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“बाबू मोशाय, आपका जीवन अनेक भागों में बंटा हुआ है, मगर आप
अपने जीवन के किस भाग को महत्त्व देते हैं?” चित्रकार सुरेन्द्रनाथ कार
ने रवीन्द्रनाथ से पूछा.
इन्डोनेशिया की यात्रा में प्रो. सुनीति कुमार चटर्जी और
सुरेन्द्रनाथ कार रवीन्द्रनाथ के साथ थे. प्रोफ़ेसर बेक ने रवीन्द्रनाथ को
इंडोनेशिया आने का निमंत्रण दिया था.
प्रश्न सुनकर रवीन्द्रनाथ खुल कर हंसे.
“सही है, सुरेन्द्रनाथ, इस पहलू पर सोचा ही नहीं. जब भी जो मन
में आया, वही किया. बालकथा, कथा, कविता, उपन्यास – इनके कारण साहित्य के क्षेत्र में प्रवेश
किया. सोचा, यहीं रम जायेंगे, यहीं वास्तव्य करेंगे. परन्तु नहीं...नृत्य, नाटक और
संगीत ने आकर्षित किया. अब चित्रकला ने भी. निरंतर कोई न कोई प्रिय सखी गले पड़ जाए, अपनी लगने
लगे,
वैसा होता गया. आगे चलकर ये प्रिय सखियां एकरूप हो गईं, किसी को भी अलग नहीं हटा
सके.”
“आप ठीक कह रहे हैं, बाबूमोशाय. ये सखियां आपकी
पक्की सखियां हो गईं. मगर आपका जो असीमित पर्यटन है, उसका क्या? रशिया हो
गया,
अमेरिका हो गया, यूरोप तो अनेक बार हुआ. बाल्कन द्वीपसमूह में आप अपनी पोती नंदिनी को लेकर
गए.”
“सच है, प्रोफ़ेसर महोदय, बिलकुल सही है. यात्रा
हमारे जीवन का अविभाज्य अंग है. हमारे पिता ने पहले हमें सियालदह की ज़िम्मेदारी
सौंपी और घने जंगल के, ओने कोने के घर, पद्मा नदी में नौकाघर बनवाकर देखे . गरीबी में पिसे हुए
सैंकड़ों इंसानों को देखा, और अब?
चैन के भूखे, सुखमय जीवन जीने वाले, स्वतन्त्र देश के लोगों को
देख रहे हैं.
चित्र बनाते रहे, और जब उनकी संख्या काफ़ी बढ़
गई तो मैंने अमेरिका में विक्टोरिया ओकाम्पो को सूचित किया. उसने फ़ौरन उन चित्रों
की प्रदर्शनी का आयोजन किया. पहले नोबेल पुरस्कार मिला, इसलिए सब जगह निमंत्रण गए, फिर
प्रदर्शनी के कारण. बीच बीच में व्याख्यानों के निमित्त से घूम ही रहा हूँ कबसे.
बिल्कुल प्रसन्नता से. किसी भी बात से उकताए नहीं.”
“ऐसा क्यों?”
“इस बारे में कभी सोचा ही नहीं. प्रत्येक क्षण
आनंदपूर्वक जीना है, यह बिना सोचे ही होता गया. अब यही देखो ना, दूसरी बार इंडोनेशिया आए
हैं.”
“सच है, रोबी बाबू, आप एक अबूझ व्यक्ति हैं.”
मलाया द्वीप से इंडोनेशिया में जावा सुमात्रा जाने के
बाद वे बाली गए. बाली के लोकनृत्य से वे अत्यंत प्रभावित हुए. उस लालित्यपूर्ण
नृत्य ने रवीन्द्रनाथ के मन पर गहरी छाप छोडी, सुरेन्द्रनाथ कार को वहां
के कपड़ों पर छपे हुए चित्र बहुत पसंद आये और सुरेन्द्रनाथ ने उस बाटिक कला का
ज्ञान आत्मसात किया. फिर थाईलैंड की राजधानी बैंकाक होते हुए वे भारत आये.
भारत में और शांति निकेतन में प्रवेश करते ही दूसरी बार
कनाडा से आमंत्रण आया था. आज तक केवल साहित्यकार
के रूप में उन्हें आमंत्रण प्राप्त होते थे, मगर अब इस बार
अंतर्राष्ट्रीय शिक्षाविद् के रूप में उन्हें आमंत्रित किया गया था. उस समय उन्होंने
अपने एक प्रशंसक अपूर्वकुमार नंदा से कहा,
“अपूर्व कुमार, देखो, अब हम शिक्षाविद् के रूप में भी प्रसिद्ध हो गए हैं.”
“बाबूमोशाय, एक ही व्यक्ति को इतने सारे गुण ईश्वर ने दिए हैं कि वह
स्वयं भी संभ्रमित हो गया है.” कनाडा में उनके साथ अपूर्व कुमार नंदा, सुधीन्द्रनाथ
दत्ता, और चर्च के प्रोफ़ेसर टकर भी थे.
वापस लौटते हुए वे जापान में रुके. उनका नाम तथा
प्रशंसकों का एक बड़ा वर्ग जापान में भी था. एक गौरवर्ण, छोटी-छोटी आँखों वाली,
गुलाबी कान्ति और मध्यम ऊंचाई की तरुणी उनके सामने आई और उसने अपनी गुलाबी हथेली
उनके सामने की. रवीन्द्रनाथ फ़ौरन समझ नहीं पाए, उसके हाथ में पेन भी था.
“हस्ताक्षर!” उसने कहा.
“किस पर लिखूं?”
“सन्देश और हस्ताक्षर हाथ पर लिखें.”
“लिखते समय तुम्हारे हाथ पर गुदगुदी होगी, और कुछ ही
देर बाद हमारे हस्ताक्षर मिट जायेंगे.”
वह हंसी. उसने हाथ की, हवा लेने वाली, फैशनेबल,
हथेली जितनी बड़ी छतरी उनके सामने की, पेन समेत, तब वहां उपस्थित अनेक
युवतियों ने उन्हें छत्रियाँ दीं – हस्ताक्षर के लिए. देखते-देखते सैंकड़ों सन्देश
और सैंकड़ों हस्ताक्षर उन्होंने दिए. अपूर्व कुमार नंदा ने अपनी नोटबुक में सारे
सन्देश लिख लिए. देखते देखते एक पुस्तक के सैंकड़ों पन्नों जितनी सामग्री तैयार हो
गई.
वापस लौटते हुए अपूर्व कुमार नंदा ने कहा,
“रवी बाबू, इन सारे संदेशों की एक पुस्तक बन जायेगी. सारे सन्देश
मैंने संकलित कर लिए हैं.”
“सही है. ये सब विचारों की चिंगारियां ही हैं, इस पुस्तक
को ‘फ़ायर फ्लाईज़’ शीर्षक दे सकते हैं.”
“सचमुच, रवी बाबू, आश्चर्य होता है. आपको केवल निमिष मात्र में ही कैसे
सूझता है?” अद्भुत, दिव्य शक्ति है आपके पास.”
रवीन्द्रनाथ खुल कर हंसे.
“इसका उत्तर कैसे दे सकता हूँ, अपूर्व कुमार? इसके लिए
मुझे भगवान के पास जाना पडेगा, और भगवान के पास जाने के बाद वह मुझे वापस लौटने नहीं
देगा. तब आपको अपने प्रश्न का उत्तर न मिल सकेगा.”
“सच, अभी ही
देखिये ना, साठ वर्ष की आयु के बाद बनाए गए चित्रों की प्रदर्शिनी हो रहे है, उसका
आयोजन भी वह धनाढ्य महिला कर रही है. अनेकों देशों में ये चित्र वितरित होंगे.
कितनी सारी विविध भूमिकाओं में आप
विश्वविख्यात हुए हैं कि आश्चर्य होता है. सचमुच अनन्य साधक हैं आप, अनन्य
साधक!”
“हमें ऐसा लगता है, कि हमने सब कुछ कर लिया है,
मगर पूर्णतः वैसा नहीं होता. अब चित्रों की ओर ध्यान देने का कोई कारण नहीं था.
अपने ही लेखों की त्रुटियाँ सुधारते हुए सहज ही चित्रकारी मन में आ गई.”
चाहे जो भी हो, मगर उस निमित्त से विक्टोरिया ओकम्पा से फिर मुलाक़ात
हुई. उसके बाद रंगचित्रों के प्रदर्शन के उद्देश्य से प्रोफ़ेसर अमेय चक्रवर्ती के
साथ जर्मनी गए. वहां भी डॉ सेलिंग से न केवल मुलाक़ात हुई, बल्कि उसने ही प्रदर्शनी का
आयोजन किया.”
अपूर्व कुमार हंस पड़े और उन्होंने पूछा,
“रवीबाबू, साठ वर्ष की आयु होने पर भी आपमें जो आकर्षण
है ना, वह कायम है. कहां-कहां और कितनी सहेलियां मिलती हैं आपको, वर्ना
हमें देखिये, एक भी सहेली मिल जाए तो सौभाग्य! बर्लिन, जिनेवा में भी महिलाएं आप
ही के निकट थीं.”
अब रवीन्द्रनाथ खुलकर हंसे.
“अपूर्व कुमार, आप जो कह रहे हैं वह सच है. सभी ऐसा ही सोचते हैं.
हमारी लोकप्रियता अंग्रेजों को, हमारे समवयस्क मित्रों को भी अच्छी नहीं लगती. परन्तु
एक मन की व्यथा किसी को नहीं दिखाई देती. हम हमेशा अकेले ही रहते हैं. अपने मन को
समझाते रहते हैं. ‘एकला चलो रे.’ जो महिलाएं आईं, उन्होंने खूब आनंद दिया, और वे चली
भी गईं.”
बोलते बोलते वे उदास हो गए. अपूर्वकुमार के ध्यान में यह
बात आई. “रवीबाबू, ऑक्सफोर्ड के आपके व्याख्यान बहुत लोकप्रिय हुए. अखबारों ने भी खुलकर
तारीफ़ की. परन्तु एक बात मानना पड़ेगी, आप चाहे कहीं भी जाएँ, आपके
चारों ओर लोगों की, प्रश्न पूछने वालों की उत्सुक भीड़ होती ही है.”
शांत भाव से बैठे रवीन्द्रनाथ अपनी ही दुनिया में खो गए
हैं, यह
देखकर अपूर्व कुमार उनके सामने से उठ गए फिर भी उन्होंने गौर नहीं किया.
हर काम के लिए अत्यंत परिश्रम करने को वे तत्पर रहते.
रशिया में स्थान-स्थान पर उनकी, उनके चित्रों की खूब प्रशंसा हुई. साथ ही बढ़ती उम्र में
चित्र साधना की भी लोगों ने खुलकर प्रशंसा की.
मगर रशिया की अपेक्षा अमेरिका के न्यूयॉर्क में उन्हें,
उनके चित्रों को और भाषणों को वांछित प्रसिद्धि नहीं मिली. शायद रशिया में जगह-जगह
पर होने वाली प्रशंसा अमेरिका को अच्छी नहीं लगी होगी. रशिया के सुखद अनुभवों को
उन्होंने ‘Letters from Russia’ शीर्षक से संकलित और प्रकाशित किया है.
रशिया के लोगों के सुखद अनुभव उनके संवेदनशील मन ने महसूस
किये थे. परन्तु चूंकि रशिया कम्युनिस्ट विचारधारा का था, इसलिए उसकी प्रशंसा
भारतीयों को बिल्कुल अच्छी नहीं लगी और उनके विरुद्ध चारों ओर नाराज़गी का सुर
सुनाई दे रहा था.
हमेशा की तरह वे शांत ही रहे. सुख की, प्रसन्नता
की एक लहर उनके शरीर और मन को छूकर जाती और फ़ौरन दुःख की, अपमान की, निराशा की, चिंता की
लहर भी प्रवाहित होने लगती, यह जैसे उनका भाग्य था. अब भी वैसा ही हुआ था.
आज उन्हें अचानक मृणालिनी की याद आई. अखंड कार्यतत्पर
मृणालिनी स्वयं सारे वार झेलती रहती, परन्तु उनका उल्लेख उसने कभी किया नहीं. वे अनेक बार घर
से बाहर होते, तो उनकी अनुपस्थिति के बारे में उनके लौटने के बाद भी शिकायत नहीं की.
हमेशा सेवातत्पर! उसे कोई लोभ-क्रोध नहीं था. उसकी मृत्यु के बाद ही वे उसकी सच्ची
पहचान समझ पाए थे.
हर बार समय निकल जाने के बाद ही उन्हें उसका महत्त्व समझ
में आया था, और पश्चात्ताप भी हुआ था. उनके जीवन में प्रत्येक सुखद घटना साथ में
दुःख लेकर ही आती थी.
उन्होंने हमेशा स्वयं को व्यस्त रखा था. यात्रा में
प्रकृति से, लोगों से साक्षात्कार, और अनुभव वे निरंतर लिखते जाते. इस चित्र
प्रदर्शनी से उन्हें एक अलग पहचान मिली थी.
उस दिन उनकी पुत्रवधू प्रतिमा देवी ने कहा था,
“बाबूजी, आपने एक भी ऐसा विषय नहीं छोड़ा है, जिसे आपका
स्पर्श न हुआ हो. लोगों का बेहद प्यार मिला और आपने भी सब पर खूब प्रेम किया. कई
बार आपके साथ यात्रा करते हुए समझ में आया, कि केवल महिलाएं ही नहीं, बल्कि
पुरुष भी आपसे प्यार करते हैं.”
“हो सकता है, ऐसा भी हो. परन्तु हर बार समाज की स्थिति ने हमें सोचने
पर मजबूर कर दिया. विदेश में हो रही शिक्षा के क्षेत्र में उन्नति, उनका
व्यवसाय, कामकाज, महिलाओं का सुखी और स्वतन्त्र जीवन ...और यदि दूसरी तरफ़ से भारत को देखें
तो दिखाई देती है निराशा, लाचारी, अज्ञान और दारिद्र्य. कला और उसका आनंद है केवल सुखी, संभ्रांत
परिवारों में, शेष समाज का क्या?”
“ये तो सही है, बाबूजी.”
“मगर हम
परदेश में देखते हैं, पैसे का उन्हें मोह है, साथ ही वे उसका मोल भी जानते हैं. मेहनत करने की
तत्परता है, किसान, मज़दूर भी यहाँ गर्दन तानकर खड़ा रह सकता है, इस बात से हमें बहुत आश्चर्य
हुआ. उसमें कोई कमी होगी...”
उस दिन वे बहुत देर तक बातें करते रहे.
“सत्तर वर्ष
के हो गए हम, विश्व में अनेक कारणों से परिचित हुए. परदेश में जाने पर लोग कहते
हैं कि हम सुखी, प्रसन्न, स्वस्थ, सुन्दर हैं.
परन्तु मन का एक कोना दुःख से व्याप्त है. एक के बाद एक
ठाकुरबाड़ी के लोग भगवान को प्यारे हो गए. अब थकान महसूस होने पर भी विदेश के
निमंत्रण अस्वीकार नहीं करते. तकलीफ होती है, परन्तु हमें प्रसन्नता
मिलती है. कभी कभी ऐसा लगता है, की हम आनंद खोजते हुए ही घूमते रहे.”
उन्हें याद आया, पर्शिया के शासक ‘रज़ा शाह
पहलवी ने उन्हें निमंत्रण दिया तो उन्होंने कहा था,
“बिना कोई वजह दिए आइये, रवीन्द्रनाथ.” और वे
प्रतिमादेवी, और केदार चैटर्जी के साथ गए. वहां के दो कवियों – सादी और हाफ़िज़ की कब्र
पर सबसे पहले गए. राजा साहब ने उन्हें शानदार दावत दी तब रवीन्द्रनाथ ने कहा, “इतना सब
क्यों किया राजा साहब?”
“आत्मीयता, प्रेम और आदर!”
रवीन्द्रनाथ चकित हो गए. उन्होंने ही आगे कहा,
“इसलिए नहीं कि आप भारतीय हैं, बल्कि इसलिए कि आप एशिया
के सर्वोत्तम कवि हैं. क्योंकि इंडो-ईरान का मूल पुरुष एक ही वंश का है, इसलिए यह
आत्मीयता है.”
रवीन्द्रनाथ ने निश्चय कर लिया कि अब यात्रा नहीं करना
है. परन्तु जब कोलम्बो का निमंत्रण आया तो व्याख्यान और चित्र प्रदर्शन ऐसे दुहरे
उद्देश्य से वे गए, तब उन्हें तकलीफ़ हुई थी.
यह याद करके उन्होंने प्रतिमा देवी से कहा,
“अब यात्रा बर्दाश्त नहीं होती.”
“अब आपका मन ही प्रवास पर निकला है. वह चुपचाप नहीं
बैठेगा.”
“यह बिलकुल सही है. अब नृत्य सिखाना भी तो कठिन हो चला
है. आजतक शरीर के सारे अंग मौन थे. अब बोलने लगे हैं. उन्हें बोलने देना चाहिए, सही है ना?”
वे हँसे. वह भी हंसी.
“रथींद्र कहाँ गया है?”
“आयेंगे चार दिन बाद. दोनों को एक साथ बाँध कर रखे, ऐसी संतान
हमारे पास नहीं है ना. यह सोचकर कभी कभी बुरा लगता है.”
“नंदिनी ने जैसे बेटी को गोद लिया, उसी तरह
तुम लोग भी किसी लडके को गोद ले सकते थे.”
“बाबूजी आपकी देखभाल के लिए भी तो कोई चाहिए ना. इसीलिये
हमने किसी को भी गोद न लेने का निश्चय किया. इसीलिये तो हम अनेक बार यात्रा में
आपके साथ रहते हैं. असल में तो अभी आवश्यकता है आपको. नंदिनी विवाह के बाद अपनी
ससुराल में है. हम मुक्त हैं.”
रवीन्द्रनाथ ने कुछ नहीं कहा. उन्होंने यह निर्धार किया
था, कि बिना किसी की मदद के जियेंगे, अपनी वेदना किसी को नहीं बताएंगे, परंतु बढ़ती आयु कभी कभी अपना एहसास करवा देती
थी. उन्हें अपने ही ऊपर क्रोध आता. ‘
बुखार को क्या अभी ही आना था?’ ऐसे प्रश्न वे मन में पूछते तब मन में क्रोध उफन आता.
अभी भी हमेशा उनका साथ देने वाले रथीन्द्र और प्रतिमादेवी की मन ही मन प्रशंसा
करते, परन्तु अपने ऊपर क्रोध ही आता.
“बाबूजी, मैं थोड़ा अपना काम करके आती हूं.” प्रतिमा देवी उठकर
चली गई थी. वे अपने ही विचारों में मग्न कुर्सी पर बैठे थे और उन्हें अचानक याद
आया, कब
से उन्होंने निश्चय किया था कि शांति निकेतन के नृत्य के प्रयोग वे अनेक स्थानों
पर करने वाले थे.
नृत्यकला वैदिक काल से ही प्रचलित थी. अनेक पौराणिक
कथाओं पर नृत्य नाट्य प्रस्तुत करने की प्रथा आज भी है. इसके अतिरिक्त हर प्रदेश
के अपने अपने लोक नृत्य हैं. विशेषकर मणिपुरी, भरतनाट्यम्, कथाकली. उसी
तरह शांति निकेतन का भाव नृत्य भी है, जिसमें कथा, सुर, छंद और पदलालित्य भी है. भारत में, कम से कम
दक्षिण भारत में तो प्रस्तुत करना ही चाहिए. कब का वह सपना, अब ढलती
उम्र में अधूरा न रह जाए. वे कुर्सी से उठे, तब कनका और लतिका उनसे
मिलने आईं थीं. दोनों नृत्य में पारंगत थीं. जब वे शांति निकेतन आईं थीं तो बहुत
छोटी, नटखट, पढाई से बचने वाली लड़कियां थीं. अब यौवन से भरपूर लतिकाएँ प्रतीत हो
रही थीं. कनका ने कहा,
“गुरुदेव, अभी हाल ही में आपने हमें नया नृत्य नहीं सिखाया.”
रवीन्द्रनाथ ने हंसकर कहा,
“कनका, लतिका, क्या तुमको ऐसा नहीं प्रतीत होता कि अब हमारी उम्र हो
गयी है?”
“शरीर वृद्ध होता है, मन नहीं, ऐसा आपने
ही कहा था ना? जब मेरे घुटने पर चोट लगी थी तो कहा था, ‘घुटना ही दर्द कर रहा है
ना? मन
तो नहीं दुखता है ना? मन क्या सोचता है, यह उससे पूछो,’ ऐसा आपने कहा था ना, गुरुदेव? वैसे ही
अपने मन से पूछिए, शरीर से ना पूछें.”
“और गुरुदेव...’, लतिका ने कहा,
“आप हमेशा ‘नटीर पूजा’ के बारे में कहते हैं.
कामता प्रसाद भी आपके उस नाटक की प्रशंसा करते हैं. वही नृत्य नाट्य फिर से करें
तो! आपके ‘प्रायश्चित्त’ और ‘फाल्गुनी’ नाटकों में आपने नृत्य किया था. इस बारे में भी सुना
है.”
“और अब बाली से वापस आने के बाद आप ही के मुख से बाली के
लोक नृत्य, संगीत, स्वर, वाद्यवृन्द इत्यादि के बारे में नृत्यकला की कक्षा में आपने इतना कुछ
बताया था, और थोड़ा सा कर के भी दिखाया था. गुरुदेव, ये तो रही अभी हाल ही की
बात, तो फिर इतनी जल्दी आपकी उम्र कैसे हो गई?”
अपने ही शब्द ललिता के मुख से सुनकर रवीन्द्रनाथ ने सोचा, ‘ऐसा तो
नहीं है ना, कि हम कहते कुछ हैं और करते कुछ और हैं?’
‘नहीं, हम जो निश्चय करते हैं, वही करते हैं. सचमुच, कला का और
उम्र का क्या संबंध है? हमने तो परंपरागत नृत्य प्रकारों में भी परिवर्तन किये
हैं. मिश्र संगीत, मिश्र नृत्य इस प्रकार के प्रयोग भी किये.’ उन्होंने शान्ति से लतिका और
कनका से कहा,
“तुम जो कह रही हो, वह ठीक है. हम पहले
नृत्य-नाट्य का लेखन करते हैं. पहले वाले नृत्य अब पुराने हो गए. अब करते हैं सब
कुछ नया-नया. फिर तुम्हें सिखाता हूँ.”
“एक बात मन में आई गुरुदेव, हम ये नृत्य-नाट्य कलकत्ता
के हर स्कूल के उत्सव में क्यों नहीं करते?”
“बहुत अच्छा विचार प्रस्तुत किया तुमने, कनका. इस
पर विचार करता हूँ. ”
“सिर्फ विचार नहीं, सचमुच में करेंगे ना?” वे उत्तर
देने ही वाले थे की उनके दफ्तर से उनके नाम के पत्र लेकर सेवक आया.
पत्र रखकर वह निकल गया. कनका और लतिका भी चली गईं. वे
खड़े हो गए, फिर से बैठ गए. एक पत्र साबरमती से आया था. उसमें गांधी जी के सचिव ने
लिखा था , ‘महात्मा जी को पुणे की येरवडा जेल में रखा गया है, और
उन्होंने अन्न सत्याग्रह का निश्चय किया है.’
‘साबरमती से दांडी तक जाकर महात्माजी ने अनेक लोगों के
साथ वहां का नमक उठाया था. नमक पर लगाया गया कर रद्द होकर नमक सभी को उपलब्ध हो यह
उनका उद्देश्य था. दूसरा उद्देश्य था लोगों को संगठित करना. नमक के सत्याग्रह में
हज़ारों लोगों ने भाग लिया था. यह समाप्त होते-होते पुणे का समझौता. दूसरी गोलमेज़
परिषद के बाद मुसलमानों और सिखों को अलग मतदार संघ मिला था. डा, अंबेडकर
ने दलितों के लिए अलग मतदार संघ की मांग की. अंग्रेजों द्वारा इस मांग को मान लिए
जाने के बाद महात्माजी ने अन्न सत्याग्रह आरंभ कर दिया. ऐसी स्थिति में ब्रिटिश
सरकार उन्हें कारावास में डाले बिना नहीं रुकेगी, अत: आप भी अपनी भूमिका स्पष्ट
करें.’
रवीन्द्रनाथ फ़ौरन कलकत्ता आये. येरवडा जेल में गए, उन्हें
देखकर महात्माजी को बहुत आनंद हुआ. उनके कृश शरीर को देखकर रवीन्द्रनाथ ने कहा,
“अन्न सत्याग्रह क्यों करते हैं? इससे आपके ही शरीर का
नुक्सान होगा, यह बात आप समझ रहे हैं ना? इससे ब्रिटिशों का लाभ होगा या हानि?”
“आत्मविश्वास बढाने के लिए.”
“या दहशत बढ़ाने के लिए?”
“मैं कैसे दहशत का निर्माण करूंगा? मैं एक फटेहाल आदमी
हूँ, मेरे जैसे व्यक्ति से क्या होगा?”
रवीन्दर्नाथ दिल खोलकर हँसे.
“महात्माजी आज पूरे देश से प्रतिक्रियाएं आई हैं. देश
आपकी पल-पल की गतिविधि पर नज़र लगाए हुए है. अब यह जेल भारत का केंद्र बन गयी है.
आपके कुछ प्रश्न होंगे. यदि कुछ बातें मान्य न हों, तो उन पर चर्चा कर सकते हैं,
ऐसा हमारा विचार है. डा. बाबासाहेब आंबेडकर भी भारत की उपेक्षित जनता के बारे में
विचार कर रहे हैं. अर्थात् दोनों की दिशा एक ही है. शायद मार्ग भिन्न हो सकते हैं.
तो सभी मार्गों से एकत्र आकर स्वतंत्रता का अधिकार मांगने का समय आ गया है, ऐसी
स्थिति में आप अन्न सत्याग्रह कर रहे हैं जो योग्य नहीं है.”
अस्पृश्यता हिन्दुओं का नैतिक और धार्मिक प्रश्न है, ऐसा आप
क्यों सोचते हैं? अस्पृश्य, पददलितों का एक बड़ा वर्ग हिंदुस्थान का भाग है.”
हम शांति निकेतन से यही समझाने आये हैं. आप विचार करें.”
वे गए और दो ही दिन बाद पुणे समझौता हुआ. उस समय डा.
आंबेडकर महात्माजी से मिलने और समझौते पर उनके हस्ताक्षर लेने येरवडा जेल गए थे.
रवीन्द्रनाथ वापस लौटे और उन्हें दुखद समाचार प्राप्त
हुआ. इकलौते पोते नितिन्द्रनाथ की अल्पायु में हुई मृत्यु का.
जब वे शान्ति निकेतन में लौटे तो बारिश हो रही थी. आकाश
चारों ओर से घिर आया था. उनका मन निराशा से भर आया था. एक के बाद मृत्यु के दर्शन
करते हुए, उसे अनुभव करते हुए, हम ही क्यों जी रहे हैं? हमारे जीवन का प्रयोजन क्या
है?
क्या होना बाकी रह गया है? या मृत्यु नहीं आ रही है, इसलिए खुद ही अपने मन को
उलझा कर रख रहे हैं?
क्या हम चिरायु हैं? नाचते ही जा रहे हैं, गाते ही
जा रहे हैं, लिखते ही जा रहे हैं, आखिर कब तक? जीने की जिद हमारी तो नहीं
है. एक एक व्यक्ति को मृत्यु के मुख में जाते हुए ऐसा लगता है, जैसे किसी
विशाल वृक्ष की बड़ी टहनी गिर जाती है, उसी तरह पेड़ अपनी टहनियां खोकर बुढापा झेलते हुए अब
खिन्न हो चला है.
वे अपनी शाल्मली कुटीर में आये. धुआंधार बारिश हो ही रही
थी. वे मन से और शरीर से थक चुके थे. उन्होंने गीले वस्त्र बदले और पलंग पर लेट
गए.
शायद कुछ देर के लिए उनकी आंख लगी थी. कहीं खिड़की जोर से
टकराई थी. वे जाग गए. तेज़ बारिश हो ही रही थी, साथ ही तेज़ हवा भी चल रही थी.
उन्होंने दूसरे कमरे की खिड़की बंद की और फिर से पलंग पर लेट गए. कभी बारिश पर लिखी
हुई अपनी ही कविता उन्हें याद आई. तब हर रोज़ शाम को बादल घिर आते थे, परन्तु आज
की बारिश सामान समेत आ धमके बिन बुलाए मेहमान जैसी थी. उस कविता की पंक्तियाँ
उन्हें याद आईं.
आमार निशिधराथेर बादल धारा एषो है
गोपोने आमार स्वपन लोके दिशाधारा
ओ गो अंधाकारे अंतरघन, डाओ ढेके मोरे प्राण
ओ मन आमी चायिने तपन, चायिने तारा.
इस कविता का मन आज का नहीं था, मगर यह कविता याद आ गई और
मन उस काल में चला गया.
शब्दगंगा कैसे अविरत और अविरल प्रवाहित होती रही. चाहे
कोई भी काल हो, समय कोई भी हो, घटना कितनी ही दुखद हो, इस कविता कामिनी का मोह कभी
कम नहीं हुआ. क्योंकि उसने पल भर के लिए भी उनका साथ नहीं छोड़ा था.
वे आधी रात को उठकर बैठ गए. बिजली चली गई थी. उन्होंने
लालटेन जलाई और ‘पूनम’ काव्य संग्रह में प्रकाशित होने वाली रचनाएं एकत्रित करने लगे.
बारिश कब थम गई और निरभ्र आकाश से सूर्य के कोमल पग कब
प्रकट हो गए, इसका भान उन्हें नहीं था. शरीर अत्यंत थक गया था, परन्तु मन अब प्रसन्न था.
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