Friday, 12 September 2025

एकला चलो रे - 26

 

 

26

अंतर मम विकसित करो, अन्तरतर हे

मंगल करो, उद्यत करो, निःसंशय करो हे

युक्त करो हे सबार संगे, मुक्त करो हे बंध

संचार करो सकल कर्मे, शांत तोमार छंद.

रवीन्द्रनाथ लिख रहे थे निराकार ईश्वर को एक प्रार्थना. दुःख के पर्वत पार करते हुए उनका मन प्रत्यक्ष रूप से अविचल प्रतीत हो रहा था, फिर भी वह विचलित हो गया था. निराकार का चैतन्य मन में आमंत्रित करने के लिए वे प्रार्थना कर रहे थे.

एक के बाद एक होने वाली मृत्यु से वे दहल गए थे. शमीन्द्र के जाने के बाद एक पल उन्हें लगा, कि अब इस जीवन में कोई अर्थ ही नहीं है, परन्तु उनकी नज़रों के सामने मीरा आई और यह अनुभव करते ही कि उसकी ज़िम्मेदारी नहीं टाल सकते, शांति निकेतन के बच्चों का भी ध्यान आया. मृत्यु को स्वीकार करना पराजय है. मृत्यु को जीतना है मृत्युंजय होना. जीवन पर सभी का अधिकार है. इसलिए जब तक जीवन है, तब तक उन्नत, उत्तम कार्य करना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है, यह भावना उनके मन में थी, इसीलिये हे ईश्वर, हमारे सभी कार्यो में तुम्हारा वास हो, यह प्रार्थना उन्होंने की. मन को शांत किया.

प्रस्फुटित होना, खिलना, मुरझाना, गिर जाना – यह तो निसर्गक्रम है. बसंत ऋतु के समाप्त होते-होते चंपा के फूल टपटप गिराने लगते हैं. उनके बिदा लेने का पल निकट आने लगता है.

एबार बिदाय बेलार सूर धरो ओय ओय

चांपा ओ करबी

तोमार शेष फुले आज शाजि भरो

चंपा के फूलों की अंतिम डलिया भरकर लाते हुए औरतें खुश होंगी. परन्तु वह वृक्ष मन ही मन रो रहा होगा. परन्तु प्रकृति का यह नियम ज्ञात होने के कारण वह स्थितप्रज्ञ हो गया होगा.

आरो चायि जे, आरो चायि जे, आरो चायि ...

हमें और चाहिए...जितना चाहो उतना दुःख , क्योंकि

प्राणेर बीनाय आरो आघात करो,

जे चायि गुनीर परश पेये शे जे शिहरे नाई

हे ईश्वर हमारी इस प्राण वीणा पर और आघात-प्रतिघात की आवश्यकता है. होने दो. उसके बिना तो गुणी वादक का स्पर्श होने पर भी तार अभी तक झनझनाए नहीं हैं. तुम गुणी हो. परन्तु हमारे मन के तार झनझनाएं इतने आघात करो.

और ये आघात उन पर हो ही रहे थे. आघात सहन करने के लिए ही वे मन को दृढ़ कर रहे थे. उनको खुद भी अपने आप पर आश्चर्य हो रहा था. अत्यंत दुःख में भी वे लिख सकते थे. कविता संग्रह ‘बाउल’, ‘खेया’, ‘गान प्रकाशित हुए. ‘हास्य कौतुक, ‘शारदोत्सव, ‘मुकुट – ये नाटक लिखकर उनके प्रयोग भी हो चुके थे. उपन्यास ‘गोरा लिखा जा चुका था, उपन्यास ‘प्रजापतीर निर्बंध प्रकाशित हो चुका था.

एक तरफ़ दुःख की चढ़ती सीढ़ियां, तो उसी मन में शब्दों की असंख्य पालकियाँ. उन्हें अपने आप पर ही आश्चर्य हो रहा था. ईश्वर ने हमारा निर्माण करते समय कौनसे रसायन का उपयोग किया होगा - समझ में ही नहीं आ रहा था. मगर इतना उन्हें मालूम था कि होने वाला प्रत्येक अनुभव उन्हें जीवन जीने की प्रेरणा दे रहा था.

दूसरी ओर उनका पूरा ध्यान शांति निकेतन की कार्य प्रणाली पर था. उन्होंने मोहितचन्द्र सेन से कहा था,
“मन में दुखों की बारिश होते हुए भी हम आनंदगान गाते हैं. ईश्वर से विनती करते हैं कि हमें बारबार दुःख और आघात दे. बसंत में खिलते हैं
, शिशिर के आते ही गिरते हुए पत्तों से नई कोंपलों की आशा करते हैं.
मन में आषाढ़-सावन जीते हैं. उस पर फ़टाफ़ट कवितायेँ करते हैं. एक के बाद एक हुई मृत्यु से पल भर के लिए हताश हो जाते हैं. मन में दबाकर रखते हैं वे यादें...ऐसा कैसे होता है.

उम्र में उनसे बड़े मोहितचंद्र बोले,

“गुरुदेव, आपके प्रत्येक मार्ग पर एक पारस स्पर्श हुआ है, दुःख का एक धन हो गया है. आपकी बहु आयामी लेखन प्रतिभा और नृत्य, नाट्य, गायन, आचार, विचार सब कुछ देखकर विश्व के कल्याण के लिए आर्त स्वर में ईश्वर की प्रार्थना करने वाले ऋषि की याद आती है. जीवन की पतझड़ से शब्दों के नए, प्रगल्भ अंकुर फूटते हुए दिखाई देते हैं. तब हम सभी धन्य हो जाते हैं. आपके ये सारे अलौकिक गुण आपको अमरत्व की ओर ले जाने वाले हैं.”

रवीन्द्रनाथ ने कुछ नहीं कहा. वे शान्ति से खड़े थे. तभी हवा लेकर आई वर्षा धारा. हवा ने पेड़ हिलाए. दनादन धरती के आँचल में फूल डाले. रिमझिम बरखा नादमय हो गयी. एक लय में गाने लगी. मौलसिरी के फूलों की गंध फ़ैल गई. मोहितचन्द्र सेन कब चले गए इसका पता भी रवीन्द्रनाथ को नहीं चला. वे मन से गाने लगे:

 

"पाताय पाताय घाशे घाशे नवीन प्राणेर पत्र आशे

पलाश जबाय, कनक चाँपाय अशोके अश्वत्थे

बकुलगन्धे बन्या एलो दखिन हावाय स्त्रोते."

दक्षिण दिशा से सन्देश लेकर हवा के आते ही मौलसिरी की सुगंध फ़ैल गई. हर पत्ते में, तिनके में नवजीवन का संचार हो गया. पलाश, गुड़हल, अशोक और वटवृक्ष पर भी नवजीवन के पत्ते आये. बारिश की पहली बौछार से मन आनंदित हो गया.

कैसा विचित्र है यह मन! दुखों की सरिताएँ आनन्दसागर से मिलने चली हैं. इस आनंद सागर की जलनौका में बैठकर हम प्रकृति के परिवर्तन का आनंन्द उठा रहे हैं.

ओई आशे ओई

ओती भैरब हरषे

जलसिंचित क्षिति सौरभ रसे

घन गौरवे नाबी यौवना बरषा

श्याम गंभीर शरशा

रवीन्द्रनाथ मन ही मन मुस्कुराए. नवयौवना वर्षा जो उनके सम्मुख रिमझिम कर रही थी! ना शांति निकेतन के विचार, ना अपने दुःख का विचार, ना समाज, राजनीति के बारे में विचार. उनके सम्मुख थी लावण्यवती, नवयौवना वर्षा. उस लावण्यमय रूप को देखकर वे विस्मयचकित रह गए थे.

 

शतेक युगेर कविदले मिली आकाशे

ध्वनिया तुलिछे मत्तमदिर बाताशे

शतेक युगेर गीतिका

शतशतगीत मुखरित बन वीथिका

प्रत्येक युग के शत शत कवियों ने इन रिमझिम गीतों को मत्त धुंध हवाओं से उठाकर रखा है. हर बार हर कवि को यह बरखा रानी टिप टिप गीतों से मन्त्र मुग्ध करती है.

“बाबा, बाबा, मीरा उन्हें ढूँढते हुए उनके पास आई थी. मीरा अपनी माँ के समान सुन्दर, सात्विक और मधुरभाषिणी थी. ग्यारहवां वर्ष अभी समाप्त हुआ था. दो-तीन वर्षों में इसका विवाह करना पडेगा, यह विचार मीरा को देखते ही उनके मन में आया.

“क्या चाहिए, मीरा?

“आज मैंने अपना पाठ पूरा नहीं किया.”

“क्या कारण था?

अचानक मन ऊब गया.”

“मीरा, क्या फूलों की मालाएं बनाते समय तुम्हें ऊब महसूस होती है? नहीं ना! मीरा, ज्ञान भी ऐसी चीज़ है, कि उसके प्राप्त होने का आनंद प्रतिदिन के अध्ययन के बाद मिलता है. एकाध दिन ऊब होती है, तो कोई बात नहीं. रोज़ रोज़ तो ऐसा नहीं होगा?

“नहीं. आज मेरा खूब नृत्य करने का मन हो रहा है. उस दिन आपने मुझे सिखाया था ना, वैसा ही आज करना है.”

वे हंसे. मन में ही उन्होंने कहा, “तुम्हारा ही क्या, हमारा भी खूब नाचने का मन हो रहा है. वह भागते हुए चली गयी. वे दरवाज़े से अन्दर आने ही वाले थे कि मोहितचन्द्र सेन वापस आये.

“गुरुदेव, हमें आश्रम में कक्षों की संख्या और बढ़ानी पड़ेगी. और बंगभंग के आन्दोलन उग्र होते जा रहे हैं. आपने स्वयं भी इस आन्दोलन में भाग लिया था. मगर लॉर्ड कर्ज़न की तानाशाही के कारण इस आन्दोलन का अंत हो जाएगा. अनेक लोगों की मृत्यु होगी, अनेक घर उजड़ जायेंगे, परन्तु बंगाल के दो भाग होकर रहेंगे. ऐसी स्थिति में हमारे सम्मुख आर्थिक संकट भी खड़ा है.”

“आपकी दोनों बातें सही हैं. हम आन्दोलन में सहभागी हुए भी थे, परन्तु यही बात समझ में आई. हम परतंत्र हैं, हमारे हाथों में सत्ता और शस्त्र नहीं हैं. इसलिए वापस आ गए. देश में चारों और तानाशाही चल रही है, परन्तु एक दिन हमारा भी होगा. उन्माद जब बहुत बढ़ जाता है, तो उसे समाप्त होना ही है. अब रहा आर्थिक परेशानी का विषय...उसके बारे में समस्या ही है. देखता हूं, क्या इंतज़ाम हो सकता है.”

“गुरुदेव, मैं यहीं रहने वाला हूँ, कलकत्ते का अपना घर बेचकर...”

“ना...ना...ऐसा न करना. आपकी विवाहित कन्या है, आगे चलकर घर उसे दे देना. हमारे मन में एक विचार है, देखिये आपको कैसा लगता है?”

“बताएं गुरुदेव.”

“अभी हमारे खेतों में उत्पन्न हो रहा अनाज, फल, फिर बड़े विद्यार्थियों द्वारा बनाई गईं विविध कलाकृतियां, इनको हम सियालदह के बाज़ार में बिक्री के लिए रखें तो? उनसे तुरंत तो आमदनी नहीं होगी, परन्तु कुछ दिनों बाद वे लोगों को पसंद आने लगेंगी. उसी तरह संगीत और नृत्य, जो हम यहाँ पढ़ाते हैं, यदि उनके कार्यक्रम विभिन्न स्कूलों में किये जाएँ तो...”

“कल्पना अच्छी है, मैं उसे लिख लेता हूँ, मगर इससे आज का आर्थिक प्रश्न हल नहीं होगा.”        

रवीन्द्रनाथ विचार कर रहे थे. उन्होंने मोहितचन्द्र से कहा,

“हम लोग विचार करेंगे इस पर.”

मोहितचन्द्र सेन के जाने के बाद उन्हें ख़याल आया, एक के बाद एक होने वाली मृत्यु के दर्शन से वे भीतर तक दहल गए थे. छोटे शमीन्द्र की मृत्यु उसे हमने मुंगेर भेजा इसलिए हुई, यह शल्य मन में था. मन को इस याद से निकालने का प्रयत्न करते हुए वे शब्दों में मन लगा रहे थे. उपन्यास ‘गोरा अब पूरा होने वाला था. ये सब होते हुए शांति निकेतन के बच्चे हमारे हैं, उनके माता-पिता ने विश्वासपूर्वक यहाँ भेजा है, यह ज़िम्मेदारी भी थी. उसमें विद्यार्थियों की बढ़ती हुई संख्या, और जगह की कमी, उसके लिए खर्च की व्यवस्था, यह सब उन्हें दिखाई दे रहा था.  

और उन्होंने जगदीशचन्द्र बोस से सहायता लेने का निश्चय किया और वे अवश्य मदद करेंगे इसमें कोई संदेह ही नहीं था. अब यही नीति अपनाना है, मन में ऐसा ठान कर वे अपने कमरे में आये. उनका मन उन्हें फिर से एक अन्य ही दुनिया में ले गया. यह कविता का विश्व, आनंदमय, सब कुछ भुला देने वाला...आज सुबह खेलते हुए बच्चों का आनंद देख कर, उन्हें अच्छे लगें, ऐसा ‘शिशुगीत संग्रह प्रकाशित करने का विचार मन में आया. इससे पूर्व कथासंग्रह ‘प्रायश्चित्त प्रकाशित करना था. उनके मन में हमेशा यह विचार उठता था, की इस कमरे को ‘अक्षर ब्रह्म नाम दिया जाए. यहाँ आकर बाकी सब विस्मरण में चला जाता था.

अब रात हो गयी थी. बारिश की धाराएं बदन पर झेलते हुए रात सुखी थी. वातावरण में रिमझिम-टिपटिप का नाद गूंज रहा था. चन्द्रमा को बादलों ने ढांक दिया था. पता नहीं चल रहा था कि हमेशा का निरभ्र आकाश मस्तक के ऊपर है या नहीं. रवीन्द्रनाथ गुनगुना रहे थे,

बादल बाऊल बाजाय रे एकतारा

सारा बेला धरे झरो झरो झरो धारा

जामेर बने, धानेर खेते।

आपन ताने आपनी मेते

नेचे नेचे होला सारा।।

 

मेघ बाऊल हो गया है और वह एकतारा बजा रहा है. वर्षाधाराएँ झरझर बरस रही हैं. अमरूदों के बाग़ में, धान के खेतों में वह एकतारा बजाते हुए गाता जा रहा है. झरझर वर्षा का गीत. मन कैसे नृत्य कर रहा है.

कविता लिखते हुए उनका ध्यान इस बात पर गया कि ऊपर से नीचेजाना – जैसे प्रकृति का नियम है, उसी प्रकार कला का प्रवाह भी एक नियम है. प्रकृति का यह प्रवाहित्व समाज में भी होना चाहिए. नए विचारों के साथ प्रवाहित होते हुए मूल तत्वों को नहीं भूलना चाहिए. प्रकृति में परंपरा है, मगर पुनरावृत्ति नहीं है. वृक्ष का एक पत्ता दूसरे पत्ते जैसा नहीं होता. परन्तु वृक्ष पर पत्ते हैं. उसी वृक्ष पर परंपरागत ढंग से वे ही पत्ते हैं. अन्य पत्ते भी वैसे ही होंगे. आनंददायी नृत्य करने के लिए भी मुक्तता का आविष्कार करने के लिए ताल-छंद के नियम में स्वयं को बांधना पड़ता है. कविता को शब्द-नाद-लय-गति में बांधना पड़ता है.  

असल में तो दोनों तीरों से सीमाबद्ध सरोवर का पानी उतना सुशोभित नहीं होता. परन्तु प्रवाहित हो रही नदी की शोभा अलौकिक होती है, प्रवाहित्व के कारण. समाज में भी परंपराओं को बनाए रखते हुए प्रवाहित्व आवश्यक है.

विचार करते करते वे उठे. अपने सामने के पलंग पर सो रही मीरा के बदन पर शाल डाली और वे अपने पलंग पर तकिये से टिककर बैठ गए. उन्हें याद आया. बंगभंग आन्दोलन में अपना सहभाग. बंकिमचंद्र ने ‘आनंदमठ से स्वतंत्रता की चेतना जगाई थी. उन्होंने पत्र लिखकर बंकिमचंद्र के उपन्यास के महत्त्व को मनःपूर्वक अधोरेखित किया था.

सुरेन्द्रनाथ बैनर्जी, विपिनचंद्र पाल के साथ वे भी बंगभंग आन्दोलन में सहभागी हुए थे. किसी भी परिस्थिति में यह विभाजन होना भारत की एकता के लिए हानिकारक था. उनका संवेदनशील मन अखंडत्व के लिए संघर्ष कर रहा था. ब्रिटिश माल का बहिष्कार करना – यह भी उसका ही एक भाग था और हिन्दू-मुस्लिम एकता तथा भारत की अखण्डता – दूसरा भाग था. इसलिए रवीन्द्रनाथ इस आन्दोलन में सहभागी हुए थे. इसके कारण उनके लेखन में उत्स्फूर्त गीत प्रकट हुए थे. उनमें बंगाली लोगों की एकता प्रधान विषय था.

रवीन्द्रनाथ ने आन्दोलन को एक अलग ही मोड़ दिया. सहभागी हुए सभी लोगों को गंगा नदी पर स्नान करने को कहा. उनमें सत्येन्द्रनाथ का पुत्र सुरेन्द्रनाथ और अवनीन्द्रनाथ भी था. आन्दोलनकारियों का जुलूस अब प्राचीन वास्तु, मंदिर के दर्शन करते हुए मुख्य मार्ग से जाने लगा. तब अवनीन्द्रनाथ भागते हुए रवीन्द्रनाथ के पास आये और बोले,

“चाचा, हम प्राचीन मंदिर में तो जाकर आ गए, परन्तु कुछ ही दूर एक मस्जिद है, वहां हम न जा सकेंगे, इसलिए हमें जुलूस का मार्ग बदलना चाहिए.”

“ऐसा किसलिए, अवनी? हम हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए प्रयत्न कर रहे हैं ना? तो फिर मस्जिद में जाने में क्या हर्ज है?

“चाचा, हमारा धर्म सर्व समावेशक और सबका स्वागत करने वाला है. परन्तु मुस्लिम धर्म कर्मकठोर और स्वाभिमानी है. इसके अलावा एकता वगैरह को मानेगा, ऐसा लगता नहीं है. उस मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश की तो आंदोलन यहीं विरुद्ध रूप धारण कर लेगा, इसलिए...”

रवीन्द्रनाथ ने उसके कंधे पर आश्वासक हाथ रखा. परन्तु अवनीन्द्रनाथ को उस आन्दोलन में रहना खतरनाक प्रतीत होने लगा, और वह जुलूस से दूर होकर मस्जिद तक चलकर गया और कुछ दूरी पर खड़ा रहा. जुलूस आया. रवीन्द्रनाथ सबसे आगे थे. वे मस्जिद के भीतर गए और वहां उपस्थित लोगों को राखी बांधी. हंसते हुए वे वापस आये.

बंगभंग आंदोलन एक अभियान था. अंग्रेजों ने यह आदेश जारी किया कि विद्यार्थी उसमें शामिल न हों. रवीन्द्रनाथ ने सुरेन्द्रनाथ से कहा, “अँगरेज़ शिक्षा क्षेत्र से बाहर रहें, इसके लिए बहुत बड़ा आन्दोलन हुआ और ‘नॅशनल कॉंग्रेस ऑफ एजुकेशन’ नामक संस्था की स्थापना हुई और बदोड़ा में कार्यरत अरबिंदो घोष उस संस्था की खातिर अपना कार्य छोड़कर आए.”

रवीन्द्रनाथ और अरबिंदो घोष का एकमत हुआ, परन्तु कार्यकारिणी को रवीन्द्रनाथ के सारे ही विचार मान्य नहीं थे, इसलिये रवीन्द्रनाथ उनसे अलग होकर फिर से शांति निकेतन आ गए.

“स्वदेशी, स्वराज्य – ये कल्पना देशवासियों को उत्तेजित करती हैं, और वे भयानक रूप से उत्तेजित हो जाते हैं. परन्तु ये हमसे हो नहीं पायेगा, क्योंकि हम कवि मन के हैं, और संयम हमारा स्वभाव है. हम विद्यार्थियों का निर्माण कर सकते हैं, उनके मन में राष्ट्रीय भावना जागृत कर सकते हैं, परन्तु ऐसे आन्दोलनों में शामिल होकर कुछ प्राप्त नहीं होता, इसका दुःख होता है.” ऐसे विचार उनके मन में आये थे.

“हमारे सामने दो ही बातें हैं जो हमें पसंद हैं,  - कल के सुदृढ़ और स्वदेश प्रेमी नागरिक का निर्माण करना, और हमारी साहित्य निर्मिति. अब हमें इन दो स्वप्नों को साकार करने का दृढ़ निश्चय ही करना होगा,” ऐसा उन्होंने स्वयं को समझाया.

राजनीति की ओर ध्यान ही नहीं देना है, ऐसा निश्चय मन में किया तो था, परन्तु समाज की प्रत्येक घटना का प्रतिसाद उनके मन में उत्पन्न होता ही था. उन्हें याद आई वह हृदयविदारक घटना:

एक अंग्रेज़ अधिकारी ने मामूली कारण से दस लोगों को बन्दूक की गोलियों से मार डाला था. तब बंगाल दहल गया था. एक तरफ़ उत्तेजित होकर मरने के लिए तैयार था, तो दूसरे ओर अत्यंत भयभीत हो गया.

ब्राह्मो समाज से भी उन्होंने स्वयं को दूर रखा. इसी दौरान मन में अनेक सुन्दर सुन्दर कल्पनाओं की कविताओं की रचना हुई, जिनका संग्रह ‘गीतांजली शीर्षक से प्रकाशित हुआ.

ईश्वर के अस्तित्व का तो अब उन्हें हर स्थान पर तीव्रता से अनुभव होने लगा था. साथ ही उन्होंने अपने कर्तव्यों का तीव्रता से बोध होने लगा. मीरा का विवाह करना था. रथींद्र का भी करना था. उन्होंने रथींद्र से पूछा,

“रथी, अपने विवाह के बारे में तुम्हारा क्या विचार है?” रथींद्र हंस पडा. रवीन्द्रनाथ की प्रतिकृति वाला रथींद्र उच्च शिक्षा प्राप्त करके शांति निकेतन में वापस आया था.

“बाबा, ऐसा सवाल क्यों पूछ रहे हैं?

“कुछ विचार बदलते रहते हैं. माँ-बाप जो शादी पक्की करें, वह हरेक को स्वीकार ही हो, ऐसा नहीं होता. इसलिए पूछ लेना अच्छा है.”

“बाबा, आप जो भी निश्चित करेंगे वह मेरे हित का ही तो होगा ना?

“पूछ इसलिए रहा हूँ, कि हमारी नज़र में एक कन्या है. उसका नाम है प्रतिमादेवी. वह बालविधवा है.”

“बाबा, आपको वह पसंद है ना...तो फिर हमें भी पसंद है.”

फिर वे दोनों बड़ी देर तक बातें करते रहे, और कुछ याद करके रथीन्द्रनाथ ने कहा,

“बाबा, मैं माधुरी दीदी के यहाँ जाकर आया. उसकी तबियत ठीक नहीं है.”

“क्या हुआ है उसे?

“बुखार है, कमजोरी है.”

रवीन्द्रनाथ का मन बेचैन हो गया. अचानक उन्हें मृणालिनी, देवेन्द्रनाथ, मीरा की मृत्यु का स्मरण हो आया. उन्होंने कुछ कहा नहीं, परन्तु अचानक उनके मन का आकाश भर आया था. नेत्रों से अश्रुधाराएं बरसने ही वाली थीं.

 

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