आये, तभी ठाकुरबाड़ी से उनका चचेरा भाई समरेन्द्र वहां आया. वैसे तो उसका भी शांति निकेतन के प्रति विरोध ही था, परन्तु यहां आकर  उसने देखा, और अनुभव किया, उसने कहा,

“गुरुदेव...”

“ऐसा क्यों कहते हो, तुम हमारे भाई हो, रोबी कहो...”

‘ना... ना... ना... यहां का वातावरण, यहां की पढ़ाई, मुक्तकला देखकर मैं अत्यंत प्रभावित हुआ हूँ. मैं भी यहाँ आऊँगा. मैं यहाँ काम करना चाहता हूँ.”

रवीन्द्रनाथ हंसते हुए मन ही मन बोले,

‘इसी तरह एकेक करके सब आयेंगे, सबके मन का क्रोध समाप्त हो जाएगा.’ प्रत्यक्ष में उन्होंने कहा,

“कैसे आना हुआ, समरेन्द्र? यूं ही या किसी काम से?”

“यूं ही नहीं आया. तुमसे ही मिलने आया हूँ. कारण यह है, कि तुम्हारे बाबा बीमार हैं. उन्हें नौकाघर से ठाकुरबाड़ी लाये हैं और वे तुम्हें याद कर रहे हैं. पत्र लिखकर भेजने में समय व्यतीत होगा, और यदि तार करूं तो तुम घबरा जाओगे. इसलिए ज्ञानरंजनी भाभीजी ने मुझे यहाँ भेजा है. ऐसा लगता है, कि यहाँ आकर अच्छा ही किया. तुम सचमुच ‘गुरुदेव हो गए हो, यह मैंने प्रत्यक्ष देखा.”

“मगर वे अभी तक ठीक नहीं हुए?”

“मैं आज ही सुबह निकलकर सियालदह आया और तांगा करके यहाँ तक आया. वैसे पैदल चलने लायक ही अंतर है, बोलपुर से तो बहुत ही निकट है. मुझे यह परिसर बहुत अच्छा लगा.”

“अरे, समरेन्द्र, मैं अपने बाबा के बारे में पूछ रहा हूँ.”

“वे, वैसे तो ठीक हैं, परंतु वृद्धावस्था है. सब कुछ करते हैं, लिखना पढ़ना. कल सुबह वे गिर गए, और उन्हें उठाकर लिटाना पडा. वैसे वे ठीक हैं परन्तु अब परलोक की राह देख रहे हैं. सदा तुम्हारा नाम लेते रहते हैं. एक बार उनसे मिल लो, इसीलिये तुम्हें लेने आया हूँ.”

फिर एक बार सारी सूचनाएं देकर वे कलकत्ता के जोड़ोसान्को स्थित अपनी ठाकुरबाड़ी आये. देवेन्द्रनाथ मानो उनकी प्रतीक्षा ही कर रहे थे. ‘आ गए, रोबी...तुमसे मिलना चाहता था...’

रवीन्द्रनाथ उनके पलंग पर बैठे. देवेन्द्रनाथ का झुर्रियों भरा हाथ रवीन्द्रनाथ के गाल पर स्थिर हुआ और रवीन्द्रनाथ की आंखें भर आईं.

रोबी, हम जानते हैं तुम्हारा दुख. इस जीवन में व्यवहार तो बहुत होते हैं, परन्तु जीवन में अपने हिस्से का सुख बेचनेवाला और दुख  खरीदने वाला कभी नहीं मिलता. सुख देना संभव है, परन्तु दुख  को कभी नहीं बांट सकते.”

“बाबा, जो कुछ भी हुआ, घटित हुआ, उसमें ईश्वर ने हमें एक उत्तम पाठ दिया है, कि ‘मैं हूँ, और मैं तेरे जीवन में कभी भी हस्तक्षेप कर सकता हूँ.” हमने भी नियति से कहा, “यदि तुम आकाश जितना दुख  दोगी, तो भी हमारी जीवित रहने की आशा बनी रहने दो, और जब तक जीवन है, जीवन को अर्थ दो, आशय और सुविचार दो.”

“सत्य है, रोबी, सत्य है. किसी के बारे में सोचो, तो उसे क्या चाहिए? थोडासा प्रेम, थोड़ी चिंता, थोडा अपनापन, थोड़ी पूछताछ. जीवन में और क्या चाहिए?

“बाबा, थोडासा प्राप्त करने के लिए प्रयत्न और हाथ से छूट न जाए, यह भय...यही जीवन है. दुख कम हो जाता है, कभी शब्दों से, कभी अश्रुओं से.”

“ऐसे नहीं बह जाता दुख ...वह होता है मन के सप्त पाताल के भीतर. कभी ऊपर आता है. स्वागत करना चाहिए उस दुख का, रो लेना चाहिए एकांत में. उस दुख को भी अच्छा लगता है.”

रवीन्द्रनाथ ने कुछ नहीं कहा. अभी अभी गुज़र गई मृणालिनी, मीरा अभी सप्त पाताल में छुपे ही नहीं थे. उनके साथ जीते हुए ही शांति निकेतन चल रहा था. फिर आरंभ हुईं शांति निकेतन के बारे में सारी कल्पनाएँ, सारी योजनाएं.

“बाबा, जब हम बारह वर्ष के थे, तब हमें आपके इस साधनाश्रम में रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था. एकांत में दूर, आपका यह साधना आश्रम मन के किसी कोने में था ही, और आश्रम की वही कल्पना आज साकार हुई है. कभी कालिदास के ‘शाकुंतल’ नाटक का तपोवन हमारे मन में फिर से आया और आज आपका साधना एवं ध्यान केंद्र शांति निकेतन से रूप में खड़ा है. शिशु विभाग, युवक विभाग है. मुक्त शिक्षा है. ब्रह्मचर्य आश्रम के सारे नियम यहाँ हैं.”

“रोबी, पुत्र पिता के कार्य का आदर करते हुए उसका सम्मान करे, यह सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ. हम धन्य हो गए. ”

“बाबा, हमारी कल्पना यह है, कि यहां कला के सभी प्रकार हों. मातृभाषा में शिक्षा दी जाए. और अंग्रेज़ी यदि एक विषय हो, तो भी वह ऐच्छिक हो.”

आगे चलकर यहाँ विद्यालय, विश्वविद्यालय, कलानिकेतन हो.”

“किसी बात का मन में ध्यास हो, और कठिनाइयों पर मात करने की हिम्मत हो, तो कुछ भी कठिन नहीं होता. जय-पराजय तो होती ही है. परन्तु पराजय से भी विजय की ओर जाने की प्रवृत्ति हो तो कुछ भी कठिन नहीं होता.”

आठ दिनों तक दोनों निरंतर बोलते रहे. विषय था शांति निकेतन.

“बाबा, शांति निकेतन के चारों ओर अनेक सप्तपर्णी वृक्ष हैं. उन पर बहार आने से पूरा परिसर सुगन्धित हो जाता है. आजकल हम क्या करते हैं – किसी की प्रशंसा करना हो तो उसे सप्तपर्णी का एक पत्ता देकर कहते हैं, ‘देखो, ये अकेला ही फलता-फूलता है. चारों तरफ़ सुगंध बिखेरता है. उसे कोई पानी नहीं देता. उसकी कोई तारीफ़ नहीं करता. फिर भी नित्य नियम से यह खिलता है. वातावरण को सुगन्धित करता है. इसके सात पत्ते हैं – संयम, सहानुभूति, सौन्दर्य, सहनशीलता, सुसंस्कृतता, सुगंध और स्वयंभूत्व.”

“रोबी, आज हम धन्य हुए.”

“और बाबा, उस घने सप्तपर्णी वृक्ष का एक पत्ता देते हुए हमें आपका स्मरण होता है. हमने सप्तपर्णी के और भी वृक्ष लगाए हैं. आपकी याद निरंतर बनी रहे, यही उसके पीछे की इच्छा है.”

देवेन्द्रनाथ की आंखें भर आईं. उनके वृद्ध नेत्रों से झुर्रियों वाले गालों पर अचानक अश्रु बह निकले. रवीन्द्रनाथ ने हौले से उनकी आंखें पोंछीं.

“बाबा, अब शांति निकेतन चलना है.”

“रोबी, हमें शांति निकेतन के दर्शन हो गए. अब कोई और दर्शन नहीं करना है. तुम अवश्य यशस्वी होने वाले हो.”

और उसी रात, किसी से भी कुछ कहे बिना वे इस संसार से बिदा हो गए. दीपक का तेल समाप्त हो जाए और ज्योत बुझ जाए, इतनी सहजता से वे दुनिया से बिदा हो गए थे.

रवीन्द्रनाथ निःशब्द हो गए थे. उनके अश्रु भी जम गए थे.

 

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