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दोपहर
का समय था. सूर्य आकाश के मध्य में था, फिर भी हवा के हलके-हलके झोंके मन और शरीर को प्रसन्नता
दे रहे थे. कुछ ही देर में इंग्लैण्ड का ‘प्लीमथ’ बंदरगाह आने वाला था. अलसाए
हुए,
थके हुए यात्री तैयार होकर अपना अपना सामान लेकर डेक पर खड़े थे. रवीन्द्रनाथ पीछे
ही थे. उन्हें लेने कोई आयेगा इसकी संभावना ही नहीं थी, क्योंकि उन्होंने किसी को
भी सूचना नहीं दी थी.
वैसे
तो जाने का भी तय नहीं था. महात्मा गांधी ने विनती की थी कि अप्रैल 1920 में
अहमदाबाद में गुजराती साहित्य का आयोजन किया गया है, उसका अध्यक्षपद वे स्वीकार
करें. इस पर रवीन्द्रनाथ ने लिखा,
‘महात्माजी, हमें
गुजराती भाषा नहीं आती. इसके अतिरिक्त गुजराती साहित्य भी हमने नहीं पढ़ा है. हम
अध्यक्षपद कैसे स्वीकार कर सकते हैं?’ महात्मा गांधी ने जवाब दिया,
‘रवी
बाबू, भारत का उद्देश्य एक है, भारत की संस्कृत भाषा एक है. भारत का उद्देश्य एक है, संगठन, और भारत
का ध्येय एक है – स्वतंत्रता. तो फिर भाषा और साहित्य का प्रश्न ही कहाँ उत्पन्न
होता है? इस निमित्त से आप देश को संबोधित करें. साहित्य लोकमानस की भावनाओं का
व्यासपीठ है. आप विश्वकवि हैं. तो भारतीय और पश्चिमी साहित्य पर आप अपने विचार
प्रकट कर सकते हैं. आप आयें, ऐसा हमारा अनुरोध है.’
रवीन्द्रनाथ अपने कैबिन में अपना सामान संदूक में
अच्छी तरह भर रहे थे. डेक पर उतरने वालों की उत्सुकता देखकर वे मन ही मन हंसे.
‘सचमुच,
हमें किसी भी बात की, किसी भी तरह की जल्दी नहीं हो, यही सच है. महात्मा गांधी जल्दी से जवाब मांग रहे थे, और हम शान्ति से
विचार कर रहे थे. लोग हमारी ओर ‘विश्वकवि’ की दृष्टि से देखते हैं, बिना अभ्यास के बोलना हमारे
लिए योग्य नहीं होगा. इसलिए उन्होंने गुजराती साहित्य की जानकारी मंगवाई थी, और तभी महात्माजी को
स्वीकृति दी थी. इस पर महात्माजी ने लिखा था, ‘हमने आपको समुद्र में छलांग लगाने के लिए तो
नहीं कहा था,
इतने सोच विचार के बाद ‘हाँ’ कहने के लिए!’
रवीन्द्रनाथ के व्यक्तित्व का आकर्षण लोगों के मन में
थी ही,
फिर समस्त गुजराती साहित्य के अध्ययन का विश्वास उनके मुख पर था. प्रत्यक्ष
महात्मा गांधी कम बोले. अनेक उदाहरणों से उन्होंने ‘साहित्य’ शब्द का अर्थ स्पष्ट किया.
मगर रवीन्द्रनाथ अनेक सन्दर्भ देते हुए, कवितायेँ समाविष्ट करते हुए, समग्र भारतीयत्व की और
वर्त्तमान घटनाओं की, साथ ही स्वतंत्रता की घोषणा करना कितना महत्वपूर्ण है इस
विषय पर बोले.
रवीन्द्रनाथ प्रसन्न थे. जैसे ही वे शान्ति निकेतन
वापस आए,
मेज़ पर गुलाबी लिफाफा उनकी राह देख रहा था. उन्होंने उसे उठाया. ये ख़त हेलेन मियर
फ्रैंक का था. उन्होंने मनःपूर्वक उसे पढ़ा, उसके प्रत्येक शब्द में उनके प्रति अपनेपन की
भावना छलक रही थी. जैसे गालों पर मोरपंख का स्पर्श हो रहा हो.
नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने के बाद अनेक पाश्चात्य
लेखकों,
कवियों का परिचय हो ही गया था. ऐसे में एक दिन हेलेन और उसके पति प्रोफ़ेसर हाईनरिच
उनसे मिलने लन्दन आये थे, मगर मिल नहीं सके. उसने अपने पति का परिचय दिया और अपना भी परिचय दिया.
“मैं जर्मनी में रहती हूँ, मैं साहित्यकार नहीं हूँ, परन्तु साहित्य को
बहुत पसंद करती हूँ. आपका साहित्य पढ़ना मुझे अच्छा लगता है.”
“परन्तु आपने मेरा साहित्य कहाँ पढ़ा?”
“आपको नोबेल पुरस्कार मिलने से पहले ही मार्टिन
क्रेम्पेशन और प्रशांत कुमार पॉल द्वारा किया गया आपके लेख – ‘माय डियर मास्टर’ का
अनुवाद मैंने पढ़ा है. मुझे वह बहुत पसंद है. यदि आप अनुमति दें, तो मैं आपके सम्पूर्ण
साहित्य का अनुवाद हमारे जर्मन लोगों के लिए जर्मन भाषा में करूंगी – आपको कोई
आपत्ति तो नहीं है, रवीन्द्रनाथ?”
नोबेल पुरस्कार प्राप्त होने के बाद पाश्चात्य देशों
के अनेक कवियों,
लेखकों से निकट परिचय हुआ. अभिनंदन के असंख्य पत्र प्राप्त हुए. उनमें एक गुलाबी
रंग का लिफाफा था. वह शांतिनिकेतन के पते पर आया था. वह उन्होंने सबसे पहले उठाया
था. उस पर लिखा था – ‘हेलेन’ उन्होंने लिफ़ाफ़े से पत्र निकाला. पहली ही पंक्ति थी,
‘माय डियर रवीन्द्रनाथ,
मैं आपके साहित्य से इतना अधिक प्रेम करती हूँ, कि अब
मैं अपनी शिक्षिका की नौकरी छोड़कर आपके समूचे साहित्य का जर्मन भाषा में अनुवाद
करने वाली हूँ. मैं थोड़ा-बहुत लिखती हूँ, और आपके साहित्य की प्रशंसक हूँ. मेरे
पति हाइनरिच प्रोफ़ेसर हैं, और उन्होंने मुझे न केवल अनुवाद कार्य के लिए अनुमति दी है, बल्कि वे स्वयं भी अनेक
शब्दों के अर्थ ढूँढने में मेरी सहायता करते हैं.
‘अब आप सोच रहे होंगे कि क्या इस जर्मन महिला को
बंगाली आती है?
इतनी सारी किताबें उसे कहाँ से मिलीं? इन प्रश्नों का उत्तर यह है कि मैं बंगाली सीखने का प्रयत्न करूंगी. परन्तु
मार्टिन क्रेंपेशन और प्रशांत कुमार पाल ने ‘माय डिअर मास्टर’ शीर्षक से आपके पत्रों का
संग्रह प्रकाशित किया है, उसके आधार पर मैं लिख रही हूँ. मेरे इस कार्य को आप अनुमति और आशीर्वाद
दें.
‘आपका साहित्य इतना सीधा-सादा, सुन्दर और आशय-संपन्न है कि
उसके आधार पर आपके स्वभाव की, आपके विचारों की भूमिका स्पष्ट हो गयी है. आप निर्मल हृदय, प्रकृति पर, लोगों पर, देश पर प्रेम करने
वाले हैं और आपके निर्मल मन का दर्शन आपके साहित्य में है.’
रवीन्द्रनाथ ने उसे सहर्ष
स्वीकृति दी थी. उन्होंने सोचा, ‘लेखक अपने साहित्य को कैद में रखना ही नहीं चाहता,’ उन्होंने सहर्ष सहमति
दे दी.
रवीन्द्रनाथ अपना संदूक लेकर
डेक पर जाने वाले थे. बंदरगाह अभी दूर था. मगर सभी को उतरने की जल्दी थी इसलिए वे
अपने कैबिन में ही बैठे रहे. यदि हमने हेलेन को इस बात की सूचना दी होती, कि आज हम यहाँ पहुँच रहे हैं, तो वह सहर्ष प्लीमथ बंदरगाह
पर उनसे मिलने आती. पल भर को वे निराश हो गए, अगले ही क्षण उसका अत्यंत भावनाप्रधान पात्र
उन्हें मिला था,
जिसमें उसने लिखा था,
‘माय डियर रवीन्द्रनाथ, आपके साहित्य का अनुवाद करते
हुए जैसा आनंद मुझे हो रहा है, उसका वर्णन मैं नहीं कर सकती. सचमुच, मैं स्वयं को अत्यंत भाग्यवान समझती हूँ, और यहाँ की वस्तुस्थिति
बताऊँ?
यूरोप की अपेक्षा जर्मनी में आपके साहित्य को लोग अधिक पसंद करते हैं. जब मैंने
कथाओं का अनुवाद किया, तो अनेक लोगों ने न केवल उन्हें चाव से पढ़ा, बल्कि एक दूसरे को भी सुनाया. ‘स्टोरी टेलिंग’ जैसा हो गया.
और मैं आपको बताती हूँ, रवीन्द्रनाथ, ऐसी बात नहीं है, कि सिर्फ मैं ही आपके
साहित्य से प्रेम करती हूँ, जर्मनी में आपके साहित्य के अनेक प्रशंसक हैं, फिर भी मेरे पति हाइनरिच
आपसे अत्यंत प्रभावित हुए हैं. वे मुझे सदैव प्रेरणा देते रहते है, यथावश्यक सहायता करते हैं, अब हमने यह निर्णय लिया है
कि आपके साहित्य के प्रसार के लिए अपना जीवन समर्पित कर दें. कम से कम मैं तो यह
करने ही वाली हूँ.
अब समझ में आ रहा है, अभी हमारी मुलाक़ात भी नहीं
हुई है, फिर भी यह प्रेम कैसा? ये आपके साहित्य पर है या आपके व्यक्तित्व पर? मैंने आपकी फ़ोटो देखी है. आपका व्यक्तित्व
सचमुच बहुत सुन्दर है, और अब तय कर लिया है कि चाहे कुछ भी हो जाए, आपके साहित्य को जर्मन भाषा में लाना ही है.
आपको जितना आनंद होगा, उससे कई गुना अधिक प्रसन्नता मुझे होगी.’
हेलेन निरंतर पत्र लिख रही थी
और रवीन्द्रनाथ उन्हें पढ़ते थे. उनके साहित्य से प्रेम करते हुए कहीं वह उनसे ही
तो प्यार नहीं करने लगी? ऐसा संदेह उन्हें होने लगा था. यह सब अच्छा तो लगता था, मगर अकल्पनीय, असंभव था. अब दोपहर ढल रही
थी. इस उम्र में ऐसे विचार मन में लाना उचित नहीं, इसलिए उसे पत्र लिखते समय वे अत्यंत
सावधानीपूर्वक लिखते. फिर भी, उसमें भी एकाध शब्द उसकी पसंद का झलक ही जाता.
उस दिन उसने लिखा था, ‘सचमुच, आपसे खूब बातें करने का, बिल्कुल मन की बात कहने की
बहुत इच्छा है,
परन्तु यह लिखने से क्या फ़ायदा? आप भारत में, मैं यहाँ. इस अंतर को समाप्त किया भी जा सकता
है,
परन्तु मैं हूँ एक अनुवादक. मेरा मन, मेरे विचार, मेरी भावनाएँ जानने की आपको इच्छा क्यों हो?’
उसका पत्र पढ़कर वे पूरी तरह
समझ गए कि यह सचमुच में प्यार करने लगी है, इससे मिलने की ललक हमारे मन में भी है. पता
नहीं क्यों,
मगर उसके शब्दों में व्यक्त भावनाएं हमारे मन ने भी मानी हैं, परन्तु यह योग्य नहीं है,
इसका भान उन्हें था. इसलिए उसके पत्रों के उत्तर देते समय वे प्रत्येक शब्द के
बारे में सावधान रहते.
परन्तु उसके द्वारा किये गए
अनुवादों का ऋण उससे एक बार मिलकर चुकाना तो था ही, और वैसे भी ऑक्सफोर्ड
विश्वविद्यालय में ‘मेसेज ऑफ़ दि फॉरेस्ट’ विषय पर भाषण देने जाना ही था. वैसे भी
वे जाने ही वाले थे. इसी दौरान लोकमान्य तिलक की मृत्यु हो गई और रवीन्द्रनाथ के
मन को तीव्र आघात पहुंचा. शिवाजी महाराज और स्वतंत्रता के लिए अपने लेखों द्वारा
जागृति लाने वाले,
सावरकर को मदद करने वाले लोकमान्य तिलक इस भूमि से अस्त हो गए, इस बात से उनके मन को
अत्यधिक क्लेश हुआ.
निश्चित कार्यक्रम के अनुसार
वे इंग्लैण्ड के लिए निकले थे. दूसरा महत्वपूर्ण काम यह था कि नोबेल पुरस्कार से
सम्मानित अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त दार्शनिक हेनरी बर्गसन से पैरिस में
मुलाकात निश्चित हो चुकी थी. इसमें हेलेन से मुलाक़ात – यह भावनिक कारण अत्यंत
महत्वपूर्ण था.
संदूक में सामान भरने के बाद
वे उसे बंद करके डेक पर आये. गहरे पानी में जहाज़ अत्यंत स्थिर था और उन्हें छोटी
नौका से किनारे पर जाना था. उन्होंने हाथ में संदूक पकड़ी और जहाज़ से नाव में उतरने
ही वाले थे कि एक अनजान सज्जन उनके हाथ से संदूक लेने लगा.
“प्लीज़, मुझे आपकी संदूक पकड़ने की
अनुमति दें. मैं – प्रोफ़ेसर हाइनरिच, हेलेन का पति. आपको जर्मनी में अपने घर ले जाने के लिए आया हूँ.”
रवीन्द्रनाथ को हेलेन की
मनोदशा की पूरी कल्पना हो गई. उसे कहीं से हमारे आने का समाचार मिला होगा.
“आपसे किसने कहा, कि हम आ रहे हैं?”
“शायद भारत से आ रही हवा ने
बताया होगा...”
वह भी गौरवर्ण, नीली आंखों वाला, प्रौढत्व
की और झुक रहा व्यक्ति था. अब हेलेन कैसी होगी, इसकी कल्पना वे करने लगे, और वे मन ही मन हंसे.
‘मन को कल्पना करने की आदत ही
हो गई है. यह भी एक विलक्षण भाव-कल्पना हम कर रहे हैं. स्वयं पर नियंत्रण रखते हुए
वे बोले,
“ मिस्टर हाइनरिच, आप आये इसका हमें मनःपूर्वक आनंद है. आप हमें
जर्मनी में अपने घर ले जाने के लिए आये, बहुत दूर से आये. सचमुच, हमें बहुत प्रसन्नता हुई.
परन्तु हमारे कुछ नियत कार्यक्रम हैं, ‘एंड आई प्रॉमिस यू कि आप दोनों के घर आये बिना हम भारत वापस नहीं
जायेंगे.”
“तभी मैंने हेलेन से कहा था, कि वे निश्चित ही किसी
महत्वपूर्ण कार्य से आ रहे होंगे. परन्तु युनिवर्सिटी से पता चला और मैं आपके
दर्शन के लिए हाज़िर हो गया, आपका तेजस्वी रूप देखकर धन्य हो गया!”
“हमें भी बहुत प्रसन्नता है.
आप दोनों हमारे साहित्य का अनुवाद कर रहे हैं, इससे अधिक प्रसन्नता की कोई और बात हो ही नहीं
सकती. हम खुद ही आपके घर सरप्राईज़ विज़िट देने वाले थे, परन्तु अब...”
नाव किनारे पर लग चुकी थी.
हाइनरिच संदूक लेकर उतरे, वैसे ही रवीन्द्रनाथ भी उतरे. हमारे आने के बारे में ऑक्सफोर्ड युनिवर्सिटी
को सूचित किया था. परन्तु निश्चित तारीख उन्हें नहीं बताई थी. फिर आप कैसे आये?”
“अगर बताऊँ, तो आप हमें, खासकर हेलेन को पागल ही
कहेंगे. परन्तु यह पता चला कि बारह जून को आपका व्याख्यान है, इसलिए आप एक तारीख
से दस तारीख के बीच कभी भी आ सकते हैं. इसलिए मैं और हेलेन बारी-बारी से प्लीमथ
बंदरगाह पर आते रहे. आज उसे कुछ काम है इसलिए वह नहीं आ पाई, और आप आ गए. मैं पहले
आपसे मिला इसका उसे अफ़सोस होगा, मगर क्या करें, मेरे ही नसीब में पहले आपसे मिलना लिखा था.”
अत्यंत खुले दिल वाला, और हंसमुख प्रोफ़ेसर हाइनरिच
उन्हें बहुत अच्छा लगा और उनके मन में हेलेन के
और उसके सुन्दर संसार का चित्र तैर गया.
“आपको कहाँ छोडूं?” उसके पूछते ही रवीन्द्रनाथ
होश में आये.
“हम चले जायेंगे, आप क्यों तकलीफ़ उठाते हैं?”
“क्या अपने प्रिय व्यक्ति से कोई तकलीफ़ हो सकती है?”
रवीन्द्रनाथ ने अपने मित्र के
घर का पता बताया. उसके घर पहुँचने पर वे हाइनरिच से बिदा लेते हुए बोले,
“आपके घर आये बिना हम भारत
वापस नहीं लौटेंगे. अभी-अभी मैंने आपसे वादा किया है, और यदि किसी कारण से चला भी गया, तो भी हम सितम्बर में वापस
आने वाले हैं. तब अवश्य मुलाक़ात होगी. बिलकुल सौ प्रतिशत.”
कार्यक्रम के बाद वे हेलेन के
घर जाने ही वाले थे, कि उन्हें शान्तिनिकेतन से तार मिला. ‘आप तुरंत वापस आयें.’ और वे भारत
वापस आये,
उन्होंने हेलेन को पत्र लिखा,
‘मिसेज़ हेलेन, हम आपसे मिले बिना भारत वापस
आ गए,
इससे आपको बहुत बुरा लगा होगा, यह स्वाभाविक है, परन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण कामों के कारण हमें वापस लौटना
पडा. मगर सौ प्रतिशत कहता हूँ, करीब 1920 के सितम्बर में हम निश्चित रूप से वहां रहेंगे. पिछली बार हमने आपके पति
हाइनरिच से वादा किया था, यह भी वादा ही है. विश्वास रखें, हम निश्चित ही मिलेंगे. सचमुच, हम अवश्य मिलेंगे.’
बंग-भंग आन्दोलन तीव्र होकर
विभाजन होना निश्चित था. अब रवीन्द्रनाथ उद्विग्न हो गए थे. उन्होंने सी. एफ़.
एंड्रयूज़ को पत्र लिखा. नोबेल पुरस्कार के पश्चात् सी. एफ़. एंड्रयूज़ घनिष्ठ मित्र
बन गए थे. जब वे शांतिनिकेतन आये थे तो वहां की आश्रम व्यवस्था, वहां की दिनचर्या, वहां का मुक्त शिक्षण,
वृक्षों के नीचे हो रही पढाई, यह सब देखकर सी. एफ़ एंड्रयूज़ अत्यंत प्रभावित हुए, उन्होंने कहा,
“गुरुदेव...”
“अब आप भी मुझे गुरुदेव
कहेंगे?”
“आप तो सभी के लिए गुरुदेव
हैं. यह जो शिक्षा प्रणाली, आश्रम व्यवस्था, और मुक्तांगन में पढाई, जो हम देख रहे हैं, वैसी विश्व में कहीं भी नहीं है. फिर आपके मन में यह कल्पना कहाँ से आई?”
“दुनिया में भारत एक ऐसा देश
है,
जहां हज़ारों वर्षों से एक संस्कार युक्त, प्रकृति और मानव के बीच सामंजस्य स्थापित करने
वाली, संस्कृति के निर्माता ऋषि
मुनियों ने मुक्तांगन आश्रम पद्धति का आरंभ किया था. आश्रम में दस सहस्त्र
विद्यार्थी ज्ञानार्जन कर रहे थे. वे ऋषि कुलपति थे. उसी प्राचीन आश्रम व्यवस्था
का हमने यहाँ फिर से शुभारंभ किया है.”
“सचमुच, आपका यह प्रयोग अलौकिक है,
गुरुदेव,
और जैसा कि आपने वर्णन किया है, वही ऋषि मेरे सामने उपस्थित है. वही प्रज्ञावंत चेहरा, वैसी ही सफ़ेद दाढ़ी, वैसे ही गर्दन पर झूलने वाले
शुभ्र बाल. तेजस्वी नेत्र और अनुभव से आई सम्पन्नता...”
“ओ.के. एंड्रयूज़,
कल्पना हमारी होने पर भी उसे साकार करने के लिए कठोर परिश्रम किये यहाँ के
शिक्षकों ने. इसके लिए धनराशी जमा करने में हमने अपनी बहुत सारी संपत्ति दांव पर
लगा दी. लोगों का सहकार्य मिला, परन्तु अंग्रेज़ अधिकारियों ने बहुत कष्ट दिए. हमारे अपने परिवार के लोगों
ने भी अत्यंत कठोर विरोध किया.”
“किसी भी प्रकार का विरोध दृढ़
संकल्प वाले व्यक्ति के मन को और अधिक प्रोत्साहित करता है. आप भी दृढ़ संकल्प रहे, यह आपकी विशेषता है.”
“गुजराती लोगों ने भी आर्थिक
सहकार्य किया,
परन्तु आश्रम का कारोबार अधिकाधिक बढ़ रहा था, और हमारे मन में विचार आया कि शांति निकेतन को
केवल बंगाल तक सीमित न रखते हुए व्यापक होना चाहिए. प्रत्येक प्रांत से
विद्यार्थियों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए यहाँ आना चाहिए. जात-पात, संप्रदाय, धर्म के बंधन यहाँ न हों.
सम्पूर्ण भारत की नई पीढी यहाँ आयेगी, और ज्ञान से समृद्ध होगी – ऐसा दृश्य हम देख रहे हैं.”
“गुरुदेव, आपका यह स्वप्न निश्चित रूप
से साकार होगा. क्योंकि इससे विश्व बंधुत्व और मानवता का सन्देश पूरे विश्व में
जाएगा. आज तक ऐसी आश्रम व्यवस्था कहीं भी नहीं है. यह एक नई बात है, केवल उत्सुकतावश अनेक पालक
यहाँ आयेंगे और यह केवल विद्यालय न रहकर इसका रूपांतर विश्वविद्यालय में अवश्य
होगा. चाहें तो मेरे ये शब्द लिख लें.”
“यदि ऐसा सचमुच हमारे सामने
हुआ,
तो हम विद्यार्थियों को पदवी प्रदान करते समय हमारे पिता द्वारा यहाँ लगाये गए
सप्तपर्णी के पत्ते से उनका सम्मान करेंगे. उसे बिदा करेंगे. जहां भी वह
विद्यार्थी जाएगा,
उसे सदैव सप्तपर्णी की सुगंध और उसके पत्ते का स्मरण रहेगा.”
“वा...वा...गुरुदेव, अति सुन्दर कल्पना. पिता के
नाम को अजरामर करने की विख्यात कवि की यह कल्पना सचमुच में अभिनंदनीय है. कभी किसी
ने ऐसी कल्पना की होगी, ऐसा संभव नहीं है, और कोई करेगा भी नहीं.”
सी एफ़. एंड्रयूज़ शांति निकेतन
में दो दिन रहकर लौट गए और रवीन्द्रनाथ पत्रों का बड़ा ढेर सामने रखकर बैठ गए.
उनमें से सबसे पहले उन्होंने दो पत्र अलग निकाले. एक था राणू चौधरी का, दूसरा – हेलेन का. उन्होंने
सर्वप्रथम हेलेन का पत्र पढ़ा. लन्दन जाकर भी वे उसके घर नहीं गए थे, इसलिए उसने अपनी नाराज़गी
व्यक्त करते हुए लिखा था,
‘गुरुदेव, आप आयेंगे इस कल्पना से हो
रही प्रसन्नता अत्यंत दुःख में परिवर्तित हो गयी है. आपके ‘प्रॉमिस’ शब्द
की प्रतिष्ठा कम से कम आज तो धूमिल हो गई है. और, यदि आप सोचते हैं, कि शब्द में भी प्रतिष्ठा होती है, तो आप उसका योग्य पालन करें, आप आयें. हम प्रतीक्षा कर
रहे हैं.’
पत्र पढ़कर वे समझ गए कि यह
अत्यंत प्रेमभरा गुस्सा है. परन्तु उसका भावनिक रूप से उत्तर देना उनके लिए असंभव
नहीं था. सचमुच कितने सारे वर्षों बाद अधिकारपूर्वक, प्रेम से गुस्सा करने वाला भावनिक पत्र उन्हें
मिला था. मृणालिनी के जाने के बाद ऐसे पत्र सिर्फ हेलेन ने ही लिखे थे. जिसमें
उनके लिए उत्कट निमंत्रण था. उन्होंने हाथ में पेन लेकर शांति निकेतन के ‘लेटर पैड’
पर लिखना शुरू किया,
‘मिसेस हेलेन,
सबसे पहले हम ‘सॉरी’ कहते
हैं. हम आपके यहाँ आने ही वाले थे, परन्तु शांति निकेतन के किसी आवश्यक काम के सिलसिले में वापस आना पड़ा. आप
दोनों ने हमारे साहित्य के अनुवाद का इतना बड़ा काम हाथ में लिया है, कि आपसे बिना मिले आना संभव
ही नहीं था. परन्तु हम अपनी शब्द प्रतिष्ठा का पालन अवश्य करेंगे. हम आने ही वाले
हैं. शायद अगस्त में भी आ जाएँ, निश्चिन्त रहें.’
इसके बाद वे राणू चौधरी को
पत्र लिखने लगे. अब तक उन्होंने राणू को सरल भाषा में अनेक पत्र लिखे थे. उसे पत्र लिखते हुए उन्हें मीरा की याद
आती. 13-14 वर्षों
की मीरा,
अनेक स्थानों पर आबो-हवा बदलने के लिए ले गए, परन्तु उसकी मृत्यु हो ही गई. माधुरीलता भी गई, और राणू चौधरी एक खिलती हुई
कली की तरह उनके जीवन में आई. मासूम, बेधड़क राणू को उन्होंने आज तक देखा ही नहीं था.
‘प्रिय राणू,
तुम्हे ऐसा लगता होगा, कि मैं खूब प्रसन्न हूँ, मगर
वैसी बात नहीं है! तुमने अपने पुरस्कारों की लिस्ट भेजी है. हमें भी पुरस्कार
मिलते हैं. और बताऊँ, मज़ा तो हमारी भी है. तुम्हारे पुरस्कार समारोह में पाठशाला के तथा अन्य लोग
आये होंगे. मगर कितने?! ये तो तुमने लिखा ही नहीं. तुम्हें पता है, शांति निकेतन में जो पुरस्कार समारोह हुआ था, उसमें दस हज़ार से अधिक लोग
थे.
‘त्तुमने लिखा है, कि कार्यक्रम में अपने
पालकों के साथ एक छोटी बच्ची आई थी. वह खूब ज़ोर से रोने लगी, और उसकी माँ उसे लेकर बाहर
गई. तुम्हें बताता हूँ राणू, कि हमारे यहाँ आवाजों का इतना कोलाहल हुआ कि किसी को किसी की बात सुनाई
नहीं दे रही थी. छोटे बच्चों का रोना, एक दूसरे को आवाज़ देना, कहीं-कहीं कुछ खेलने की आवाजें, बैलगाड़ी की आवाज़, वहां
मेलेवाले लोग आये थे, उनकी आवाजें, मंडपों की कनातों की हवा में फडफडाती आवाजें, पटाखों की आवाजें, हंसने की, चीखने की आवाजें, समझ में आया राणू की आवाजें कितनी तरह की हो
सकती हैं.
‘पौष प्रतिपदा को मैदान में
खूब बड़ा बाज़ार लगा था. उसमें मिट्टी की गुडिया, खाने-पीने की अनेक चीज़ें थीं, इसलिए बच्चों की ज़िद, माँ का गुस्सा करना, इसके अलावा एक मंडप में
‘कंसवध’
नाटक भी चल रहा था, उसके संवाद ज़ोर-शोर से चल रहे थे. मतलब, ये आवाज़ों की दुनिया ही थी.
सिंघाड़े और आलूबडे की दुकानें भी थीं. सुकेशी भाभी ने बादामों से एक गुडिया बनाई
थी,
वह छः आने में बिक गई. कमला ने मिट्टी का एक घर बनाया था, वह घर उसने मझे ही तीन रुपये
में बेचा,
चारों तरफ़ दीवारों से घिरे घर में एक शिवलिंग था. अनेक लड़कियों ने रूमाल बनाए थे.
वे लड़कियां,
- ‘आठ आने का एक रूमाल’ कहती हुई मेरे ही पास उन्हें बेचने के लिए आईं. हम ‘नहीं-नहीं’ कह रहे थे, मगर उन्होंने दो रूमाल जेब
में ठूंस ही दिए. ऐसी ऐसी मजेदार बातें हुईं. अब बताओ, तुम्हारे पुरस्कार समारोह में मज़ा आया, या शांति निकेतन में? तुम्हे
हमने अनेक बार बुलाया, परन्तु तुम्हारी जिद है, कि जब तक हम तुमसे नहीं मिलेंगे, तुम्हारे घर नहीं आयेंगे, तब तक तुम यहाँ नहीं आओगी.’
‘अब तुम्हें भी हम बताते हैं.
हम अवश्य आयेंगे. परन्तु हमारा अनुमान है कि तुम पढाई लिखाई में अच्छी हो, मगर शायद तुम्हें खाना बनाना
नहीं आता, है ना?
फिर भी हम आयेंगे.’
पत्र पूरा करने के बाद उसे
लिफ़ाफ़े में बंद करते हुए उन्हें मन ही मन हंसी आ रही थी. हम हरेक से मिलने का वादा
करते हैं. जॉर्ज बर्नार्ड शॉ को हमने पत्र लिखा था. पहले आप भारत आइए, फिर हम आपके
यहाँ आएंगे.
और वैसा होने से पहले ही हम
जॉर्ज बर्नार्ड शॉ से उनके घर में ही मिले थे. इसके बाद वे भारत आये थे. उसी तरह
यदि हेलेन आती तो?
मगर कैसे आयेगी?
हमने उसे निमंत्रण कहाँ भेजा है? हमने ही उसके निमंत्रण को स्वीकार किया है.
सचमुच, पत्रों की इस दुनिया में
हमें बहुत प्रसन्नता होती है. पत्रों का ढेर देखकर अपने पसंद के पत्रों को अलग
करके,
उनमें से प्रिय व्यक्ति को उत्तर देते हैं.
सत्येनदा की इंदिरा, अपने प्रिय भाई की कन्या को
भी हमने अनेक पत्र लिखे. चाहे देश में हों, या विदेश में, शांति निकेतन में हों, या कहीं अन्यत्र, उसे नियमित रूप से पत्र
लिखते थे. उसका विवाह हो गया और और पत्रों का प्रवाह कुछ कम हो गया. पत्र समाप्त
नहीं हुए थे,
परन्तु वह अपने संसार में व्यस्त हो गई थी. उन्होंने बहुत पहले कटक से, शायद सन् 1893 में उसे एक पत्र भेजा था, जिसमें लिखा था,
‘प्रिय बॉब,
भतीजी के रूप में ‘इंदिरा’
नाम से तुम्हें संबोधित न करते हुए तुम्हारे घर के ही नाम से तुम्हें आज तक पत्र
लिखे. आज एक बात का उल्लेख करने का बहुत मन हो रहा है. एक समय में हमारे मन में यह
इच्छा उत्पन्न हुई थी, कि हम देश के लिए स्वयँ को समर्पित कर दें. घर-परिवार की तरफ़ भी ध्यान नहीं
दिया, तुम तो जानती ही हो. अनेक
निरर्थक काम करते हुए गर्दन झुकाकर अपने देश के सभी दरवाजों के सामने खड़े रहे, परन्तु हाथ खाली ही रहे. कुछ
भी नहीं मिला.
ईश्वर की कृपा से सुन्दर शरीर
प्राप्त हुआ,
और इसीलिये भूखे पेट घर-घर भीख माँगते हुए हम वैसे ही रहे. क्योंकि जिसके भी द्वार
पर गए,
उन्होंने कुछ किया तो नहीं, बल्कि हमें गालियाँ ही दीं. खासकर निकटतम मित्रों से बहुत वेदनाएं प्राप्त
हुईं. किसी किसी ने छुपे वार भी किये, परन्तु कुछ अभी शेष हैं, जिन्होंने मौनव्रत धारण कर लिया है.
‘जाने दो, अनेक व्यक्तियों को हम पढ़
सके. यह ऐसा दुःख है, जो समाप्त होने पर भी दिल में रह गया. दूसरों पर निशाना साधे हुए वे तीर
हमारे सीने में ही चुभ रहे थे. केवल महात्मा चित्तरंजन को छोड़कर! बन्किम, शरद, नवीन सेन – इनमें से किसी को
भी इतनी गालियाँ नहीं सुननी पडीं. किसी किसी का पेशा ही होता है दूसरों को गालियाँ
देने का. क्योंकि गालियाँ देने से उन्हें प्रसिद्धि प्राप्त होती है.
‘हम विदेश जाते हैं, तो वहां के लोगों से सन्मान
प्राप्त करने के लिए ही,’ असल में ये लोग हमें जानते ही नहीं हैं. अब मन में ऐसा विचार उठता है, कि हमारी मृत्यु के बाद
श्रद्धांजलि देते हुए हमारी ऐसी विडम्बना न की जाए. क्योंकि जीवित रहते हुए
जिन्होंने हमारी किसी भी प्रकार की सहायता नहीं की, उनके प्रति हम कृतज्ञ हैं. क्योंकि हमें किसी
से भी कुछ भी नहीं मिला, यह भी कैसे कहें? जिन्होंने जो थोड़ा बहुत हमें दिया, वे हमारी श्रद्धांजलि सभा का
आयोजन नहीं करेंगे, और जिन्होंने कुछ भी नहीं दिया, वे शौक से हमारी श्रद्धांजलि सभा का आयोजन
करें.
‘हमारा श्राद्ध इस तरह से
किया जाए,
कि उसे किसी भी समारंभ का स्वरूप न प्राप्त हो. लोगों को उस प्रसंग पर आमंत्रित न
किया जाए. ‘शांति निकेतन’ के ‘शालवन’
में हमारी स्मरण-सभा हो. जिस भी स्थान से हमें प्रेम था, वहां पर हमारा नाम लिया जाए.
आगे क्या लिखूं!’
तुम्हारा,
रवी चाचा.’
उस दिन वे एक के बाद एक पत्र
लिखते रहे. समय का भान खो गया था. वे अपने आप में मगन थे. कुछ ही दिन पहले उनके
संपर्क में प्रमथ चौधरी नामक नवोदित लेखक आये थे. आते ही उन्होंने रवीन्द्रनाथ के
दिल में अपना स्थान बना लिया, और वे रहने के लिए ही आ गए. देखते-देखते उनका विवाह सत्येन्द्रनाथ की कन्या
इंदिरा से हो गया था. इंदिरा अब प्रमथनाथ चौधरी की पत्नी हो गई थी. उनसे भी
रवीन्द्रनाथ का पत्र व्यवहार शुरू हो गया था. एक दिन उन्होंने लिखा,
‘कल्याणियेषु भाई प्रमथ,
कैसे बताऊँ की हमारे मन की
अवस्था कैसी है. हमारा मन अभी अत्यंत अस्वस्थ है. लेख तो लिखा है, परन्तु वह ठीक ठाक लिखा गया
है,
यह पढ़ने के लिए भी समय नहीं है.
‘कुछ देर बार अत्यंत थकावट के
कारण हम बिस्तर पर लेट गए, परन्तु मन ही मन लिखते ही रहे, और मन ही मन लिखते हुए नींद भी आ गई. और जो
लिखा,
उसे शीर्षक दिया ‘अनंग आश्रण’. शायद लोग ये समझें की रवीन्द्रनाथ ने कोइ विनोदी लेख लिखा है. आजकल हटकर कोई
चीज़ लिखी जाए तो फ़ौरन टीका-टिप्पणी होने लगती है. रूचि बदली, स्वभाव बदला, लेखन शैली बदली – मानो ये कोई
अपराध ही हो.
‘कभी कभी ऐसा लगता है, कि सभ्यता के दबाव के कारण या फिर लोगों की
सभ्यता की परिभाषा सीमित होने से ‘प्रेम’ शब्द भी लज्जास्पद लगने लगता है.
‘खैर, समय कम है. और हम जल्दी ही
आपसे मिलने आ रहे हैं. इसलिए अधिक कुछ नहीं लिखेंगे. अच्छा!
रवीन्द्रनाथ’
पत्र लिखने के बाद उन्होंने
फिर से पलंग पर सोने का प्रयत्न किया, परन्तु अब उनके सामने जिसे कभी भी नहीं देखा था, परन्तु पत्रों से दिल खोलकर लिखने वाली, शब्दों से प्रेम करने वाली
हेलेन खड़ी हो गई और उससे एक बार मिलने का मन ने निश्चय कर लिया. 5 जून को जाकर वे वापस आये थे, अब जुलाई 1920 समाप्त होने वाला था. अगस्त
में जाकर अचानक उसे मिला जाए, इस कल्पना में मगन वे सहज ही निद्राधीन हो गए.
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