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दोपहर
ढल चुकी थी. ठाकुरबाड़ी के अपने कमरे में वे अनमनेपन से बैठे थे. ऐसी बेचैनी उनके
चेहरे पर कभी भी प्रकट नहीं हुई थी. एक के बाद एक परिवार के लोगों की मृत्यु वे
देखते आये थे. मृणालिनी गई और सम्पूर्ण विश्व ही समाप्त हो गया, क्षण भर
के लिए आया यह विचार छोटी मीरा और और शमीन्द्र के कारण क्षणिक ही रहा. हमें फिर से
हिम्मत बटोर कर जीना है हाल ही में स्थापित हुए शांतिनिकेतन के बच्चों के लिए,
अपने बच्चों के लिए – यह विचार मन में प्रबल हो गया.
परन्तु,
हे ईश्वर, कब तक हम अपने ही असीम मन में सदा जानलेवा प्रयास करते हुए किनारे पर
आयेंगे? मीरा, शमीन्द्र गए, माधुरीलता गई, पिता गए, पिता समान द्विजेन्द्रनाथ गए और ऐसा लगा कि मन
खाली-खाली, अर्थशून्य हो गया है. उन्हें अपनी ही कविता याद आई:
प्राण भरीये, तृषा हरीये , मोरे आरो आरो दाओ प्राण
तव भुवने, तव भवने, मोरे आरो आरो दाओ स्थान!
यह मन की गहराई से की गई प्रार्थना थी. आर्त मन का ईश्वर से निवेदन था, या
दुःख से नश्वर जीवन का आक्रोश होकर की गई प्रार्थना थी, उन्हें
समझ में नहीं आ रहा था.
आरो वेदना, प्रभु दाओ मोरे चेतना... ये उत्कट, असह्य
वेदना तुमने दी है. इसी वेदना में हमें मुक्ति मिले, इसलिए यह
प्रार्थना है, परन्तु आत्मार्पण हम करेंगे नहीं. हम अपने आप स्वयं की
आहुति नहीं देंगे. इसलिए, इस वेदना में भी हमारी चेतना सदैव बनी रहने दो. चाहे तो
दुःख से हमारी झोली भर दो, परन्तु जीने की सामर्थ्य भी तुम्हीं दो.
उनका मन अतीव दुःख से भर आया था. वेदना का सागर उनके मन के किनारे पर पूरे
वेग से टकरा रहा था. उस भयानक अंधेरी रात को वे किनारे पर खड़े थे. पैरों के नीचे
की रेत खिसक रही थी. आने वाली प्रत्येक लहर जीवन से बाहर खींच रही थी. मगर किसी भी
चीज़ का भान न होते हुए वे आकंठ निराशा के गहन अन्धकार में स्वयं को संभालते हुए
खड़े थे.
सत्येन्द्रनाथ
की मृत्यु का उन पर न केवल गहरा परिणाम हुआ, बल्कि वे झंझावात में किसी
पेड़ की तरह धराशाई हो गए थे.
बिल्कुल
छुटपन में माँ के जाने के बाद ज्ञानरंजनी उनकी माँ हो गई, और द्विजेन्द्रनाथ की तरह
सत्येनदा माता-पिता-सखा, मार्गदर्शक और आदर्श बन्धु हो गए. उनकी हर बात का
बच्चों के समान ध्यान रखते. जीवन में एक भी बात ऐसी न थी, जो सत्येनदा ने उनके लिए
नहीं की. उन्होंने ही पढ़ाया, उनके साथ अनेक बार प्रवास किया, उन्होंने
ही पढ़ने के लिए विदेश भेजा. हमारी प्रत्येक इच्छा का सम्मान किया.
‘शान्तिनिकेतन’
की संकल्पना का जब चारों ओर से, परिवार की ओर से भी, विरोध हो रहा था, तब
द्विजेनदा...बड़ो दादा ने आशीर्वाद दिया था, तो सत्येनदा ने कहा था,
“रोबी, हर अच्छा
काम आरंभ करो तो जनमत की अपेक्षा न करो. विरोध से यशस्वी निर्माण करना सामर्थ्यवान
व्यक्ति का लक्षण है. तुम्हारे मन में संकल्पना साकार करने की सामर्थ्य है ना, तो आगे
बढ़ो,
विरोध की परवाह किये बिना, और कर के दिखाओ. बिना कुछ बोले. अगर जीत गए, तो सभी को
जीतने की खुशी होगी. तुम्हारा कार्य विश्वात्मक होगा, और यदि पराजित हुए तो
तुम्हारे भीतर से ‘तुम’ समाप्त हो जाओगे.”
“सत्येनदा,
आप हमारे साथ हैं, इससे अधिक और क्या चाहिए हमें?”
“रोबी, किसके साथ
कौन है, सिर्फ यह आधार पर्याप्त नहीं है, इसके लिए प्रयत्न तो तुम्हें ही करना होगा, और खिसकती
रेत पर अपने यश की आलीशान इमारत बनाते समय, बार बार टकराने वाली जनसागर
की लहरें तुम्हारी इमारत बनने ही नहीं देंगी. यह कठोर परिक्षा का समय है. यदि हारे
भी, तो
हम तुम्हारे साथ हैं, और जीत गए तो गर्व से हमारी गर्दन तन जायेगी.”
ज्ञानरंजनी
के साथ सत्येनदा अनेक बार शांतिनिकेतन आते थे. कुछ दिन रहकर लौट जाते. एक बार
उन्होंने कहा,
“रोबी, गुरुदेव
का सम्मान तुम्हें प्राप्त हो रहा है, यह देखकर हमारे बाबा स्वर्ग में प्रसन्न हो रहे होंगे.
वैसे ही उनकी कार्य व्यस्तता के बीच हम अचानक बड़े हो गए, उन्हें समय ही नहीं मिलता
था. तुम छोटे थे, और बाबा भी अनेक कार्यों से मुक्त हो गए थे.”
“ये
सही है, सत्येनदा, परन्तु हमारे ह्रदय पर जिस बात की अमिट छाप है वह है, बारह वर्ष
की आयु में हिमालय जाना, यहाँ उस समय भयानक शांत ऐसे ‘शांतिनिकेतन’ में रहना.
उनके सहवास के वे चार महीने ह्रदय पर अंकित हो गए. परन्तु सत्येनदा, आप ही
हमारे सच्चे पिता हैं. हमारी प्रत्येक बात में, हमारे नाट्य, कला, अथवा अनेक
बातों में ध्यान देकर आप ही ने हमें पढ़ाया, हमें गढ़ा, इतना ही नहीं, हम अकेले
न रहें, इसलिए कई बार हमें अपने साथ ले गए. हमें परदेस में शिक्षा के लिए भेजा...”
सत्येनदा
भाव विह्वल हो गए. उन्होंने रवीन्द्रनाथ के मस्तक पर हाथ रखा.
“रोबी, ये सब सच
है,
फिर भी, आज जो हम तुम्हें बताने वाले हैं, उसकी तुम्हें कल्पना भी न
होगी. हमारी कोई संतान नहीं थी. आखिर
तक...और जब ज्ञानरंजनी संतान के लिए अत्यधिक आतुर थी, उसी समय माँ का निधन हो गया, और तुम
अकेले रह गए, तब हमने ज्ञानरंजनी से कहा, “तुम माँ बनो रोबी की, वह अकेला रह गया है.”
अब
रवीन्द्रनाथ की आंखें भर आईं. अनजाने ही आंसुओं की धाराएं बहने लगीं. अनेक मृत्यु
देखकर भी, अत्यंत व्याकुल होते हुए भी कभी अश्रुधाराएँ नहीं बही थीं. ढलती दोपहर में,
संध्याछायाएं देखकर उनका मन भर आया. शायद आजतक हुई मृत्यु के मन की गहराई तक
पहुँचने के कारण ये अनावर अश्रु बह रहे थे.
“रोबी, गुरुदेव
होना तो तुम्हारा सर्वोच्च बहुमान है, और यह बहुमान, शांतिनिकेतन का विकसित होता
हुआ स्वरूप देखकर मन भर आता है. एक पिता को और क्या चाहिए?
परन्तु
अब संध्याछाया गहराती जा रही है, ऐसे समय में तुम्हें क्या दूं, यह प्रश्न है. परन्तु
देता हूँ – केवल आशीर्वाद. सुखी और प्रसन्न तो तुम हो ही, ऐसे ही प्रसन्न रहो. यदि सब
लोग छोड़कर भी जाएँ, तो तुम्हारी ‘शब्दसखी’ जीवन भर तुम्हारा साथ देगी.”
यह
उनकी अंतिम भेंट थी और अंतिम संवाद उन्हें याद आये. सचमुच, वे चले गए हैं, इस पर
उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था. किनारे का मोल समझने के लिए लहरों के निकट जाना
पड़ता है. पानी का मोल जानने के लिए अकाल में घूमना पड़ता है. और रिश्तों का मोल
समझने के लिए हमेशा अपने लोगों के मन में गहरे उतरना पड़ता है. द्विजेनदा, सत्येनदा, विशेषत:
सत्येनदा कदम कदम पर साथ चल रहे हैं, ऐसा आभास उस क्षण उन्हें हुआ.
सत्येनदा
अब नहीं हैं, इसका एहसास होने के लिए काफ़ी कालावधि चाहिए. पलभर को एहसास भी हुआ, मगर मन ने
इसे नकारते हुए कहा,
‘सत्येनदा, भाभी
हमारे साथ हैं ही. उनके बिना जीना असंभव ही है...’
वे
अपने आप ही हँसे. ‘ऐसा वाक्य हमने ऐना गई तब भी कहा था, कादम्बरी गई तब भी कहा था, मृणालिनी
गई तब भी कहा था, देवेन्द्रनाथ, द्विजेन्द्रनाथ गए तब भी कहा था. मृत्यु
का मन ही मन निषेध भी किया था. शमीन्द्र, मीरा, माधुरीलता के मृत्यु देखकर नियति पर क्रोध भी आया था.
ऐसा लगा, जैसे हमारे शरीर का एकेक अवयव टूट कर गिर रहा है.
मगर
वैसा कुछ भी नहीं हुआ. अतिशय दुःख में भी हमने कविता का सहारा लिया. मन की सारी
वेदना कविता में प्रतिबिंबित होने के स्थान पर कविता आनंदमय होती गई. कितना
विचित्र था यह!
क्या
सत्येनदा के जाने के बाद फिर से ऐसा ही होगा क्या? जीवन के व्यथा, वेदना के
गहरे रंग कविता से प्रभात के रंग के रूप में अवतरित होंगे क्या?
‘नहीं, कभी नहीं.
सत्येनदा तुम्हारे लिए क्या थे, इसका तीव्र अनुभव पग पग पर होगा. मृणालिनी तुम्हारी देह
में, मन
में, स्पर्श में थी, परन्तु सत्येनदा तुम्हारी आत्मा हैं, और क्या आत्मा को भूलना
संभव है? वो ही निरंतर तुम्हारे साथ चलते रहेंगे.’
रवीन्द्रनाथ
ने अनजाने ही हाथ जोड़े और उनके होने की कल्पना से वे दुःख में भी संभल गए.
लगभग
एक महीने बाद जब वे शांतिनिकेतन वापस आये, तो प्रसन्न मन थे.
मोहितचन्द्र सेन से रहा नहीं गया, उन्होंने पूछ लिया,
“आपके
आदरणीय, पितृतुल्य सत्येनदा नहीं रहे, तो....” उनका वाक्य पूरा होने से पहले ही रवीन्द्रनाथ
ने कहा,
“क्या
होता है, मोहितचन्द्र, कुछ व्यक्ति समाज से, परिवार से जाते हैं, और मन में
अपने-अपने पक्के घर बनाकर वास्तव्य के लिए आ जाते हैं. पहले हमारा मन छोटा था. बाबा
के बनाए शांतिनिकेतन जैसा. अब वह विश्व विद्यालय हो गया है. मन में भी हरेक के
अत्यंत सुन्दर कमरे हैं. जिस कमरे में चाहें, हम वास्तव्य के लिए चले
जाते हैं. हैं ना आनंद के ही क्षण. वह व्यक्ति मन के इतने निकट होती है,
कि...चलिए. जाने दीजिये...सत्येनदा कहीं नहीं गए हैं, बस इतना ही हुआ है, कि जब
चाहे मन का उनका वाला कमरा खोल लो और भीतर चले जाओ...इतना आसान हो गया है...अब
ठाकुरबाड़ी जाने की भी ज़रुरत नहीं है.”
मोहितचन्द्र
सेन को समझ में नहीं आया की क्या कहें. वे दोनों हाथ जोड़कर बोले,
“गुरुदेव, यह मेरे
लिए अतर्क्य और अनाकलनीय है...”
काफ़ी
देर शांतिनिकेतन की चर्चा होने के बाद जाते समय उन्होंने कहा, “गुरुदेव, एकबार आपकी
बहू,
प्रतिमादेवी को यहाँ बुलाना है. यहाँ के बाल-संस्कार केंद्र में पुरस्कार वितरण
समारोह है.”
“अवश्य
बुलायें, वे ज़रूर आयेंगी. साथ में रथींद्र भी आयेगा, परन्तु थोड़े दिन जाने दो.”
“अच्छा,”
मोहितचन्द्र सेन सोचते हुए निकले, ‘दस-बारा कोस दूर सियालदह से प्रतिमादेवी को
यहाँ आमंत्रित करने के लिए गुरुदेव ने कुछ दिन इंतज़ार करने के लिए क्यों कहा?’ और उनके
ध्यान में आया, ‘गुरुदेव सचमुच अनाकलनीय हैं.’ उन्हें याद आया, एक बार गुरुदेव ने कहा था,
“Learning is the raising of character by broadening of
vision and the deepening of feeling.”
बिल्कुल
सही है. गुरुदेव की हर बात सीखने जैसी ही है और उनकी विस्तारित दृष्टि आत्मसात
करने योग्य है...
रवीन्द्रनाथ
आज अनेक दिन के बाद पद्मा नदी पर आये. हमेशा की अपनी जगह छोड़कर वे नारियल के पेड़
के नीचे बैठे. पलभर को उनके मन में विचार आया, अगर कोई नारियल हमारे ही
सिर पर गिरे तो...जानबूझ कर सिर फूटेगा. परन्तु फ़ौरन उनके ध्यान में आया कि
‘नारियल के चार पेड़ न जाने कब से ठाकुरबाड़ी में हैं. बच्चे खेलते हैं, घर की
महिलाओं के लिए गप्पे मारने की वह पसंदीदा जगह है. नौकर-चाकर जाते हैं. मगर एक भी
नारियल कभी किसी के सिर पर नहीं गिरा, तो आज क्यों गिरेगा?
वे
बैठ गए, और पेड़ से दो नारियल गिरे, बिलकुल बगल में. ‘ईश्वर ने प्रत्यक्ष दिखा दिया,’ वे हंस
पड़े.
सामने
पद्मा नदी, उस पर नौकाएं, नारियल के पेड़ों की कतारों के साथ कुछ झोंपड़ियां. दोपहर का सूर्य संध्या
से मिलन को आतुर, उनका मन प्रसन्न था.
तभी
एक अधेड़ उम्र का आदमी उनकी तरफ़ तेज़ी से आता दिखाई दिया. रवीन्द्रनाथ तक पहुंचते
हुए वह हाँफ रहा था. रवीन्द्रनाथ ने उसे बैठने का इशारा किया. वह बैठ गया. कुछ देर
बाद उसने कहा,
“मैं
कुमारचन्द्र दासगुप्ता. मैं...”
“हाँ.
नाम सुना था. आपकी कवितायेँ, अत्यंत सुन्दर, नाज़ुक और संवेदनशील मन को
छूने वाली हैं. शायद हमने आपको दो बार पत्र भी लिखे थे. कवितायेँ पढ़कर प्रतीत होता
है, कि
शब्द-संपत्ति से आप खूब समृद्ध हैं.” कुमार दासगुप्ता हँसे.
“सचमुच, मैं धनवान
हूं. मेरा घर कलकत्ता के निकट है. आपके पत्र मुझे मिले थे. उस समय मेरे पुत्र का
निधन हो गया था, फिर कई वर्षों तक पत्नी बीमार रही, वह मुक्त हो गई. और मैं भी
मुक्त हो गया. परन्तु अब यहां बोलपुर में मेरे पिता के घर आया हूँ. दो सेवक हैं.
आपको देखा तो चला आया.”
“आपका
गीत अभी हाल ही में कहीं सुना था. उस गायक ने इतनी सुन्दरता से गाया है, की हम
मंत्रमुग्ध हो गए थे.”
“रवी
बाबू, आपको विश्व प्रसिद्द नोबेल पुरस्कार मिला है. आप मेरी कविता की प्रशंसा
करें, यह आपका बड़प्पन है.”
“बड़प्पन
से याद आया; शरद बाबू हमेशा हमारी तारीफ़ करते हैं. उनका गीत हमें इतना अच्छा लगा कि
हमने उसे कई स्थानों पर गाया था.”
“सच
है, एक दूसरे का बड़प्पन समझने के लिए मन का बड़प्पन आवश्यक है. क्या आपसे एक
विनती कर सकता हूँ?”
“ऐसा
क्यों कह रहे हैं, कुमारचन्द्र? असंभव हुआ, तो भी संभव करेंगे. अब बताइये.”
“यहां
निकट ही हमारा घर है, आप हमारे घर चलें.”
“इतनी
साधारण बात, आपने इतनी कठिन करके बताई! चलिए!”
कुमारचन्द्र
बैठे थे, मगर उनसे उठना संभव ही नहीं हो पा रहा था. रवीन्द्रनाथ ने उन्हें दोनों
हाथों से खडा किया और हाथ पकड़कर चलना शुरू किया.
“रवी
बाबू, इसी तरह सबको आधार देकर आपने शांतिनिकेतन बनाया. अनेक कवियों, लेखकों को
ऊर्जा देकर नए नौजवान लेखकों का निर्माण किया. शब्दों से क्रान्ति होती है, यह भी सिद्ध
किया और मेरे जैसे व्यक्ति का हाथ पकड़कर मुझे खड़ा किया. आपसे छोटा हूँ, परन्तु
आपका सम्मान करते हुए मुझे प्रसन्नता होगी. अब चलिए.”
रवीन्द्रनाथ
और वे सज्जन एक कबेलू वाले घर के पास आये. नारियल के पत्ते कबेलुओं पर थे. मिट्टी
का वह छोटा सा घर, और आँगन में पास-पास लगे हुए पेड़. उन्होंने दरवाज़ा खोला और दवाईयों की गंध
महसूस हुई. एक पलंग पर पुराना गद्दा, उसपर पुरानी, जीर्ण चादर, लकड़ी की अलमारी पर रखी दवाइयों की बोतलें, अलमारी पर
जमा धूल, नीचे ज़मीन पर पड़े फर्श के तख्ते और दरार पड़ी हुई दीवारें... बगल में एक
कमरा, उस पर लटकता हुआ मैला परदा. रवीन्द्रनाथ यह सब देख रहे थे.
एक
अच्छे कवि की यह दशा देखकर उन्हें बहुत दुःख हुआ. कुमारचन्द्र ने दरवाज़े पर जाकर
आवाज़ दी, “केशवा...”
केशव, बारह-तेरह
वर्ष का लड़का भागकर आया.
“की
होबे बाबा?”
“कछु
नई, जल
लागबे.” वह भागकर पानी लाया, फिर वह नारियल पानी लाया. कमरे में एक ही कुर्सी थी.
वर्षानुवर्ष से साक्ष देती-सी. उस पर वे बैठे. कुमारचन्द्र भी पलंग पर बैठे. तकिये
की बगल में रखी एक नोटबुक उन्होंने रवीन्द्रनाथ को दी.
रवीन्द्रनाथ
ने देखा. नोटबुक रंगबिरंगी स्याही से बनाए फूल-पत्तों से सजी थी. कवितायेँ तो इतनी
कोमल शब्दों की थीं, कि मानो स्वर्ग से सरस्वती-शारदा ने स्वयं ही उन्हें शब्दबद्ध किया हो.
ऐसे वातावरण में रहकर भी कवि इस सबसे कितना अलिप्त था! अपने मन में उसने शब्द-गंगा
के किनारे नया गांव बनाया था – अपने लिए.
“कुमारचन्द्र, आपकी
शब्द-नगरी सपनों के गाँव में ही होगी. एक बात पूछूं, आप चलेंगे शांति निकेतन में? जो संभव
हो, वह
काम करना...अकेले रहने की अपेक्षा...”
“रवी
बाबू. अब हमसे कोई भी काम नहीं होता. उम्र की दोपहर में ही संध्या घिर आई है.”
“इसीलिये, मैं कह
रहा हूँ. कल भेजता हूँ किसीको आपको लेने के लिए. आप सामान के साथ तैयार रहें.
पक्का.”
रवीन्द्रनाथ
वापस आये. मन ही मन कह रहे थे,
‘एक
भग्न हृदय की दूसरे भग्न हृदय से भेंट हुई है. हमारा भग्न हृदय बार बार संभलता है
तो शांतिनिकेतन में और कविता से. परन्तु कुमारचन्द्र अकेला रह गया है, फिर भी मन
में सपनों का गाँव बसाकर जी रहा है. सारी चिंताएं वह कुछ समय के लिए भूल भी जाता
होगा. उन्हें अपने लिखे हुए गीति काव्य ‘भग्न हृदय’ के कुछ संवाद याद आये. वहां
चपला और मुरला का संवाद है. चपला पूछती है,
सखी भावना कोहेरे बोले? सखी जातोना कोहेरे बोले?
तोमारा जो बोलो, दिवश रजनी, भालोबाशा, भालोबाशा.
सखी भालोबाशा कारे कोय? शे की केबलई जातनामय
सखी, चिंता, यातना का अर्थ क्या है? तुम लोग दिन-रात कहते रहते
हो, क्या प्रेम भी यातना ही है?
शे की केबलई चोखेर जाय?
शे की केबलई दुखेर शाश?
लोके तॉबे
करे की शुखरी तोरे
ऐमान दुखेर आश?
क्या प्रेम सिर्फ आंख में आने वाला पानी है? क्या केवल श्वास ही दुःख है? तो फिर
लोग वेदना में सुख क्यों ढूँढते हैं? क्यों प्रेम की कामना करते
हैं?
भग्न हृदय की चपला आगे कहती है,
आमार चोखे तो शकलई, शोभेन शकलई नबीन
शकलही बिमल, सुनील आकाश श्यामल कानन बिशन
ज्योछ्ना, कुशुम कोमल, शकलई आमारी मतो.
चपला मुरली से कहती है, ‘मुझे तो सब कुछ सुन्दर ही दिखाई देता है, आकाश, अरण्य,
फूल, प्रकाश...कहीं भी कोई यातना, वेदना नहीं है.’
सचमुच,
कुमारचन्द्र को उस वीरान, उदास भग्न झोंपड़ी में बिल्कुल चपला के समान विमल-कुसुम
कोमल, और सुन्दर ही लगता होगा! उनकी वेदना के फूल हो गए होंगे, उसकी दाहक ज्वाला
में सुनहरी कोमल. रंग बिरंगी उष:प्रभा ही होगी. बेकार ही उनसे ज़िद की, ऐसा
उन्हें लगा.
अगले
दिन, जैसा की निश्चय किया था, रवीन्द्रनाथ स्वयं उनकी झोंपड़ी के पास गए और वहां
उन्हें कुमारचन्द्र के घर के सामने काफ़ी भीड़ दिखाई दी. रवीन्द्रनाथ को पता चला कि
अत्यंत अकेलेपन के कारण, वेदना ही जी रहे कुमारचन्द्र ने ज़हर खाकर अपना जीवन
समाप्त कर लिया था.
रवीन्द्रनाथ
मन ही मन बेचैन हो गए. जीर्ण घर, दवाईयों की बोतलें, दरारों वाली दीवारें, जहां
चारों ओर धूल का साम्राज्य था ऐसे घर को छोड़कर वह कवी सपनों के गाँव निकल पड़ा था.
जब
वापस आये, तो उनके मन में विचार आया, एक के बाद एक मृत्यु देखकर क्या हमारा मन कठोर हो चला
है?
हमारे प्रिय और हृदय के अत्यंत निकट ऐसे कितने ही व्यक्ति चले गए, इतनी दूर
कि अब उनकी यादें भी धूमिल हो चली हैं. जैसे कभी बांबी ढह जाए और चींटियाँ बदहवास
हो जाएं. इसी तरह से अनेक यादें आती हैं. मन घबरा जाता है, और उन्हीं यादों में
खोये-खोये मन के भीतर कहीं से आश्वासक शब्द आते हैं.
‘जाने
वाला जाता ही है, उसे कोई रोक नहीं सकता. परन्तु हम अपने जीवन से अपने पीछे क्या छोड़कर जाने
वाले हैं, इसका विचार कर. जब मृत्यु आयेगी, तो तुम्हारे मना करने पर भी आयेगी ही. तो फिर, जब तक हो,
तुम्हारी कविता-कामिनी-सहचरी तुम्हारे साथ ही तो है...उठ... रुकना मत, चलते
रहो.’
वे
शांतिनिकेतन में आये. अनेक विद्यार्थी उस प्रांगण में गेंद खेल रहे थे. वास्तव में
तो वह कपडे की गेंद थी. एक लड़का मारता, दूसरा उसके वार से बचता, कितना आसान खेल, मगर उससे
प्राप्त होने वाला आनंद अनमोल था.
वे
मन ही मन हंसे सारी वेदनाओं से बचाते-बचाते अपनी गेंद अपने ऊपर नहीं आने देते.
हमेशा चूक जाती है. क्योंकि अपना दाँव अभी आया नहीं है. हम वह गेंद अपने ऊपर आने
ही नहीं देते. यह हमारी चतुराई नहीं बल्कि भ्रम है. कभी न कभी गेंद हमारे ऊपर आयेगी
और हम ‘आऊट’ हो जायेंगे. तब तक होता है अहंकार कि हम जीत रहे हैं.
एक
बार जब विचार आने लगें, तो वे रुकते नहीं हैं. जब वे शांतिनिकेतन के ऑफिस में
आये तो दो-तीन पालक उनसे मिलने आये थे. उनकी समस्याएँ औरों से भिन्न थीं. उनके
बच्चे शांतिनिकेतन से शालांत परिक्षा उत्तीर्ण करने के बाद अंग्रेजों की सेना में
भर्ती हो गए थे. उनमें से एक ने कहा,
“गुरुदेव, शांतिनिकेतन
में होने वाले संस्कार कहां गए? हमारे बच्चोँ पर संस्कार हुए ही नहीं. यदि वे सुभाष बाबू
के, महात्मा गांधी के मार्ग पर जाते, तो हम समझ सकते थे.’
रवीन्द्रनाथ
ने काफ़ी देर बाद कहा,
“संस्कार व्यर्थ नहीं
जायेंगे. इतना ही आज मैं कह सकता हूँ. वे वापस आयेंगे, आप प्रतीक्षा कीजिये.” फिर
भी उन्होंने मन ही मन कहा,
‘उपदेश करना, और संस्कार अपने आप होते जाना, इनमें अंतर तो है.’
An advice is like snow, the softer it falls, the deeper it penetrates
and the longer it dwells upon. परन्तु
संस्कारों का बल हमेशा रहता है. फिर भी एकाध अपवाद हो सकता है.’
उन
पालकों के जाने के बाद वे ‘श्यामली’ कुटी में आये. अनेक पत्र पड़े थे. उनमें एक हेलेन का और
एक मुसोलिनी का था. उन्होंने मुसोलिनी का पत्र पहले पढ़ा. मुसोलिनी हिटलर के निकटतम
सलाहकार थे. उसने लिखा था,
‘प्रिय
रवीन्द्रनाथ,
यदि
आप इंग्लैण्ड आ रहे हैं, तो आपसे भेंट हो यह इच्छा है. आपके शांतिनिकेतन के बारे
में, आपके साहित्य के बारे में और और आपकी शिक्षा नीति के बारे में आपके विचार
सुनना हमें अच्छा लगेगा.’
हिटलर
के संपर्क में रहने वाले मुसोलिनी की गृह नीति, कृषि नीति, विदेश
नीति के बारे में उन्होंने काफ़ी कुछ सुन रखा था. मुसोलिनी के बारे में औरों के समान
उनके मन में भी आकर्षण था. सहज ही निमंत्रण मिला था. उन्होंने हेलेन का पत्र खोला, उसने लिखा
था,
‘प्रिय
रवीन्द्रनाथ,
आपसे
मिलकर बहुत खुशी हुई. वह अभी भी मन में है. इस बात को दो वर्ष बीत गए. यदि आप
इंग्लैण्ड आ रहे हैं, तो मुझे बहुत खुशी होगी. आपसे मिलने की तीव्र इच्छा है.’
असल
में तो इस ‘प्रेम दीवानी’ महिला से क्या कहें, उसे क्या लिखें वे समझ नहीं
पा रहे थे. मगर लिखना आवश्यक था, उसके सिवाय मन मानने वाला नहीं था. उन्होंने मुसोलिनी
का और हेलेन का पत्र निकालकर अलग रखा और अन्य पत्र पढ़ने लगे.
दोपहर
समाप्त हो रही थी. शांतिनिकेतन के प्रांगण में संध्या छायाओं का खेल चल रहा था. वे
मन ही मन प्रसन्नता से हंसे.
‘हमारे
जीवन में भी संध्या छायाए, प्रवेश कर चुकी हैं. फिर भी मन जैसे अभी भी जवान है.
सचमुच, मन का कोई भरोसा नहीं. ‘मन से मन’ निकलता ही नहीं, हमेशा भागता है जीवन की
ओर.’
वे
खिड़की ने पास आकर खड़े हो गए. बगुलों की एक लम्बी कतार आकाश में तैरते हुए गई और मन
को प्रसन्न कर गई .
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