Tuesday, 9 September 2025

एकला चलो रे - 25

  

25

 

शाम अब धीरे धीरे पद्मा नदी के जल में उतर रही थी. आज काफ़ी महीनों के बाद वे यहाँ आये थे, वह भी इसलिए कि रथींद्र को पद्मा नदी के बारे में बहुत कुतूहल था.

“बाबा, बहुत सुन्दर है पद्मा नदी, और उसकी धीमी धीमी लहरें भी, आकाश देखो ना, कितना रंगबिरंगी हो गया है. सचमुच, कैसे आते होंगे ये रंग? और नदी के उस पार दिखाई दे रहा जंगल...सचमुच, सब कुछ बहुत सुन्दर है!”
रवीन्द्रनाथ हंसे. अभी तक बालकों जैसा मन निष्पाप मन है हमारा. ऐसे ही अनेकों प्रश्न हमारे मन में हैं. उनके बारे में खूब उत्सुकता है मन में.

विषय चाहे जो हो, हमेशा बालक की उत्सुकता और उत्तर मिलने तक बेचैनी. कहीं यह बेचैनी ही तो किसी लेख, कविता, उपन्यास, या नाटक के रूप में प्रकट नहीं होती? उनका ही प्रश्न और उन्हींका उत्तर... ‘अस्वस्थता जब बहुत बढ़ जाती है, तो शब्दों के माध्यम से प्रकट होती है. मगर हम हर बात का इतना भावनात्मक विचार क्यों करते हैं? शायद हमारे मन में हर बात अत्यंत उत्सुकता से आती होगी.

“बाबा, आपने शमीन्द्र को उसके मित्र के साथ उसके घर मुंगेर क्यों भेजा?” अचानक पूछे गए इस प्रश्न से वे विचलित हो गए. मित्र की माँ उसे लेने आई थी, तब उसने पूछा था, “ तुम ही शमीन्द्र हो ना? तुम दोनों की खूब पक्की दोस्ती है ना? और उसने रवीन्द्रनाथ से पूछा था. वास्तव में तो दस-ग्यारह वर्ष के शमीन्द्र को भेजना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था, मगर उस सीधी-सादी माँ की इच्छा को ठुकराने का मन नहीं हो रहा था.

“कितने दिनों में वापस आयेगा शमीन्द्र?

“जाने आने में जितना समय लगेगा, और सिर्फ दो ही दिन वहां...”

उन्होंने शमीन्द्र को भेज तो दिया, मगर न जाने क्यों, अनजान गांव में, अनजान परिवार में शमीन्द्र को भेजने का पछतावा मन में था ही. उन्होंने रथींद्र का प्रश्न सुना और उन्हें ऐसा लगा जैसे मन में कोई चीज़ चुभ गई है. वे अपना ही सांत्वन करते हुए बोले, “रथी, शमीन्द्र कल-परसों तक आ ही जाएगा. नहीं तो अपने कालीचरण को उसे लाने के लिए भेजता हूँ.”

वह रेत का किला बनाने में मगन हो गया. मगर रवीन्द्रनाथ के मन में बहुत बेचैनी होने लगी. मृणालिनी गई, मीरा गई, बाबा भी चले गए. अब हमने शमीन्द्र का ध्यान रखने के बदले उसे मित्र के साथ क्यों भेज दिया, यही वह समझ नहीं पा रहे थे.

शाम गहरी हो गई. रथींद्र का किला बालू में बन गया, और वे दोनों घोडागाडी तक आये. अचानक रथींद्र ने पूछा,

“बाबा, अहिंसा का मतलब क्या होता है?

“किसी को दुःख न पहुंचाना, किसी का दिल न दुखाना, ह्त्या न करना, शब्द से भी किसी को दुःख न देना, मतलब अहिंसा.”

“सचमुच ऐसी अहिंसा कैसी हो सकती है?

“मगर तुझे अभी ही क्यों याद आई अहिंसा की?

“यूं ही, यूं ही. मतलब, अजित कुमार बाबूमोशाय के बारे में कह रहे थे, कि जिसने किसी का बुरा नहीं किया, शब्द से भी अहिंसा का पालन किया, उसका निधन हो जाए, इसे क्या कहेंगे?’ इसलिए मैंने पूछा.”

“सही है, रोबी. जिसके मन में औरों के प्रति करुणा है, दया है, ऐसे लोगों का यदि लौकिक रूप से मृत्यु भी हो जाए, तो भी वे हमेशा अमर रहते हैं.”

रथींद्र को बहुत कुछ समझ में नहीं आया था. रवीन्द्रनाथ भी इस बात को समझ गए और बोले,

“हम एक दिन सब कुछ समझाएंगे. गौतमबुद्ध का अहिंसा का तत्वज्ञान घोड़ागाड़ी में जाते हुए बताने की अपेक्षा एक दिन तुम्हें सामने बिठाकर समझाऊंगा, और तुम्हें भी वह समझ में आ जाएगा.”

रवीन्द्रनाथ वापस आ गए थे. रथीन्द्र उनका बेटा था, परन्तु उसे भी ब्रह्मचर्याश्रम के सारे नियमों का पालन करना पड़ता था. वह अपने आश्रम कक्ष में गया. रवीन्द्रनाथ अपने कक्ष में आये. उन्हें याद आया, मृणालिनी, मीरा और देवेन्द्रनाथ की मृत्यु के बाद वे अत्यंत व्याकुल हो गए थे और उन्होंने अपना दुःख कविता में प्रकट किया था. औरों को इस दुःख का एहसास न होने दिया था. सहवास समाप्त होने के दुःख का वर्णन करना उनके लिए कठिन हो गया था. 

आज उनका मन फिर अस्वस्थ हो गया था. वे पलंग पर लेट गए. रात बीत रही थी.

मध्यरात्रि का चन्द्रमा शान्त था. उसके साथ थी रोहिणी. अनगिनत तारों के बीच वह प्रमुख रूप से दिखाई दे रही थी. यह दृश्य देखते हुए रवीन्द्रनाथ कुर्सी पर बैठे थे. उन्हें याद आई मृणालिनी की. जीवन में अचल स्थान निर्माण करके वह चली गई थी. आज उसके लिए मन अधीर हो गया. मन ने देह को संभाल लिया.

ऐसा कितनी बार स्वयं को संवारना है, यह प्रश्न उनके मन में था. जीवन में माँ के गुज़र जाने के बाद कादम्बरी भाभी ने उन्हें संभाला था. बहुत प्रेम किया. उस प्रेम का अर्थ एना के सहवास में आने के बाद समझ में आया. मगर अनुमान नहीं हो पाया था. उस वांछित सहवास को उन्होंने नकार दिया था. एना पागल हो गई थी उनके लिए.

और मृणालिनी जीवन में आई, और सारा चित्र मन ने ही स्वीकार किया. मधुर भाषिणी, सुस्वरूपा मृणालिनी में उलझते गए, उन पर अपार प्रेम करने वाली कादम्बरी को भी वे भूल गए. मृणालिनी और उनके विवाह को मुश्किल से एक वर्ष बीता था, कि उसने आत्महत्या कर ली थी. मृणालिनी के जीवन में ही उन्होंने उसके जाने को ‘भग्न हृदय’ में प्रकट किया ही था. अपनी ही कविता उंहें याद आ गई थी. वास्तव में तो वह कविता कादम्बरी, एना अथवा मृणालिनी के लिए नहीं थी, पर मन में उमड़ रही भावनाओं को व्यक्त करते हुए उन्होंने लिख दिया था:

 

जेथा आमी जाई नाको, तुमि प्रकाशित थाको

आकुल नयन जोले, ढालो गो किरण धारा.

 

‘जहां जहां भी मैं जाऊं, वहां प्रकाश के समान तुम्हारा अस्तित्व रहने दो. तुम्हारा सुहास्य वदन सदा मेरे सम्मुख रहने दो. तुम न होगी तो मेरी जीवन नैया भटक जायेगी.’

आज तीनों ही नहीं थीं मगर सर्वस्व अर्पण करने वाली उनकी प्रिय सखी, अनुरागिनी, प्रियतमा और पत्नी थी.

उन्हें अपने आप पर ही हंसी आई. अब हम चालीस-बयालीस वर्ष के हैं. ऐसी कवितायेँ करने पर कोइ कुछ नहीं कहेगा, परन्तु सोलह वर्ष की आयु में हम राधा-कृष्ण से प्रेम कर बैठे थे.

 

गहन कुसुम कुंज माझे मृदुल मधुर बंसी बाजे

बिसरि त्रास लोकलाज सजनी आओ आओ हो ॥

 

और प्रेम क्या आयु पर निर्भर करता है? यदि हम अपने ही बारे में सोचें तो हमारा प्रत्येक वस्तु पर नितांत प्रेम है. प्रकृति की हर बात के बारे में हमारे मन में निष्पाप उत्सुकता है. हमारे प्रश्नों के उत्तर भी हम प्रकृति में ही ढूँढते हैं. मृणालिनी के जाने पर मन में जो तूफ़ान उठा, वह हमें एक सीख दे गया. मीरा की मृत्यु पर ऐसा लगा जैसे किसी खिलती हुई कली को ही नियति ने कैंची से काट दिया हो, और देवेन्द्रनाथ के जाने के बाद ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे एक वटवृक्ष जीर्ण होने के कारण धराशायी हो गया. जीवन की हर घटना का समन्वय हम केवल प्रकृति में ढूँढते हैं. प्रकृति की इन भावनाओं से एकरूप होते हुए ऐसा लगता है, कि इस निराकार ईश्वर ने मुझे बहुत कुछ दिया है. जो ले गया है, वह तेरा था, अब हमारे लिए काफ़ी कुछ है, उसे रहने दे. हम सचमुच बहुत ज़्यादा प्रेम करते हैं.      

 

आमि बहु वासनाय प्राणपने , चाई वंचित करे वाचाले मोरे

एक कृपा संचित मोर जीवन भरे ।।

हे प्रभु, हमारी इच्छाएं तीव्र और अनंत हैं, उन्हें तुम पूरा न करना. हमें इनकार कर दे. हमें मोह में न डाल.

 

दिने दिने तुमी नितिछो, आमाय शे महादानेरई योग्य करे।

अति इच्छार संकट होबे, बाचायो मोरे।

आमि करवन वा भुली, वा चली, तोमार पथेर।

लक्ष्य धरे तुमि निष्ठुर, सम्मुख होते जाओ रे सरे।।

तुम्हारे मार्ग पर मै कभी ध्यान देकर चलता हूँ, तो कभी भटक भी जाता हूँ

“ए जे तव दया, जानी जानी हाय,

निते चाओ बोले फिराये आमाय।

पूर्ण करिया लबे, एव जीवन तव मिलानेइरी योग्य करे।

आधा इच्छार संकटे होते बाचाय मोरे।।

कई बार हम तुम्हारे मार्ग पर चल चुके होते हैं, परन्तु तुम हमें वापस भेज देते हो, इसीलिये ना, कि हम अधिक पवित्र कार्य करें?

असल में तो अब जीवन का सन्दर्भ और अर्थ कैसे ढूंढें यह प्रश्न हमारे सामने है, हे ईश्वर! आखिर करना क्या चाहिए? विश्व के नाद निनाद से हम खुद को कैसे मुक्त करें, समझ में नहीं आता. मुक्त होने के स्थान पर अधिकाधिक उलझते तो नहीं जायेंगे, यह भय है.

शायद हमारे परम स्नेही जगदीश बाबू ने यह सब समझ लिया होगा. उनका पत्र आया था, ‘हम बोध गया जा रहे हैं. हमारे साथ भगिनी निवेदिता, सर यदुनाथ सरकार, स्वामी सदानंद और अमूल्य महाराज हैं. आप भी चलें. ऐसी हमारी इच्छा है. जीवन व्यवहार से परे जाकर बौद्ध तत्वज्ञान आप भी जानें, ऐसी इच्छा है.’

और रवीन्द्रनाथ ने स्वीकृति दर्शाई. वे जीवन के ऐसे मोड़ पर खड़े थे कि एक तरफ़ दुःख की परंपरा, तो दूसरी ओर कर्तव्य कठोरता थी, उन्हें जोड़ने वाला एक सेतु था. मन से नित्य झरझर बहने वाली कविता. उससे मन को जो समाधान मिलता था, वही जीवन की आशा थी. कभी कभी वे सोचते, ‘मृणालिनी, रेणुका, देवेन्द्रनाथ, अजित कुमार चक्रवर्ती –  एक के बाद एक होने वाली इनकी मृत्यु को दिखाकर ईश्वर हमारे मन की परीक्षा तो नहीं ले रहा है? इस परीक्षा में उत्तीर्ण होना या अनुत्तीर्ण होना, यह केवल उन्हीं का प्रश्न था. मन को वे हमेशा यही समझाया करते.

स्वामी विवेकानंद अर्थात् नरेंद्र ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक, स्वदेशी लोगों द्वारा किया गया मान-अपमान सहन करते हुए पाश्चात्य देशों में वैदिक तत्वज्ञान का प्रचार करके भारतीयों की आध्यात्मिक उन्नति को ऊपर उठाया. उनके ही विचारों से प्रेरित होकर मार्गारेट नोबल ने हिन्दू धर्म स्वीकार किया और भारत आकर भारत के सामाजिक उत्थान के लिए प्रयत्न किये. वह जब भारत आई थी, तो कलकत्ता में हैजा फैला हुआ था. ऐसे समय में भी अपने प्राणों की परवाह न करते हुए उसने समाज के साथ सहकार्य किया. इतना ही नहीं, उसने भारत वासियों के लिए विदेशों से आर्थिक सहायता भी प्राप्त की. ‘निवेदिता बालिका विद्यालय’ की स्थापना करके महिला शिक्षा का आरंभ किया. इतना ही नहीं, बल्कि श्री रामकृष्ण की पत्नी की याद में ‘शारदा मठ की स्थापना की.

भारत के आध्यात्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक क्षेत्रों में कार्य करने वाली भगिनी निवेदिता का निकट परिचय प्राप्त होने का अवसर इस निमित्त से मिलने वाला था.

रवीन्द्रनाथ जब लन्दन गए थे, तब भी डॉ. जगदीश चन्द्र बोस का स्नेह पत्रों द्वारा उन्हें मिलता रहता. उन्होंने यह सिद्ध किया था कि ‘वनस्पति भी सजीव हैं, इतना ही नहीं, बल्कि उनमें भी हमारे जैसी ही भावनाएं होती हैं.’ एक संशोधक के सहवास में कुछ दिन बिताते हुए वे वैदिक तत्वज्ञान को मज़बूत करने वाले थे. इसके अतिरिक्त इतिहासकार, संगीतकार सर यदुनाथ सरकार का भी निकट परिचय प्राप्त होने वाला था. स्वामी सदानंद विवेकानंद के शिष्य थे. जब स्वामी विवेकानंद भारत भ्रमण के लिए निकले थे, तो हाथरस स्टेशन के स्टेशन  मास्टर शरद गुप्त उनके कार्य से प्रभावित होकर विवेकानंद के शिष्य होकर रामकृष्ण मठ में कार्यरत हो गए थे. रवीन्द्रनाथ के मन में अमूल्य महाराज के प्रति आकर्षण था. वे ज्ञान और विज्ञान पर प्रवचन दिया करते थे.

कुल मिलाकर यह यात्रा सुखकर होने वाली थी. ज्ञान में अमूल्य योगदान देने वाली थी. हर मोड़ पर एक नया प्रवास उन्हें आनंद देता था.

गौतम बुद्ध का जन्म ईसा पूर्व 563 में. वे शाक्य वंश के सम्राट शुद्धोधन और मायादेवी के पुत्र. क्षत्रिय वंश के. समस्त वैदिक ज्ञान प्राप्त करने वाले. अचानक हुए मृत्यु के दर्शन से वे विचलित हो गए, राजप्रासाद से बाहर निकल गए और समूचे विश्व को शान्ति का सन्देश देने के उद्देश्य से चिंतन करते रहे.                              

बोध गया पहुँचने पर जगदीश चन्द्र बोस ने कहा,

“ बौद्ध धर्म लोकमानस को पसंद आया, समझ में आया, और उसने उसे माना भी, क्या इसका कारण अहिंसा हो सकता है?

“वैदिक धर्म में भी अहिंसा को परम धर्म माना गया है; परन्तु आगे चलकर धर्म किन्हीं विशेष व्यक्तियों के हाथों में चला गया. खुद ब्राह्मणों ने ब्राह्मणों पर अत्याचार किये. उस धर्म का स्वरूप संकुचित हो गया. सर्वसाधारण समाज और कर्मठ ब्राह्मणों के बीच एक गहरी खाई का निर्माण हो गया. ऋषभ देव के समय से प्रचलित जैन धर्म आगे चलकर चौबीसवें तीर्थंकर महावीर तक पहुंचा। तब उन्होंने समाज के लिए उपयोगी जैन विचारधारा का आरंभ किया. उसमें भी वे ही सिद्धांत थे और ऐसी मांग थी कि उनका कठोरता से पालन हो. परन्तु उनके बाद गौतम बुद्ध ने धर्म की कठोरता को नकार दिया, और सबके लिए सहज, सुखद, ऐसा नया धर्म – बौद्ध धर्म आरंभ किया.

‘अर्थात् वैदिक धर्म से ही दो विचार धाराएं प्रवाहित हुईं, परन्तु समाज ने उन्हें स्वीकार किया. समाज स्वीकार करता है, धारण करता है, मानता है, अनुसरण करता है, अगली पीढ़ी के लिए संचित करता है, वह धर्म है – ऐसा मुझे प्रतीत होता है. इसीलिये शायद जैन और बौद्ध धर्म अस्तित्व में आये होंगे.’

रवीन्द्रनाथ ने कहा, तो भगिनी निवेदिता ने कहा,

“कोई भी धर्म दो बातों से मान्य होता है -  वह समाज को सहन करता है, उसका वहन करता है, और समाज को मन से प्रिय होता है. वैदिक तत्वज्ञान को समझना कठिन है. स्वामी विवेकानंद ने वैदिक धर्म पर और भगवद्गीता पर सैकड़ों भाषण दिए हैं. तब वह लोगों को समझ में आया, परन्तु उसे आचरण में लाना कठिन था. स्वधर्म से परधर्म का आचरण करने के लिए पहले उसे समझना पड़ता है.’ निवेदिता अपने अनुभव से कह रही थीं. विषय को गंभीर रूप धारण करते देख रवीन्द्रनाथ ने कहा,

“भगिनी निवेदिता, धर्म ऐसा विषय है जो हरेक के मन में गहरे पैठा हुआ होता है. आप कैसे आईं हिन्दू धर्म में?

“मैंने अपना बाइबल पढ़ा था. मैं समाज कार्य करने वाली शिक्षिका भी थी. स्वामी विवेकानंद अमेरिका से लन्दन आये. उनका उद्देश्य स्पष्ट रूप से समझ में न आने के कारण कलकत्ता के उनके लोगों ने भी उन पर टीका की. उनका उद्देश्य था – भारत गुलामी के कारण निस्तेज हो गया है. अपने अस्तित्व को भूल गया है. आज मिशनरी लोग अपने धर्म का प्रचार करके लाखों हिन्दुओं को आर्थिक बल के आधार पर ईसाई धर्म की दीक्षा दे रहे हैं. भारतीय लोग अपने स्वत्व को, अस्तित्व को, तेज को क्यों भूल जाएँ, जिस धर्म की अलिखित संहिता में केवल मानवता है. आक्रमण नहीं, हिंसा नहीं, अत्याचार नहीं. सुखैनेव जीने का सन्देश है. विशेषत: अंग्रेजों को वे यह बात बताना चाहती थीं.

“मैंने बायबल पढ़ी, भगवद्गीता पढ़ी. दोनों धर्मों का अध्ययन करते हुए ब्रिटिशों की साम्राज्य लालसा और अधिकारशाही समझ में आई और नज़रों के सामने आया असहाय भारत. मेरा मन दुखी हो गया. येशू ने जिस करुणा के बारे में कहा है, उसको मैंने अनुभव किया, और मुझे हिन्दू धर्म की महानता समझ में आई. इसलिए मैंने हिन्दू धर्म स्वीकार किया.” एक लंबे स्वगत के समान एक सांस में उन्होंने कहा.

“वैदिक धर्म कर्मकांड में उलझ गया. कठोर नियमों की चौखट में बंद हो गया, तब महावीर जैन ने समाज के सामने एक आचार-विचार प्रणाली प्रस्तुत की. परन्तु उसमें भी कठोर तत्व थे, जिनका पालन करना लोगों के लिए कठिन था. ऐसे समय में सिद्धार्थ गौतम बुद्ध ने जो विचार प्रस्तुत किये वह आचार का सहज धर्म हो गया, ऐसा मुझे प्रतीत होता है,” जगदीशचंद्र बोस ने कहा.

“सचमुच, यह स्थान का महत्त्व हो सकता है. यहाँ आकर इस बोधिवृक्ष के परिसर में हमें सर्वधर्मों का आकलन हो, इसे संयोग ही कहना होगा. परन्तु जिस वैदिक धर्म में शाश्वत मूल्य हैं, वे कालजयी हैं. ऐसा मेरा मत है.” यदुनाथ सरकार ने कहा.

“मुझे तो ऐसा प्रतीत होता है, कि बौद्ध धर्म का जनमानस पर गहरा प्रभाव हुआ है. क्योंकि सनातन धर्म की कठोरता, प्रतिबन्ध – ये जितने कारण हैं, उसके अतिरिक्त यह भी कारण है कि समाज में उसका प्रसार करने में हमारे धर्म मार्तंड पीछे रह गए. कलिंग युद्ध में हुई भयानक मनुष्यहानि के बाद सम्राट अशोक के मन में उत्पन्न हुई उदासी, उसका अहिंसा और बौद्ध धर्म की शरण लेना, और बौद्ध धर्म को प्राप्त हुआ राजाश्रय  - इनके कारण बौद्ध धर्म का प्रसार देश विदेश में हुआ. हिन्दू धर्म केवल नाम मात्र के लिए शेष रहा. इसलिए शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म की महानता समाज को समझाई. आधुनिक समय में – स्वामी विवेकानंद ने.” स्वामी सदानंद ने कहा.

“ असल में तो मुझे रवीन्द्रनाथ ने तपोवन की जो कल्पना साकार की है, वह अच्छी लगी. इससे विद्यार्थी प्रकृति के निकट जा सकेंगे. उस प्रार्थना से उस निराकार की स्तुति होगी. ये जो कुछ भी शांति निकेतन में हो रहा है, वह सचमुच आदर्श है. स्वामी विवेकानंद पर अपने ही लोगों ने टीका की, वैसी ही रवीन्द्रनाथ पर भी हो रही है. अब जाकर उसका ज़ोर कुछ कम हुआ है. मगर उनके कार्य के महत्त्व को कल देश अवश्य ही गायेगा. ये मेरी भविष्यवाणी है. वह असत्य हो ही नहीं सकता. मैं भविष्यवादी नहीं हूँ, मगर जिस शाश्वत स्तंभ पर शांति निकेतन की अध्यात्म वास्तु बनी है, वह कालातीत है,” अमूल्य महाराज ने कहा.

बोध गया के परिसर में सब लोग आराम से बैठे थे, और प्रत्येक व्यक्ति सब कुछ सुनने के लिए तथा कुछ कहने के लिए आतुर था.

“परन्तु सिद्धार्थ को अचानक वैराग्य क्यों हो गया? हमारे मन में हमेशा यही प्रश्न उठता है. उसने तो एक ही मृत्यु देखी, हमने तो एक के बाद तीन मृत्यु देखे हैं. हमें वैराग्य नहीं हुआ, बल्कि ऐसा लग रहा है कि कार्य क्षमता और भी अधिक बढ़ गयी है,” रवीन्द्रनाथ ने कहा.

“उसका क्या है, रवीन्द्रनाथ, कि आपने विचार किया कार्य का, कार्यसिद्धि का, अपने ध्येय का, मन: शान्ति का. आपके मन में जितना प्रेम अपने सहवास वाले व्यक्तियों पर है, उससे कहीं अधिक प्रकृति पर, शब्दों पर, अपने कार्य पर है. इसी कारण मृत्यु का जो दुःख अन्तरंग से झरता है, वह उदात्त होकर, विचार लेकर कविताओं से, कथाओं से झरझर बहता है. मृत्यु की ओर देखने की आपकी जीवनदृष्टि औरों की तुलना में अधिक विशाल है. दुःख तो है, परन्तु उसकी आंच औरों तक कभी पहुँची ही नहीं. दुःखभार आपने ईश्वर पर भी नहीं डाला.”

जगदीशचन्द्र ने कहा, तो उनका मन भर आया. ‘असल में, जिसे अपने अंतरंग की बात बताएं, जिसके पास जाकर खूब रो लें, जिससे सांत्वना प्राप्त करें, जिसके बालों में स्नेह से हाथ फेरें, वह मृणालिनी ही नहीं थी तो वह किसके सामने रोते...आज जगदीश बाबू के कहने पर उन्हें प्रतीत हुआ कि उनका दुःख समझने वाला एक सच्चा मित्र उनके पास है.

धर्म विषयक चर्चा अब परिवार और समाज पर आकर समाप्त हो गई थी. पंद्रह दिन बार रवीन्द्रनाथ नया उत्साह लेकर ठाकुरबाड़ी लौटे थे. 

बोलपुर से शांति निकेतन को जाते हुए हरे हरे वृक्षों ने, लताओं ने, बेलों ने उनका स्वागत किया था, और शांति निकेतन देखते हुए उन्हें रथींद्र, शमीन्द्र और बेला की याद आ गई. वे जल्दी जल्दी शांति निकेतन के महाद्वार के पास आये और उन्होंने खिले हुए सप्तवर्णी पुष्पों द्वारा चित्रित सुन्दर रंगोली को देखा. वे मन ही मन हंसे. मन में थोड़ी सी निराशा आ जाए तो सुगंध लेकर समीर आ पहुंचता है. पत्ते लहराते हुए फूल बिखरते हैं. चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई देती है. चैतन्य का एक झोंका ही उनकी तरफ़ आता है, और मन का नैराश्य दूर भाग जाता है. मन में फिर से चैतन्य का संचार होने लगता है.

विचार करते-करते वे न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच गए थे. कविता में मगन हो गए, मृणालिनी, एना, कादम्बरी भाभी, इतना ही नहीं, सबके साथ वे बोध गया भी जाकर आ गए. मन न जाने कितने वेग से, और न जाने कहां भागता रहता है, पता नहीं. पल भर में आकाश में, पल भर में पाताल में, तो प्राचीन काल की दसों दिशाओं में भटक कर आ जाता है. वर्तमान काल के सारे सन्दर्भ भूतकाल के हो जाते हैं, और वे ही सन्दर्भ फिर से वर्तमान काल में आ जाते हैं. भविष्य की भी टोह लेते हैं.

और अचानक उन्हें याद आया. तीन दिन हो गए, शमीन्द्र अपने मित्र के घर मुंगेर गया था. उसे इतनी दूर भेजकर हमने कोई गलती तो नहीं की? ऐसा प्रश्न उनके मन में उठा, और मन ने ही उत्तर दिया, “रोबी, तुमने गलती की है. यहां शांति निकेतन में रहने वाले एक मित्र की खातिर तुमने शमीन्द्र को आसानी से, कुछ भी सोचे बिना, भेज दिया, क्या यह गलती नहीं है?

अपनी भूल का उन्हें बार बार एहसास हो रहा था. तभी मीरा आई और उसने सहजता से पूछा, “बाबा, शमी कब आयेगा?” जब वे पद्मा नदी पर गए थे, तो यही प्रश्न रथींद्र ने भी पूछा था. वे परेशान हो गए. मैंने इस बारे में क्यों नहीं सोचा? अपने आप को संभालते हुए उन्होंने कहा,
“ऐसा करते हैं
, कल हम खुद ही जायेंगे और उसे ले आयेंगे.”

“तब ठीक है,” उसने कहा और सोने के लिए चली गई. उन्हें याद आया, कि उनकी मां चौदह वर्ष की आयु में उन्हें छोड़ कर चली गई थी. रथींद्र भी उसी आयु का है, और शमीन्द्र, मीरा तो दस-बारह वर्ष के हैं. शमीन्द्र और मीरा एक दूसरे को संभाल ले रहे थे. आज तीन दिनों से वह यहाँ नहीं है, तो मीरा को कैसा लग रहा होगा, इसकी कल्पना करके उन्होंने उसका हाथ पकड़ा और बोले,

“आज हम अच्छी-सी कहानी सुनायें?” उनके हाथों से अपना हाथ छुड़ाते हुए वह बोली, “शमी के आने के बाद सुनाइये ना कहानी! और मुझे भी उसके साथ भेजना था ना!”

“सचमुच, ये ख़याल ही नहीं आया. अगली बार याद रखेंगे, हाँ!”

वह उनके कमरे में एक पलंग पर लेट गई. तब उन्हें प्रतीत हुआ, कि कितने मासूम हैं ये दोनों बच्चे! माँ के बिना उदास हो गए होंगे. मगर वे जैसे सोच-समझ कर ही बर्ताव कर रहे थे. मृणालिनी के बारे में उन्होंने एक भी शब्द नहीं कहा था. सारी यादें ठाकुरबाड़ी में छोड़कर आये थे. रवीन्द्रनाथ की आंखें भर आईं. सुबह मुंगेर जाने का फैसला उन्होंने कर लिया और वे सो गए.

सुबह चार बजे उनकी आंख खुल गई, तब मीरा नींद में ही कह रही थी.

‘शमी, शमी, जाओ नहीं! मेरा हाथ पकड़ो. शमी...शमी...’ उन्होंने उसे जगाया, और समझाया, उसके पास बैठकर थपथपाते रहे.

मगर उस दिन वे जा ही नहीं सके. कलकत्ता से कुछ लोग आये थे. दिन भर शांति निकेतन का अभ्यासक्रम, योजना, आर्थिक पक्ष के बारे में पूछ रहे थे. उन्होंने शाम को हरिप्रसाद मुखर्जी से कहा, “हमें कल मुंगेर जाना है.”

सुबह वे शांति निकेतन के द्वार पर तांगे की प्रतीक्षा कर रहे थे. तभी दो आदमी जल्दी-जल्दी आये, और सिर नीचा किये खड़े रहे.

“क्या कुछ काम था?

“हाँ, बाबूमोशाय..हमें गुरुदेव से मिलना है.”

“हाँ, मैं ही हूँ. कहिये.” वे दो आदमी फिर से सिर नीचा किये खड़े रहे. तब रवीन्द्रनाथ ने कहा,
“अगर
, ऐसे मौन खड़े रहे तो, क्या हमें कुछ समझ में आयेगा?

“बाबूमोशाय, आपका बेटा...”

“उसका क्या?...” उन्होंने अधीरता से पूछा.

“उसे हैजा हुआ और वह देखते ही देखते...”

“उसे हैजा हुआ, और क्या?” रवीन्द्रनाथ पल भर में मन ही मन ढह गए.

“और उसकी मृत्यु हो गई. उसे लेकर आ रहे हैं ...” उन दोनों में से एक ने बात पूरी की. तब तक आश्रम के शिक्षक, विद्यार्थी इकट्ठा हो गए थे.

कुछ ही देर में शमीन्द्र के कलेवर को लेकर कुछ लोग आ गए. मन को दुखी करने वाला दृश्य देखकर रवीन्द्रनाथ मन ही मन रो पड़े. मगर वे निर्विकार खड़े रहे. मीरा, रथी उनके निकट आये, उन्हें अपने पास लेते हुए वे दुःख बर्दाश्त करते रहे.

 

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