Wednesday, 5 November 2025

एकला चलो रे - 39

 39

 

रवीन्द्रनाथ ने सुबह सुबह अपनी डायरी देखी. सन् 1934 चल रहा था. उन्हें खुद ही आश्चर्य हुआ. दिन और महीने कैसे पंख लगाकर फड़फड़ाते हुए दूर दूर, कभी वापस न लौटने के लिए उड़ गए, और उम्र के पन्नों को तो इकट्ठा ही नहीं कर सके. हाथ से फिसल गए. जैसे अनजाने ही अंजुली से पानी फ़िसल जाए.

वे हंसे. आज तक मौन रहने वाला एकेक अवयव अब बोलने लगा है, बताने लगा है अपने अस्तित्व के बारे में. उनके मन में विचार कौंध गया, एक तरह से ये सारे संकेत ही मिल रहे हैं अब तक अनदेखे मार्ग के. दिखाई दे रही हैं इस किनारे से इस पार से उस पार तक रेखाएं. एक तरफ मन की अवस्था ऐसी कि अनाहत नाद सुनाई दे रहा है, तो दूसरी ओर मन अभी भी नृत्य कर रहा है, हवा में तेज़ी से गोल-गोल घूमते हुए कागज़ के टुकड़े जैसा मन घूम रहा है.

शांति निकेतन में ‘विश्व भारती की स्थापना होने के बाद शांति निकेतन को स्वतन्त्र अस्तित्व प्राप्त हो गया था. इसका भी प्रचार और प्रसार करना था. शांति निकेतन को मिलने वाला उच्च पद अटल रखना हो तो उसकी महत्ता कायम रखने के लिए एक बार फिर प्रयत्न करना होगा.       

नया उत्साह, नई ऊर्जा लेकर वे मुम्बई आये. उस समय सरोजिनी नायडू ने ‘रवीन्द्र सप्ताह’ मनाने का निश्चय किया था. उसमें रवीन्द्रनाथ के साहित्य, कला, विज्ञान और शांति निकेतन के सन्दर्भ में चर्चा का आयोजन था.

अचानक प्राप्त हुई इस संधि का लाभ उठाते हुए उन्होंने विस्तार पूर्वक ‘विश्व भारती की कल्पना प्रस्तुत की:

खुले आकाश के नीचे, वृक्षों की छाया में, प्रकृति के सान्निध्य में जीवन और शिक्षा देने वाली ‘शांति निकेतन एकमात्र संस्था है. यहां कला के लिए पर्याप्त अवसर है. नृत्य, नाट्य, संगीत शिक्षा, और जीने की कला सिखाने वाली यह संस्था पाश्चात्य कल्पना पर आधारित नहीं है, बल्कि ऋषि काल के गुरुकुल के समान है. आज संस्कार और साधना को भूल चुके भारतीयों को पुनः स्वदेश की, अपने संस्कारों की याद आये ऐसी यह संस्था है. आज यहाँ पाश्चात्य विद्यार्थी भी आनंदपूर्वक अध्ययन कर रहे हैं. पंडित जवाहरलाल नेहरू की कन्या इंदिरा अभी कुछ समय से यहाँ वास्तव्य कर रही हैं.

सरोजिनी नायडू ने भी शांति निकेतन की मुक्त कंठ से प्रशंसा की और कहा कि भारतीय शांति निकेतन को एक अनन्य साधारण जीवन शैली के रूप में देखें.

इसके पश्चात् रवीन्द्रनाथ आंध्रप्रदेश गए. वहां प्रोफेसर राव से बातें करते हुए उन्होंने कहा,

“प्रोफ़ेसर राव, आपको शांति निकेतन की कल्पना इतनी ज़्यादा अच्छी लगी है, तो आप शांति निकेतन चलिए.”

“इसी बात की मैं राह देख रहा था. पिछले तीन दिनों से मैं विभिन्न पद्धति से आपसे चर्चा कर रहा हूँ, वह इसी उद्देश्य से कि आप मेरी उत्सुकता देखकर मुझे आमंत्रित करेंगे. मुझे इसी की उम्मीद थी.”

आंध्र, उड़ीसा करके वे वापस आये. कनिका और लतिका उनसे मिलने आईं.

“गुरुदेव यहाँ से जाते समय आपने देवी सुमति से लोकनृत्य और लोकसंगीत पर आधारित एक कार्यक्रम आयोजित करने को कहा था. वह उन्होंने किया. बहुत सुंदर हुआ.”

“तो अब?

“आप उसे एक बार देखें, तो...”

“हाँ, हाँ, हम देखेंगे. उसका लेखन हमारा था, फिर भी सादरीकरण सुमति देवी का है. नृत्य भी हमारी ही कल्पना से आया. इसलिए हमें यह लोकनाट्य, लोकसंगीत, लोकनृत्य का त्रिवेणी कार्यक्रम देखना है.”

कनका, लतिका भागते हुए चली गईं, रवीन्द्रनाथ हंस पड़े.

जवानी कितनी उत्साह भरी होती है. झरझर बहती है. नादमय और गंधित होती है. ये ही दोनों कल विवाह के बाद ससुराल जायेंगी, तब जीवन के रंगीन धागे बुनेंगी. उसीमें मगन हो जायेंगी, परन्तु ऐसी महिलाओं को अपनी कला को संभालना चाहिए.

उसी समय उनके मन में विचार आया, ‘हमने जैसे चित्र प्रदर्शनी का मुम्बई के टाऊन हॉल में आयोजन किया  था, उसी तरह लोकनृत्य. नाट्य, संगीत का कार्यक्रम भी हर जगह होना चाहिए.’

मन में यह बात आते ही उन्होंने सुमति देवी और अपनी बहू प्रतिमा देवी को बुलाया.

“प्रतिमा, मन में एक विचार आया, इसलिए तुम लोगों को बुलाया. विचार यह है कि अभी हाल ही में ‘श्रावण गाथा यह गीत नाट्य जो हमने लिखा है, तुम लोगों ने प्रस्तुत किया. इस लघुनाट्य और बंगाली लोकनृत्य, लोकनाट्य और लोकसंगीत पर आधारित कार्यक्रम तैयार करें, और जहां नृत्य को मान्यता और सम्मान प्राप्त है, उस भारत की दक्षिण दिशा में शांति निकेतन की ओर से उसे ले जाएं. इससे दो बातें साध्य होंगी, पहली यह कि एक कार्यक्रम हम प्रस्तुत करेंगे, और दूसरी – उसके माध्यम से हम शांति निकेतन का परिचय दे सकेंगे. लोकसाहित्य पर भी विचार प्रस्तुत कर सकते हैं.”

“बाबूजी, यह कल्पना बहुत सुन्दर है. बंगाली साहित्य, नृत्य, नाट्य, संगीत – यह सब आज रवीन्द्र संगीत के रूप में प्रसिद्द होगा.”

और पहला नृत्य-नाट्य समूह लेकर वे श्री लंका गए. वहां से वापस लौटते समय दक्षिण भारत में अनेक स्थानों पर उनका सत्कार हुआ. वे मन ही मन हंसे.

‘सन् 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला. देश में सैंकड़ों स्वागत समारोह हुए. परन्तु अब सन्   1934 में दक्षिण भारत आने पर ‘विश्वकवि’ के रूप में सत्कार हो रहा है. यह कुछ अगम्य ही है. भारतीय व्यक्ति के बारे में यह प्रसिद्द है कि वह उदार है. आतिथ्य भी खूब हुआ. परन्तु वह तारीफ़ करने में, प्रशंसा करने में इतनी देर क्यों करता है?

प्रतिमादेवी ने सहज ही कहा,

“बाबूजी, हमारा भारत देश कितनी विविधताओं से सजा हुआ है, इस कार्यक्रम के माध्यम से उसका दर्शन हुआ. मन होता है कि इसी तरह यात्रा करते रहें.”

“तुम कर सकते हो, मगर अब हमारा बाहर जाने का मन नहीं होता.”

“ऐसी बात बिल्कुल नहीं है, बाबूजी. अभी यदि यू.के. से निमंत्रण आया तो आप जायेंगे! सही है ना?

“किसी न किसी को साथ लेकर जाते हैं, यह सच है. परन्तु अब परदेस जाने का बिलकुल मन नहीं होता. शांति निकेतन, यहां का हमारा शाल्मली कुटीर, बच्चों के खेल, उनकी आवाजें, इस सब के बीच हमें अकेलापन महसूस नहीं होता. कभी कभी तो हमारी शब्द-सखी भी रूठ जाती है. कभी-कभी.’ उन्होंने मन में कहा. प्रत्यक्ष में उन्होंने कहा, “प्रतिमा, अब परदेश के निमंत्रण को नकारने का निश्चय किया है. तेरह वर्ष की आयु से निरंतर घूमने वाले हम प्रवासी हैं. यह नहीं कहते, कि ‘थक गए हैं,’ मगर अब...”

वह हंसी.           

उन्होंने मन ही मन कहा, ‘रथींद्र, तुम और प्रतिमा निरंतर हमारा ध्यान रखते हो, इसलिए तो स्वच्छंद घूमते रहे.’

“बाबूजी, अभी हाल ही में आपके उपन्यास ‘चार अध्याय का प्रकाशन हुआ ना! मैंने अभी तक उसे पढ़ा नहीं है. जैसे ईश्वर हरसिंगार के पेड़ को अनगिनत पुष्प देता है, उसी तरह उसने शब्दों के फूलों की अविरत धारा  आपकी हथेली में डाल दी है. आप धन्य हैं.”

 शांति निकेतन वापस लौटने पर नृत्य नाट्य मंडली अपने अपने अनुभव बार बार दुहराते हुए प्रसन्न हो रही थी. वे भी प्रसन्न थे. परन्तु दिन के बाद जैसे रात आती है, वैसा ही हुआ. उनकी कविताओं के गायक, रवीन्द्र संगीत संकल्पना के आविष्कारक दिनेन्द्रनाथ ठाकुर की कलकत्ता में मृत्यु हो गई. आते ही वे फ़ौरन कलकत्ता गए.

जिन्होंने उनका निरंतर साथ दिया उनका इस तरह जाना मन को विदीर्ण कर रहा था और पल भर को मन में विचार आया कि अब जीवन शून्य है. परन्तु दूसरे मन ने तत्काल कहा,

‘यदि कोई रुकने वाला न हो, कोई साथ में चलने वाला न हो, तो हम ‘एकला चलो रे...’ यही भावना रखेंगे. हमारे हाथ में और है ही क्या? दूसरे मन ने कहा,

‘कठिन है, रोबी, असंख्य व्यक्तियों के साथ, शब्दों के साथ तुम चल ही रहे हो. एकला, तो एकला. साथ में चलने वाले लोग होते हैं, इसलिए हम उनके साथ मन से नहीं चल रहे होते हैं, ‘एकला’ ही चलते रहते हैं! फिर तुम उदास क्यों होते हो?

वे अपने ही मन को समझाते हुए बोले,

‘महात्मा गांधी ने अन्न सत्याग्रह किया, अपनी उम्र भूलकर तू पुणे भागा. अपने हाथों से उनका उपोषण रोका. दूसरे महायुद्ध के संकेत नज़र आने लगे, तुम बेचैन हो गए. भारतीय फिर से ब्रिटिशों की सहायता क्यों करें, हमारा राज्य लेकर हम पर हुकूमत करने वाले अंग्रेज़, उन्हें ही क्यों विजय दिलाएं? भारतीय शासन अधिनियम के अनुसार सन् 1935 में, अर्थात् दो वर्ष पूर्व ब्रिटिश और भारतीय दोनों को मिलाकर उनके लिए स्वतन्त्र न्यायालय का गठन हुआ. फ़ेडरल कोर्ट की स्थापना हुई, फिर भी ब्रिटिशों की सत्ता कायम रहे ऐसी ही व्यवस्था थी. फिर भी प्रान्तों को स्वशासन का अधिकार प्राप्त हुआ. हालांकि भारतीय और ब्रिटिशों की एकत्र शासन प्रणाली थी, परन्तु सब कुछ केंद्र के आधीन था, और केंद्र में शासन तथा आधिपत्य था ब्रिटिशों का.

और इस तरह सतही तौर पर भारतीयों को न्याय दिलाने वाले क़ानून बनाए गए फिर भी अभी तक सत्ता ब्रिटिशों की ही थी, और अन्य लोगों की भांति हमें भी स्वतंत्रता का सूर्य देखने की जल्दी है. परन्तु एक बार फिर युद्ध के संकेत मिलने लगे थे.

रवीन्द्रनाथ कभी कभी अत्यंत निराश हो जाते थे. थक जाते थे. जीवन का प्रयोजन क्या है, इस पर विचार करते रहते और साथ ही दूसरा मन भी सजगता से विचार करता. राजकीय, सामाजिक, आर्थिक पहलुओं से विचार करते हुए व्यवहारिक स्तर पर उनका मन एकदम कथा-कविता, नाटक में व्यस्त हो जाता.

उन दिनों वे ‘चित्रांगदा नृत्य-नाटक पर काम कर रहे थे. चित्रांगदा अर्जुन की पत्नी थी. उसके पिता ने आदेश दिया था कि यदि मित्रता चाहते हो, तो चित्रांगदा से विवाह करो. अर्जुन ने उससे विवाह किया और गर्भवती होने पर उसका त्याग कर दिया. प्रतिशोध लेने की दृष्टी से चित्रांगदा अपने पुत्र को पिता के विरुद्ध तैयार किया. यहाँ तक का कथानक इस नृत्य नाट्य में था. मगर कभी शीघ्र गति से चलने वाले रवीन्द्रनाथ के पांव अब थक चुके थे. परन्तु फिर भी वे नृत्य नाट्य का निर्देशन ही नहीं, बल्कि उसमें भूमिका भी कर रहे थे.   

शांति निकेतन की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए नृत्य-नाट्य समूह को लेकर वे पूरे भारत में घूम रहे थे. फले-फूले वृक्ष के समान शांति निकेतन को अब पानी कम पड़ रहा था, यह परिस्थिति भी उन्हें बेचैन कर रही थी.

इसी समय कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में उन्हें व्याख्यान देने के लिए आमंन्त्रित किया गया था. उन्हें अपने विचार सबके सम्मुख रखने का मौक़ा प्राप्त हुआ था. इस अवसर का लाभ उठाते हुए उन्होंने कहा,

“शैक्षिक पदवी लेकर आपने अपनी सजीव, आलोचनात्मक दृष्टि का अनुभव प्राप्त किया, परन्तु भी आपको अपना लक्ष्य प्राप्त करना है. पदवी परिक्षा में मिला हुआ उत्तम यश सफल जीवन की कुंजी नहीं है.

‘ब्रिटिशो का राज, भारत के शोषण की अवस्था, दारिद्र्य, दुःख और अज्ञान के बीच अब युद्ध के संकेत मिलने लगे हैं. इस सबके बीच आप लोग नौकरी प्राप्त करके अपने जीवन को सुखी और संपन्न बना लोगे,  परन्तु समाज का क्या? बंधुत्व की भावना का क्या? विश्वबंधुत्व की भावना का क्या? विचार करें.’

‘आज देश की स्वतंत्रता के लिए विभिन्न मार्गों से प्रयत्न किये जा रहे हैं. ऐसी स्थिति में यदि देश स्वतन्त्र होता है, तो हम देश के लिए क्या करेंगे, इसका विचार आज के विद्यार्थियों को करना चाहिए.”

भाषण के पश्चात् उन्होंने विद्यार्थियों से हुई चर्चा में अनेक विषयों पर चर्चा की. सशस्त्र क्रान्ति में युवकों का नहीं बल्कि विद्यालयीन, महाविद्यालयीन युवतियों का सहभाग, सन् 1857 से लेकर आज, जब अभी स्वतंत्रता का सूरज भी नहीं निकला है, अनेक नौजवानों और नवयुवतियों द्वारा दी गयी प्राणों की आहुति, असहकार सत्याग्रह, उपोषण पर विश्वास रखने वाला एक जन प्रवाह.

यहां से अगली पीढ़ी के कर्तव्यों पर जब चर्चा हुई तो रवीन्द्रनाथ प्रसन्न हो गए. मन की बात व्यक्त करके वे बहुत प्रसन्न थे. 

शांति निकेतन लौटने पर उनका ध्यान इस बात की ओर गया कि दक्षिण में, श्रीलंका तक नृत्य नाट्य के टिकट लगाकर प्रयोग किये गए. फिर भी प्राप्त हुई धनराशि और शांति निकेतन का बढ़ता हुआ व्यय इनमें ज़रा भी मेल नहीं था. विद्यार्थी दो कारणों से प्रवेश ले रहे थे, एक तो पढ़ने के लिए, और कला आत्मसात करने के लिए. और निचली कक्षाओं में आते थे – दो बार भोजन और कोई छोटा-मोटा काम करके कुछ पैसे मिल जाएं इसलिए. अनेक विद्यार्थी गाँवों से आते थे.

एक बार शुरू किये गए नियम रीति अब प्रतिष्ठित हो चुकी संस्था में समाप्त करना असंभव था. आजकल उन्हें इसी बात की चिंता थी. बढ़ती उम्र के साथ अब छोटी मोटी बीमारियां उनके शरीर पर मानो अपना अधिकार जमा रही थीं. और जवानी की लहलहाती शिशिर ऋतु अब पतझड़ की ओर जा रही थी.

फिर भी आजकल उनके मन में एक ही विचार था कि नृत्य नाट्य के प्रयोग अब टिकट लगाकर पूरे भारत में किये जाएं और पैसों का इंतज़ाम किया जाए. पटना, अलाहाबाद, लाहोर – इन शहरों में भी उन्होंने कार्यक्रम किये, और अगला कार्यक्रम दिल्ली में होने वाला था. उस समय महात्मा गांधी दिल्ली में थे. वे रवीन्द्रनाथ की राह देख रहे थे. जब अत्यंत क्लांत अवस्था में रवीन्द्रनाथ उनसे मिले तो महात्माजी ने उन्हें कार्यक्रम रद्द करके विश्राम करने की सलाह दी. तब रवीन्द्रनाथ ने उन्हें सारी परिस्थिति से अवगत कराया तो महात्माजी बोले,

“आप चिंता न करें. शांति निकेतन  - इस अभिनव संस्था का निर्माण आपने किया है, कला और ज्ञान के लिए. वह बिलकुल बंद नहीं होगी. आप वापस जाएँ और विश्राम करें.”

महात्मा गांधी ने जैसा कहा था, वैसा ही किया. उन्होंने साठ हज़ार रुपये जमा करके रवीन्द्रनाथ को दिए तो रवीन्द्रनाथ को अत्यंत प्रसन्नता हुई. शांति निकेतन के अपूर्व सेन ने उनसे कहा,

“किसी भी संस्था को सर्वप्रथम जिस जोश से लोग संभालते हैं, उद्देश्यों का पालन करते हैं, वह संस्थापक व्यक्ति और ध्येय के प्रति समर्पित कार्यकारिणी हमेशा नहीं रहती. फिर उसे व्यावसायिक स्वरूप प्राप्त हो जाता है. आज महात्माजी ने चन्दा इकट्ठा करके धन दिया इसलिए हमारे अच्छे दिन कायम रहे.”

“सत्य है. संस्था के संस्थापक का कार्य नई संतान का जन्म और उसके संगोपन के समान होता है. आगे चलकरउसका कार्य होता है इस संतान का ध्यान रखना. हमारी योजनाएं, हमारे विचार, हमारी रीति नीति प्रणाली इतने वर्षों से चल रही है, इसकी ख़ुशी है. परन्तु विश्वात्मक आनंद के लिए स्थापित यह विश्व ज्ञान, कला केंद्र व्यावसायिक न हो जाए, और वह बंद भी न हो जाए, इसी बात की चिंता है.”

“ प्रत्येक संस्थापक के लिए यह स्वाभाविक है. परन्तु आपके द्वारा निर्मित कार्यकारी मंडल हैं. आपके द्वारा शिक्षित विद्यार्थी हैं, उन्हें संस्था से मोह होगा ही. आप चिंता न करें.”

आप ठीक कह रहे हैं. परन्तु जो पौधा लगाता है, उसे बड़ा करता है, उसे हमेशा चिंता रहती है उसके उत्कर्ष की. हम अब वयोवृद्ध हो चले हैं, देह के पत्ते कब टपक जायेंगे इसका कोई भरोसा नहीं. ऐसे समय...’

उनका मन भर आया. अपूर्व सेन ने कहा,

“महात्माजी ने आज व्यवस्था की है. अनेक लोग आगे आयेंगे और आपके द्वारा लगाए गए शांति निकेतन की शान को संभालेंगे. उसे चिर प्रतिष्ठा मिलती रहेगी. निःस्वार्थ दृष्टि से और सद्हेतु से किये गए कार्य को समाज में भी आदर मिलता है.”

रवीन्द्रनाथ काफ़ी संभल गए. उन्होंने कहा,

“महात्मा जी ने कहा, ‘आप कोई चिंता न करें. विश्वभारती और विश्वविद्यालय बन चुकी यह सुदृढ़ इमारत हमेशा सुदृढ़ ही रहेगी. वैसे मैं जवाहरलाल नेहरू से भी इस बारे में बात करूंगा. आपकी तबियत बहुत कमजोर हो गई है. संस्था की चिंता न करें. अपने आप को संभालिये. ‘सिर सलामत, तो पगड़ी पचास.’

हमें महात्माजी के इस वाक्य पर हंसी आई. मगर कुछ भी हो, साठ हज़ार कोई छोटी रकम नहीं होती, यह एहसास हमें है.”

दोनों का वार्तालाप चल रहा था की कनका आई. उसका विवाह निश्चित होने से वह शांति निकेतन छोड़कर जा रही थी. रवीन्द्रनाथ ने उसके मस्तक पर हाथ रखते हुए कहा,

“कनका, जीवन का सुखद क्षण है विवाह. सुखी रहो. प्रसन्न चित्त जाना. परन्तु यहाँ का नृत्य न भूलना. एक नृत्य शाला शुरू कर सकती हो.”

“निश्चित, गुरुदेव! वही मेरी गुरुदक्षिणा होगी आपके लिए.”

उनकी आंखें फिर भर आईं. उन्हें स्वयं पर ही आश्चर्य हुआ, ऐसा लगा की हम पल-पल अधिकाधिक संवेदनशील होते जा रहे हैं.

कनका चली गयी, अपूर्व सेन भी निकल गए. वैसे देखा जाए तो सबके बीच रहकर भी मनुष्य हमेशा अकेला ही रहता है. मगर आज उन्हें कुछ ज़्यादा ही अकेलापन लग रहा था. आम तौर पर घिर आये आकाश, गहरा गया वातावरण, और अस्वस्थ मन पर वे एकाध कविता कर लेते. नदी के बीच किसी पत्थर को चारों तरफ़ से पानी घेर ले और उस पर खड़ा आदमी लाचार हो जाए, वैसा लग रहा था.

कहीं से कोई दुखद समाचार तो नहीं आने वाला? उनका मन साशंक हो गया. रात मुश्किल से बीती होगी, कि उनके नाम से तार लेकर आदमी खड़ा था. उन्होंने हस्ताक्षर करके तार पढ़ा. उसमें सुभाषचंद्र बोस ने लिखा था, ‘क्षमा करें, गुरुदेव, परन्तु आने में असमर्थ हूँ. संभव हुआ तो बिना सूचित किये ही आपसे मिलने चला आऊंगा.’

सुभाष बाबू का अतीव उत्साह उन्हें बहुत अच्छा लगता था. नरेंद्र दत्त के प्रति जिज्ञासा थी, योगी अरविंद के प्रति आदर था, और सुभाष चन्द्र द्वारा चुने गए मार्ग के प्रति सम्मान था. वे आने वाले हैं, इसलिए उन्होंने बहुत सारे देशप्रेम संबंधी गीत उनके सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए तैयार करवाए थे. उनके कौतुकास्पद शब्द भी इस बार रवीन्द्रनाथ ने लिख लिए थे. आम तौर पर वे लिखे हुए वाक्य पढ़कर प्रस्तुत नहीं करते थे. शायद मन को अनजाने ही आभास हो गया था कि वे नहीं आयेंगे.

उन्होंने लिखा था,

‘हम आपको सम्माननीय लोकमाता के रूप में स्वीकार करते हुए, बंगाल के कवी के रूप में शांति निकेतन में आमंत्रित करते हैं. समय समय पर श्रीमद्भगवत गीता द्वारा आश्वासन मिलता है, कि                     

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥

यह बात तुम्हारे बारे में अक्षरशः सत्य सिद्ध हो चुकी है. सुभाषचंद्र तुम्हारे योग्य उच्चपद ही तुम्हें देना चाहिए.’

रवीन्द्रनाथ के ये शब्द उनकी डायरी में ही दर्ज थे. परन्तु मन की बात सुभाषचंद्र तक पहुँच चुकी थी. मानवता की रक्षा करने वाले महाकवि के रूप में सुभाषचन्द्र के मन में उनके प्रति आदर था. उनके लेखनी के द्वारा, उनके शांति निकेतन के कारण कर्म और साधना संभव हो रही है, ऐसा सुभाषचंद्र मन:पूर्वक मानते थे.

एक दूसरे के प्रति यह आकर्षण स्वाभाविक था. दोनों के ही मन में तीव्र भावना थी, कि देश को स्वतन्त्र होना ही चाहिये.

आज सुबह रवीन्द्रनाथ उठने के बदले पलंग पर शांत लेटे थे. बिना किसी कारण के यूं ही लेटे रहने का जीवन में यह पहला मौक़ा था. उन्हें भी स्वस्थ-शांत प्रतीत हो रहा था. वे हमेशा की तरह प्रार्थना पर उपस्थित नहीं थे, तो अपूर्व सेन प्रार्थना के उपरांत उनसे मिलने आये.

“कुछ भी नहीं हुआ है. परन्तु जी चाहता है कि पलंग से उठें ही नहीं. न कुछ बोलें, ना लिखें. आज अपने शांत मन को ही पढ़ा जाए, उसका अध्ययन किया जाए.”

“ठीक है, मैं चलता हूँ. आपको कुछ हुआ तो नहीं यही देखने के लिए आया था. आप ठीक हैं, यह देखकर अच्छा लगा.” मगर मन ही मन अपूर्व सेन को महसूस हो रहा था, कि ‘रवीन्द्रनाथ बहुत ज़्यादा थक गए हैं, अब उन्हें विश्राम की ही आवश्यकता है. अब उन्हें कहीं जाने की अनुमति ही नहीं देना चाहिए. बस, यहीं रहें वे, सबकी नज़रों के सामने,’ वापस जाते हुए वे अपने मन में कह रहे थे.

रवीन्द्रनाथ अब पहले की तरह शांति निकेतन के परिसर में भी कभी-कभार ही आते, अपूर्व सेन मन में चिंतित थे. इसी बीच पंद्रह दिन बाद कलकत्ता से सुभाषचंद्र का पत्र आया.

‘गुरुदेव, कलकत्ता में एक इमारत बन रही है, ‘महाजातिसदन . इसका आधारशिला समारोह आपके करकमलों द्वारा हो, यह इच्छा है. यह सदन केवल लोगों के उपयोग के लिए ही रहेगा. आप अवश्य आयें.’

रवीन्द्रनाथ ने शाम को पुत्रवत् उनका ध्यान रखने वाले अपूर्व सेन को यह सब बताया, तब उन्होंने कहा,

“जीवन अब ढलान पर है, लोग सोचते हैं कि हम जैसा व्यक्ति थोड़ा कार्य और कर ले. इसमें उनका कोई दोष नहीं है. स्वास्थ्य अच्छा रहे इस दृष्टी से यह ‘डाईवर्शन नहीं है क्या?”

आम तौर पर उत्साह से बोलने वाले रवीन्द्रनाथ अब कहीं बाहर बोलते समय लिख कर बोलने लगे थे और सहकारियों से भी संक्षिप्त बातचीत ही करते.

अभी भी उनके शब्दों का प्रवाह अविरत था. नृत्य, नाट्य, कविता निरंतर प्रवाहित हो रहे थे. ब्रह्माण्ड के अनंत फूल उन्होंने सहज ही इस तरह उछाले थे, मानो हरसिंगार के फूल बिखेर रहे हों. उनकी गंध मन में घमघमाती  रहती.

सन् 1939 स्वास्थ्य की दृष्टी से यूं ही रहा. प्रतिमा देवी और रथींद्र अब शांति निकेतन में ही रहने के लिए आ गए थे.

उस दिन प्रतिमा देवी ने कहा,

“बाबूजी, अब कहीं भी बाहर नहीं जाना है. कहीं का भी निमंत्रण स्वीकार नहीं करना है.”

“ठीक है. आमी भालो आछे, प्रतिमा.”

“ठीक है, फिर भी इसे हमारी विनती समझें.”

उन्होंने गर्दन हिलाकर ‘हाँ कहा. मगर उसी दिन दोपहर में मेदिनीपुर में ईश्वरचंद्र विद्यासागर की स्मृति में बनाए गए मंदिर का उद्घाटन करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया था.

अब क्या किया जाए, यह प्रश्न उन्हें सता रहा था.

 

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