रवीन्द्रनाथ ने अपनी डायरी देखी. आज 7 जून 1924. मतलब कल ही हमें रोम के
गवर्नर के प्रासाद में प्रीति भोज का
निमंत्रण है और उसके पश्चात् ‘यूनियन इंटेलेक्चुअल संस्था’ में एक भाषण है. ‘कला का
अर्थ’ इस विषय पर वे भाषण देने वाले थे.
सचमुच, कला का अर्थ क्या बताना चाहिए? जीवन जीना – यह तो कला ही
है. सृष्टि में जो जो भी अनुपम -उत्कट, उत्कृष्ट है, वह भी विधाता की कला ही है.
मन की भावनाएं प्रदर्शित करने के लिए कला ही आवश्यक है. भावना, संवेदना गीतों से, कथा से, कविता से, अभिनय से अथवा जीवन की
प्रत्येक कृति से व्यक्त होती है. कला – संवेदना है, कला- कृति है और कला- जीवन
की उत्कट शैली है. विधाता ने सृष्टि में जो भी रेखांकन किया है उनकी, चित्रों की अनुभूति लेना –
यह भी एक कला ही है.
वे मन में हँसे. मन हर पल भागता ही रहता है. विषय और आशय चाहे जो भी हो.
सुबह ही वे बेनिटो मुसोलिनी से मिलने जाने वाले थे. एक पत्रकार के रूप में जीवन
आरंभ करने वाला यह मुसोलिनी अब हिटलर के सहवास में अपने मत के लिए जिद्दी हो गया
था, यह सुना था. एक शिक्षक होते हुए भी मुसोलिनी
राजनीति में कैसे आया, यह जानने की रवीन्द्रनाथ के मन में उत्सुकता
थी. वैसी ही उत्सुकता दक्षिण अमेरिका के पेरू देश की स्वतंत्रता की शताब्दी
महोत्सव के निमंत्रण के बारे में भी थी. स्वतन्त्र देश के नागरिक अपनी स्वतंत्रता
का अनुभव किस प्रकार करते हैं, यह उन्हें महसूस करना था.
हेलेन का पत्र भी आया था. ‘हे प्रभु, आप मुझे एक बार दर्शन दें.
मैं अत्यंत व्याकुलता से आपकी राह देख रही हूँ.’
यात्रा भी आखिर कितनी की जाए? अमेरिका, यूरोप में हम घूम ही रहे
हैं. उन्होंने अपना ध्यान कल होने वाली मुसोलिनी की मुलाक़ात पर केन्द्रित किया.
और अगले दिन एक शानदार होटल में मुसोलिनी से भेंट हुई.
बेनिटो मुसोलिनी का प्रसन्न व्यक्तित्व, तेजस्वी नीली आंखें, गोरा रंग और बार बार हाथ से
बाल संवारने की अदा रवीन्द्रनाथ को बहुत अच्छी लगी. किंचित् प्रौढत्व की और झुकता
हुआ मुसोलिनी पहली ही मुलाक़ात में उन्हें अच्छा लगा.
“गुड मॉर्निंग, मुसोलिनी. हमने सोचा कि आप इटली में अपने
जन्म-स्थान पर मिलेंगे. सुना है, इटली बहुत सुन्दर, निसर्गरम्य है.”
“रोम उससे भी अधिक सुन्दर है, आप जैसे नोबेल पुरस्कार
प्राप्त कवि से मुलाक़ात हो, और शान्तिनिकेतन के बारे में जानकारी प्राप्त
करें, यह विचार मन में आया. फिर आजकल हमारा वास्तव्य
रोम में ही है.”
“हाँ, हमें भी ज्ञात है. आप राजनीति, युद्धनीति, कृषिनीति, गृह्नीति जानते हैं, इसलिए आप एडोल्फ़ हिटलर के
निकट स्नेही हैं.”
“करेक्ट, एब्सोल्युटली करेक्ट! वैसे तो अपने बारे में हम स्वयं क्या कहें.
हम अध्यापक थे और उन्नीस वर्ष की आयु में स्विट्ज़रलैंड गए. समाजवादी लोगों का
नेतृत्व किया. पत्रकारिता की, अखबार के संपादक भी रहे. कुछ समय सेना में भी
कार्य किया. राजनैतिक पत्रकार, समाजवादी और प्रथम
विश्वयुद्ध में इटली भी सहभागी हो, इसलिए सामाजिक आन्दोलन भी
किया.
“सचमुच, आपने जीवन के विविध रंगों का अनुभव आपने
प्राप्त किया है.”
“और ऐसा ही अनुभव आपने भी प्राप्त किया है, रवीन्द्रनाथ. आपका कुछ
साहित्य पढ़ने का सौभाग्य हमें प्राप्त हुआ. उसी अनुभूति पर आधारित अनेक साहित्यिक
कृतियों का निर्माण तो किया, परन्तु आपकी शांति निकेतन की कल्पना हमें बेहद
पसंद आई. आपका राजनीति में सहभाग नहीं है, ऐसा क्यों?”
“बेनिटो, हम देशभक्त अवश्य हैं, परन्तु राष्ट्रीय आन्दोलन
में ज़्यादा सक्रिय नहीं रहे. इसके दो कारण दे सकते हैं: देश स्वतन्त्र हो, यह हमारी भी आतंरिक इच्छा
है. परन्तु अहिंसा, असहकार, सत्याग्रह मार्ग से जाने
वाले गांधीजी हैं, तो सशस्त्र क्रान्ति के मार्ग पर सुभाषचंद्र
बोस जा रहे हैं. संस्कृति का आदर्श सम्मुख रखने की सीख देने वाले स्वामी विवेकानंद
हैं. तो, उसी संस्कृति का परिचय देते हुए, संस्कारों से नए देश का
निर्माण हो, इस उद्देश्य से हमने शांतिनिकेतन की स्थापना
की.”
रवीन्द्रनाथ ने शांतिनिकेतन की कल्पना के बारे में बताया, तो मुसोलिनी ने कहा, “संवेदनशील, और प्रगल्भ, दूरदर्शी विचार करने वाला
व्यक्ति ही ऐसा कार्य कर सकता है. हमने तो साम्राज्यवृद्धि की संधि का लाभ उठाते
हुए दो ही वर्षों में रोम के सम्राट को इस्तीफा देने पर मजबूर किया और वहां
स्वशासन स्थापित किया. नए सुरक्षा सैनिक तैयार किये. देश का विकास करने के लिए पहले
कृषि व्यवस्था पर ध्यान केन्द्रित किया. संगठनात्मक विचार प्रस्तुत किये. देश के
लिए और देश को संरक्षण प्राप्त हो, इस कल्पना को कार्यान्वित
किया.”
“परन्तु आपने हमसे संपर्क क्यों किया, बेनिटो मुसोलिनी?”
“आपसे संपर्क करने का कारण बताएं, तो देश को अहिंसा के मार्ग
से स्वतंत्रता मिलेगी, क्या आपको ऐसा लगता है?”
“क्या सिर्फ इतना ही पूछना था?” रवीन्द्रनाथ हंसे. रोम का
एक तानाशाह इसके लिए हमें आमंत्रित करे, इस पर उनका विश्वास नहीं था.
जिसने दो ही साल पहले तीस हज़ार सैनिक लेकर रोम पर कब्ज़ा कर लिया था, उसका हमसे क्या काम हो सकता
है, यह बात वे समझ नहीं पा रहे थे.
“रवीन्द्रनाथ, चाय लीजिये.” मेज़ पर खाने-पीने के विभिन्न
पदार्थ थे. रवीन्द्रनाथ के मन में एक और बात आई, मुसोलिनी हमसे इस शानदार
होटल में क्यों मुलाक़ात कर रहे हैं? वह हमसे क्या जानना चाहते
हैं?” वे सोच ही रहे थे, कि मुसोलिनी उनके भावों को
ताड़कर बोले,
“रवीन्द्रनाथ, हमने किसी भी उद्देश्य से आपको नहीं बुलाया है.
आपके साहित्य के बारे में, और उससे भी ज़्यादा ‘शांतिनिकेतन’ के बारे में जानना चाहते थे.
हम वास्तव में साम्राज्यवादी, साम्राज्यविस्तारक और सत्ताधीश हैं, फिर भी देश के विकास की
अपेक्षा करते हैं. धर्म, संस्कृति और साहित्य राष्ट्र का निर्माण करते
हैं, इस पर हमारा विश्वास है. अब आप कहेंगे, साम्राज्य विस्तारवादी, एक सत्ताधीश, और धर्म, संस्कृति और विकास
को मानने वाला यह एक नेता, एक साथ दोनों कैसे हो सकता है? आपके मन में यह
प्रश्न उठाना स्वाभाविक है.”
रवीन्द्रनाथ खुलकर हंसे, और फिर भारत की स्थिति, शिक्षा प्रणाली, अज्ञान, दारिद्र्य, अंग्रेजों का आधिपत्य, स्वतंत्रता के लिए संघर्ष इन
सब बातों पर चर्चा हुई. तब मुसोलिनी ने कहा,
“हम सभी देशों के महत्वपूर्ण व्यक्तियों से मिलते हैं क्योंकि हमें भी
देश-विदेश में क्या चल रहा है यह जानने की इच्छा है, और संपर्क तथा अनुभूति से ही
विकास का मार्ग स्पष्ट होता है.”
“आप इटली के प्रधान मंत्री हैं. सन् 1922 में ही अपने सामर्थ्य से इस पद पर
आसन्न हुए हैं! हम एक परतंत्र देश के निवासी हैं.”
“रवीन्द्रनाथ, आपको यहां आमंत्रित करने के पीछे हमारे मन में
कोई भी हेतु नहीं था. एक विश्वप्रसिद्ध कवि, और ‘शांतिनिकेतन’ ये दो
घटनाएं अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीत हुईं, और जैसा की हमने कहा, भारत की परिस्थिति से अवगत
होना चाहते थे. मन में हम भी एक गीत गाते रहते हैं, जो हमारी विजय का होता है.
अपनी विजय होने पर समाज और राष्ट्र - इन दोनों पर विजय प्राप्त करना अत्यंत ज़िद से, दृढ़ता से, और परिश्रम से संभव
है.”
“आपके विचारों पर आश्चर्य होता है, खुद समाज और राष्ट्र निर्माण की प्रबल
भावना अपने मन में रखकर उसके अनुसार चलना कठिन है.”
“कुछ भी कठिन नहीं है, रवीन्द्रनाथ. आपका आज का छोटा सा सपना, शान्ति निकेतन आपने अत्यंत
जिद से पूरा किया ही ना! राष्ट्रनिर्माण के लिए समाज को जागृत करके भव्य स्वप्न को
साकार करने में समय तो लगता ही है. मगर मन में उस उत्साह, ऊर्जा, भव्य विचारों का होना
आवश्यक है और साम, दाम, दंड, भेद, इसके अलावा अपने स्वयं के
लिए युद्ध नीति का प्रयोग करते हुए मन को सुदृढ़ रखना आवश्यक है.”
रवीन्द्रनाथ बेनिटो मुसोलिनी से बिदा लेकर निकले तब उनके मन में विचार आया, ‘ईश्वर ने समाज में कितने
विविध प्रकृति के लोगों का निर्माण किया है. जैसे एक पत्ते के समान दूसरा पत्ता
नहीं होता. इस विविधता को मन में लिए वे अपने होटेल की ओर चले.
रोम के बाद जर्मनी में हेलेन के अनुरोध पर वे कुछ दिनों के लिए पेरू में आये
थे. वहां से वे ब्यूनस आयर्स गए. ‘गीतांजली’ को नोबेल पुरस्कार प्राप्त
होने के बाद उनके साहित्य का अन्य देशों में भी सम्मानपूर्वक अनुवाद हुआ था.
स्पैनिश भाषा में उनके साहित्य का अध्ययन करने वाली, उस पर व्याख्या करने वाली
धनवान और श्रेष्ठ कवियत्री विक्टोरिया उनके आने का समाचार सुनते ही सर्वप्रथम उनसे
मिलने आई. उसके आने से रवीन्द्रनाथ को अत्यंत आदरणीय स्थान प्राप्त हुआ. उनका
कार्यक्रम आठ दिन बाद था. विक्टोरिया रोज़ उनसे मिलने आया करती थी.
अलौकिक सुंदर, गज़ब का चैतन्य, और अपरिमित बुद्धिमत्ता वाली
कवियत्री सबको अत्यधिक प्रिय थी.
तीन दिन बाद गुलाबी रंग की लम्बी पोशाक में और हीरों के चमचमाते गहनों से
सजी विक्टोरिया ने रवीन्द्रनाथ के होटल के कमरे में प्रवेश किया, तो आज उनसे मिलने कोई भी आने
वाला नहीं था.
रवीन्द्रनाथ पलंग पर सोये थे. माथे पर आड़ा हाथ रखे. आंखें बंद करके वे
शान्ति से लेटे थे. विक्टोरिया उनके पलंग के पास आकर बैठी तो भी उन्हें पता नहीं
चला. गले तक लहराती सम्पूर्ण सफ़ेद दाढी, गर्दन से झूलते लंबे बाल, बंद आंखे भी तेजस्वी प्रतीत
हो रही थीं, चेहरे का हर भाग अत्यंत सुडौल. जैसे चित्रकार
ने कोई चित्र बनाया हो. विस्तीर्ण भाल प्रदेश पर कुछ केश, गौरवर्ण और स्वच्छ
कांती...वह देखती ही रह गई. एक पुरुष का निर्दोष सौन्दर्य वह कुछ देर देखती ही
रही. फिर भावनावश होकर उन्हें पुकारा. परन्तु वे जागे नहीं. तब उसने उनके हाथ को
स्पर्श किया. हाथ बहुत गर्म था. उसने उनके माथे पर हाथ रखा और उसे अनुभव हुआ कि
उन्हें तेज़ बुखार है.
उसने डॉक्टर को बुलाया और कार्यक्रम के संयोजक को भी आमंत्रित किया. उनका
कार्यक्रम नियत समय पर नहीं हो सकता था, उसने संचालकों से कहा, “भारत से कार्यक्रम के लिए
इतनी दूर आये रवीन्द्रनाथ की ज़िम्मेदारी अपने देश की है. वह ज़िम्मेदारी मैं
संभालूंगी.”
तीन दिन के तेज़ बुखार के बाद वे होश में आये. उन्हें एहसास हुआ कि कार्यक्रम
आज ही है. वे उठने की कोशिश करने लगे तो विक्टोरिया उनके निकट आई और उनका हाथ अपने
हाथों में लेते हुए बोली,
“सॉरी, रवीन्द्रनाथ, आप नहीं जा सकेंगे. तीन दिन
भयंकर बुखार में आप ताप रहे थे,” और कहते कहते उसका ध्यान इस
तरफ गया कि उनकी म्लान आंखों में विलक्षण तेज है. उसके हाथों में पड़े हाथ में भी
विलक्षण ऊर्जा है. आज तक ऐसा व्यक्तित्व उसने देखा नहीं था. प्रौढत्व से
सांध्यपर्व की ओर निकले रवीन्द्रनाथ उसे अत्यंत आकर्षक प्रतीत हुए.
“आज हमारा कार्यक्रम...”
“हमने सूचित कर दिया है. तीन दिन बहुत तेज़ बुखार में थे, अब होश में आये हैं, तो हमारे बंगले में चलिए.”
उनका हाथ अभी भी उसके हाथ में था. वह मृदु, मुलायम स्पर्श कादंबरी की
याद दिला रहा था.
शाम को एक लम्बी, आलीशान गाड़ी में वे उसके शानदार, महल जैसे घर
पहुंचे. तब रवीन्द्रनाथ ने कहा,
“शांतिनिकेतन के निसर्गरम्य आश्रम के एक बड़े कक्ष में हम रहते हैं, यह प्रासाद इतना भव्य है, कि समूचा शांतिनिकेतन इस
प्रासाद का एक चौथाई ही होगा. परन्तु हमारा अपना ‘शाल्मली’ कुटीर है. शांत, प्रसन्न.”
विक्टोरिया के अप्रतिम सौन्दर्य पर सारा समाज मोहित था. गौर वर्ण, नीली आंखें, गुलाबी गाल, लाल-लाल होंठ, सुनहरे, कमर तक लम्बे सुनहरे बाल, आंखों की चमक, और सम्पन्नता के, बौद्धिक तेज से दमकती
विक्टोरिया आज नतमस्तक थी रवीन्द्रनाथ के सामने.
“रवीन्द्रनाथ,” वह बोलते बोलते रुकी और
मुस्कुराई.
“हमें यहाँ तक लाने में तुमने
विजय प्राप्त की है, इसलिए आज से तुम्हारा नाम ‘विजया’...विजया...विजया...”
उसने उनके दोनों हाथ पकड़कर उन
पर अपने होंठ रखे.
“अब बोलो, विजया...”
“रवीन्द्रनाथ...हम...अर्थात्
हमें आपने ‘विजया’ यह नाम अत्यंत प्रेम से दिया है, एक अत्यंत प्रिय सखी की तरह,
तो हमारी बात मानेंगे?”
“ऐसी क्या बात है, जो हम नहीं मानेंगे?”
“जब आप बिलकुल अच्छे हो
जायेंगे, तभी इंडिया वापस जाईयेगा. हमें भी आपका उतना ही सहवास प्राप्त होगा.”
वे प्रसन्नता से हंसे. उसने
आगे बढ़कर उनके दोनों हाथ पकडे और उनसे बोली, “थैंक्स!”
“सच कहूं, विजया, हमें भी यहाँ आकर मनःपूर्वक
प्रसन्नता हुई. तुम्हारी हर कृति से, सहज स्पर्श से हमारी संवेदनाएं जागृत हो गईं. हम यह भी भूल गए की ‘प्रेम’ शब्द व्यक्तिगत होता है.
अपने स्वयं के जीवन का अर्थ भी भूल गए थे. आज उसका स्मरण हुआ. हमारे जीवन में
सर्वप्रथम हमारी हमउम्र भाभी आई. जिसने हम पर अत्यंत प्रेम किया, फिर उसके बाद आई ऐना उसने भी
हमें प्रेम करना सिखाया और उसके बाद आई पत्नी पर भी हमने दिल खोलकर प्रेम किया.
“इसके बाद मिली जर्मनी की
हेलेन. उसने हमारे साहित्य का जर्मन भाषा में अनुवाद किया. वह इतनी भावविभोर राधा
थी, परन्तु अब उनमें से कोइ भी नहीं है. हर मोड़ पर मिली स्त्री ने हमारे जीवन
को सुगन्धित किया, परन्तु सुख, प्रसन्नता और चिरंतन विरह वेदनाएँ भी दीं.”
उसने कुछ नहीं कहा. परन्तु
जैसे नीले आकाश में कृष्ण मेघ छा जाएँ, उस तरह अपार करुणा और वेदना
उसकी आंखों में भर आई. उसने उठकर उनका हाथ अपने हाथों में लिया और कस कर दबाया. उस
स्पर्श के भाव रवीन्द्रनाथ समझ गए. वे मुक्त हंसे.
“विजया, किसी किसी व्यक्ति के जीवन
का वह भाग ही होता है. उसका कोई इलाज नहीं होता. जो हुआ, वह उस समय प्रसन्नता से
प्राप्त हुआ, और फिर से न हो, इसीलिये ईश्वर ने दूर हटा दिया. और हमेशा के लिए स्मरण में रख दिया.”
“आप ईश्वर को मानते हैं?”
“विश्व की उस एक शक्ति को आप
चाहे जो नाम दें, मगर उसका अस्तित्व है. उस पर श्रद्धा रखें या न रखें यह हरेक का व्यक्तिगत
प्रश्न है. छोटे से पौधे का शक्तिशाली वृक्ष बनाता है, फिर वह सूख जाता है, और एक दिन तूफ़ान में उखड़
जाता है. तूफ़ान रुकने की, उसे अपने ऊपर झेलने की जिसमें शक्ति होती है, वह इतना गलितगात्र हो जाता
है. यह सृष्टी का जीवन पार करवाने वाला, विनाश करने वाला, पुनः निर्माण करने वाला,
सृष्टि के चक्र को निरंतर गति देने वाला जो भी कोई है, उस निराकार को हम साकार रूप
देकर ‘ईश्वर’ कहते हैं.”
विक्टोरिया मंत्रमुग्ध होकर
सुन रही थी.
“रवीन्द्रनाथ, हमने अमेरिका में आयोजित
स्वामी विवेकानंद के भाषण नहीं सुने, परन्तु उनके बारे में भी बहुत कुछ सुना है. वे भी सुन्दर हैं, ऐसा सुना है. यह सच है ना?”
“भारत पराधीन है. ऐसी
परिस्थिति में प्रत्येक व्यक्ति अपनी तरह से स्वतंत्रता कैसे प्राप्त की जाए और
स्वतंत्रता प्राप्त होने के बाद क्या करना संभव होगा, इसी पर विचार करता प्रतीत
होता है. विवेकानंद हमसे केवल दो ही वर्ष छोटे हैं.”
“देश में फैला अज्ञान, स्वयं की अस्मिता, अस्तित्व, निर्धनता – इन विचारों से
इतने प्रभावित हुए, उससे भी ज़्यादा अधिक व्यथित इस बात से हुए कि समाज अस्तित्वहीन
हो गया है. और फिर हिन्दुधर्म – संस्कृति – ज्ञान के क्षेत्र में भारत प्राचीन
संस्कृति से कितना संपन्न है, यह बात पूरे विश्व को भारतीयों को भी ज्ञात हो, इसलिए दिन-रात परिश्रम किया.
सैकड़ों भाषण दिए, और सम्पूर्ण भारत में लोक जागृति की. केवल बत्तीस वर्ष की आयु में उनका
निधन हो गया. भारत स्वतन्त्र हो, इस उद्देश्य से अनेक प्रकार से प्रयत्न जारी हैं. शांतिनिकेतन की स्थापना
का भी वही उद्देश्य है. हमारी संस्कृति, हमारा देश, और हमारी माटी, तीज-त्यौहार, परंपरा का विस्मरण न हो
इसलिए.”
“अब हम इस विषय के अलावा कुछ
और बात करें,” ऐसा कहते हुए उसने भी अपने जीवन के यशोमंदिर की ओर जाने वाले मार्ग के
बारे में बताया.
“रवीन्द्रनाथ,” वह रुकी. रवीन्द्रनाथ उसकी ओर देखते
रहे. उन्हें लगा कि वह विश्वामित्र पर मोहिनी डालने वाली मेनका ही तो है. उन्होंने
सहज ही उसके मस्तक पर हाथ रखा, उसके रेशम जैसे बालों से वह नीचे आया. उसने वही हाथ अपने कंधे पर रखा, और
कहा,
“अगर आप पूरी उम्र यहीं रह
जाएँ तो?”
“तो हम अनिवार मोह जाल में
फंस जायेंगे, तुम चलो शांतिनिकेतन.”
“आ भी जाती, मगर ज़िंदगी भर पैसा, अमीरी, प्रसिद्धी के बीच जीती रही.
फिर स्वतन्त्र देश में अपनी मन मर्ज़ी से जी सकती हूँ. भाषा, देश, संस्कृति उस समाज विशेष की
आवश्यकता होती है.”
फिर उसने उन्हें अपने अनगिनत
फोटो, अखबारों, पत्रिकाओं में छपी तस्वीरें दिखाईं. कविताओं की विभिन्न पुसकें दिखाईं.
उसकी एक प्रेम कविता पढ़ते हुए रवीन्द्रनाथ ने कहा,
“ अभी तुम जवान हो. परन्तु
तुम्हारे सहवास में हम जैसे सूखे हुए पेड़ पर न सिर्फ नई कोंपलें फूटीं, बल्कि पूरे वृक्ष पर ही बहार
आ गयी. हर शाख़ पर कलियाँ खिल गईं. यह तुम्हारे प्रेम भाव का प्रभाव है या भक्ति
भाव का?”
“यह प्रभाव इतना अधिक है कि ...”
वह रुकी और उनके निकट से उठने लगी. तब रवीन्द्रनाथ ने कहा,
“विजया, ढलती सांझ इतने विलोभनीय रंग
लेकर आयेगी, ऐसा भूल से भी न सोचा था. नियति का शायद यही विचार था कि हमारे जीवन के हर
मोड़ पर सुगन्धित पुष्प बिखेर कर हमारा मार्ग सुकर बनाए.” विषय बदलते हुए
रवीन्द्रनाथ ने पूछा,
“कवितायेँ ही लिखने का मन
क्यों होता है?”
“कविता मन में ही जन्म लेती
है. मन में अनजाने ही विकसित होती हैं. उन मोहक, खिलती हुई भावनाओं की पंक्तियाँ
हम लिख लेते हैं, बस इतना ही. साहित्य के अन्य प्रकारों पर काम करने के लिए समय भी देना पड़ता
है – यह सच है, फिर भी हमारे मन में खिलती है सिर्फ कविता. उस पर किसी भी प्रकार का कोई
बंधन नहीं होता. आप तो साहित्य की अन्य विधाओं पर काम करते हैं, कैसे संभव हो पाता है यह सब?”
रवीन्द्रनाथ हंसे. कभी
चैतन्यमयी कविता सहज शब्दों में मन से शब्द रूप लेकर अवतरित होती है, तो कभी विनोद, वास्तविकता पर नाटक लिखा
जाता है. अपनी राय स्पष्ट रूप से रखने के लिए कभी व्याख्या करनी पड़ती है, तो कभी
सीधे साधे लेख भी लिखे जाते हैं. मन में कब क्या आयेगा, और क्या लिखा जाएगा, यह कहा नहीं जा सकता.”
“आपकी प्रतिभा बहुआयामी है
रवीन्द्रनाथ. किसी व्यक्ति को ईश्वर अंजुली भर-भर के देता है. आपको सम्पन्नता मिली, सौन्दर्य मिला, सुदृढ़ शरीर मिला, नित्य नई
कल्पनाओं के लिए ऊर्जा मिली. अनेकों का स्नेह मिला. साहित्य की सभी विधाओं में
आपने खूब लिखा. शब्द संपदा भी खूब मिली. आप हर प्रकार से अमीर हैं. यू आर वेरी
लकी.”
देखते-देखते विजया के सहवास
में दो महीने समाप्त होने को आये. एक दिन उन्होंने विजया से कहा,
“ विजया, विवाह करके पति-पत्नी एकत्र
आते हैं. एक साथ जीवन के सुख-दुःख जीते हैं. मगर कोई एक आगे, तो कोई पीछे रह जाता है. ऐसा
ही होगा. अब तुम्हें छोड़कर जाने का मतलब है, तुम्हारी याद में जीना. यह
मालूम है, फिर भी हमें जाना ही होगा. ज़िंदगी की ढलान पर जनवरी 1925 में रवीन्द्रनाथ विजया से
बिदा लेकर निकले. तब उनके पास उसके पास वास्तव्य के दौरान ‘पूरबी’ कविता संग्रह तैयार हुआ और
रवीन्द्रनाथ ने ‘विजयार करकमले’ कहते हुए उसके सुन्दर हाथों को अर्पण किया.
जनवरी 1925 को रवीन्द्रनाथ ने अवरुद्ध
कंठ से उससे बिदा ली. उसके अश्रु निरंतर बह रहे थे. प्रदीर्घ काल के बाद अकस्मात्
प्रदीर्घ प्रेम से साक्षात्कार हुआ था.
उसने जहाज़ पर उनके लिए अत्यंत
सुन्दर और सभी सुख सुविधाओं से युक्त कैबिन ‘रिज़र्व’ करवा दी थी, साथ ही उसके घर
में वे जिस आराम-कुर्सी पर बैठा करते थे, उस लंबी चौड़ी कुर्सी को भी
केबिन में रखवाने का प्रयत्न किया, बड़ी कोशिशों के बाद जहाज़ के कप्तान से कहकर बहुत कोशिश करके कुर्सी कैबिन
में रखवा ही दी.
जहाज़ ने किनारा छोड़ा. अत्यंत
दुखी अंतःकरण से उन्होंने डेक से कैबिन में प्रवेश किया. उसके घर बिताये दो महीनॉन
में पल-पल आनंद की वर्षा होती थी. आज उन्हें बहुत उदास और अकेलापन लग रहा था.
दो दिन बाद उन्होंने कैबिन
में उसे पत्र लिखा,
‘ प्रिय विजया,
अमेरिका की तुम्हारी याद
हमारे मन में हमेशा रहेगी. तुम्हारे भरपूर स्वागत से अब हम मुक्त हो गए, तुम्हारी ही बदौलत देश के आदरातिथ्य का अनुभव हुआ. वहां
की भाषा हमें समझ में नहीं आ रही थी. इसीलिये तुम्हारे और हमारे बीच ठीक से संवाद
भी नहीं हो पाया. हम दोनों के बीच शब्दों का एक खेल था. उससे सहज ही विनोद बन
जाता. वास्तव में तो हम स्वयँ को कैद करके जीने का प्रयत्न कर रहे थे. ये सब इसलिए
बता रहा हूँ, क्योंकि तुम हमसे असीमित प्रेम करती थीं.
“तुम्हारी हमारी मुलाक़ात और
दोस्ती अनपेक्षित थी. इसीलिये हम प्रसन्न हो गए, स्वयं को भी भूल गए. परन्तु हमारा
जीवन इतना प्रसन्न और सुखी नहीं है. हमने अपने अनेक मित्रों, रिश्तेदारों की मृत्यु को
देखा है. सभी को हमारी आवश्यकता थी, परन्तु हम किसी एक के रह ही नहीं सके. हो सकता है, हरेक ने हमें अहंकारी समझा
हो. परन्तु जब बार-बार नए मित्रों से परिचय होता है, तो हम अस्वस्थ हो जाते हैं.
विधिलिखित हमें मान्य है.
“और विजया, तो भी सोचती होगी, की यदि ऐसे मित्र को स्वीकार
करें तो हमारी मित्रता हमेशा रहेगी.”
उसका क्या जवाब आयेगा, इस पर विचार करते-करते
उन्हें शांतिनिकेतन के घर की याद आई और यह विचार भी कि कहीं भी, कितना भी घूम लें, देश तो देश है, घर तो घर है और परिवार तो
परिवार ही है.
परन्तु अब परिवार का एक एक
पत्ता गिरने लगा है, और विचार करते-करते वे देवेन्द्रनाथ के गंगा के बोट हाऊस में चले गए.
भारत पहुँचने में और चार दिन
शेष थे, परन्तु उनका मन अस्वस्थ हो गया था. घर जाने के लिए व्याकुल हो गया था.
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