Thursday, 9 October 2025

एकला चलो रे - 32

 

32


अनेक दिनों के बाद रवीन्द्रनाथ शान्ति निकेतन में अपनी मेज़ के पास कुर्सी पर हाथ में पेन लिए बैठे थे. आँखों के सामने से अनेक चित्रों की मालिका सरक रही थी. मृणालिनी, रेणुका, शमीन्द्र, देवेन्द्रनाथ की मृत्यु की वेदना को सहन करते हुए ज़रा सा भी मन संभलता, कि उनकी पहली, अत्यंत प्रिय कन्या माधुरीलता, जिसे सब बेला कहते थे, उसके अस्वस्थ्य होने का पत्र आया था.

बेला उन्हें अत्यंत प्रिय थी. तेरह वर्ष की आयु में विवाह के बाद वह चक्रवर्ती परिवार में गई थी. इस बात को भी अब दस वर्ष बीत चुके थे. इन दस वर्षों में उसे संतान की प्राप्ति नहीं हुई थी. हो सकता है, यह दुःख भी उसके मन में हो, परन्तु उस दुःख से कोई बीमार हो जाए, यह बात मन स्वीकार नहीं कर रहा था, परन्तु सत्य तो यही था.

जब वे बेला से मिलने पहुंचे, तो वह अत्यंत निर्बल प्रतीत हो रही थी. उन्होंने उसके मस्तक पर हाथ रखकर पूछा:

“की होबे, बेला?”

“कछु नाहीं, आमि भालो आछे!”

रवीन्द्रनाथ के नेत्रों में पानी तैर गया. चक्रवर्ती परिवार ने इस बात की खूब देर से सूचना दी थी.

“बेला, कितनी निर्बल हो गई हो...हमें बताना तो चाहिये था ना!”

“बाबा, आप पहले ही कितना सहन कर रहे थे. उस बीच ‘गीतांजलि को नोबेल पुरस्कार मिला. वह आनंद मैंने पत्र द्वारा व्यक्त किया. इसके बाद आपके ‘सर की उपाधि वापस लौटा देने का समाचार मिला, तब भी मैंने पत्र लिखा था. आप बीमार थे, उपचार के लिए लन्दन जाने वाले थे, तब भी मैंने लिखा था. हर बात को याद करके लिखा था ना?!”

“अब हँसे या रोयें, प्रशंसा करें, कि गुस्सा करें, यही समझ में नहीं आ रहा है. बेला, तुम हमेशा हमारे बारे में सोचती रहीं, परन्तु अपने बारे में एक भी शब्द नहीं लिखा. लिखा, तो परिवार के व्यक्ति के बारे में, दिल खोल कर. और हमारे दिमाग में भी कभी ऐसा ख़याल नहीं आया, कि तुमने अपने बारे में कभी भी, कुछ भी क्यों नहीं लिखा. ऐसा क्यों किया, बेला?

माधुरीलता के नेत्रों से सावन-भादों बरस रहे थे. उसे निकट लेते हुए उन्होंने प्रेम से पूछा,

“ऐसा हुआ क्या है, बेला?

“पहले-पहले ऐसा लगा कि बहुत कमज़ोरी आ गई दवाएँ शुरू कीं, दो-तीन डॉक्टर बदले, मगर कमज़ोरी बढ़ती ही गई. तब कलकत्ता के डॉ. सुप्रियो बाबू को दिखाया, तब वे बोले,

“टी. बी. हुआ है. हवा बदलना चाहिए. तो हम दोनों कुछ दिन बाहर भी रहकर आये. पर अब कोई भरोसा नहीं है.”

उन्होंने कुछ नहीं कहा. ठाकुरबाड़ी से रोज़ उसके घर जाते हुए सारा धैर्य इकट्ठा करके जाते. क्या सुनने को मिलेगा, इसका कोई भरोसा नहीं था. ऐसे में कभी अपने ही लिखे हुए गीत की पंक्तियाँ मन में गूंजती होतीं. आज भी वे ही पंक्तियाँ उन्हें याद आ रही थीं.

 

बीना बाजाओ हे, मम अंतरे

सजने, विजने, बन्धु, सुख दुःखे, विपदे

आनंदित तान सुनाओ, हे मम अंतरे

यदि अपना मन आनंदित हो, तो बेला का सांत्वन करके, उसे धीरज देते हुए, उस आनंद दे सकते हैं. वे मन ही मन प्रार्थना करते हैं

 

धाय जेनो मोर सकल भालोबाशा प्रभु

तोमार पाने, तोमार पाने, तोमार पाने

चित्त मम जखन जेधाय थाके, शाडा जेनो दाय तोमाय डाके

जतो बाधा सब टूटे  जाय जेनो, तोमार टाने

हे हमारे जीवन सखा, ईश्वर, हम चाहे कहीं भी हों, हमारा ध्यान तुम्हारी पुकार की तरफ़ ही रहता है. क्योंकि देशस्थिति, सामाजिक स्थिति, और पारिवारिक दुःख से हम मौन हो चुके होते हैं. ‘

उनका ध्यान बेला की ओर गया. वह उनकी तरफ़ देखते हुए बोली,

“बाबा, अब माँ नहीं है, आप ही मेरी माँ हो, जब तक मैं हूँ, मिलने आया करें. खूब-खूब अकेलापन लगता है. इस तरह रोज़ मृत्यु की पुकार सुनकर ज़िंदा रहने से मैं उकता गई हूँ. अब जितनी जल्दी वह आये और मुझे ले जाए.”

रवीन्द्रनाथ का मन उसकी बातों से द्रवित होता. वे उसे अनेक कथाएँ सुनाते, कवितायेँ पढ़कर सुनाते, कभी यात्रा के मनोरंजक किस्से सुनाते. परन्तु बेला को सिर्फ आंखों के सामने खड़ी मृत्यु नज़र आती. वह उसे अपने निकट बुला रही थी, मगर वह जिद्दीपन से अपनी जगह से हिलती नहीं थी.

रथींद्र के विवाह को भी कई वर्ष बीत चुके थे, अभी तक उनके कोई संतान नहीं थी. साथ ही बेला के भी कोई संतान नहीं थी. रवीन्द्रनाथ मन में सोच रहे थे – एक दृष्टि से ठीक ही हुआ – माँ के बिना बच्चों की कल्पना ही नहीं की जा सकती. रेणुका, शमीन्द्र, मीरा – इनके लिए चाहे जितना करो, माँ की तुलना उससे हो ही नहीं सकती.

वे कितनी ही देर बेला के पास बैठे रहते. सामने अखबार होते, परन्तु उन्हें पढ़ने का मन ही न होता. जीवन में निराशा छाती जा रही थी. मन को चाहे कितना ही व्यस्त रखने का प्रयत्न करते, परन्तु वह रिक्त होकर, बेला की असहाय स्थिति देखकर भर आता. फिर भी वे उससे कहते,

“बेला, तुम अच्छी हो जाओ, फिर हम अमेरिका जायेंगे. रथी और प्रतिमा के साथ हम अमेरिका गए थे. हमें नोबेल पुरस्कार मिला था, इस निमित्त से जगह जगह पर हमारा सत्कार किया गया था.

एक नोबेल पुरस्कार से हम विश्व कवी हो गए. रथी और प्रतिमा अमेरिका से वापस आये. हम जापान चले गए. हमें यहाँ कौन पहचानेगा, यह सोचकर, मस्ती में घूम रहे थे. तब वहां रास्ते में एक नौजवान मिला, उसने पूछा,

“आप इंडिया से हैं ना? मैं आपको पहचानता हूँ.”

“वो कैसे?” हमने उत्सुकता से पूछा.

“आपका फोटो अखबार में देखा. बिलकुल ऐसा ही फोटो था, दाढी, गर्दन पर झूलते हुए बाल, याद रह गया वह फोटो. ‘जस्ट ए मिनट प्लीज़.’ वह भागकर गया और सामने के आँगन में गिरे हुए अंजली भर फूल लाकर हमारा स्वागत किया. हमें उसकी समयसूचकता का आश्चर्य हुआ. उसने कहा, “आप कवि हैं, क्या एक कविता सुनायेंगे?

वैसे तो रास्ते पर, और राह चलते बच्चों के लिए कविता कहना हमें ठीक नहीं लग रहा था.

“फिर सुनाई कविता?” बेला ने उत्सुकता से पूछा.

“कवि को कविता सुनाने का मोह तो होता ही है, हम उसे टाल नहीं सके. अपनी एक पुरानी कविता सुना दी.

 

प्रचंड गर्जने अशिलो एकी दुर्दिन.

दारुण घनघटा अशनितर्जन

घन घन दामिनी. भुजंग क्षत यामिनी

अंबर करिछे अंध नयने अश्रु बरिषण.

पल पल भय महसूस हो, ऐसी बिजली चमक रही है, ज़ख़्मी सर्प के समान घिसटते हुए रात धीरे धीरे सरक रही है. 

“बाबा, यह तो हमारे ही मन की स्थिति है.”

“बेला, ये हर बात तुम मन पे क्यों ले लेती हो, इससे बाहर आओगी तभी तबियत ठीक होगी ना? देखो, इसी कविता में तुम्हें ही उपदेश किया है.

छड़ो रे शंका, जागो भीरू अलस

आनंद जागाव अंतरे शक्ति

अकुंठ आखी मेली हेरो प्रशांत विराजित

महाभय, महासने, अपरूप मृत्युंजयरूपे भयहरण .

चाहे कितना ही घनघोर अन्धेरा हो, चाहे कितनी ही समस्याएँ, और उनसे नैराश्य हो फिर भी मन के सारे संदेह दूर करो. आलस त्याग दो, और भयमुक्त होकर शान्तता-स्वस्थता पर विजय प्राप्त करो.

समझ में आया, बेला? इस तरह हारने से काम नहीं चलेगा. हर परिस्थिति पर मात करने योग्य मन का सामर्थ्य होना चाहिए.”

“बाबा, आप ठीक कहते हो. परन्तु मृत्यु सामने खड़ी है हाथ पसारे. मन और नेत्र उसे कैसे नकार सकते हैं?

रवीन्द्रनाथ ने कोई जवाब नहीं दिया. मृत्यु चाहे कितनी ही अच्छी क्यों न हो, फिर भी अपूर्ण ज़िंदगी में, खिलने से पूर्व ही कली को तोड़ लिया जाए, वैसे ना आए. ऐसा विचार उनके मन में आया. बेला को ऐसा लगा कि उन्हें अपने कथन पर दुःख हुआ है. उसने विषय बदलते हुए कहा,

“ ये एनी बेसेन्ट कौन हैं? लोकमान्य तिलक से उनका क्या संबंध है?

“हम जब दूसरी बार अमेरिका में सिएटल गए थे, तब एक बार फिर जापान गए थे. जापान के विश्वविद्यालय में ‘द मेसेज ऑफ इंडिया टू जापान इस विषय पर भाषण दिया था. तभी एनी बेसेंट भारत आई हैं, यह सूचना मिली थी.

उसी दौरान ‘कीओ विश्वविद्यालय’ में  ‘द स्पिरिट ऑफ जापान इस विषय पर भाषण देकर भारत वापस आये, तो यहाँ ‘होमरूल आन्दोलन आरंभ हो चुका था, और एनी बेसेंट उसमें सहभागी हुई थीं.”

“मगर यह आन्दोलन शुरू कैसे हुआ?” बेलाने पूछा. बेला अलग-अलग विषय देकर रवीन्द्रनाथ को बोलने पर मजबूर कर रही थी. पिता हमारी वजह से दुखी न हों, यह उसकी भावना थी. हमें तो जाना ही है, यह दुःख रवीन्द्रनाथ की बर्दाश्त से बाहर होगा, कम से कम हमारी वर्त्तमान स्थिति देखकर वे रोने न लगें, इसीलिये वह विभिन्न प्रकार के प्रश्न पूछ रही थी. रवीन्द्रनाथ इस बात को अच्छी तरह जानते थे, परन्तु उसका उद्देश्य पूरा हो, ऐसा वे मन ही मन चाहते थे, इसलिए वे उसके प्रश्नों के उत्तर दे रहे थे. असल में तो वे दोनों एक दूसरे को संभाल रहे थे.

“बेला,” उन्होंने एक दिन माधुरीलता से कहा, “जीवन बहुत सुन्दर है. प्रत्येक स्थान की प्रकृति भिन्न-भिन्न होती है. उस प्रकृति में एक नाद होता है. एकदम निस्तब्ध वातावरण में भी एक सुरीली लय होती है.”

“बाबा, यदि हमारा मन सुन्दर हो, तभी तो यह सब दिखाई देगा ना! विवाह को पांच वर्ष हो गए, फिर भी एक भी संतान नहीं, तब ऐसा प्रतीत होने लगा कि कहीं हम बांझ पेड़ तो नहीं हैं? आशा के पत्ते आते, झड जाते, याद आया, जीवन भी तो ऐसा ही नहीं है ना... जन्म लेना, नई आशाएं, आकांक्षाएं, लेकर, वे झड़ने लगीं, तो ऐसा लगा कि अगला जन्म होना चाहिए. नहीं चाहिए ऐसी मृत्यु! अपत्यहीन!”

रवीन्द्रनाथ का मन भर आया. ईश्वर ने उसे मातृत्व से वंचित रखा, और मन का दुःख शरीर पर प्रकट होने लगा. वेदनाओं के घाव मन में समेटे वह यहाँ तक पहुंची थी. उन्होंने विषय बदल दिया. बोले, “तुम्हें मालूम है, बेला, भारत की स्थिति कैसी है? एक तरफ अहिंसा की हवा चल रही है, लोगों को अहिंसा का मार्ग अच्छा लग रहा है. तो दूसरी ओर भारतीय सैनिक ब्रिटिशों की ओर से विश्वयुद्ध में शामिल होकर प्रत्यक्ष स्वयं को समर्पित कर रहे हैं.”

“बाबा, भारत की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक घटनाओं के सन्दर्भ जानकर मैं क्या करूं? मेरा विश्व तो घर-परिवार है.”

“जब इसमें से बाहर आओगी, तभी तो तुम्हें समाज की व्याप्ति का ज्ञान होगा ना? यदि अपने मन की खिड़की ही बंद कर लो, तो बाहर का कुछ भी दिखाई नहीं देता. खोलो वह खिड़की, देखो आकाश को, वृक्षों को, हाथ से छुओ पेड़ों को. अनेक वृक्षों में फल देर से आते हैं. प्रतीक्षा करते हुए वे प्रसन्न रहते हैं. हर साल वे प्रतीक्षा करते रहते हैं.

“ये अखबार पढ़ो. अच्छा लगेगा.”

उन्हें हाल ही में जापान में दिया अपना भाषण ‘आक्रामक राष्ट्रवाद और साम्राज्यवाद याद आया और उन्होंने मन ही मन कहा,

‘बेला, कहां जापान, अमेरिका, बर्मा, म्यांमार घूमने वाले हम, अनेक बार एकांत में दुखी हुए हैं, मगर खुद को संभालते हुए कथा, कविता, उपन्यास, लेख, भाषण में हमने अपना मन बहलाया. दुःख की हल्की सी रेखा भी हमारे चेहरे पर नहीं दिखाई दी. क्या हमारे मन में वेदना नहीं थी? शारीरिक वेदनाएं तो दवाओं से ठीक हो जाती हैं, परन्तु मानसिक वेदनाएं...उन्हें नहीं बता सकते...’

उससे किस विषय पर बात की जाए, यह प्रश्न उनके मन में था.

एक तरफ विश्व युद्ध समेटा जा रहा था, और जिस उद्देश्य से अंग्रेज़ों ने भारतीय सैनिकों को युद्ध के लिए प्रवृत्त किया था, वह कारण ये था कि यदि युद्ध में अंग्रेज़ जीत जाते हैं, तो वे खुद ही भारत को धीरे धीरे स्वतंत्र कर देंगे, लोकतंत्र का आधार लेंगे. परन्तु युद्ध समाप्त होने को आया, ब्रिटिश शासन की विजय हुई, परन्तु ब्रिटिश सरकार कोई भी कदम नहीं उठा रही थी, तब मोंटेग्यू ने चेम्सफोर्ड के काल में वाईसरॉय रहते हुए नया अधिनियम बनाया इसलिए उस अधिनियम का नाम मोंटेग्यू चेम्सफोर्ड रखा गया.

परन्तु यह केवल बाहरी दिखावा था. हांलाकि ब्रिटिश सरकार यह दिखा रही थी, कि उसने सिद्धांत रूप में इसे स्वीकार कर लिया है, परन्तु उस पर अमल नहीं कर रही थी. इसके लिए रवीन्द्रनाथ स्वयं प्रयत्न करने वाले थे. परन्तु माधुरीलता की अस्वस्थता के कारण उनका मन कहीं भी नहीं लग रहा था. परन्तु ऐसी स्थिति में भी उन्होंने चेम्सफोर्ड से मुलाक़ात की. भारतीय समाज की भूमिका, जो उनके मन में थी, बताई. उस समय की घटना वे माधुरीलता को सुनाने वाले थे.

परन्तु दिन प्रतिदिन क्षीण होती हुई माधुरीलता से क्या कहें, उसे कैसे समझाएं, कैसे उसे प्रसन्न करें, वे समझ नहीं पा रहे थे. वे ईश्वर की प्रार्थना कर रहे थे:

 

मेघ बोलेछे जाबो जाबो, रात बोलेछे जाई

सागर बोले कूल मिलेछे, आमी तो आर नाई

मेघ कहता है कि अब बरस जाने के बाद मैं जाने वाला हूँ. रात भी जाने वाली है. सागर ने कहा, मुझे किनारा मिल गया है, मैं भी जाऊंगा. 

दुःख बोले रोईनो चुपे ताहार पाएर चिह्न रूपे

आमी बोले मिलाई आमी, आर किछु ना चाई

मगर दुःख कहता है, मैं तो रहूँगा, यादों के रूप में. सचमुच, हम भी तो दुःख ही जीते है, जीवन ही दुःख हो गया है. अब हमें कुछ और नहीं चाहिए.

भुवन बोले तोमार तरे आछे वरणमाला

गगन बोले तोमार तारे लक्ख प्रदीप जाला

सारा वातावरण कहता है, तुम्हारे लिए ही हैं ये फूलों की मालाएं. ये फूलों की सजावट. आकाश कहता है, तुम्हारे लिए ही ये लाखों दीप प्रज्वलित किये हैं.

एक तरफ मन में घनघोर निराशा, तो दूसरी ओर मन में आशा के दीप. सचमुच, मन का झोंका दुःख से ऊपर ऊंचे ऊंचे जाकर आकाश को छूना चाहता है, तो हाथ में आती हैं आशा की खिलती हुई बेलें. फिर वह झोंका नीचे आता है, वापस ऊपर जाने के लिए. यह खेल चलता ही रहता है. 

 

प्रेम बोले जे जुगे जुगे तोमार लागि आछि जेगे .

मरण बोले आमी तोमार जीवनतरी बाई  

प्रेम कहता है, मैं  तुम्हारे लिए जीवन भर जीवित रहूँगा. इस प्रकृति में तुम्हें खिलता रखूंगा. आशा की ये कड़ी खींचते हुए मृत्यु कहती है, मैं ही तुम्हारी जीवन नौका उस पार ले जाऊंगी.

वे माधुरीलता के घर उसके सामने कुर्सी पर बैठे थे और लगभग तीन-चार वर्ष पूर्व लिखी हुई कविता उन्हें याद आ गयी थी. उन्होंने माधुरीलता से कहा,

“बेला, दुःख की वेदना का झोंका जितना ऊंचा जाता है ना, उतने ही वेग से जीवन आशा उसे नीचे की ओर खींचती है. अब तुम अपने मन को बदलो. सब ठीक हो जाएगा. मन में सामर्थ्य हो तो अनेक दुखों को मात दे सकते हैं.”

“बाबा, आप अर्थात् मैं नहीं – मैं हार चुकी हूँ. मेरे सामने ईश्वर ने कोई भी पर्याय नहीं रखा है.”

“ऐसा न कहो, बेला...” असल में तो उनके पास शब्द ही समाप्त हो चुके थे. उनका मन व्याकुल हो गया. माधुरीलता उनकी अवस्था को जान गई थी.

“बाबा, आपके पास जीवित रहने के लिए बहुत कुछ है. अभी चार वर्ष पूर्व ही आपको नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ. सैंकड़ों पत्र आपको मिले. अनेक बड़े-बड़े लोग आपके संपर्क में आये. अनेक सत्कार समारोह हुए. आप अनेक किताबें लिखते हैं. रोज़ नई नई कल्पनाएँ दिमाग में आती हैं. शान्तिनिकेतन का कामकाज बढ़ गया है. जीने के लिए आपके पास बहुत कुछ है. मेरे जीवन का वृत्त ही संकीर्ण है. उसके भीतर अब कोई नहीं है. मैं अकेली ही उसमें भटकती रहती हूँ. अब तो मेरी इस वृत्त से बाहर निकलने की इच्छा ही नहीं होती. जैसे तोते को पिंजरे की आदत हो जाती है ना, उसी तरह मुझे इस वृत्त की आदत हो गयी है, और यहाँ से मुझे दिखाई देता है सिर्फ ईश्वर का घर.”       

रवीन्द्रनाथ उसे समझा रहे थे, मगर उन शब्दों में कोई जोश नहीं था. उन्हें अनुभव हो रहा था की उनके शब्द निरर्थक हैं.

शाम को वे उसके घर से वापस ठाकुरबाड़ी आये. वे पत्रों का ढेर देख रहे थे, सोच रहे थे कि किसे सबसे पहले उत्तर लिखना है. तभी ‘राणू चौधरी’ लिखा हुआ पत्र दिखाई दिया. उन्होंने उत्सुकता से उसे खोला.

पत्र में उसने ‘साहित्य के सूर्य नाम से उन्हें संबोधित करते हुए लिखा था, ‘आप मुझसे खूब-खूब बड़े हैं. मैं केवल दस वर्ष की हूँ. मुझे बहुत सारा लिखना नहीं आता. आप खूब-खूब लिखते रहिये, मैं पढ़ती रहूँगी. भेजेंगे ना पत्र?

वे मन ही मन प्रसन्न हो गए. दूसरा पत्र उठाया. वह सरोजिनी नायडू का था. उनका कविता संग्रह ‘दि ब्रोकन विंग्स प्रकाशित हुआ था. इन कविताओं की रवीन्द्रनाथ ने प्रशंसा की थी. उसके उत्तर में यह पत्र था. कई सारे पत्रों के उन्हें जवाब देने थे.

सबसे पहले उन्होंने राणू चौधरी को पत्र लिखा,

‘मनःपूर्वक तुम्हारी प्रशंसा करते हुए हमें बहुत खुशी हो रही है. तुम दस वर्ष की, तो हम छप्पन साल के हैं. फिर भी अपनी दोस्ती हुई. अब हम तुम्हें पत्र लिखेंगे. परन्तु शांतिनिकेतन जाने के बाद. पत्र का उत्तर हम अवश्य देंगे.’

उन्हें रेणुका की याद आई, शमीन्द्र की भी आई. इस उम्र के हमारे बच्चे स्वर्ग में क्या कर रहे होंगे, यह प्रश्न उनके मन में उठा और प्रसन्न मन ने उत्तर दिया, ‘मृणालिनी के संपर्क में दोनों भी प्रसन्न ही होंगे.’ सचमुच, निरभ्र आकाश में एकाध बादल का टुकड़ा आये, पल भर को अन्धेरा छा जाए, और फिर से आकाश स्वच्छ हो जाए, ऐसा था उनका मन. दूसरा पत्र वे सरोजिनी नायडू को लिखने लगे. इससे पूर्व, अगस्त 1917 में लिखा गया पात्र उन्हें जैसे का वैसा याद था. उन्होंने लिखा था,

‘प्रिय श्रीमती नायडू,

हमने आपकी कवितायेँ पढ़ीं. उनमें हमें जो अनुभव हुआ, उसके बारे में लिख सकता हूँ ना? फिर से उन्हें पढ़ते हुए ऐसा लगा, कि ‘I became too conscious of my own broken wings, in the alien sky of  English diction.’ आपकी कविता की सहजता, सरलता, और आपसे मैत्री करते हुए विदेशी शब्दों के माध्यम से व्यक्त होने वाले लालित्य को देखकर हमें आपसे स्वाभाविक रूप से ईर्ष्या होने लगी और अपने साहित्य से आपने पश्चिमी साहित्यकारों के बीच अपना एक विशिष्ठ स्थान बनाया है. इसके अतिरिक्त इन कविताओं से भारत का गौरव बढ़ा है. अनेक पश्चिमी साहित्यकारों का ध्यान उन्होंने आकर्षित किया है, यह भारत के लिए एक उपलब्धि है.

आज हमारे घनिष्ठ मित्र जगदीश चन्द्र बसु ने वनस्पतियों में भी सजीवता है, यह सिद्ध किया और वे भी विश्व विख्यात हो गए. वे हमारे स्नेही हैं, इस बात का भी अभिमान है. उनके इस शोध कार्य के लिए अनेक स्थानों पर जाकर आर्थिक सहायता प्राप्त की, और उन्हें विदेश भेजा. उस समय उन्होंने त्रिपुरा के महाराज राधा किशोर माणिक्य बहादुर को जगदीश बाबू की सहायता के लिए पत्र लिखते हुए कहा था,

‘वर्तमान में यदि हम शान्तिनिकेतन के कार्य के सन्दर्भ में लिए गए कर्ज़ में न डूबे होते, तो जगदीश बाबू के लिए किसी के द्वार पर जाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती.’ महाराज ने उत्तर दिया,

‘रवीबाबू, इस तरह घर घर जाकर भीख मांगना, वह भी आप जैसे व्यक्ति के लिए योग्य नहीं है. आपके हाथ में झोली शोभा नहीं देती. वह हमें दे दीजिये. हमारे वीरेन युवराज का विवाह तय हो गया है. उसकी पत्नी के लिए जो अलंकार हम बनवाने जा रहे हैं, उसमें दो कम बनवायेंगे, परन्तु अपने संशोधक मित्र की सहायता अवश्य करेंगे.’

और त्रिपुरा के महाराज ने दिल खोलकर सहायता की. तब उन्होंने जगदीश बाबू को लिखा था,

‘जगदीश बाबू,

भारत के अश्वमेध अश्व की लगाम आपके हाथ में है. आप जब संशोधन का विश्वविजयी अश्व लेकर भारत लौटेंगे, तब यज्ञ की पूर्ति होगी, और यहाँ आने के बाद आप अनेकों के मार्गदर्शक होकर अपने शिष्यों को सृष्टि के अनेक रहस्यों के बारे में बताएंगे, ऐसा हमें विश्वास है.’

‘सिर्फ पाठांतर से कोई भी ज्ञान दीर्घकालीन नहीं हो सकता. उसके लिए अनुभव तथा साधना की आवश्यकता होती है. मतलब, आपकी असली परिक्षा तभी है, जब आप विद्यार्थियों को प्रयोगशील बनाएंगे.

‘एक समय ऐसा आता है, कि जब सत्ता, संपत्ति सम्मान के प्रति मोह नहीं रहता, बल्कि मन में संजोये हुए महान सपनों को प्रत्यक्ष रूप कैसे दिया जाए, जनकल्याण किस प्रकार हो, इस पर विचार होता रहता है.

आपको वैश्विक सम्मान प्राप्त हो, इसके उद्देश्य से ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ, और उस दिन की प्रतीक्षा करता हूँ.’

पत्रों के ढेर से वे बाहर आये, और माधुरीलता के घर जाने के लिए निकले. यहाँ ठाकुरबाड़ी आने के बाद वे रात को और सुबह पत्रों के उत्तर लिखते और फिर दिन भर माधुरीलता के यहाँ जाकर उसका मन प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते. माधुरीलता को खुद ही मृत्यु की आहट मिल गई थी, इसलिए शब्द निरर्थक प्रतीत होते थे.  मगर कुछ बोलना तो आवश्यक था. उन्हें आशा नहीं थी, परन्तु यदि मृत्यु अवश्यंभावी है तो अत्यंत दुर्दशा न हो, इस विचार से वे उससे मिलते, उसे समझाते. इस समय उन्हें शब्दों की निरर्थकता समझ में आ गई थी.

जब वे आये तो माधुरीलता गहरी नींद में थी. उसके पति शरतचंद्र चक्रवर्ती अपने काम पर जाने की तैयारी कर रहे थे.

“मैं आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा था. आज घर के सब लोग एक विवाह समारोह में गए हैं. घर में काम करने वाली उसकी दो सेविकाएँ हैं – और मुझे भी कोर्ट में ज़रूरी काम है. समझ में नहीं आ रहा था की क्या किया जाए. आप आये तो सचमुच बहुत अच्छा लगा. अब मैं बेफिक्र हो गया.”

“कैसी है तबियत?

“तबियत कल से ठीक है. आश्चर्य की बात है, कि कल रात को वह प्रसन्न थी. ‘वैसे तो मैं ज़िंदा ही रहने वाली हूँ. मगर मान लो यदि मेरी मृत्यु हो जाए, तो आप एक काम करना – दूसरी शादी कर लेना. करेंगे ना?’ सच कहता हूँ, पिछले कुछ महीनों से वह इतनी प्रसन्न नहीं थी. अब शान्ति से सो रही है. रात भर बोलती रही. मैं भी सुन रहा था. वह निश्चित रूप से अच्छी हो जायेगी. उसके मन ने ठान लिया है ना...”

कोट पहनते हुए वह कह रहे थे. वे भी प्रसन्न थे. घर के लोग सुबह ही किसी विवाह में गए थे. माधुरीलता की विधवा सास घर में थी.

रवीन्द्रनाथ ने उन्हें निश्चिन्त मन से जाने के लिए कहा. उन्होंने कहा, “दो ही घंटे में वापस आता हूँ, बिलकुल निश्चित.”

रवीन्द्रनाथ उसके कमरे में आये. वह शान्ति से सो रही थी. वे अखबार पढ़ते हुए बैठ गए. बीच बीच में उनका ध्यान माधुरीलता की तरफ था. आधा घंटा बीत गया, अखबार पढ़ना हो गया, तो उन्होंने उसे आवाज़ दी. उसकी कोई हलचल महसूस नहीं हुई, इसलिए उन्होंने उसके पास जाकर उसे हिलाया और रवीन्द्रनाथ को भयानक आघात पहुंचा. वह इस दुनिया में ही नहीं थी. उन्होंने उसकी सास को बताया और नौकर को शरदबाबू को बुलाने के लिए भेजा, और वे बाहर आकर कुर्सी पर बैठे. उनके मन का समूचा आकाश ही गिर गया था. उनकी अत्यंत प्रिय माधुरीलता उन्हें छोड़ कर चली गई थी. वे मन ही मन आक्रोश कर रहे थे.

‘बेला, औरों के जाने के दुःख को बर्दाश्त करते हुए हम मन से सहस्त्रों बार धराशायी हुए थे, अब तुम्हारे जाने से तो मन सप्त पाताल लोक चला गया है. तुम चली गईं, परन्तु हम नहीं जा पायेंगे, क्योंकि आत्मघात हम कर नहीं पायेंगे. बेला,तुम हमारे जीवन का पहला नाज़ुक फूल थीं, समय से पहले ही कुम्हला गईं...’ दुःख अनावर हो गया. दोनों हाथों में चेहरा ढांके वे बैठे थे.

रात उदास थी. सारे क्रियाकर्म पूरे करके वे घर आये थे. शरीर की अपेक्षा मन से टूट चुके थे. निरभ्र आकाश की ओर देखते हुए वे कुर्सी पर बैठे थे. 

तोमार होलो शुरू, आमार होलो शारा

तोमार आमार मिले एमनी बौहे धारा.

 

तुम्हारी यात्रा आरंभ हो गई है उस निराकार के पथ पर और तुम्हारे पास आने की हमारी यात्रा समाप्त हो गई है. अब हमारा प्रवाह एक हो गया है. आरंभ और अंत – ये दोनों क्रियाएं एक दूसरे में मिल गई हैं.

 

तोमार जौले बाती, तोमार घरे साखी

आमार तारे राती, आमार तरे तारा.

 

अब तुम्हारे उस नए घर में दीप जल उठे होंगे, अनेक लोग तुम्हारे चारों और होंगे, हमारे हिस्से में मगर है रात्री का अन्धकार और तारों का साथ. अब तुम वहां सबसे मिल रही होगी, प्रसन्न होगी.

 

तोमार हाथे रय , आमार हाथे क्षय

तोमार मने भय, आमार भय हारा.

अब तुम्हारी अंजुली में सब कुछ समाया हुआ है, और हमारे हाथों से हर चीज़ फिसल रही है, बह रही है, तुम्हें हमेशा भय था, मगर हम अब भय के उस पार जा चुके हैं. सारी वेदनाओं को गले से लगाते हुए वेदना ही हमारी सहचरी हो गई है. अब कैसा भय? अब तो उनके कारण हम समृद्ध हो गए हैं. वेदनाओं की समृद्धि, परन्तु वे हमारे शब्दों से प्रकट न हों इसका हम पूरा ध्यान रखते हैं  और झोंक देते हैं स्वयं को नए काम में .

और मन में दु:खों और वेदनाओं के विचार रहते हुए ही उन्हें याद आया, राणू चौधरी को पत्र भेजना रह गया था. लिख तो चुके थे. अब यहाँ का सारा काम समाप्त हो गया है. माधुरीलता के लिए वे तीन महीने यहाँ थे. परन्तु जब माधुरीलता ही नहीं रही, तो उसकी याद में वेदनाओं के पहाड़ चढने की अपेक्षा उन्होंने शान्तिनिकेतन जाने का फैसला किया. पंद्रह दिन बाद वे निकले.

वे अपना संदूक भर रहे थे. ढेर सारे पत्रों से ही आधी संदूक भर गई थी. ज्ञाननंदिनी ने कुछ खाने के पदार्थ भी दिए थे. भाभी को इनकार करना उनके लिए संभव नहीं था. परन्तु यह सब खाना भी संभव नहीं था. सारी इच्छाएं ही माधुरीलता की मृत्यु ने समाप्त कर दी थीं.

 

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