Thursday, 30 October 2025

एकला चलो रे - 37

  

                               37


रवीन्द्रनाथ अपनी ‘शाल्मली कुटीर में अत्यंत व्यथित अंतःकरण से खिड़की के पास विजया की दी हुई आरामकुर्सी पर बैठे थे. यह कुर्सी विजया ने अमेरिका में दी थी. उसकी याद, और यह अत्यंत आरामदायक कुर्सी उसकी बदौलत ही यहाँ तक पहुंची थी. अब विजया से भेट होना असंभव ही है.

जो भी व्यक्ति हमसे मिलती है, हमसे नितांत प्रेम करती है, वह दूर हो जाती है. इसका अनुभव उन्हें अनेकों बार हुआ था. विजया के यहाँ से आने के बाद कुछ ही दिनों – 4 मार्च 1925 को ज्योतिदा का देहांत हो गया. निकटतम मित्र, भाई, सहकारी, अत्यंत स्नेह करने वाला चला गया. बिल्कुल छोटी सी बीमारी से. तब कोशिश करने के बाद भी वे स्वयं को रोक नहीं पाए थे.

जनवरी में ही विजया से बिदा लेकर वे वापस आये थे और यह समाचार प्राप्त हुआ था. तब आकाश फट जाए, ऐसे आर्तनाद से रोने को उनका मन कर रहा था. समवयस्क, अत्यंत घनिष्ठ मित्र जैसा था ज्योतिदा. उसकी मृत्यु के समय तीव्रता से स्मरण हुआ था कादम्बरी का, उसके प्रेम का, उसके स्पर्श का एहसास हुआ ऐना के यहाँ जाने पर. उन दिनों ज्योतिदा चित्रपट, उसके गीत, संगीत, सिनेतारकाओं में व्यस्त थे, और माँ की मृत्यु के बाद सांत्वना देने के लिए यह छोटी बहू कादम्बरी ही हमारी पक्की सहेली कब हो गयी, समझ में ही नहीं आया. प्रेम करना ही उसका धर्म था. प्रेम करने के लिए जैसे उसने रवीन्द्रनाथ को स्वीकार कर लिया था, और इसीलिए रवीन्द्रनाथ का मृणालिनी से विवाह होने के बाद उसने आत्महत्या कर ली थी.

वे समझ नहीं पा रहे थे कि आज उन्हें किस बात का अनावर दुःख हो रहा था – ज्योतिदा की मृत्यु का, या उस निमित्त से कादम्बरी के सहवास का. ज्योतिदा चले गए थे, और कादम्बरी भी चली गई, और कुछ ही वर्ष पूर्व जीवन में एक आनंद पर्व का आरंभ हुआ था, जो तीन-चार निकटतम मुलाकातों के बाद समाप्त भी हो गया.  हेलेन की मृत्यु हो गई थी. क्या हम जिसके निकट सहवास में जाते हैं, उसकी मृत्यु हो जाती है? मन में इस विचार के दृढ़ होने के लिए एक माह पूर्व एक और घटना घटित हुई थी. देखते-देखते ज्योतिदा की मृत्यु को एक वर्ष हो गया था और महीना भर पहले शांतिनिकेतन के पहले विद्यार्थी और फिर वहीं अत्यंत मनोयोग से सेवा करने वाले उनके निष्ठावंत कार्यकर्ता संतोष चन्द्र की मृत्यु हो गई थी.

इस पल वे विचार कर रहे थे, अपने मन की बात संतोष से कह रहे थे. वह जैसे उनकी स्मरणपुस्तिका था. अपना सुख, दुःख, व्यथा, वेदना प्रकट करने के लिए किसी निकटतम व्यक्ति की आवश्यकता थी. संतोष उनके काफ़ी निकट था.

उसकी एक एक बात याद करते हुए वे आराम कुर्सी पर बैठे थे. उन्होंने एक बार कहा था, ‘संतोष, हम तुमसे इतनी सारी बातें कहते हैं, उनका बोझ तो नहीं प्रतीत होता?

“गुरुदेव, आप मुझ पर भार हल्का करें, इतना आत्मीय मुझे समझते हैं. इसकी मुझे खुशी है. आप हमेशा प्रसन्न, सुख से रहें, यही मेरी कामना है.”

“तुम, इस तरह ब्रह्मचारी बनकर जीने वाले, हम इतने भोगी, तुम्हें हम पर गुस्सा तो नहीं आता?

“कैसे आयेगा? क्या कभी श्रीकृष्ण पर किसी को गुस्सा आया? मैं चाहे विदुर होऊं या सुदामा, मगर मुझे इस बात की सबसे ज़्यादा खुशी है कि आप मेरे निकट हैं.”                    

कितनी ही बार प्रातःकाल और सुहानी शाम को उसके साथ चलते हुए मन गाने लगता. होठों से शब्दों की पंक्तियां मुक्त होकर सुदूर प्रान्तों में जाने को मचल उठतीं. वह अकेला ही चलता रहता. अपने आप में मगन. वह कभी भी उकताया नहीं. इस तरह चलता रहता, मानो सुनना ही उसका एकमात्र व्रत हो. सुनता रहता. अब वो चला गया, और ऐसा प्रतीत हुआ मानो हृदय एकदम रिक्त, शून्य हो गया हो.

ज्योतिदा गए और कादम्बरी की याद में दिन गुज़रे. संतोष गया, तो मन का आकाश ही रिक्त हो गया. वे मन ही मन अत्यंत भावुक हो गए. ‘ईश्वर, और कितने व्यक्तियों की मृत्य हमें दिखाने वाले हो? जो अपना लगता है, जिसकी स्नेह वर्षा से मन भीग जाता है, उस श्रावण मेघ को ही तुम भगा देते हो ? फिर भी, भगवान, बार बार टूटने से तुम हमें संवार लेते हो...किसलिए? हमारे जीवन का प्रयोजन क्या है? कब तक जीना है हमको? और क्या साध्य करना है? या, यह सज़ा है हमारे मन को?

कितने लोगों के मृत्य देखें! जीवन की बेल कुछ समय के लिए मुरझा जाती है, इतनी कि मानो उस पर कभी बहार ही नहीं आयेगी और कुछ ही दिनों में फिर से खिल उठती है. कौन देता है उसे पानी? कौनसे जीवनसत्व लेकर यह बेल बार बार खिल उठती है?

शायद हमारा ही इस जीवन से इतना गहरा प्रेम है कि हम खिल उठते हैं. सचमुच, हम रसिक हैं, शब्दों के, स्पर्श के, प्रकृति के परिवर्तन के. कभी कोई जीवन में आता है, और हमेशा के लिए मन में रह जाता है.

वे विचार कर रहे थे. सामने पत्रों का ढेर पडा था. उन पर प्रेम करने वाले असंख्य वाचक. मानो उन्हें समझा रहे थे कि जीवन का अर्थ प्रेम और केवल प्रेम ही है. और समझा रहे थे, ‘उठ और सभी चाहने वालों को पत्र लिख.’

वे उठे और कुटी से बाहर आये. श्रावण अभी अभी समाप्त हुआ था. गहरा हरा, बूटियों वाला परिधान पहने वसुंधरा सजी हुई थी. उसकी गोद में उसके प्यारे बच्चे खेल रहे थे. आने वाला समीर उन्हें हंसा रहा था, झुला रहा था. सूर्य की सुनहरी किरणों में ये नवजात संतानें अपनी नन्ही नन्ही आंखों से दुनिया देखने की कोशिश कर रही थीं. रवीन्द्रनाथ ने मन ही मन कहा, ‘पंचमहाभूतों से घिरे इस प्रेम और प्रेम के मोह के सिवाय और क्या है! हमारा भी हमारे साहित्य पर वैसा ही प्रेम है. अभी हाल ही में प्रकाशित ‘पूरबी, ‘प्रवाहिनी’, ‘गीति चर्चा ये कविता संग्रह मन में ही पढ़ते हुए हम अपने ही प्रेम में मगन हो जाते हैं.’

वे कुटी के बाहर खड़े थे, तभी अनिकेत आया. ‘आपकी कुटी में जो पत्र रखे हैं, वे सिर्फ आपके लिए और आपके ही हैं. मगर ऑफिस के कुछ महत्वपूर्ण पत्र भी हैं. उनमें से कुछेक देख लीजिये. उनमें महात्मा गांधी का पत्र भी है. आप उसे पढ़ें. वे अगले सप्ताह आने वाले हैं.”

“इतनी दूर? किसलिए? उनका सेवाश्रम वर्धा में है, और हम इतनी दूर. ऐसा क्या काम हो सकता है?

“वह सब तो लिखा नहीं है. परन्तु पत्र दिल्ली से आया है. अर्थात् वे दिल्ली में होंगे.”  

अनिकेत चला गया, परन्तु गांधी जी मन से नहीं जा रहे थे. उनके अहिंसा आन्दोलन ने अब ज़ोर पकड़ लिया था. सन् 1919 में गांधीजी ने रोलेट एक्ट के विरुद्ध जो जन आन्दोलन किया था, उसका उन्होंने समर्थन किया था. जलियांवाला बाग़ के हत्याकांड के निषेध आन्दोलन में उन्हें दी गयी ‘सर की उपाधि वापस लौटा दी थी. उनके अनुरोध पर सन् 1920 में आयोजित गुजराती साहित्य सम्मलेन के अध्यक्ष बने थे. अब उनका विचार क्या हो सकता है, और हमारे पास उनका क्या काम हो सकता है यह वे समझ नहीं पा रहे थे.

आठ ही दिन बाद पत्र में लिखी तारीख पर सुबह के समय महात्मा जी आये थे. सुभाषचंद्र बोस द्वारा दी गई उपाधि ‘महात्मा’ जन मानस में रूढ़ हो गयी थी.

रवीन्द्रनाथ शांति निकेतन के फाटक पर ही उनके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे. जल्दी जल्दी चलते हुए वे आये. उनके साथ आठ-दस लोग थे. महात्मा गांधी को लेकर रवीन्द्रनाथ ‘शाल्मली कुटी में आये. आते आते महात्मा जी ने शांति निकेतन परिसर का अवलोकन किया था.

“शांति निकेतन में केवल प्रकृति की बाग़ ही नहीं, अपितु रसिकता, सौन्दर्य, कला, क्रीडा, संगीत, नृत्य, नाट्य भी यहाँ फल-फूल रहा है. यहाँ संस्कार की, संस्कृति की पाठशाला है.”

“हाँ, प्रयत्न तो किया है.”

वे महात्माजी को अपनी शाल्मली कुटी के भीतर ले गए. तब महात्माजी ने कहा,

“धरती की गोद में स्थित निसर्गरूपी बालक है शाल्मली कुटीर.”

“हाँ, ये हमारी पसंद है. हमें कुछ ही वर्षों में चित्रकला से लगाव हो गया और शाल्मली का भीतरी भाग चित्रों से भर गया.”

“सचमुच, धन्य हैं आप. कितनी विविधता है आपमें!”

“महात्माजी, आपने भी सत्याग्रह के कुछ कम प्रयोग नहीं किये हैं. सेवाग्राम में अनेक शिक्षा पद्धतियों का आरंभ किया. परदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी को प्रोत्साहित किया. आपके एक शब्द पर कितने ही विद्यार्थियों ने स्कूल छोड़ दिया, कुछ लोगों ने अंग्रेज़ों की नौकरियाँ छोड़ दीं. जन मानस पर आपका प्रभाव है. अंग्रेज़ आपके सत्याग्रह से डरते हैं, और सारी दुनिया की नज़रें आपकी तरफ़, भारत की तरफ लगी हुई हैं. और जन मानस में यह धारणा दृढ़ हो गई है कि जल्दी ही आज़ादी की हवा बहने वाली है.”

“रवीन्द्रनाथ, बोलने में भी आप चतुर, वाक्पटु हैं.”

काफ़ी समय शांति निकेतन के बारे में जानकारी प्राप्त करने में गया. उसके बाद रवीन्द्रनाथ ने उनसे आने का प्रयोजन पूछा, तब वे बोले,

“रवीन्द्रनाथ, आपको अनुमान होगा, मैं...”

“हाँ, पूरा अनुमान है, ‘एक वर्ष में स्वराज्य’ यह भावनिक नारा आपने भारतवासियों को दिया है. ‘कच्छ से कामरूप तक और कश्मीर से कन्याकुमारी तक आपकी यह आर्त, तेजस्वी और अत्यंत स्नेहपूर्ण पुकार पहुंची  है. हर भारतीय के मन पर राज करने वाले आप, और आपकी पुकार सुनकर भारतवासी नई आशा से, नए आनंद से कल की स्वतंत्रता की बाट जोहने लगे हैं. महात्माजी, सन् 1921 आपके लिए यशस्वी सिद्ध हो रहे है. परन्तु आपके यहां आने का प्रयोजन?                                         

“रवीन्द्रनाथ, इस जन आन्दोलन का बंगाल का नेतृत्व आप करे.”

“आपको सत्य प्रिय है, महात्माजी, इसलिए मन का सत्य ही कहता हूँ, ‘चरखा चला चला के लेंगे, स्वराज्य लेंगे,’ यह नारा हमें मान्य नहीं है, विदेशी वस्त्रों की होली और शिक्षा पद्धति पर ध्यान केन्द्रित करने की अपेक्षा, हज़ारों टन विदेशी कपड़े जलाने की अपेक्षा, औद्योगिक क्रान्ति को स्वीकार करने के बदले अगर आप चरखे के ही पीछे लगे रहेंगे तो वह अवैज्ञानिक होगा. अकालग्रस्त भागों में सैंकड़ों लोग मर रहे हैं, उन सब भारतीयों की सहायता करने की घोषणा भी करें.”

महात्माजी ने कुछ नहीं कहा. रवीन्द्रनाथ आगे बोले,

“भारतीय वैदिक संस्कृति में विद्यमान विज्ञान, विश्व बंधुत्व का विचार करें. आज़ादी कोई आपकी झोली में डालने वाला नहीं है, परन्तु इस मार्ग से हम तो सहमत नहीं हैं. क्योंकि विद्वेष फैलाकर स्वतंत्रता मिलने वाली नहीं है. परन्तु आप की बात पर हम निश्चित ही विचार करेंगे.”

इधर-उधर की काफ़ी बातें करने के बाद महात्माजी निकल गए. रवीन्द्रनाथ मन में विचार कर रहे थे. महात्माजी के प्रति, उनकी विचारधारा के प्रति, कार्य के प्रति हमारे मन में आदर है, फिर भी हम उनके पीछे क्यों नहीं जा सके? शायद, हम निरंतर पूरे विश्व में घूम रहे हैं, इसलिए सभी व्यक्तियों के गुणदोष हमें दिखाई देते हैं.

ऐसे समय में स्वतंत्रता के लिए अहिंसात्मक पद्धति से होने वाले युद्ध से क्या सचमुच स्वतंत्रता मिलने वाली है? आज के वैज्ञानिक युग में क्या चरखा चलाकर हम स्वतंत्रता प्राप्त कर लेंगे? महात्माजी को इस पर विचार करना चाहिए, ऐसा उन्हें प्रतीत हुआ.

क्या महात्मा गांधी हमारे यहाँ आकर निराश हो गए? यह विचार आते ही उन्होंने मन ही मन सोचा, ‘सत्य तो सत्य ही है ना, महात्माजी, एक बार अवश्य विचार करें, बस इतना ही कहना है.’

रवीन्द्रनाथ का शरीर अब थक गया था. मगर मन से वे जवान ही थे. मन में आये अनगिनत सपने साकार हो गए थे, फिर भी हर दिन खिलने वाले फूल की तरह सपने अभी भी खिलते ही थे. बोलपुर में शांति निकेतन में चार विद्यार्थियों के साथ लगाया गया पौधा अब वृक्ष बन चुका था. कला, क्रीडा, नाट्य, संगीत, नृत्य जैसी विविध शाखाओं से सज गया था. विद्यार्थी स्नातक होने के पश्चात् बाह्य जगत में आत्मविश्वास के साथ कदम रख रहे हैं. मतलब, यहां दी जाने वाली शिक्षा और यहां का जीवन उनके लिए उपयोगी सिद्ध हो रहा है. स्नातक होने के बाद उनके पिता द्वारा लगाए हुए सप्तपर्णी वृक्ष का एक पत्ता देने के बाद उन्हें पदवी प्राप्त होती थी.

रवीन्द्रनाथ विचार कर रहे थे. जीवन में जिस भी चीज़ की अपेक्षा की, वह देर से ही सही, मगर प्राप्त हुई. परन्तु भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हो, यह इच्छा अभी पूरी नहीं हुई. परन्तु अब शीघ्र ही हो जायेगी. देश में स्वतंत्रता प्राप्त करने के उद्देश्य से अनेक संगठन, अनेक विचारधाराएं, अनेक मार्ग निर्मित हो गए हैं. जब पूरा देश ही जागृत हो जाए, तो स्वतंत्रता प्राप्त करना असंभव नहीं है.

समय आगे बढ़ता है, परिस्थिति बदलती है. वहीं से आते हैं आनंद के फूल. सोचते थे, कि शांति निकेतन विश्व केंद्र बने, वैश्विक कला केंद्र बने. शांति निकेतन को वैश्विक मान्यता प्राप्त हो, और कुछ ही समय में वैसा ही हुआ. शांति निकेतन ‘विश्वभारती विद्यापीठ हो गया, अनेक कलाएं यहां आईं. अनेक अभ्यासक्रम आये. जीवन और शिक्षा के समन्वय से व्यवसाय निर्मित हुए.

उन्हें याद आया, साबरमती के आश्रम में भी महात्माजी ने ऐसे अनेक प्रयोग शुरू किये थे. उनके सत्याग्रह के प्रयोग भी चल रहे थे. रवीन्द्रनाथ अनेक पहलुओं से उनके कार्य का अनुभव कर रहे थे.

और तभी उनका आश्रम का प्रिय विद्यार्थी, दस वर्ष का नंदनंदन भागते हुए आया,

“गुरुदेव, ठाकुरबाड़ी से कोई आया है. क्या उन्हें भीतर भेजूं?

“अभी ये पत्रों का ढेर संभालता हूँ, थोड़ी देर बाद भेजना,” ऐसा उन्होंने कहा, और फ़ौरन बोले, “नंदन, उन्हें भीतर भेज दे.”

आजकल जब भी ठाकुरबाड़ी से कोई आता, तो रवीन्द्रनाथ के मन में भय पैदा हो जाता. किसी न किसी की मृत्यु का समाचार लेकर ही कोई आता. वैसे तो अब शांति निकेतन में टेलीफोन आ गया था. कहीं बाहर जाकर आने के बाद वे ठाकुरबाड़ी फोन किया करते. सबकी तबियत का हालचाल पूछते. यदि कोई बीमार हो तो जाकर देख भी आते. अभी तो सब ठीक ही था.

परन्तु एक के बाद एक करके धीरे धीरे पूरा कुटुंब ही समाप्त हो रहा था. घर में राह देखने वाला कोई था ही नहीं. वे विचार कर ही रहे थे, कि ठाकुरबाड़ी का श्यामसुंदर अन्दर आया.

“की समाचार, श्यामसुंदर? की होबे? सब भालो आछे!”

 श्यामसुन्दर वैसे ही खड़ा रहा.

“बाबू मोशाय, ज्योति बाबू...”

“की होबे?

श्यामसुंदर ने बताया की ज्योति बाबू बीमार हैं, और रवीन्द्रनाथ फ़ौरन तैयार होकर निकले.

ठाकुरबाड़ी पहुंचते ही उन्हें महसूस हुआ कभी हंसते-खेलते घर का एकाकीपन. जहां शब्दों का अखंड प्रवाह था, वह मौन हो चुका घर. किताबों से भरी अलमारियों पर धूल जमी थी. हर कमरे में निपट खामोशी थी. पुरुष धीरे धीरे अनंत की ओर जा रहे थे. महिलाएं अपनी खोई हुई सौभाग्य स्मृतियों में मगन थीं.

इतनी बड़ी, आदमियों से भरी, चहल पहल वाली ठाकुरबाड़ी ऐसी शांत-शांत थी, मानो निद्रा में मग्न हो. यूरोप के दौरे के बाद वे कई महीनों बाद ठाकुरबाड़ी आये थे. प्रवास के दौरान अखंड काव्य लेखन हुआ था, उत्साहपूर्वक बहने वाली शब्दगंगा अब ना तो मुख से प्रकट हो रही थी, ना ही लेखन से. वे निःशब्द हो गए थे. सबका सांत्वन करते हुए उन्होंने अपने मन का भी सांत्वन किया था. ज्योतिदा की पत्नी कादम्बरी. रवीन्द्रनाथ के विवाह के एक वर्ष बाद ही कादम्बरी ने आत्महत्या कर ली थी. आज न तो कादम्बरी थी, ना मृणालिनी. केवल हम ही जी रहे हैं!

उनके मन में निरभ्र आकाश में एक ही काले मेघ के समान क्षणभर के लिए नैराश्य प्रकट हुआ और फ़ौरन ‘ईश्वर प्रदत्त जीवन का कोई तो प्रयोजन होगा, वह प्रयोजन अब लेखन ही है,’ इस विचार से वे हंस पड़े. दुःख का आधार, सुख का आधार – केवल लेखन ही है.’

अभी हाल ही में उनके काव्य संग्रह ‘पूरबी, ‘प्रवाहिनी प्रकाशित हुए थे, और ‘गृह प्रवेश’ नाटक लिखकर  शांति निकेतन में उसका प्रयोग भी हुआ था. साथ ही लघु संगीत नाटक ‘बसंता और ‘नटीर पूजा और ‘रक्त करबी’ नाटक लिखने के बाद उनके प्रयोग भी हुए थे.

रवीन्द्रनाथ अतीव दुःख से ठाकुरबाड़ी पहुंचे और वहां से निकले सहज भाव से.

अब उन्हें दक्षिण और पूर्वी देशों का दौरा करना था. भारत देश की प्रकृति और यहां हो रही राजनीतिक हलचल से उनका निकट परिचय था. वे शांति निकेतन पहुंचे.

वह दिन था 3 फरवरी 1927 का. ‘बंगाल ऑर्डिनन्स’ नामक एक कानून शासन ने तैयार किया था. इस क़ानून के विरोध में अनेक नौजवानों ने प्रदर्शन किये और शासन ने कठोरता से उन्हें कैद करके जेल में डालकर बड़ी यातनाएं दीं, तब रवीन्द्रनाथ ने अत्यंत कठोर शब्दों में शासन को पत्र लिखा. परिणाम स्वरूप उस कानून को पीछे तो नहीं लिया गया, परन्तु उसे शिथिल करके अनेकों को जेल से छोड़ा गया. वे मन में अत्यंत व्यथित हो गए. अभी तो चारों ओर केवल धुँआ ही नज़र आ रहा है, स्वतंत्रता की हवा चारों ओर आग क्यों नहीं लगा रही है?

विचार करते हुए मन में ख़याल आया, कि क्रांतिकारी से आध्यात्मिक गुरू तक का प्रवास करने वाले योगी अरविंद से मिला जाए. सचमुच, क्या एक व्यक्ति में इतना आमूलाग्र परिवर्तन हो सकता है? उन्होंने आठ दिन बाद योगी अरविंद से भेंट करने का निश्चय किया और वे शाल्मली कुटी में अपनी मनपसंद कुर्सी पर बैठ गए.

हाथ में उनकी ही पसंद की नोटबुक थी. उसमें उन्होंने अपनी ही कविताओं में कुछ सुधार किये थे. हरे रंग से किये गए वे सुधार उन्हें आकर्षित कर रहे थे. उन अस्तव्यस्त त्रुटियों की कतार देखकर उन्हें ऐसा लगा, मानो वे त्रुटियाँ उनसे किसी निश्चित आकार की मांग कर रही हैं, और उन्होंने उन चिह्नों को विविध प्रकार के आकार देना आरंभ कर दिया, उन त्रुटियों से भिन्न भिन्न आकार के पक्षी, फूल, घास प्रकट हुए.

और जैसे कविता देखें करके, उसी तरह चित्र देखें बनाकर – यह विचार मन में आया. उन्होंने ड्राईंग की नोटबुक ही शांति निकेतन के दफ़्तर से मंगवाई.

उनके पास लाल स्याही, हरी स्याही. काली स्याही थी ही. उन रंगों का उपयोग करने पहला चित्र बनाया. कभी बारीक रेखा से, तो कभी मोटी रेखा से, कभी कपडे के छोटे से गोल से कागज़ पर स्याही फैलाकर, तो कभी फैलाए हुए रंग पर दूसरे रंग की स्याही फैलाकर वे मुक्त चित्र संचार कर रहे थे. चित्रकला की शिक्षा उन्होंने नहीं ली थी, और पैंसठ वर्ष की आयु में कभी आड़ी- खडी रेखाओं से, रंगों से चित्र बनायेंगे यह भी नहीं सोचा था.

मन की भावनाएं रंगों से व्यक्त करते हुए उनके शब्दरंगचित्र तैयार हो रहे थे, और निराकार ईश्वर की खोज करते हुए चित्रों के एक नए गाँव से उनका साक्षात्कार हुआ. जैसे वास्को द गामा को अचानक भारत दिखाई दिया था.

रवीन्द्रनाथ प्रसन्न थे. आजकल उनके ध्यान में आ रहा था कि अतीव दुःख की बावड़ी में डूबने के बाद अचानक सुख की एक सीढ़ी दिखाई देती है और उस उस बावड़ी से वे प्रकाश की ओर आते हैं. कभी कविता, कभी नाटक, कभी उपन्यास, अब, कभी चित्र...अनंत कठिनाइयों में, सुख में साथ देने वाली यह कला उन्हें अत्यंत प्रेम करने वाली प्रेमिका जैसी प्रतीत हुई.

वैसे ही उन्हें यह भी साक्षात्कार हुआ कि वे अनंत यात्री हैं. एक ही स्थान पर जीवन का आनंद लेना उनके स्वभाव में नहीं है. बचपन में माँ कहा करती थी, “पैर पर देख, भँवरा है. तुम कभी भी एक ही जगह पर नहीं बैठोगे.” तब हमने हंस कर माँ से कहा था,

“ दिखाओ, कहाँ है भंवरा. और मैं उस पश्चिम वाले कमरे में दिन-दिन भर अकेला बैठा रहता हूँ. “

आज समझ में आया कि वह सच ही कहती थी.

“बैंगलोर से निमंत्रण है, कैनाडा से बुलाया है, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी लंदन का निमंत्रण है. माँ को यह ज्ञात नहीं था कि हम विश्व कवि के रूप में प्रसिद्ध होंगे. परन्तु पैर पर भंवरा है, यह उसे दिखाई दिया था.

नरेन्द्र दत्त की माँ को भी कहाँ मालून था, कि वे ‘स्वामी विवेकानंद’ के रूप में प्रसिद्द होंगे. मगर उसने कहा ही था, ‘मेरा नोरेन श्रीकृष्ण जैसा सारथी होकर विश्व के रथ को दौड़ाएगा.’

अब रवीन्द्रनाथ को भी ‘दि रिलीजन ऑफ़ दि मैन’ इस विषय पर भाषण देना था.

अमेरिका में हो रही महान विकास क्रान्ति और उसमें से लुप्त हो रहे संस्कार और आध्यात्मिक प्रवृत्ति, विकास के पीछे निरंतर भागते लोग घर की गरिमा को भुला रहे है ऐसा उन्हें प्रतीत हो रहा था.

‘मानव द्वारा अपने चारों ओर निर्मित पिंजरा, यदि सोने का भी हो, तो भी वह बाह्य जगत से कट जाता है. घोंसला और पिंजरा दोनों ही विश्राम के लिए बने हैं, पंछी को घोंसले की ज़रुरत होती है - आश्रय के लिए. उड़ान से वापस लौटने के बाद घोंसले में एक सुरक्षित आश्रय होता है. परन्तु जब वह पिंजरे में बंद होता है, तब उसे पर्याप्त स्थान, पानी और अन्न प्राप्त होता है, परन्तु उड़ान का सपना गिरवी रखा रहता है. यदि तांत्रिक ज्ञान अनंत काल तक चलता रहेगा तो मनुष्य सोने के पिंजरे में रहकर भी आध्यात्मिक ऊंचाई को छू नहीं पायेगा.’

उनका ध्यान समाज जीवन के हर पहलू पर था. उन्हें ऐसा प्रतीत होता था कि तांत्रिक कौशल्य और कल्याणकारी वस्तुओं के अत्यधिक लालच में जीवन की अनेक अच्छी चीज़ें लुप्त हो जायेंगी. मनुष्य प्रेम, माया, स्नेहसंबंध, सौन्दर्य और प्रकृति के अनुभव से दूर रहेगा.

इस विषय पर उन्होंने कविता भी लिखी. वर्चस्व दिखाने वाली प्रकृति पूरी तरह तटस्थ है. वह उत्सुकता सृजनशीलता की कमी पूरी करने को तत्पर है, और यदि उसकी इच्छा पूरी नहीं होती तो वह विध्वंस पर भी उतर आती है.’

वे शांत बैठे थे. शाल्मली कुटीर में पद्मा नदी से आने वाली ठंडी हवा मन को आराम दे रही थी. आकाश निरभ्र था. शांति निकेतन के विद्यार्थी अपने निवास स्थान पर आश्रम में वापस आ गए थे. चारों ओर शान्ति थी.

यूरोप के दीर्घ प्रवास के दौरान, अमेरिका से लौटने के बाद उनका भव्य सत्कार हुआ था. उनके हाथों-पैरों का, कम से कम वस्त्रों का स्पर्श तो मिले इसलिए लोगों की अथाह भीड़ उनके चारों ओर थी.

और पैरिस में उनकी मुलाक़ात प्रोफ़ेसर सिल्वेन लेवी से हुई जो भारतीय संस्कृति, इतिहास और साहित्य का गहरा अध्ययन कर रहे थे. साथ ही रोमा रोला और हेनरी बर्गसन से भी परिचय हुआ.

वे अपने आप ही हंसे. कितना प्रचंड प्रवास रहा हमारा...बिल्कुल आज तक चीन में शांघाय, हानचाऊ, नानकिंग और पेकिंग समेत अनेक स्थानों पर उनका मनःपूर्वक स्वागत हुआ. उनके साथ थे चित्रकार क्षिती मोहन सेन, नंदलाल बोस और टैगोर के अंग्रेज़ मित्र हेस्ट भी थे.

आज यह सब उन्हें चित्रवत प्रतीत हो रहा था. जीवन में अनगिनत व्यक्तियों से मुलाक़ात होती रही, बातें होती रहीं... कुछ व्यक्ति मन की गहराई तक पहुंचे. ईश्वर ने खाली समय कभी दिया ही नहीं. अपने निकट व्यक्तियों की मृत्यु का शोक करने के लिए भी नहीं. मन में कभी द्वेष नहीं आया, भय प्रतीत नहीं हुआ. प्रत्येक समस्या से गुज़रते हुए हमने उसे ‘अनुभव की भांति स्वीकार किया. देश-विदेश में यात्रा करते हुए, जहाज़ से जाते हुए अनेक बार तबियत भी बिगड़ी, परन्तु अप्रतिम प्रकृति ने सब कुछ भूलने पर विवश कर दिया. कभी, जब अकेले रहे, तो रम्य स्मृतियाँ चारों और नृत्य करने लगीं. अब रेखाओं की इस दुनिया में रेखाएं और रंग भी मुखरित हो गए. मन की संवेदनाओं को आवाज़ देने लगे.

वे मन में ही हंसे. विविध रंग बिखेरती हुई संध्या प्रसन्नता से हौले हौले क्षितिज से मिलने निकली थी.

‘कितना अद्भुत है यह कलाकार! इसके पास कितने मुखरित रंग है!’ अब वे कुटीर से बाहर आ गए थे.

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