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आज सुबह-सुबह रवीन्द्रनाथ
की आंख खुल गयी. आकाश बादलों से ढंका हुआ था. चन्द्रमा और तारे उसमें खो गए. अकारण
ही मन में बेचैनी छा गई. बेहद अस्वस्थता प्रतीत होने लगी. कुछ भी समझ में नहीं आ
रहा था. ऐसा क्यों हो रहा है? ये मन में किसी अनहोनी के संकेत तो नहीं हैं? जीवन में
अनेक घटनाएं हुईं, अनेक लोगों के मृत्यु देखे, मन अत्यधिक अस्वस्थ हो गया, मगर अपने मार्ग से विचलित
नहीं हुआ. आज ही ऐसा क्यों हो रहा है? उन्हें अपनी ही एक कविता याद आई, जो उन्होंने ‘गीतांजलि’ में लिखी
थी,
मेघेर
परे मेघ जमेछे, आंधार कोरे आछे
आमाय कॅनो बशियो राखो, एका द्वारेर पाशे .
आकाश में मेघों की व्याप्ति धीरे धीरे बढ़ रही है. अँधेरे
ने वातावरण को घेर लिया है और हम अकेले ही बैठे राह देख रहे हैं...मगर किसकी? और क्यों? क्या कोई
आने वाला है, या किसी का सन्देश आने वाला है?
दिन तो अनेक लोगों के मध्य बीत जाता है, परन्तु
रात हमारी होती है. प्रार्थना होने के बाद दिन भर शांतिनिकेतन में अहर्निश
पक्षियों की चहचहाहट हो, और उस ध्वनी में हर चीज़ का विस्मरण हो जाए, बिलकुल
ऐसा ही था शांतिनिकेतन में.
काजेर दिने नाना काजे थाकी लोकर माझे
आज आमी जे वशे आछी तोमारी आश्वासे.
दैनंदिन कार्यों में हम सदैव व्यस्त रहते हैं, परन्तु आज
का व्याकुल दिन हम किसी संकेत की प्रतीक्षा में व्यतीत कर रहे हैं. हे प्रभु ...
तुमी जदी ना देखा, दाओ करो आमार हॅला
कॅमन करे काटे आमार अॅमन बादल
बेला
यदि तुमसे मिलने की इच्छा को तुमने
दुर्लक्षित किया, तो इस
मेघाच्छन्न अँधेरे का क्या करूँ? तुम्हारे आने का संकेत दो. अन्यथा दिन कितना अस्वस्थ बीतेगा, यह जानते हो ना तुम?
दुरेर पाने मेले आखी केवल आमी चेये
थाकी
प्राण आमार केंदे वेडाय दुरंत
बाताशे.
हम सिर्फ दूर से ही तुम्हारी ओर
देखते हैं. इस बहती हवा के कारण हमारी जान भी ऊपर-नीचे हो रही है. अस्वस्थ्य हो
रही है.’
रवीन्द्रनाथ सचमुच में अस्वस्थ हो
गए थे. दूर से आने वाली हवा सांकेतिक भाषा में उनसे कुछ कह रही थी, परन्तु वे समझ नहीं पा रहे थे, उन्होंने ईश्वर से
प्रार्थना की,
‘हे प्रभु, तुम्हारी सांकेतिक भाषा हमें आघात पहुँचने के बाद ही समझ में आई. अब कौनसा
आघात करने वाले हो? ये किस सन्देश के संकेत हैं? हम अतिशय व्याकुल हैं.’
उन्हें याद आया, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में
भाषण देने के बाद जर्मनी में हेलेन से मिले बिना ही वापस आ गए थे. आने के बाद उसे प्रॉमिस
करते हुए एक पत्र भी लिखा. उसके अनुसार अगस्त में जाने का निश्चय किया और उस दिन
ऐसा ही घनघोर बादल घिर आया था. हवा सरसराते हुए आई. उस सांकेतिक भाषा को वे समझ
गए. तब उन्हें शाम को तार मिला था, लोकमान्य तिलक के निधन के बारे में. एक ध्रुवतारा फिर
से आकाश में समा गया. अंग्रेजों के विरुद्ध असंतोष निर्माण करने वाले,
स्वतंत्रता के लिए जान की बाज़ी लगा देने वाले, मंडाले के कारागार में
भगवद्गीता पर भाष्य करने वाले, न्यायालय में न्याय की अपेक्षा न करने वाले, और ‘ईश्वर
ही हमारा न्यायालय है’, ऐसा कहने वाले लोकमान्य तिलक चले गए. रवीन्द्रनाथ को बहुत दुःख हुआ. जब
उनकी अंत्ययात्रा निकली तो आसमान भी फूट-फूट कर रोया था. हज़ारों व्यक्ति भीगते हुए
उनकी अंत्ययात्रा में सहभागी हुए थे.
रवीन्द्रनाथ भी दिन भर बेचैन रहे. रात में वे विचार कर
रहे थे, ‘जन्म लेने वाला हर व्यक्ति मृत्यु के मार्ग पर जाता ही है, परन्तु
जाते हुए, या जाने के बाद समाज के मन पर उसकी छाप कितनी अमिट है, उसका
कार्य कितना प्रखर और समाजाभिमुख था, उनका वर्तमान कितना प्रभावशाली था, इसका लेखा
जोखा इतिहास रखता है. और तिलक का स्मरण वर्तमान भारत के साथ भविष्य का भारत भी
करेगा. एक कृतार्थ जीवन का कृतार्थ समापन हो गया था. मृत्यु तो अपरिहार्य ही है.
उन्होंने मन ही मन लोकमान्य तिलक को श्रद्धांजलि देते
हुए कहा, ‘लोकमान्य, आप लोकमान्य, सर्वमान्य हो गए. जीवन के सभी संपादित लेख आपने उत्तम प्रकार से लिखे.
समाज आपको दीर्घायु देने वाला है, ईश्वर के न्यायालय में आपको गवाही नहीं देनी पड़ेगी. आप
मृत्युंजय हो गए हैं. इतिहास में एक युग आपके नाम से लिखा जाएगा.’
उस दिन उनके मन में एक अद्भुत कल्पना ने जन्म लिया.
‘ईश्वर मृत्यु तो अवश्य दे, परन्तु मृत्यु के पश्चात् दूसरे दिन कम से कम पांच मिनट
अवकाश से सबका आभार मानने का अवसर भी दे. कितने लोगों ने प्यार किया, कितने
लोगों ने हमारे जाने के बाद राहत की सांस ली, इन सबके प्रति एक बार
कृतज्ञता व्यक्त करने की संधि तुम अपनी अलिखित आचार संहिता में लिख लो.’
वे मन ही मन हँसे. सृष्टी के जन्म के साथ ही अंत – बस
इतना ही कहती है ईश्वर की आचार संहिता, और जीवनपट बहुत कुछ कहता है. उसे तो हम
अपने कार्यों से लिख सकते हैं. हमने क्या लिखा, समाज मन ने उसे कैसे
स्वीकार किया, यह तो जीवन की सांझ बेला में हमें ज्ञात हो ही जाता है. फिर दूसरे दिन
अवकाश से पांच बोलने की क्या आवश्यकता है?
जहां जाना है, वहां शब्दों का मोह क्यों हो? एक बार ख़त्म हुआ तो हो गया
ना!
उन्होंने लोकमान्य के कार्यों पर एक लेख लिखा और उसे
पूरा करते हुए उनका मन भर आया. चाहे जो भी हो, मध्याह्न के प्रगल्भ और
प्रौढ़ सूर्य का अस्त होता ही है. जो हमने किया, वही पीछे रह जाता है. संध्या छाया
के बाद भी कल के उषःकाल के लिए.
उन्होंने निश्चय किया की हेलेन से मिलने अवश्य जायेंगे.
हमें अपना वादा पूरा करना चाहिए और हमारा अंत कब और कहाँ होगा, यह तो
ईश्वर को ही ज्ञात होगा. परन्तु हमारे शब्दों की अपनी प्रतिष्ठा होनी चाहिए. यह
निश्चित है.
उन्होंने अगस्त के बदले सितम्बर में उससे मिलने का
निश्चय किया और उसे पत्र लिखा. उसका खुशी से लबालब जवाब आया. रवीन्द्रनाथ के
नेत्रों के सामने आनंद की लहरों पर झूलती हुई हेलेन का चित्र तैर गया.
और वे फिर से इंग्लैण्ड के ‘प्लीमथ’ किनारे पर
उतरे. तब उनके स्वागत के लिए दोनों खड़े थे. उनके चेहरों पर आनंद स्पष्ट दिखाई दे
रहा था. हाइनरिच ने उनकी संदूक उठाई, हेलेन ने उनका हाथ पकड़ा, और जब वे किनारे से चले तो
उन्हीं की आयु का एक व्यक्ति गौर से उनकी ओर देख रहा था. तीनों के पास आते ही वह
आगे बढाकर बोला,
“आर यूं मिस्टर रवीन्द्रनाथ?”
रवीन्द्रनाथ ने सहमति से गर्दन हिलाई, तब उसने कहा,
“ आय एम् बर्ग सन ....”
रवींद्रनाथ ने फ़ौरन उसके हाथ अपने
हाथों में लिये.
“वेरी ग्लैड टू मीट यू” और हाइनरिच
का उससे परिचय करवाते हुए बोले,
“आप हैं, हैनरी बर्गसन . महान दार्शनिक,
अध्यापक, लेखक, और उत्तम वक्ता हैं. इनकी पुस्तक ‘ला.
एवोल्यूशन’ पूरी
दुनिया में प्रसिद्ध है.”
“रवीन्द्रनाथ, यह सब जानकारी आपको कैसे मिली?”
“मैं सूर्य हूँ, ऐसा सूर्य को कहना
नहीं पड़ता. आपके भाषण लोगों ने सुने हैं. हमने केवल आपकी स्तुति सुनी है.”
“मिस्टर बर्गसन, आप भी जर्मनी चलें, आप पैरिस में रहते हैं ना? हम भी अखबारों में आपके बारे में पढ़ते रहते हैं,” हेलेन ने कहा.
“आप चलें, हम अपनी कार लाये हैं. शीघ्र ही फिर मिलेंगे. परन्तु यदि रवीन्द्रनाथ हमारे
यहाँ आये, तो हम सम्मानित होंगे.”
“हम अवश्य आयेंगे, अवश्य.”
हेलेन को बहुत खुशी हो रही थी, कि अब रवीन्द्रनाथ निश्चित ही उनके घर आयेंगे. घर
लौटते हुए भी वह उन्हींके साहित्य के बारे में जी भर के बातें कर रही थी.
उसका घर चार कमरों का छोटा सा बंगला
था. बाहर फूलों की छोटी सी बगिया थी. चारों तरफ़ खाली जगह थी. तीन तरफ पहाड़ियाँ
थीं. रवीन्द्रनाथ को वह छोटा सा बंगला बहुत अच्छा लगा. मानो हर कदम पर प्रसन्नता
बिखरी थी. वे बोले,
“मिस्टर हाइनरिच, आपका घर बहुत सुन्दर है.”
“सही है, क्योंकि आनंदपूर्वक सब कुछ करने वाली ‘आनंद’ नामक परी हमारे यहाँ है. सबको
दिल से प्यार करती है.”
और उन्हें मृणालिनी की याद आई.
अत्यंत सुन्दर, सात्विक मृणालिनी इसी तरह हर चीज़
से प्यार करते हुए खुश होती थी, और वह आनंद उसके
रोम रोम से प्रकट होता था.
उसने रवीन्द्रनाथ को उनका कमरा
दिखाया. वह अत्यंत कलात्मक पद्धति से सजाया गया था. रवीन्द्रनाथ प्रसन्नता से
हँसे.
दो दिन की छुट्टी के बाद हाइनरिच
अपने कॉलेज गया. जाते समय उसने कहा भी, “व्हेरी सॉरी,
रवीन्द्रनाथ, मुझे कॉलेज जाना ज़रुरी है. और हेलेन तो है ही. वह आपका ध्यान
रखेगी.”
उसके जाने के बाद हेलेन उन्हींका साहित्य और उसके द्वारा
किया हुआ अनुवाद उन्हें दिखा रही थी. रवीन्द्रनाथ हंस पड़े.
“सच बताऊँ, सर! हंसते हुए आप बहुत सुंदर लगते हैं, मगर आप
ऐसे क्यों हँसे?”
“हेलेन, तुम्हारी जर्मन भाषा हमें कहाँ आती है? हमें
दिखाने से क्या फ़ायदा? यह हमारी ही पुस्तक का नाम है, ये हमें कैसे पता चलेगा?”
“यू आर राईट, सर. परन्तु मेरे मन में एक विचार आया है, प्रत्येक प्रकाशित किताब पर
आपका फोटो और ‘स्लोगन’ रहेगा. उसमें ‘नोबेल पुरस्कार प्राप्त रवीन्द्रनाथ टैगोर’ ऐसा
अंग्रेज़ी में लिखने से लोगों को समझ में आयेगा ना?”
छरहरे बदन वाली, मुस्कुराते गोल चेहरे वाली, नीली
आंखों वाली और किसी छोटे बच्चे जैसी मासूम और उत्सुक थी हेलेन. वे उसकी तरफ़ देखते
हुए बोले,
“ लोगों को पसंद आये, ऐसी ही हो तुम...!”
“सर, मेरी बात रहने
दीजिये. आप तो साठ वर्ष के हैं, इस बात की तो
कल्पना ही नहीं की जा सकती. आपका वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं. औरों
की बात तो नहीं कह सकती, मगर मैं तो पहली
नज़र में ही आपसे प्यार करने लगी हूँ.”
रवीन्द्रनाथ
को समझ में नहीं आ रहा था, कि क्या कहें. उसके पत्रों से अदृश्य प्रेम का आभास तो
हो ही गया था. अब उसने स्पष्ट स्वीकारोक्ति दे दी थी. शायद यहाँ के मुक्त वातावरण
में उसे यह सब कहने में संकोच न हुआ होगा, मगर उन्होंने स्वयं को संभालते हुए विषय
बदलकर कहा,
“आपके
बच्चे? परिवार?”
वह
दिल खोलकर हंसी. उसके सुनहरे बाल माथे पर आ गए. हौले से उन्हें दूर करते हुए बोली,
“आपने विषय बदल दिया, सर... मेरी उम्र पैंतालीस और हाइनरिच बयालीस साल का
है. परिवार इत्यादि तो हमारे वार्तालाप का विषय ही नहीं है.”
दो दिन बाद जब वे वापस जाने के लिए निकले तो उसके चेहरे पर उदासी छाई थी. मन
ही मन अच्छा भी लगा. चारों ओर घूमने वाली, दिल खोलकर बोलने वाली, उनके ही
साहित्य से दिल तक पहुँचने वाली हेलेन उन्हें अच्छी लगी. ढलती दोपहर में संध्या
छायाएं आँगन से वृक्षों पर स्थिर हो जाएँ, तब हेलेन जैसी स्त्री पर
दिल आ जाए, इसका उन्हें स्वयं भी आश्चर्य हुआ.
वही आगे बोली, “आप मेरे घर का प्रकाश हैं. रवी हैं. आप मेरे घर का रत्नभण्डार हैं. बहुत
कुछ कहना चाहती हूँ, मगर शब्द वैसे ही रह जाते हैं.”
उनके यूरोप के दौरे में उनकी हेलेन से तीन बार मुलाक़ात हुई. पहली हुई तीस
सितम्बर को. पहली बार रवीन्द्रनाथ उसके घर गए और सन् उन्नीस सौ इक्कीस में दो बार
हुई. एक बार उसके घर और एक बार बर्लिन में.
उसका फुर्ती से इधर उधर घूमना, उनकी ज़रुरत का ख़याल रखना, उनकी पसंद
का ध्यान रखना, सब कुछ मन में संजोये वे भारत लौटे और उनकी मेज़ पर शीघ्र गति से आया एक
पत्र रखा था. इसमें उसने लिखा था,
‘सच बताऊँ, आपके यहाँ रहते हुए ध्यान गया आपकी भव्यता, रूप सौन्दर्य, प्रतिभा, वाणी के
विलक्षण माधुर्य पर, और मेरे शब्द बाहर आने से डर रहे थे. आपके व्यक्तित्व के
सामने मैं कितनी क्षुद्र हूँ इसका एहसास हुआ. मैं सिर्फ सब कुछ भूलकर बस आपकी ओर
देखती रही. आपको क्या देना चाहिए यह भी मेरे ध्यान में नहीं आया, और बाद में जब
सोचा, तो पता चला कि मेरा मन ही आपको अर्पण करने के सिवाय मेरे पास और था ही
क्या? ये सब मैंने लिख तो दिया, मगर आप ऐसा तो नहीं कहेंगे ना कि मैं स्वार्थी
हूँ?’
पत्र पढ़कर रवीन्द्रनाथ का मन भर आया. हम पर कोई ऐसा प्रेम कर सकेगा, यह कल्पना
ही अद्भुत थी. कुछ देर वे स्तब्ध बैठे रहे और फिर उनकी अनुपस्थिति में शांतिनिकेतन
में क्या क्या हुआ इसका लेखा जोखा लेने के लिए उन्होंने दोपहर में बैठक का आयोजन
किया. इस परदेसी हेलेन को मन से दूर करने के लिए नई योजनाओं, नए लेखन
की ओर मुड़ना आवश्यक था.
उन्होंने आते ही काम की स्थिति देखी और दोपहर बाद की बैठक में सबको संबोधित
करते हुए बोले,
“हम चाहे यहाँ हों या न हों, फिर भी हम जो योजनाएं कार्यान्वित करने के उद्देश्य से
आपके सम्मुख रखते हैं, तब खासकर परदेस से आने के बाद समझ में आता है, कि वे योजनाएं कार्यान्वित
हो चुकी हैं, अथवा हो रही हैं. इसका अर्थ यह है कि यहाँ उपस्थित सभी कार्यकर्ता, अध्यापक –
सभी शांतिनिकेतन की कार्यप्रणाली पर हृदयपूर्वक प्रेम करते हैं. अर्थात् हमसे
स्नेह करते हैं. इसीलिये दो-तीन विद्यार्थियों से आरंभ हुई यह पाठशाला अब प्राथमिक, माध्यमिक
और उच्च माध्यमिक पाठशाला हो गई है. प्रति वर्ष अनेक विद्यार्थी यहाँ से शालांत
परिक्षा देकर उच्च शिक्षण के लिए अथवा नौकरी करने के लिए बाहर जाते हैं.
अनेक कलाएं यहाँ प्रेम से रहती हैं, अनेक चित्रकृतियों को विदेश में भी
बाज़ार मिले ऐसा हमारा आज का प्रयत्न कल यशस्वी हो ही जाएगा. यहाँ के संगीत को, नाट्य को
काफ़ी हद तक प्रसिद्धी मिली है. आप उसे स्नेहपूर्वक रवीन्द्र संगीत, रवीन्द्र
नाट्य कहने लगे हैं. आगे भी यह विश्वपरिचित होगा, ऐसा हमें पूरा विश्वास है.
उसी तरह यहाँ मिट्टी से, शंखों-सीपियों से, वृक्षों के तने से निर्मित
सुन्दर कलाकृतियों को सियालदह के बाज़ार में महत्वपूर्ण स्थान मिला है. इक्कीस
दिसंबर सन् 1901 को स्थापित शांतिनिकेतन संस्था अब प्रतिष्ठापूर्वक भव्य स्वरूप में खड़ी है.
इन बीस-इक्कीस वर्षों में संस्था ज़रा भी डगमगाई नहीं है. इसका सम्पूर्ण श्रेय आप
जैसे कार्यनिष्ठ कार्यकर्ताओं को और अध्यापक, मुख्याध्यापक को जाता है.”
“गुरुदेव, आप मार्गदर्शक और दिशादर्शक हैं, इसीलिये यह सब यहाँ तक पहुंचा है. योजनाएँ, कल्पनाएँ
आपके दिमाग से आती हैं और उनका मूर्त स्वरूप कैसा होगा, यह भी आप ही समझाकर बताते
हैं. उन योजनाओं को कार्यान्वित करते हुए क्या-क्या करना चाहिए इस बारे में
सूक्ष्म सूचनाएं भी देते हैं. अत्यंत सूक्ष्म कार्यों का विस्तुत विवरण देते हुए
वे सहज साध्य हो जाती हैं,” मुख्याध्यापक ने कहा.
“और आज हम आप सब को साथ लेकर अगली और एक अलग ही सीढ़ी चढने वाले हैं.”
सब लोग अत्यंत आनंद से और अधीरता से उनकी तरफ़ देख रहे थे.
“हम हमेशा ही आप पर एक ज़िम्मेदारी डाल देते हैं, और उसे पूरा करने का
प्रयत्न आपका होता है.”
“गुरुदेव, ऐसा क्यों कहते हैं? आपकी कल्पना से निर्मित शान्ति निकेतन जितना आपका है, उतना ही
हमारा भी है. आपकी योजनाएं पूर्ण करना हमें हमेशा अच्छा लगता है.”
“सत्य है, आप करते ही हैं मनःपूर्वक. कुछ दिनों से अनेक विद्यार्थी यहाँ से शालान्त
परिक्षा उत्तीर्ण करके आगे स्नातक और स्नातकोत्तर शिक्षण के लिए जाते हैं, तब यहाँ
जैसा संगीत, नाट्य, कला, शास्त्र और निर्मिती क्षेत्र है, हर कोई मनचाहे विषय में प्रावीण्य
प्राप्त कर सकता है. शालेय कार्यक्रम पर आज तो हमारा हठ नहीं है.”
“तो फिर आप वास्तव में क्या करना चाहते हैं?”
“सचमुच, प्रस्तावना में ही हमने बहुत समय लिया. यदि हम इस शांतिनिकेतन में स्नातक
और स्नातकोत्तर कार्यक्रम शुरू करें तो कैसा रहेगा?”
“तो देश-विदेश से भी विद्यार्थी यहाँ आयेंगे.”
“हमारा अभिप्राय यही है.”
“मगर और प्राध्यापकों की आवश्यकता होगी, और अनेक विद्यार्थियों के
लिए इंतज़ाम करना होगा.”
“वो सब हो जाएगा. परन्तु हमारे मन में जिस शान्तिनिकेतन का चित्र है, वह
विश्वात्मक हो, यहाँ से विश्व सन्देश प्रसारित हो, हमारी संस्कृति के बारे में
विचार करते हुए हमारे मन में एक नाम प्रकट हुआ.”
“कौनसा?” सबने एक सुर में पूछा.
“ विश्व भारती.”
“अत्यंत सुन्दर, समर्पक और आशयपूर्ण!” मोहित सेन ने कहा.
“हमने अपने निवास स्थान को ‘शाल्मली’ नाम दिया है. हमारे पिता का
यह शांतिनिकेतन चिरंतन रहे, इस सन्दर्भ में एक और विचार मन में आया. स्नातक अथवा
स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करके जाने वाले विद्यार्थी को इस प्रांगण में सप्तपर्णी
वृक्ष का एक पत्ता दिया जाए, वह सप्तपर्णी का वृक्ष हमारे बाबा की स्मृति के रूप में
रहेगा. प्राचीन काल में ‘वरतन्तू’ ऋषि के आश्रम में रहने वाले देवदत्त के पुत्र कौत्स ने
अपने गुरू से गुरुदक्षिणा के सन्दर्भ में पूछा था. ब्राह्मणपुत्र कौत्स निर्धन था.
इसलिए वरतंतू ऋषि ने दक्षिणा नहीं मांगी थी. परन्तु उसकी जिद पर उन्होंने सहस्त्र
सुवर्ण मुद्राएं मांग लीं. तब कौत्स इंद्र के पास गया. तब इंद्र ने अपने ज्ञान की
सामर्थ्य से वे सहस्त्र मुद्राएं पृथ्वी पर उस पेड़ पर बिखेर दीं. उस पेड़ के पत्ते
हम ‘सुवर्ण’ के रूप में औरों को देते हैं. रामायण के पांचवें सर्ग में यह कथा है. वह
पढ़ने के पश्चात् सप्तपर्णी के पत्ते प्रदान करने की कल्पना हमारे मन में आई.”
“गुरुदेव, कल्पना तो अच्छी है, परन्तु...”
“हम समझ गये, की आप क्या कहना चाहते हैं. यह सप्तपर्णी का पत्ता लेकर वह अपने दफ्तर
जाएगा और वहां से लिखित पदवी प्राप्त करेगा.”
अब सबको राहत की सांस लेते देखकर रवीन्द्रनाथ हंसे. जैसे हम मयूरपंख किताब
में रखते हैं, उसी तरह ये पत्ता भी लोग मनःपूर्वक संभाल कर रखेंगे. इस पत्ते के कारण एक
विशिष्ठ परिचय सबको प्राप्त होगा. स्नातकों का प्रांगण में सुन्दर स्वागत करने के
बाद उसे यह सप्तपर्णी का पत्ता दिया जाएगा.”
“अब हमारी आंखों के सामने वह स्नातकोत्तर समारोह दिखाई दे रहा है. सचमुच, गुरुदेव, आपकी
अद्भुत् कल्पनाएं समझने में हमें देर लगती है. परन्तु समझ में आने के बाद सचमुच
में आनंद होता है.”
और सभा में शान्तिनिकेतन में ‘विश्व भारती’ विश्व विद्यालय की घोषणा की
गई. इस काम के लिए उन्होंने मन ही मन स्वयं को समर्पित कर दिया था. उन्होंने मन ही
मन महात्मा गांधी को पत्र लिखा.
“आपकी और हमारी दो बार भेंट हुई. एक बार जब आप यहाँ आये थे, और बाद
में एक और बार. आपने हमसे पूछा भी था, ‘इस स्वतंत्रता के लिए आपकी भूमिका क्या है?’ यह
प्रश्न केवल आप ही नहीं बल्कि अनेक लोग पूछते हैं. हमें भी निश्चित रूप से अपने
देश की स्वतंत्रता चाहिए, परन्तु आज भारत में केवल दो ही प्रणालियां, दो ही
विचार धाराएं हैं. एक – आपका असहकार, अहिंसा का मार्ग, और दूसरा – सशस्त्र
क्रान्ति का मार्ग. नरेन्द्र दत्त ने अध्यात्मिक मार्ग स्वीकार किया, उसी तरह
हमने भी अपना मार्ग चुन लिया है.
‘संस्कार, संस्कृति, कला निर्माण का, नवनिर्माण का, ज्ञान समृद्ध करने का – और सोचा नहीं था कि दो-तीन
विद्यार्थियों से प्रारंभ होने वाली शान्ति निकेतन की पगडंडी राजमार्ग की और
अग्रसर होगी. इसलिए आज समाज में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए दो प्रवाह अत्यंत वेग
से आगे बढ़ रहे हैं.
“सशस्त्र क्रान्ति का आन्दोलन और आपका अहिंसा मार्ग. मूल रूप से सभी
अंग्रेज़ लोग बुरे नहीं हैं. परन्तु राज्यकर्ताओं का साम्राज्यवाद इसका उत्तर नहीं
है. हमने खुद कभी भी हाथों में शस्त्र लेने का विचार नहीं किया, क्योंकि
वह हमारी प्रवृत्ति नहीं है. अनेक बार आन्दोलनों में भी सहभागी हुए हैं. समझ में
आया कि यह भी हमारी प्रवृत्ति नहीं है. अंत में ‘एकला चलो रे’ प्रवृत्ति
से शांतिनिकेतन की ओर मुड़े.”
“हमारा स्वभाव है – ‘निर्मिती’, ‘लेखन’ भी स्वभाव ही है. प्रकृति में ही
हमारा मन प्रसन्न रहता है, यह भी हमारा स्वभाव ही हो गया है, और इस
स्वभावधर्म के अनुसार ‘स्वधर्मे निधनं श्रेय:’ हमारे ही स्वभावधर्म से कार्य करते
हुए जीवन के अंत तक इसी मार्ग पर चलते रहेंगे. परन्तु हमारी अहिंसा पर निष्ठा है, और आपकी
हम पर निष्ठा है, इसकी प्रसन्नता है.
‘जवाहरलाल नेहरू को भी शांतिनिकेतन की संकल्पना को साकार हुआ देखकर अच्छा
लगा. वे अपनी पुत्री को शांतिनिकेतन में भेजने वाले हैं. महात्माजी, उम्र में हम
आपसे बड़े हैं. परन्तु भारतीय लोगों का स्नेहभाव हम पर अधिक है, इसका
एहसास हुआ.
“आज विश्वभारती की संकल्पना प्रस्तुत की है, वह अवश्य ही पूरी होगी.
परन्तु यह सब कहते हुए आज आपके ‘सेवाग्राम’ आश्रम के वर्णन का स्मरण
हुआ और ऐसा लगा कि आपका ‘सेवाग्राम’ का आश्रम विश्व विख्यात होगां उसी तरह
‘विश्वभारती’ विश्वविद्यालय भी विश्व में प्रसिद्ध होगा.
रवीन्द्रनाथ खुद ही हंसे. कथा, कविता, उपन्यास, लेख, नाटक इतनी भव्य संख्या में लिखकर भी हम मन में भी किसी
न किसी को हमेशा लिखते ही रहते हैं. ये हमारा मन है या शब्दों का भण्डार, जो कभी
खाली नहीं होता?’ I
वे उठे. अपने ‘शाल्मली’ कुटीर से बाहर आये. इस कुटीर पर कोई सुन्दर वाक्य होना
चाहिए, ऐसा उन्हें लगा. मन फिर से एक बार शब्दभण्डार का एक एक कोना घूमने लगा.
‘शाल्मली’ कुटीर के बाहर मनमोहक बाग़ उन्होंने स्वयं ही बनाई थी. प्रवेश द्वार पर ही
अपनी भावनाएं व्यक्त करने वाला एक वाक्य प्रथम अपने मन में लिखा,
“I have built with mud, a shelter for my lost hours
and have named it ‘Shyamali’. I have built it on that dust which buries in it
all sufferings and cleanses all stains.”
- Ravindranath’
मन ही मन ‘श्यामली’ के मुख्य द्वार पर ये वाक्य लिखकर वे वापस मुड़ने ही
वाले थे, कि पोस्टमैन ने पत्रों का एक गट्ठा ही उनके हाथों में दिया. पोस्टमैन ने
हंसकर कहा,
“ साहब, आपको वह
कोई पुरस्कार मिला है न, तब से रोज़ खतों का ढेर ही लेकर आता हूँ. मगर, साहब, आप ये
सारे ख़त पढ़ते कब हैं? उनके जवाब कब देते हैं?”
रवीन्द्रनाथ हँसे, तब वह आगे
बोला,
“साहब, आपका
हंसमुख चेहरा दिखाई दे, इसलिए कई बार मैं खूब देर खड़ा रहता हूँ. बड़े बड़े लोग
आपके पास आते हैं. बड़े बड़े लोगों के ख़त आते हैं. मुझे बहुत अच्छा लगता है. आप खूब
लिखते हैं ना साहब, क्या मेरे बारे में ‘पोस्टमैन’ नाम से कहानी लिखेंगे?”
“ज़रूर
लिखूंगा. और, हमें ‘साहब’ न कहा करो. तुम जिस भूमि पर रहते हो, वह भारत की भूमि है, उस
भूमि पर ही हम भी रहते हैं ना?”
तभी
एक विद्यार्थी उन्हें प्रणाम करते हुए बोला,
“गुरुदेव, क्या मेरे
बाबा आपसे मिलने आ सकते हैं?”
रवीन्द्रनाथ
ने गर्दन हिलाकर ‘हां’ कहा. वह भागते हुए ही वापस गया. पोस्टमैन ने कहा,
“आज
से आप मेरे भी गुरुदेव.” और कुछ समझने से पहले ही वह खतों के ढेर सहित उनके चरणों
में नतमस्तक हो गया. तब उसे उठाते हुए वे बोले,
“यदि
हम गुरुदेव हैं, तो तुम देवदूत हो. रोज़ नए नए सन्देश ईमानदारी से हमारे पास लेकर
आते हो. हमारे जीवन में आनंद बिखेरते हो.”
पोस्टमैन
की आंखें भर आईं. ‘श्यामली’ के आंगन का एक फूल उसे देते हुए वे बोले,
“तुम्हारे
इस सेवाकार्य से अभिभूत होकर हम तुम्हें एक गुलाब पुष्प भेंट दे रहे हैं.”
अब
तो पोस्टमैन की आंखों से आनंदाश्रु निकल कर गालों पर बहने लगे. पत्रों का गट्ठा
उनके हाथों में देकर वह मुख्य फाटक की ओर मुडा, तब पत्रों को श्यामली में
ले जाते हुए उनके मन में ‘पोस्टमैन’ का कथानक सहज ही प्रकट हुआ.
लिखने
के लिए हमारे मन को बस किसी निमित्त की ही ज़रुरत है! सरस्वती के कंठ की मौक्तिक
माला हम ही शब्द मालिका के रूप में धारण करते हैं, ऐसा अनुभव हुआ.
उन्होंने
मन ही मन कहानी लिख डाली. अब उसे कागज़ पर उतारना बाकी था. पत्रों का ढेर सामने
वाली मेज़ पर रखकर हाथ में कागज़ और पेन लेकर बैठे. तभी ठाकुरबाड़ी से देवीदास आया.
अनेक वर्षों से काम करने वाला देवीदास अचानक कैसे आया, यह विचार मन में आते ही वे
घबरा गए.
एक
वर्ष पूर्व जनवरी में ही वह आया था. तब बड़ो दादा की मृत्यु का समाचार लेकर ही आया
था. तब उन्होंने कहा था,
“देवीदास, चार घंटे
रेल के सफ़र में बिता कर तुम आये हो. ट्रंक कॉल करना चाहिए था ना!”
बड़ों
दादा द्विजेन्द्रनाथ के जाने से, जैसा दूसरा पितृछत्र खो गया था. उन्हें अतीव दुःख
हुआ. ऐसा लगा जैसे अचानक निराधार हो गए हों. पिता देवेन्द्रनाथ गए. पितृतुल्य
द्विजेन्द्रनाथ गए. एकेक करके सभी छोटे-बड़े लोग निराकार प्रदेश की ओर अग्रसर होने
लगे थे. सहन शक्ति समाप्त हो चली है, ऐसा प्रतीत हो रहा था, ऐसे में देवीदास को आया
देखकर उन्होंने पूछा,
“देवीदास, सब ठीक है
ना?”
“सब
ठीक नहीं हैं, यही कहने आया था. कलकत्ता में भीषण तूफ़ान आया. बड़े बड़े पेड़ गिर गए. तार
टूट गए. ट्रंक कॉल करना असंभव था इसलिए...”
“मगर
हुआ क्या है?”
“सत्येन
दा की तबियत ठीक नहीं है...”
उन्होंने
कुछ भी नहीं कहा. अपने छोटे संदूक में चार कपड़े, कुछ किताबें रखीं और उसके साथ
कलकत्ता के लिए निकल पड़े. आंखों के सामने थी .चहल पहल भरी जोड़ोसान्को की ठाकुरबाड़ी.
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